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रविवार, 10 दिसंबर 2017

भारतीय प्रेस दिवस (16 नबम्वर) पर मीडिया मंथन-भाग2



भारतीय पत्रकारिता – दशा, दिशा एवं दायित्वबोध
माना चारों ओर घुप्प अंधेरा, लेकिन दिया जलाना है कब मना

पिछली पोस्ट के आगे जारी......
ऐसे में आजादी के संघर्ष के दौर की पत्रकारिता पर एक नजज़र उठाना जरुरी हो जाता है।
स्वतंत्रता संग्राम की पत्रकारिताएक मिशन
आजादी के दौर में पत्रकारिता एक मिशन थी, जिसका अपना मकसद था – देश को गुलामी से आजाद करना, जनचेतना का जागरण और अपने सांस्कृतिक गौरवभाव से परिचय। भारतेंदु हरिश्चंद्र से लेकर महावीरप्रसाद द्विवेदी, श्रीअरविंद से लेकर गणेशशंकर विद्यार्थी और माखनलाल चतुर्वेदी से लेकर विष्णु पराड़कर तक आदर्श पत्रकारों की पूरी फौज इसमें सक्रिय थी। वास्तव में देश को आजाद करने में राजनीति से अधिक पत्रकारिता की भूमिका थी। स्वयं राजनेता भी पत्रकार की भूमिका में सक्रिय थे। तिलक से लेकर लाला लाजपतराय, सुभाषचंद्र बोस से लेकर गांधीजी व डॉ. राजेंद्रप्रसाद जैसे राजनेता इसका हिस्सा थे।

आजादी के बाद क्रमशः इस मिशन के भाव का क्षय होता है। शुरुआती दोतीन दशकों तक नेहरुयुग के समाजवादी विकास मॉडल के नाम पर विकास पत्रकारिता चलती रही। लेकिन आपात के बाद प्रिंटिंग प्रेस में नई तकनीक के आगमन व उदारीकरण के साथ इसमें व्यावसायीकरण का दौर शुरु हो जाता है। मीडिया एक उद्योग का रुप अखित्यार कर लेता है, और पत्रकारिता के मानक क्रमशः ढीले पड़ने लगते हैं। पत्रकारिता से मिशन के भाव का लोप हो जाता है और पत्रकारिता के आदर्श धूमिल होते जाते हैं।

इसकी एक झलक 2001 में प्रकाशित प्रेस परिषद की रिपोर्ट से स्पष्ट हो जाती है, जिसमें तत्कालीन भारतीय पत्रकारिता के व्यापक सर्वेक्षण के आधार पर उभरती चिंतनीय प्रवृतियों को रेखांकित किया गया था, जो निम्न प्रकार से थीं -
1.     विशेष वर्ग का ध्यान, आम जनता से क्या काम
2.     जनसराकारों की उपेक्षा या दमन
3.     आर्थिक पत्रकारों को अनावश्यक महत्व
4.     गल्त एवं भ्रामक सूचना
5.     राजनेताओँ एवं व्यावसायिओं का साया
6.     अपर्याप्त विकासपरक पत्रकारिता
7.     जनता की अपेक्षा बाजार को प्रधानता
8.     नारी शक्ति का अवाँछनीय चित्रण
9.     गप्प-शप को अनावश्यक महत्व
10.                        सनसनी खबरों को प्रधानता
11.                        व्यैक्तिक जीवन में ताक-झाँक
12.                        पपराजी का बढता सरदर्द
13.                        सूचना संग्रह के वेईमान तरीके
14.                        अवाँछनीय सामग्री का बढ़ता प्रकाशन
15.                        दुर्घटना एवं दुखद घटनाओँ के प्रति अमानवीय रवैया
16.                        विज्ञापन और संपादकीय में घटता विभेद
17.                        पत्रकार की निर्धारित योग्यता के मानदण्ड का अभाव
18.                        ओपीनियन पोल की खोल
19.                        प्रकाशन या सूचना के दमन में रिश्वत का बढता चलन
20.                        मुद्दों का उथला एवं अप्रमाणिक प्रस्तुतीकरण
21.                        विज्ञापन की बढती जगह
22.                        पश्चमी संस्कृति एवं मूल्यों का अँधानुकरण
23.                        प्रलोभन के आगे घुटने टेकता पत्रकार
24.                        साम्प्रदायिकता का बढ़ता जहर
25.                        अपराध और सामाजिक बुराइयों का गौरवीकरण
26.                        अपराधी पर समयपूर्व निर्णय की अधीरता (मीडिया ट्रायल)
27.                        प्रतिपक्ष के तर्कों व दलीलों की उपेक्षा
28.                        संपादक के नाम पत्र में गंभीरता का अभाव
29.                        अनावश्यक प्रचार से वचाव
30.                        विज्ञापन के साय में आजादी खोती पत्रकारिता
31.                        संपादकीय गरिमा का ह्रास
भारतीय पत्रकारिता की उपरोक्त नकारात्मक प्रवृतियां आज लगभग 16 वर्षों के बाद और गंभीर रुप ले चुकी हैं। जिसमें पेड न्यूज जैसे घुन के साथ पत्रकारिता एक विकाऊ पेशा तक बन चुकी है। कॉर्पोरेट घरानों, राजनैतिक दलों व राष्ट्रविरोधी शक्तियों के हस्तक्षेप खुलकर काम कर रहे हैं। टेक्नोलॉजी के विकास के साथ आपसी प्रतिस्पर्धा भी अपने चरम पर है, लाभ कमाने के लिए तमाम हठकंडे अपनाए जा रहे हैं। पत्रकारिता का गिरता स्तर ऐसे में चिंता का विषय है।

कन्वर्जेंस के वर्तमान दौर में टीवी पत्रकारिता अपनी विश्वसनीयता के संकट के सबसे गंभीर दौर से गुजर रही है। सुबह ग्रह-नक्षत्र-भाग्यफल, दोपहर को फिल्मी दुनियाँ की चटपटी गपशप और शाम के प्राईम टाईम की ब्रेकिंग न्यूज और निष्कर्षहीन कानफोड़ू बहसवाजी, रात को भूतप्रेत, नाग नागिन, बिगबोस का हंगामा – यह टीवी की दुनियाँ की एक मोटी सी तस्वीर है, जिसके चलते टीवी माध्यम के प्रति गंभीर दर्शकों का मोहभंग हो चला है। आश्चर्य यह है कि इस सबके बीच भी इन कार्यक्रमों की टीआरपी बर्करार है, जो विचारणीय है। कुछ ही चैनल अपनी गंभीरता और विश्वसनीयता को बनाए हुए हैं, व्यापक स्तर पर स्थिति चिंताजनक है। कंटेंट आधारित पत्रकारिता के संदर्भ में टीवी माध्यम व्यापक स्तर पर अकाल के दौर से गुजर रहा है कहें तो अतिश्योक्ति न होगी।

वेब मीडिया अपने लोकताँत्रिक स्वरुप, इंटरएक्टिवनेस के कारण लोकप्रिय हो चुका है। लेकिन बच्चों से लेकर बुजुर्ग, किशोर से लेकर युवा एवं प्रौढ़ इसकी लत के शिकार होते जा रहे हैं। इससे एडिक्ट मनोरोगियों की संख्या बढ़ रही है। इसके साथ इंफोर्मेशन बम्बार्डमेंट के युग में ईंफोर्मेशन ऑवरलोड़ की समस्या बनी हुई है और फर्जी सूचना (फेक न्यूज) का संकट एक नई चुनौती बनकर सामने खड़ा है। इस वर्ष फेक न्यूज सबसे प्रचलित शब्द रहा है। आम उपभोक्ता के लिए इससे आ रही सूचनाओं का रचनात्मक उपयोग कठिन ही नहीं दुष्कर हो चला है।
उपरोक्त वर्णित सीमाओं के बावजूद तुलनात्मक रुप में प्रिंट मीडिया की साख बनी हुई है, लेकिन धीरे-धीरे यह माध्यम इंटरनेट में समा रहा है। हालांकि भारत में अगले 2-3 दशकों तक इसका अस्तित्व बना रहेगा, ऐसा विशेषज्ञों का मानना है। और सभी माध्यमों (रेडिया, टीवी, फिल्म, अखबार, मैगजीन) के इंटरनेट में समाने से वेब मीडिया भविष्य का माध्यम बनना तय है।

नैतिक उत्थान, राष्ट्र निर्माण एवं आधुनिक पत्रकारिता
अपनी व्यावसायिक मजबूरियों के चलते उद्योग बन चुकी मुख्यधारा की पत्रकारिता की सीमाएं समझी जा सकती हैं। हालांकि इसके बीच भी संभावनाएं शेष हैं। मीडिया में चल रहे सकारात्मक प्रयोग आशा की किरण की भांति आशान्वित करते हैं। पॉजिटिव स्टोरीज हालांकि अंदर के पन्नों में किन्हीं कौनों तक सिमटी मिलती हैं, लेकिन इनकी संख्या बढ़ रही है। दैनिक भास्कर हर सोमवार फ्रंट पेज में सिर्फ पाजिटिव न्यूज को दे रहा है, जो अनुकरणीय है। अमर उजाला में नित्य सम्पादकीय पृष्ठ पर सकारात्मक सक्सेस स्टोरीज पर आधारित मंजिलें ओर भी हैं तथा अंतर्ध्वनि जैसे स्तम्भ पाठकों को नित्य प्रेरक डोज देने वाले सराहनीय प्रयास हैं। ऐसे ही सकारात्मक प्रयास बाकि अखबारों में भी यदा कदा अंदर के पृष्ठों पर प्रकाशित हो रहे हैं।

किसानों को लेकर दूरदर्शन के किसान चैनल जैसी पहल अपनी तमाम कमियों के बावजूद सराहनीय है। प्राइवेट चैनल दिन भर की ब्रेकिंग न्यूज के बीच कुछ पल आम जनता को कवर करते हुए किसान, गरीब, पिछड़े व वेसहारा तबके की सुध-बुध ले सकते हैं। प्रेरक सक्सेस स्टोरीज से दर्शकों का उत्साहबर्धन एवं स्वस्थ मनोरंजन कर सकते हैं।
वेब मीडिया अपने अतिवादी स्वरुप के साथ तमाम खामियों के बावजूद अल्लादीन के चिराग की तरह है, जिसमें खोजने पर नाना प्रकार के सकारात्मक प्रयोग खोजे जा सकते हैं।

एक बात और गौरतलब है कि हर जन माध्यमों में आध्यात्मिक कंटेट की मात्रा बढ़ती जा रही है, जिसके साथ मीडिया में पॉजिटिव स्पेस बढ़ता जा रहा है। अखबारों में नित्य स्तम्भ छप रहे हैं, साप्ताहिक परिशिष्ट आ रहे हैं,  टीवी में आध्यात्मिक चैनलों की संख्या बढ़ी-चढ़ी है तथा इंटरनेट में ऐसी प्रेरक सामग्री की भरमार है। इनकी गुणवत्ता को लेकर सबाल उठ सकते हैं, लेकिन एक शुरुआत हो चुकी है, जो समाज के नैतिक विकास एवं राष्ट्र निर्माण के संदर्भ में महत्वपूर्ण है। 
बनें समाधान का हिस्सा, निभाएं अपनी भूमिका
व्यावसायिकरण के दौर से गुजर रही भारतीय पत्रकारिता की उपरोक्त वर्णित तमाम खामियों के वावजूद इसकी लोकतंत्र के चतुर्थ स्तम्भ के रुप में भूमिका को नजरंदाज नहीं किया जा सकता। इसकी प्रोफेशनल सीमाओं के बीच समाधान बहुत कुछ हमारे आपके हाथ में भी है। मीडिया कन्वर्जेंस की ओर बढ़ रहे जमाने में नियंत्रण हमारे हाथ में है। जो टीवी सीरियल, टीवी कार्यक्रम या चैनल ठीक नहीं है, उन्हें न देखना हमारे आपके हाथ में है, रिमोट से उन्हें बंद कर सकते हैं। मिलजुल कर यदि हम यह करते हैं, तो उसकी टीआरपी गिरते ही इनका गंदा एवं कुत्सित खेल खुद व खुद खत्म हो जाएगा। यदि ऐसा नहीं हो रहा है तो फिर हम ऐसे कार्यक्रमों को झेलने की नियति से नहीं बच सकते।
फिर, मोबाईल हमारे हाथ में है, हम क्या मेसेज भेजते हैं, क्या देखते हैं, क्या फोर्बाड करते हैं, कितनी देर मोबाईल से चिपके रहते हैं, कितना इससे दूर रहते हैं - सबकुछ हमारे हाथ में है। सोशल मीडिया के युग में हम सब इसके उपभोक्ता के साथ एक संचारक की भूमिका में भी हैं, ऐसे में हम अपनी जिम्मेदारी से नहीं बच सकते। अब ये दारोमदार हम आप पर है कि हम सोशल मीडिया का प्रयोग मालिक की तरह करते हैं या इसके गुलाम बन कर रह जाते हैं।

यहाँ एक जिम्मेदार मीडिया संचारक के रुप में हम एक नागरिक पत्रकार की भूमिका में अपना योगदान दे सकते हैं। यदि हमें कोई समाधान सूझता हो तो उसे किसी फोटो, मैसेज, कविता, ब्लोग पोस्ट, लेख, फीचर या वीडियो आदि के माध्यम से उपयुक्त प्लेटफॉर्म पर शेयर, प्रकाशित एवं अपलोड़ कर सकते हैं। सारा दारोमदार जाग्रत नागरिकों एवं प्रबुद्ध मीडिया उपभोक्ताओं पर है। मात्र मीडिया पर दोषारोपण करने से बात बनने वाली नहीं। 

अंत में यही कहना चाहेंगे कि,
माना चारों ओऱ घुप्प अंधेरा, लेकिन दिया जलाना है कब मना। 

यदि कमरे में अंधेरा हो गया है, तो अंधेरे को कोसने और इसमें लाठी भांजने भर से कुछ होने वाला नहीं। आवश्यकता है तो बस एक दीया भर जलाने की, जिसकी शुरुआत हम स्वयं से कर सकते हैं, अपने सकारात्मक संचार एवं सार्थक संदेश के माध्यम से।

(डीएवी यूनिवर्सिटी, जालन्धर, राष्ट्रीय प्रेस डे, 16 नबम्वर, 2017 के अवसर पर दिए गए उद्बोधन का सार अंश।)

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