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गुरुवार, 22 नवंबर 2018

यात्रा वृतांत-सुरकुंडा देवी का वह यादगार सफर, भाग3


गढ़वाल हिमालय के सबसे ऊँचे शक्तिपीठ के दिव्य प्राँगण में


कद्दुखाल से सुरकुंडा देवी तक 3 किमी का ट्रेकिंग मार्ग है, जहाँ हमें 8000 फीट से लगभग 10000 फीट ऊँचाई तक का आरोहण करना था। पूरा रास्ता पक्का, पर्याप्त चौड़ा और सीढ़ीदार है, प्रायः हल्की चढ़ाई लिए समतल, लेकिन बीच-बीच में खड़ी चढ़ाई भी है। जो चल नहीं सकते, उनके लिए घोड़े-खच्चरों की भी व्यवस्था है, लेकिन हमारे दल में कोई ऐसा नहीं था जिसे इनकी जरुरत पड़ती। पहाड़ को चढ़ने का सबका उत्साह और जोश देखते ही बन रहा था। अगले ही कुछ मिनटों में दल का बड़ा हिस्सा दृष्टि से औझल हो चुका था, कुछ ही पथिक साथ में बचे थे।


लगभग आधा पौन घंटे की चढ़ाई के बाद दम फूल रहा था, सो यहाँ एक बड़े से बुराँश पेड़ की छाया तले रेलिंग के सहारे खड़े हो गए, कुछ दम लिए, जल के दो घूंट से सूखे गले को तर किए और फिर आगे चल दिए। इन विशिष्ट पलों को यादगार के रुप में कैमरे में केप्चर किए।


इस रास्ते की खासियत ये बुराँश के पेड़ भी हैं, जो पर्याप्त मात्रा में लगे हैं। गुच्छों में लगी लम्बी हरि पत्तियाँ इनकी पहचान है। अप्रैल-मई माह में इनमें सुर्ख लाल रंग के फूल लगते हैं, जिनसे तैयार किया गया जूस औषधीय गुणों से भरपूर रहता है, विशेषरुप से ह्दय के स्वास्थ्य के लिए उपयोगी।
इसी रास्ते में खट्टे-मीठे जंगली फलों की झाडियां भरपूर मात्रा में लगी हैं, बल्कि बीच में तो सड़क इन्हीं से घिरी हुई दिखीं। इनमें कांटेदार पत्तों बाली दारू हल्दी(शाम्भल), आंछा आदि विशेषरुप में दिखी। कुछ नए पौधे व झाड़ियां भी थीं। लगा, इनके जानकार किसी जड़ी-बूटी विशेषज्ञ के साथ इस इलाके की यात्रा यहाँ की दुर्लभ वनस्पतियों पर रोचक प्रकाश डाल सकती है।
काफिले के साथ बीच में मुख्य मार्ग से हटकर हमनें कुछ चढ़ाईदार शॉर्टकट्स भी मारे, जिसकी राह में वाचा घास के दर्शन हुए। इसको देखते ही जैसे बचपन आंखों के सामने तैर उठा, जब हमारे नानाजी अपने कपड़े की थैली से लोहे की कमानी निकालकर चकमक पत्थर पर चोट मारते और इसकी चिंगारी वाचा घास को सुलगा देती, जिसे चिल्म की तम्बाकू पर रखकर आग सुलगते हुए उनकी चिल्म तैयार हो जाती। तब नानाजी यह घास स्थानीय जंगलों से लाते थे। यहाँ यह अग्नि प्रज्जवल्क घास हमें प्रचुर मात्रा में ढलानों में उगी दिखी। लगा नहीं कि यहाँ कोई इसके इस गुण, धर्म व प्रयोग से परिचित है, क्योंकि यह निर्बाध रुप से ढलानों पर फैली थी।
रास्ते में चाय-नाश्ते आदि की व्यवस्था ढाबों में थी, लेकिन आज समय अभाव के चलते यहाँ रुकने की गुंजाइश नहीं थी। बाकि, साथ में रखी पानी की बोटल से काम चल रहा था। जहाँ थक जाते दो पल दम भरते और आगे चल देते। रास्ते में हमें हर उमर के सैलानी, तीर्थयात्री मिले, जिनमें बच्चे, बुढ़े, जवान, कप्पल, स्टुडेंट व प्रौढ़ शामिल थे। सबसे आश्चर्य नन्हें बच्चों को पैदल ट्रैकिंग करते हुए देखकर हुआ, जिनमें एक-ड़ेढ़ साल से लेकर 3 साल तक के बच्चे दिखे। इनको देखते ही मन रोमाँचित हो उठता, इनके जीवट को सलाम करते हुए इनसे हेंडशैक करते, इनको टॉफियाँ देते और लगता कि येही दुर्गम शिखरों पर शौर्य एवं जीवट का झंड़ा फहराने वाले भावी कर्णधार हैं।
मंजिल के लगभग अंतिम शॉर्टकट के दौरान रास्ते में हमें हेलीकॉप्टर के दर्शन हुए, जो घाटी में हमसे काफी नीचे उड़ रहे थे। अहसास हुआ, जिन हेलीकॉप्टर को हम मैदान में नीचे से निहारते हैं, आज वो हमसे कितना नीचे हैं और जैसे वो हमको निहार रहे हों। लगा, यह ऊँचाईयों के साथ दोस्ती का परिणाम था। जितना हम ऊँचाईयों का संग-साथ करते हैं, उतना ही निचाईयां पीछे छूटती जाती हैं और अनायास ही हम ऊच्चता एवं महानता के संवाहक बन जाते हैं।
लेकिन अपनी उच्चता का मुगालता पालने की भी जरुरत नहीं। प्रभु की सृष्टि में हर इंसान व प्राणी अपनी मौलिक विशेषता के बावजूद अधूरा है और सबको मिलकर ही सर्वसमर्थ पूर्ण सत्ता बनती है। इन्हीं क्षणों में टीम के जागरुक सदस्यों ने  सर पर काफी ऊँचाईयों में मंडराते हुए ड्रोन कैमरे की ओर ईशारा किया। लगा सब प्रभु की माया है, हेलीकोप्टर नीचे और ड्रोन कैमरा हमारे ऊपर, हम बीच में कहीं। काहे का तथाकथित महानता का मुगालता-काहे का दंभ, काहे की तुलना और काहे का कटाक्ष। हम तो माता के दर्शन के लिए निकले थे, मंजिल पास थी, सो उस पर ध्यान केंद्रित कर सामने खड़ी मंजिल की ओर बढ़ चले।
हम उस बिंदु पर थे, जहाँ से उड़न खटोले का काम चल रहा था। अगले कुछ ही महीनों में इसके तैयार होने के आसार हैं। कमजोर, बुजुर्ग और बीमार लोगों के लिए यह सुविधा वरदान सावित होने वाली है, जो पैदल चलकर या खच्चरों पर बैठकर यहाँ तक नहीं आ सकते। साथ ही यह भी लगा कि इस सुविधा के चलते कई स्वस्थ-सक्षम किंतु आरामतलब लोग इस राह के रोमाँच व सुंदर नजारों से बंचित रह जाएंगे। 

सुरकुंडा देवी के दिव्य प्रांगण में
जुत्ताघर में जुता उताकर हम मंदिर के पावन परिसर में प्रवेश किए। आगे पहुँचे हुए सदस्य सब इधऱ-उधर तितर-बितर हो चुके थे। हम मंदिर की परिक्रमा कर मंदिर में प्रवेश किए, माता का दर्शन किए, आशीर्वाद लिए और बाहर मंदिर के पीछे एक कौने पर आसन जमाकर बैठ गए। सामने बर्फ से ढकी हिमालय की विराट ध्वल श्रृंखलाएं अपने दिव्य वैभव के साथ अटल तपस्वी जैसी खड़ीं थी, उस ओर मुंह कर कुछ पल चिंतन-मनन व ध्यान के विताए। 
हमारे विचार से सुरकुंडा शक्तिपीठ से हिमालय का पावन सान्निध्य इस स्थल को विशिष्ट बनाता है। यहाँ विताए कुछ पल बैट्री चार्ज जैसा अनुभव रहते हैं।
काफिले का फोटो और सेल्फी अभियान जारी था। आग्रह पर हम भी बीच में शामिल हो गए और अंत में सबको बटोरकर एक ग्रुफ फोटो के बाद भगवती को अपना भाव निवेदन करते हुए बापिस चल दिए।
ज्ञातव्य हो कि सुरकुंडा माता वह शक्तिपीठ है, जहाँ सती माता का सर व कंठ बाला हिस्सा गिरा था, इसलिए इसका नाम सरकंठ पड़ा, जो क्रमशः बदलते-बदलते सुरकुंडा हो गया। यहाँ नवरात्रियों व ज्येष्ठ माह के गंगा दशहरा के दौरान विशेष भीड़ रहती है। आज यहाँ भीड़ उतनी अधिक नहीं थी। 
मंदिर परिसर में हनुमान, शिव-परिवार सहित अन्य देवी-देवताओं के विग्रह स्थापित हैं, जो हिमालय की पृष्ठभूमि में विशिष्ट भाव जगाते हैं।
     मंदिर का नवनिर्माण पिछले ही वर्षों हुआ है, जो एक विशेष शैली में है। इस शैली का मंदिर हम पहली वार देखे। यह इस क्षेत्र के सबसे ऊँचे शिखर पर स्थापित है, जहाँ से देहरादून, ऋषिकेश, प्रतापनगर एवं चकराता साइड के सुंदर दृश्यों को निहारा जा सकता है। मौसम साफ होने पर कुंजादेवी, चंद्रबदनी सहित केदारनाथ, बद्रीनाथ, गंगोत्री, यमुनोत्री क्षेत्र की समस्त चोटियों के दर्शन किए जा सकते हैं। 
सामने बर्फ से ढकी सफेद चोटियों के दर्शंन तो हमें भी हो रहे थे, लेकिन ये कौन सी चोटियां हैं, बताने वाला यहाँ भी कोई नहीं मिला, सो इस अनुतरित प्रश्न के साथ हम बापिस चल पड़े।
बापसी का रास्ता
इस जिज्ञासा के साथ हम बापिस कद्दुखाल तक नीचे उतरे। उतरने में अधिक समय नहीं लगा। चढ़ाई जहाँ लगभग 2 घंटे में तय हुई थी, उतराई महज पौने घंटे में पूरी हो गयी। उतराई में हम अघोषित नियमानुसर सबसे आगे थे। रास्ते में बुराँश के पेड़ हमें विशेष रुप में प्रभावित करते रहे, लगा कि अप्रैल-मई में फूलने पर इनके सुर्ख लाल फूलों से गुलजार इनके जंगल कितने सुंदर लगते होंगे।
जहाँ थोड़ा दम भरना होता, वहाँ खड़ा होकर नीचे की घाटी के विहंगम दृश्य को निहारते, जो स्वयं में अद्भुत, मनोरम एवं बेजोड़ हैं। लगता इन्हें निहारते हुए यहीं ठहर जाएं, लेकिन समय की सीमा इसकी इजाजत नहीं दे रही थी। 
पूरा काफिला धीरे-धीरे उस बिंदु तक आ रहा था, जहाँ से ट्रेक शुरु हुआ था। यहाँ भूखे खच्चर सड़क किनारे घास चर रहे थे।
नीचे कद्दुखाल उतरकर पूरे समूह ने भोजन किया। महज 60 रुपए में पूरी थाली और गर्मागर्म रोटियाँ। भूख लगने पर भोजन का आनन्द कई गुणा बढ़ गया था। बाहर छत से नीचे घाटी का नजारा देखने लायक था। यहाँ तेज हवा चल रही थी, ठंड़ काफी बढ़ चुकी थी, बंद पड़े स्वाटर-जैकेट अब काम आ रहे थे। साथ में दूसरे पाठयक्रमों के बच्चों के साथ धीरे-धीरे जान-पहचान हो रही थी और इनकी बालसुलभ जिज्ञासाओं का समाधान करते-करते एक आत्मीयतापूर्ण भाव स्थापित हो चुका था तथा कुछ नाम याद भी हो गए थे। पूरे ग्रुप का अनुशासन व सहयोग काबिले तारीफ रहा। पूरा ट्रिप एक यादगार सफर के रुप में कई सुखद अनुभवों के साथ स्मृतिपटल पर अंकित रहेगा।
ढलती शाम और अंधेरे में बापसी का सफर
शाम को साढ़े चार तक हम कद्दुखाल से चल चुके थे। ढलती शाम के साथ सफर आगे बढ़ रहा था। रास्ते में अँधेरा हावी हो चुका था। रात को सेलुपानी स्थान पर बस चाय के लिए रुकी। आधी सवारियाँ दिन भर की ट्रेकिंग से थकी निद्रादेवी की गोद में थीं। आगे रास्ते में कब हेंवल नदी पार हो गयी और आगराखाल पहुँचे, पता ही नहीं चला। अंधेरा होने के कारण बापसी में कुंजापुरी के दर्शन अब संभव नहीं थे। 
यहाँ से नीचे डोईबाला और ऋषिकेश साइड के मैदानी इलाकों की शहरी रोशनियाँ ऐसे जगमगा रहीं थीं, जैसे कि दिपावली का नजारा हो। जब हम नरेंद्रनगर से नीचे उतर रहे थे, तो नीचे देखकर ऐसा लग रहा था कि जैसे आसमान के तारे जमीं पर उतर आए हों।
शहर के रोशन नजारे को निहारते हुए हम क्रमशः 8 बजे तक ऋषिकेश पहुँचे और अगले आधे घंटे में देसंविवि के गेट पर थे। इस तरह पूरे 12 घंटे में हम सुरकुंडा देवी का यह यादगार सफर पूरा कर रहे थे
पहली बार दिन के उजाले में तय किया गया यह रास्ता हमारे ऑल टाइम फेवरेट रास्तों में शुमार हो चुका है। शायद इसका प्रमुख कारण इतना नजदीक से बर्फ से ढके हिमालय के दीदार थे, जो दूर होते हुए भी हमें बहुत पास लगे और हिमालय की गोद में सफर के अनुभव हमें कहीं गहरे अपने अंदर भावों की सुरम्य घाटियों व शिखरों के बीच विचरण के रोमाँचक अहसास जगा रहे थे, जो यात्रा वृतांत की तीन कड़ियों के रुप में आपके सामने प्रस्तुत हैं।
इस यात्रा के पहले दो भाग यदि न पढ़े हों, तो नीचे लिंक्स पर देख सकते हैं -

सुरकुण्डा देवी का यादगार सफर, भाग-1 (ऋषिकेश-नरेंद्रनगर-चम्बा)

सुरकुण्डा देवी का यादगार सफर, भाग-2 (चम्बा, कानाताल,कद्दुखाल)

 
 

मंगलवार, 20 नवंबर 2018

यात्रा वृतांत - सुरकुंडा देवी का यादगर सफर, भाग-2

गढ़वाल हिमालय की सबसे मनोरम राहों में एक

हिमालय के आलौकिक वैभव की पहली झलक
चम्बा को पार करते ही हम आराकोट स्थान पर पहुंचे, जहाँ से हिमाच्छादित हिमालय की ध्वल श्रृंखलाओं के प्रत्यक्ष दर्शन करते ही काफिले के हर सदस्य के मुंह से आह-वाह के स्वर निकल रहे थे। चलती बस से सभी इसको मंत्र मुग्ध भाव से निहार रहे थे। थोड़ी ही देर में हिमालय की ध्वल पर्वत श्रृंखलाएं दृष्टि से औझल हो चुकी थी। अब हम पहाड़ी के वायीं ओर से आगे बढ़ रहे थे। ऐसे में नीचे दक्षिण में देहरादून की ओर की पहाड़ियों व घाटियों के दर्शन हो रहे थे।

यहाँ सीढ़ीनुमा खेत प्रचुर मात्रा में दिखे, जो देखने में बहुत सुंदर लग रहे थे। पहाड़ी यात्रा के दौरान ये खेत निश्चित रुप में पथिकों का ध्यान आकर्षित करते हैं और सफर का एक सुखद अहसास रहते हैं। रास्ते में हम चुपडियाल नामक हिल स्टेशन को पार करते हुए आगे बढ़े। सड़क के साथ सटे सीढ़ीदार खेतों में सरसों, पालक, राई, मटर, गोभी आदि की सब्जियों को प्रचुर मात्रा में उगे देखा। लगा यह क्षेत्र कैश क्रॉप्स के मामले में जागरुक है।

और कहीं-कहीं सेब के पेड़ भी दिखना शुरु हो चुके थे। पहाड़ियों पर देवदार के पेड़ आम होते जा रहे थे। वास्तव में हम हिमालय की ऊँचाईयों में लगभग 7000 फीट की ऊँचाई पर थे, लग रहा था कि जैसे हम हिमालय की गोद में सफर कर रहे हैं और रास्ते के प्रति पनप चुका आत्मीय लगाव क्रमशः प्रगाढ़ होता जा रहा था।

घर-आंगन में फूलों की क्यारियाँ और सूखे घास के टुहके -
   रास्ते में प्रवाहमान लोकजीवन हो हम उत्सुक भाव से देख व समझ रहे थे तथा इसके सुपरिचित पहलुओं से अपने सहचरों को अवगत करा रहे थे। घर आंगन में गेंदे के फूलों के लाल-पीले झुरमुट छोटे एवं भव्य पहाड़ी घरों की शोभा में चार-चाँद लगा रहे थे। साथ ही सूखी घास के ढेर, जिनको हमारे क्षेत्र में टुहका कहते हैं, कतारों में शोभायमान खड़े थे और कहीं-कहीं तो ये दो-चार नहीं दर्जनों की संख्या में एक साथ पंक्तिबद्ध खड़े थे। सर्दी में जब हरा चारा नाम मात्र का रह जाता है और चारों ओर बर्फ गिरी होती है, तो पहाड़ी क्षेत्रों में गाय-बैल एवं भेड़-बकरियों के लिए यही सूखा चारा काम आता है। यहाँ अधिकाँश टुहके जमीं पर खड़े दिखे, हालाँकि कई इलाकों में इन्हें पेड़ के ऊपर भी जमाया जाता है।


      रास्ते भर पाजा या पइंया के फूलों से लदे वृक्षों के दर्शन स्थान-स्थान होते रहे। यह एक अद्भुत फूलों वाला पौधा है, जो सर्दी में तब खिलता है, जब पतझड़ का मौसम शुरु हो चुका होता है, बाकि पौधों के फूल तो दूर, फल तक झर चुके होते हैं और पत्ते झरने की प्रक्रिया में होते हैं। इसके फूल मधुमक्खियों के लिए पराग का समृद्ध स्रोत होते हैं, जिसके चलते सर्दियों में भी क्वालिटी शहद का निर्माण संभव होता है। पूजा में भी इन फूलों का उपयोग किया जाता है। इसकी पौध पर ग्राफ्टिंग कर चैरी के बेहतरीन पौधों को तैयार किया जाता है। शायद इन सब गुणों के कारण पाँजा के पौधे को कल्पवृक्ष भी कहा जाता है।
कुछ ही मिनटों में हम एक ऐसे बिंदु पर थे, जो पहाड़ी की धार (रिज) के ठीक बीच में था, जहाँ से हम पहा़ड़ के दोनों ओर के नजारे देख सकते थे, विशेषरुप में हिमालय की ध्वलश्रृंखलाएं अपने पूरे श्बाब के साथ घाटियों के उस पार सुदूर प्रत्यक्ष खड़ी थी। यह कानाताल का ठांगधार इलाका था। यहाँ बस को खड़ा कर काफिला बाहर उतरा। 
सड़क के किनारे एक छत्त पर उतर कर हिमालय की बेकग्राउंड में ग्रुप फोटो हुई और इसके बाद हम पास के पहाड़ी ढाबे पर चाय की चुस्की व स्थानीय लोगों से यहाँ की जानकारी बटोरने के उद्देश्य से लकड़ी की बेंच पर बैठ गए। काफिला हिमालय की गोद में फोटो खेंचने व सेल्फी लेने में मश्गूल था, तो हम चाय का इंतजार कर रहे थे। ड्राइवर हमारे साथ था।

ड्राईवर से सामने दिख रही हिमालय की चोटियों के बारे में पूछा, तो जबाब मिला कि सामने खड़ी सबसे ऊँची चोटी माउंट एवरेस्ट है। सुनकर हम थोड़ा चौंके कि ये क्या जबाब मिल रहा है। हम कुछ कहते, इससे पहले ही चाय बना रहे ढावेदार ने तुरंत करेक्ट करते हुए कहा कि एवरेस्ट तो नेपाल में है। फिर हमने समझाया की गढ़वाल की सबसे ऊँची चोटी नन्दा देवी हैं, और ये कंचनजंगा के बाद भारत की दूसरी सबसे ऊँची चोटी है। सामने की विभिन्न पर्वत श्रृंखलाओं के सही-सही नाम क्या हैं, यह प्रश्न यहाँ अनुत्तरित रहा, लगा शायद आगे किसी जानकार से इसका समाधान मिले।
यहाँ चाय-बिस्कुट के रिफ्रेशमेंट के बाद, स्थानीय गिफ्ट के रुप में दुकान पर रखे चीनी राई की भाजी और लोकल सेब को खरीदा, जिनकी विशेषता इनका नेचुरल व ऑर्गेनिक होना था। सेब मध्यम आकार के थे, देखने में सुंदर लग रहे थे, लाल-पीला रंग लिये सेब स्वाद में एक खास तरह की मिठास लिए थे। समय कम था, नहीं तो यहाँ के सेब के बागों को एक्सप्लोअऱ करने का मन था। काफिला भी पास पहुँच चुका था, कुछ और लोगों ने यहाँ के स्मृति प्रसाद के रुप में सेब व चीनी राई की भाजी लिए।

अब हम सुरकुंडा से महज 10-15 किमी दूर थे। सामने पहाड की चोटी पर सुरकुंडा देवी की सबसे ऊँची चोटी हमारी आज की मंजिल का प्रत्यक्ष बोध करा रही थी। रास्ते भर पहाड़ों के बीच इसका लुकाछुपी का खेल चलता रहा और इसको बीच-बीच में निहारते हुए सफर मंजिल की ओर बढ़ रहा था। सड़क के किनारे देवदार के वृक्षों की संख्या व घनत्व भी बढ़ रहा था। इस रास्ते में ढलानदार खेतों में सेब के छोटे-छोटे बाग भी प्रचुर मात्रा में मिले। इस राह के एक नए आकर्षण थे - पिकनिक स्पॉट्स, जो रास्ते में प्रचुर संख्या में मिले।

इनमें तम्बुओं की कतारें सीढ़ीनुमा खेतों में सजी थी। देवदार के एक पेड़ से दूसरे पेड़ में और खाई के पार रसियों के पुल बने थे, जिन पर पैदल चलकर पार किया जा सकता है। इस तरह के एडवेंचर क्रीडाओं के तमाम सरंजाम यहाँ किए गए दिखे। पता चला कि कुछ फीस के साथ यहाँ रुकने, ट्रैकिंग व नाइट हाल्ट की व्यवस्था रहती है। इस दौरान स्थानीय गाँव, घाटियों, झरनों, तालों व पहाड़ियों के दर्शन भी कराए जाते हैं। कानाताल का नाम ऐसे ही किन्हीं ताल के नाम पर पड़ा समझ आया, हालाँकि यह ताल कहाँ है, किस अवस्था में है, यह सब जानना शेष था।

इस तरह हम सुरकुंडा माता के काफी नजदीक आ चुके थे। राह में मुख्य सड़क के ऊपर पहाड़ी के चरण से चोटी तक जाने का पैदल मार्ग दिखा, जो कठिन व लम्बा लगा। संभवतः लोकल ग्रामवासी या ट्रेैक्कर इसका प्रयोग करते होंगे। हमें तो आगे कद्दुखाल से महज 3 किमी ट्रेक करते हुए ऊपर चढ़ना था। सो हम उस ओर देवदार के घने जंगलों से होकर बस में आगे बढ़ रहे थे। यह रास्ता बहुत ही शांत-एकांत, सुंदर एवं मनोरम लग रहा था।
कुछ किमी के बाद हम देवदार के सघन आच्छादन को पार कर बाहर निकल चुके थे और कद्दुखाल से महज 1-2 किमी पहले थे, यहाँ से एक मार्ग नीचे देहरादून, राजपुर की ओर जाता है। पता चला कि यह यहां का गुप्त मार्ग है, जिसमें कम ही लोग सफर करते हैं। लेकिन यह रास्ता हमें बहुत ही सुंदर, सुरम्य, शांत एवं घुमने योग्य लगा।

कुछ ही देर में हम कद्दुखाल पहुँच चुके थे, जो बस से हमारा अंतिम स्टेशन था। बस से उतर कर बाहर सड़क पर निकले, तो ऊपर शिखर पर सुरकुंडा देवी के भव्य दर्शन हो रहे थे। अभी हम 8000 फीट की ऊँचाई पर खड़े थे, जहां से हमें 10,000 फीट की ऊँचाई तक 3 किमी की चढ़ाई चढ़नी थी। सो पूरा काफिला प्रवेश गेट पर ग्रुप फोटो के बाद माता के जयकारे के साथ आगे बढता है। 

अपनी उम्र और स्टेमिना के हिसाब से हम सबसे पीछ चल रहे थे, ताकि सबको बटोर कर मंदिर तक पहुँचा सकें। नौसिखियों की टीम के साथ यात्रा में प्रायः हमारी स्ट्रेजी यही रहती है। जब पूरी टीम मंदिर तक पहुँचे, तभी हमारा अभियान सफल माना जाएगा, बाकि रास्ते से भी हमें बापिस आना पड़े, तो कोई गम नहीं, आखिर माता की गोद में तो हम पहुँच ही चुके हैं। 

चम्बा से यहाँ तक के रास्ते और पीछे ऋषिकेश से चम्बा तक के रास्ते के बीच एक मौलिक अंतर नजर आया, जो एक शोध प्रश्न की तरह मन में कौंधता रहा। इस राह में बहते पानी का नितांत अभाव खला। कहीं कोई झरना, नाला या समृद्ध जल स्रोत नहीं दिखा। शायद इसका एक कारण सड़क का चोटी के आसपास होना था, जिस कारण कैचमेंट एरिया बहुत ही स्वल्प था। खैर इसका सांगोपांग जबाब तो इस क्षेत्र के किन्हीं विशेषज्ञों से ही मिलेगा, जिसका इंतजार रहेगा, क्योंकि इस संदर्भ में हमारी जिज्ञासा अभी शांत नहीं हुई है। (जारी...शेष अगली पोस्ट में-गढ़वाल हिमालय के सबसे ऊँचे शक्तिपीठ के दिव्य प्राँगण में)