शनिवार, 27 फ़रवरी 2016

स्वाध्याय-सत्संग, परमपूज्य गुरुदेव युगऋषि पं. श्रीरामशर्मा आचार्य

अपना सुधार संसार की सबसे बड़ी सेवा

अध्यात्म-विद्या का प्रथम सुत्र यह है कि प्रत्येक बुरी परिस्थिति का उत्तरदायी हम अपने आपको मानें। बाह्य समस्याओं का बीज अपने में ढूंढें और जिस प्रकार का सुधार बाहरी घटनाओं, व्यक्तियों एवं परिस्थितियों में चाहते हैं उसी के अनुरुप अपने गुण-कर्म-स्वभाव में हेर फेर प्रारम्भ कर दें। भीतरी सुधार बाहरी समस्याओं को सुधारने को सबसे बड़ा, सबसे प्रभावशाली उपाय सिद्ध होता है। माना की दूसरों की गलतियाँ और बुराईयाँ भी हमें परेशान करती हैं और अनेक प्रकार की बाधाएं खड़ी करके प्रगति का द्वारा रोकती हैं। संसार में बुरे लोग हैं और बुराईयाँ भी कम नहीं हैं इस बात से कोई इनकार नहीं किया जा सकता, पर साथ ही यह भी ध्यान देने योग्य है कि कोई बस्तु सजातीय एवं अनुकूल परिस्थितियों से ही बढ़ती है एवं पनपती है। बुराई को अपना रुप प्रकट करने का अवसर तभी मिलेगा, जब बैसी ही बुराई अपने अन्दर भी हो। अपना स्वभाव उत्कृष्ट हो तो बुरे लोगों को भी झक मारकर निरस्त होना पड़ता है। (पृ.3)

 कोई अध्यात्मवादी यह स्वीकार नहीं कर सकता कि उसे ग्रहदशा ने, परिस्थितियों ने या दूसरों ने सताया है। वह सदा यही मानेगा कि अपने भीतर कोई कमी रह गई जिसके कारण दुष्टता को सफल होने का अवसर मिल गया। प्रत्येक बाह्य आघात या असफलता का कारण वह अपने अन्दर ढूँढ़ता है और जो त्रुटियाँ सूझ पड़ती हैं उन्हें सुधारनें के लिए जुट जाता है। इस तरीके को अपनाने से तीन-चौथाई समस्याएँ हल हो जाती हैं। एक चौथाई जो अनिवार्य बनी रहती हैं उन्हें वह उपेक्षा में अपनी सहनशीलता के बलबूते हँसते-हँसते भुगत लेता है। कठिनाई के कारण दूसरे लोग जिस पर उद्विग्न रहते और रोते-चिल्लाते हैं बैसी परिस्थिति उसकी गम्भीरता उत्पन्न ही नहीं होने देती। तितिक्षा और सहनशीलता के बल पर बड़े से बड़े अभाव एवं कष्टों को हँसते हुए भूलाया या भुगता जा सकता है। (पृ.4)

 इसका तात्पर्य यह कदापि नहीं कि बाहर से जो बाधाएं उपस्थिति होती हैं, उन्हें हटाने का कोई प्रयत्न न किया जाए। वह तो करना ही चाहिए। संघर्ष में ही जीवन है। प्रत्येक पुरुषार्थी को मार्ग की बाधाएं हटाकर ही उनसे छूटकर ही अपना मार्ग बनाना पड़ता है। पर छूटने की शक्ति भी तो आत्म-निर्माण से ही प्राप्त होती है, यदि मनुष्य अस्त-व्यस्त मनोभूमि का हुआ तो उसके लिए बाधाओं से लड़कर प्रगति का मार्ग बना सकना तो दूर होगा, उल्टे उनकी कल्पना और आशंका से ही भयभीत होकर वह मानसिक सन्तुलन खो देगा और चिन्ता एवं परेशानी से अपना स्वास्थ्य तक गँवा देगा। (पृ.4-5)

 

हमें अपना उद्धार करना चाहिए, अपने को सुधारना और सम्हालना चाहिए। आज की अपेक्षा कल अधिक निर्मल और अधिक उत्कृष्ट बनाने का प्रयत्न करना चाहिए। यदि इस मार्ग को अपना सकना हमारे लिए सम्भव हो सका तो न तो केवल अपना वरन् समाज का, सारे विश्व का भी हित साधना करने का श्रेय प्राप्त करेंगे। युग-निर्माण का कार्य व्यक्ति निर्माण से ही आरम्भ होता है। संसार की सेवा का व्रत लेने वाले प्रत्येक परमार्थी को अपने आप की सेवा करने का ब्रत लेकर विश्व मानव की उतने अंश में सेवा करने को तत्पर होना चाहिए जितने का उत्तरदायित्व अपने ऊपर है। समस्त संसार की सेवा कर सकना कठिन है। अपनी सेवा तो आप कर ही सकते हैं। समस्त संसार को सुखी बनाना और सन्मार्ग पर चलाना यदि अपने लिए कठिन हो तो अपने को सुखी-सन्तुलित एवं सन्मार्गगामी तो बना ही सकते हैं। दूसरों का उद्धार कर सकना उसी के लिए सम्भव होता है जो अपने उद्धार कर सकने में समर्थ होता है। (पृ.7)

आन्तरिक परिष्कार की ओर समुचित ध्यान देना यही बुद्धिमत्ता और दूरदर्शिता का प्रथम चरण है। अध्यात्म का पहला शिक्षण यही है कि मनुष्य अपना स्वरुप समझे। यह सोचे की मैं कौन हूँ? क्या हूँ और क्या बना हुआ हूँ? आत्म-चिन्तन को साधना का प्रथम सोपान कहा जाता है। यह चिन्तन ईश्वर-जीव-प्रकृति की उच्च भूमिका से आरम्भ नहीं किया जा सकता। कदम तो क्रमशः ही उठाए जाते हैं। नीचे की सीढ़ियों को पार करते हुए ही ऊपर को चढ़ा जा सकता है। सोहम्, शिवोहम् की ध्वनि करने से पूर्व, अपने को सच्चिदानन्द मानने से पूर्व हमें साधारण जीवन पर विचार करने की आवश्यकता पड़ेगी और देखना पड़ेगा कि ईश्वर पुत्र-जीव आज कितने दोष-दुर्गुणों से ग्रसित होकर पामरता का उद्गिन जीवन यापन कर रहा है। माया के बन्धनों ने उसे कितनी बुरी तरह से जकड़ रखा है। और षडरिपु पग-पग पर कैसा त्रास कर रहे हैं। माया का अर्थ है - वह अज्ञान, जिससे ग्रस्त होकर मनुष्य अपने को निर्दोष और सारी परिस्थितियों के लिए दूसरों को उत्तरदायी मानता है। भव-बन्धनों का अर्थ है कुविचारों, कुसंस्कारों और कुकर्मों से छुटाकारा पाना। अपने दोषों की ओर से अनभिज्ञ रहने से बड़ा प्रमाद इस संसार में और कोई नहीं हो सकता, इसका मूल्य जीवन की असफलता का पश्चाताप करते हुए ही चुकाना पड़ता है। (पृ.11)

 अध्यात्म मार्ग पर पहला कदम बढ़ाते हुए साधक को सबसे पहले आत्म-चिन्तन की साधना करनी पड़ती है। ब्रह्मचर्य, तप, त्याग, सत्य, अहिंसा आदि उच्चतम आध्यात्मिक तत्वों को अपनाने से पहले उसे छोटी-छोटी त्रुटियों को संभालना होता है। परीक्षार्थी पहले सरल प्रश्नों को हाथ में लेते हैं ओर कठिन प्रश्नों को अन्त के लिए छोड़ रखते हैं। लड़कियाँ गृहस्थ की शिक्षा गुड़ियों के खेल से आरम्भ करती है। युद्ध में शस्त्र चलाने की निपुणता पहले साधारण खेल के रुप में उसका अभ्यास करके ही की जाती है। सबसे पहले एमए की परीक्षा देने की योजना बनाना गलत है। पहले बाल कक्षा, फिर मिडिल, मैट्रिक, इण्टर, बीए पास करते हुए एमए का प्रमाण पत्र लेने की योजना ही क्रमबद्ध मानी जाती है। सुधार के लिए सबसे पहले सत्य, ब्रह्मचर्य या त्याग को ही हाथ में लेना आवश्यक नहीं है। आरम्भ छोटे-छोटे दोष-दुर्गुणों से करना चाहिए। उन्हें ढूँढना और हटाना चाहिए। इस क्रम में आगे बढ़ते वाले को जो छोटी-छोटी सफलताएं मिलती हैं, उनसे उसका साहस बढ़ता चलता है। उस सुधार के जो प्रत्यक्ष लाभ मिलते हैं उन्हें देखते हुए बड़े कदम उठाने का साहस भी होता है औऱ उन्हें पूरा करने का मनोबल भी संचित हो चुका होता है।

 जो असंयम, आलस्य, आवेश, अनियमितता और अव्यवस्था की साधारण कमजोरियों को जीत नहीं सका, वह षड़रिपुओं, असुरता के आक्रमणों का मुकाबला क्या करेगा। सन्त, ऋषि और देवता बनने से पहले हमें मनुष्य बनना चाहिए। जिसने मनुष्यता की शिक्षा पूरी नहीं की, वह महात्मा क्या बनेगा। (पृ.11-12)

 हम स्वयं ही अपना उद्धार कर सकते हैं, अन्य कोई नहीं। इसे ह्दय में पक्की तरह से अंकित करलें। अकेले ही आगे बढ़ने के लिए पथ संधान करने के लिए आपको अपनी आत्मा पर विश्वास करना होगा, उसे ही अपना सर्वस्व मानना होगो। आत्म स्वत्व को भूला देने वाला व्यक्ति अधिक दिन नहीं चल सकता, उसे संसार नष्टकर डालता है। आत्म-शक्ति को समझने, जानने और उसे बढ़ाने के लिए उन सभी बुरे कर्मों से बचना होगा, जो हमारे अन्तर्बाह्य जीवन को कलुषित करते हैं। इसके लिए सबसे बड़ी आवश्यकता है संयम की। संयमी ही स्वाबलम्बी हो सकता है। (पृ.21-22)

 जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में स्वाबलम्बी बनने का प्रयत्न करें। अपने प्रत्येक कार्य को स्वयं पूरा करें। बालकों की तरह दूसरों कें कन्धों पर चढ़कर चलने की वृत्ति का त्याग करें। दूसरों के बलवूते आपको स्वर्ग का राज्य, अपार धन-सम्पतियों का अधिकार, उच्च पद-प्रतिष्ठा भी मिले, तो उसे ठुकरा दें। अपने आत्म-सम्मान के लिए, अन्तर्ज्योति को प्रज्जवलित रखने के लिए, स्बावलम्बी बनने के लिए। अपने प्रयत्न से आप छोटी-सी झोंपड़ी में रहकर, धरती पर विचरण करके, मिट्टी खोदकर कड़ा जीवन भी बिता लेंगे, तो बहुत बड़ी सफलता होगी, आपके अपने लिए। इससे आपको अकेले के स्वत्व में वह शक्ति क्षमता पैदा होगी, जो किसी भी बरदान प्राप्त शासक, पदाधिकारी, सम्पत्तियों के स्वामी को दुर्लभ होती है। (पृ.22)

(आचार्यश्री की पुस्तक उद्धरेदात्मनात्मानम् से उद्धृत)

यात्रा - हरिद्वार से श्रीनगर वाया देवप्रयाग

 गढ़वाल हिमालय की गोद में गंगा मैया के संग

हरिद्वार से ऋषिकेश और श्रीनगर शहर केदारनाथ, बद्रीनाथ, हेमकुण्ड आदि की तीर्थयात्रा के कॉमन पड़ाव हैं। कितनी बार इनकी यात्राओं का संयोग बना। इस लेख में इस मार्ग की कुछ विशेषताओं पर प्रकाश डाल रहा हूँ, जो नए पाठकों व यात्रियों के सफर को और रोचक एवं ज्ञानबर्धक बना सकते हैं और कुछ स्वाभाविक प्रश्नों के जबाव मिल सकते हैं। यह सब अपने सीमित ज्ञान के दायर में है, लेकिन कुछ तो इसका प्रयोजन सिद्ध होगा, ऐसा हमें विश्वास है।

हरिद्वार को हरि या हर का द्वार कहा जाता है, अर्थात केदारनाथ हो या बद्रीनाथ, चारों धामों की यात्रा यहीं से होकर आगे बढ़ती है। हरकी पौड़ी को पार करते ही विशाल शिव प्रतिमा यही अहसास दिलाती है और पुल पार करते ही आगे वायीं ओर शिवालिक तथा दायीं ओर गढ़वाल हिमालय की पर्वत श्रृंखलाएं इस अहसास को और गाढ़ा करती है। हरिद्वार से ऋषिकेश की आधे घण्टे की यात्रा के दौरान हिमालय अधिक समीप आता है और ऋषिकेश को पार करते ही जैसे हम इसकी गोदी में प्रवेश कर जाते हैं। बग्ल में गंगाजी की धीर गंभीर आसमानी नीले रंग की गहरी धारा जैसे पहाड़ों में उतरने के उत्साह से थकी कुछ अलसाए से अंदाज में मैदानों की ओर प्रवाहित होती हैं।

तपोपन से गुजरते हुए पहले रामझूला और फिल लक्ष्मण झूले के दर्शन होते हैं। जो हमें रामायण काल की याद दिलाते हैं। इस अहसास को रास्ते में विशिष्ट गुफा और गाढ़ा करती है और देवप्रयाग में तो जैसे इसका चरम आ जाता है। जहाँ एक और अलकनंदा और भगीरथी का संग होता है तथा इसके ऊपर भगवान राम को समर्पित राम मंदिर। यहीं से गंगा मैया की यात्रा आरम्भ मानी जाती है। इस रास्ते में एक दो स्थान पर चाय नाश्ते की व्यवस्था रहती है और प्रायः बाहन वहाँ रुकते हैं। जैसे व्यासी, कोडनाला, आदि। कोडनाला में सामने त्रिशंकु आकार के पर्वत ध्यान आकर्षित करते हैं, जैसे कोई तपस्वी गंगाजी के किनारे आसन जमा कर बैठे हों। यहाँ गंगाजी का प्रवाह भी गोल-गोल पत्थरों के बीच हल्की ढलान पर छलछलाते हुए नीचे बढ़ता है।

इसी रास्ते में शिवपुरी स्थान पर राफ्टिंग व कैंपिंग की बेहतरीन व्यवस्था है। इसे राफ्टिंग कैपिटल कहा जाता है। बैसे इस राह में तमाम ऐसे स्थान मिलेंगे। गंगाजी के रेतीले तट पर कैंपिंग साइट्स और तम्बुओं की सजी कतारों के दृश्य बहुत खूबसूरत नजारे पेश करते हैं। यदि कोई चाहे तो यहाँ रुककर यादगार नाईट हाल्ट कर सकता है और दिन में राफ्टिंग का लुत्फ उठा सकता है। इसके साथ बज्जी जंपिंग की भी यहाँ व्यवस्था है, जिसे काफी रोमाँचक माना जाता है, लेकिन साथ ही खरतरनाक भी। कोई पूर्णतया स्वस्थ व्यक्ति ही उसके लिए फिट माना जाता है।

रास्ते भर गंगाजी के लुकाछिपी का खेल चलता रहता है। गंगाजी गहरी खाई में काफी शांत व धीर गंभीर नजर आती हैं। एक स्थान पर तो गंगाजी उतरायण भी हो जाती हैं, जहाँ इनका प्रवाह उत्तर की ओर यू टर्न ले लेता है। रास्ता चट्टानी पहाड़ों के बीच से काफी उँचाई से होकर गुजरता है, सो नए यात्रियों के लिए काफी खतरनाक अनुभव रहता है। हालाँकि अब तो सड़क काफी चौड़ी हो गई हैं, ऐसे में इसका बहुत अहसास नहीं होता। बारिश में इस मार्ग पर पहाड़ों का भूस्खलन आम नजारा रहता है। इस रास्ते में कुछ पड़ाव ऐसे हैं, जहाँ थोड़ी सी बारिश में रास्ता जाम मिलेगा। कितने ही अनुभव हैं दो-चार से सात-आठ घण्टे तक इंतजार के। एकबार तो गढ़वाल विश्वविद्यालय से वाइवा (मौखिकी परीक्षा) लेकर बापिस आ रहे थे, लैंड स्लाईड के कारण कीर्तिनगर के आगे पूरी रात बस की छत पर गुजारी थी। सुबह जाकर रास्ता खुला था। इसकी अपनी कठिनाईयों हैं और अपने रोमाँच भी। पहाड़ों में रात कैसे होती है, इसका बखूबी आनन्द और अनुभव लिया था उस रात को।

सफर के दौरान हिमालय की गोद में उस पार बसे गाँवों को देखकर हमेशा ही मन में कौतुक जगता है कि लोग इतने दुर्गम स्थल पर क्यों बसते होंगे। यदि कोई बिमार पड़ गया तो इसकी व्यवस्था कैसे होती होगी। फिर क्या वहाँ जंगली जानवरों का खतरा नहीं रहता होगा। फिर राशन को लेकर कितनी चढ़ाई चढ़नी पड़ती होगी आदि। लेकिन ऐस स्थलों की एकांतिक शांति में रहने का एडवेंचर भाव भी जगता है। रात में तो ये गाँव पहाड़ों में टिमटिमाते तारों का ऐसा अहसास जगाते हैं लगता है कि जुगनुओं ने जैसे अपना गाँव बसा रखा हो।

देवप्रयाग इस मार्ग का विशेष आकर्षण रहता है। यहाँ पर भगीरथी और अलकनंदा नदियों का संगम होता है। प्रायः दोनों के रंग में काँट्रास्ट पाया जाता है। एक आसमानी नीला रंग लिए हुए स्वच्छ निर्मल दिखती हैं, तो दूसरी मटमैला रंग लिए। सामने संस्कृत  संस्थान का तैयार हो रहा परिसर भी स्वयं में एक आकर्षण रहता है। देवप्रयाग के उस पार से पीछे पहाड़ में बसे गाँवों का नजारा हमेशा ही रोचक लगता है। कभी मौका मिला तो इनको नजदीक से जाकर अवश्य देखेंगे, ऐसा यहाँ से गुजरते हुए मन करता है। यहाँ रास्ते भर जगह-जगह दुकानों पर पहाड़ की प्राकृतिक मौसमी फसलें सजी मिलती हैं। अदरक, हल्दी, दालें, पहाड़ी खीरा, पालक, मालटा आदि।

इस तरह पहाड़ का सफर कीर्तिनगर तक पहुँचते-पहुँचते लगभग पूरा हो जाता है। अब मैदानी इलाका आता है, जहाँ खेतों में लगी फल सब्जी और अनाज के हरे भरे खेतों को देखकर आँखों को ठण्डक मिलती है। साथ ही खेतों के बीच नहर से होकर बहता जल अपने पहाड़ी गाँव की सिंचाई व्यवस्था की याद दिलाता है। अब तो यहाँ महत्वाकाँक्षी ऋषिकेश-कर्णप्रयाग रेल्वे योजना का अहमं पड़ाव निर्माणधीन है, जिस पर काफी तेजी से काम चल रहा है। कई किमी लम्बी सुरंगे इन चट्टानी पहाड़ों के बीच तैयार की जा रही हैं, जो स्वयं में काफी चुनौतीपूर्ण काम प्रतीत होता है।

इसी के साथ आता है श्रीनगर शहर, जिसे कभी आदि शंकराचार्यजी ने श्रीयंत्र पर स्थापित किया था। हालाँकि जमाने की भयंकार बाढ़ों ने इसके नक्शे को काफी हद तक बदल दिया है लेकिन गढ़वाल विश्वविद्याल के कारण इस शहर का अपना महत्व तो है ही। उस पार चौरास कैंपस में कई विभाग स्थापित हैं। जहाँ कई बार पत्रकारिता विभाग के अध्यक्ष प्रो. डंगबालजी के निमंत्रण पर आना-जाना होता रहा है।

इनके नेतृत्व में विभाग कहाँ से कहाँ आ पहुँचा है। कभी खुले बरामदे में शुरु विभाग आज पूरा स्टूडियो, आडिटोरियम, लैब, पुस्तालय आदि लिए हुए है। प्रशिक्षित मानव संसाधन की थोड़ी कमी है, आशा है समय के साथ वह भी पूरी होगी। इस विभाग ने प्राँत एवं देश को कुशल नेतृत्व प्रदान करने वाले कितने साहित्यकार, पत्रकार, शिक्षाविद, सामाजिक कार्यकर्ता और नेता दिए हैं। इसी तरह बाकि विभागों एवं विश्वविद्यालय की अपनी उपलब्धियाँ रही हैं।

हमेशा एक ही विचार आता है किसी भी विश्वविद्यालय को देखकर कि अपने नाम के अनुकूल पूरा विश्व इसके शोध-अध्ययन एवं अध्यापन के दायरे में होता है, राष्ट्रचिंतन स्वतः ही इसके केंद्र में आता है और इसका शुभारम्भ इसके प्राँत व क्षेत्र के प्रति इसके योगदान के आधार पर तय होता है। एक विश्वविद्यालय के रुप में हम इस दिशा में कितना सक्रिय हैं, इसका ईमानदार मूल्याँकन किया जा सकता है। हर विद्यार्थी, शिक्षक, विभागप्रमुख एवं विश्विविद्याल का नेतृत्व इस दिशा में अपने सचेष्ट प्रयास के आधार पर अपना भाव भरा योगदान दे सकता है।

चरित्र निर्माण, कालजयी व्यक्तित्व का आधार


"Character has to be established trough a thousand stumbles. Swami Vivekananda" 

चरित्र, अर्थात्, काल के भाल पर व्यक्तित्व की अमिट छाप
 
   चरित्र, सबसे मूल्यवान सम्पदा -
   कहावत प्रसिद्ध है कि, यदि धन गया तो समझो कुछ भी नहीं गया, यदि स्वास्थ्य गया तो समझो कुछ गया और यदि चरित्र गया, तो समझो सब कुछ गया। निसंदेह चरित्र, व्यक्तित्व क सबसे मूल्यवान पूँजी है, जो जीवन की दशा दिशा- और नियति को तय करत है। व्यक्ति की सफलता कितनी टिकाऊ है, बाह्य पहचान के साथ आंतरिक शांति-सुकून भी मिल पा रहे हैं या नहीं, सब चरित्र निर्माण के आधार पर निर्धारित होते हैं। व्यवहार तो व्यक्तित्व का मुखौटा भर है, जो एक पहचान देता है, जिससे एक छवि बनती है, लेकिन यदि व्यक्ति का चरित्र दुर्बल है तो यह छवि, पहचान दूर तक नहीं बनीं रह सकती। प्रलोभन और विषमताओं के प्रहार के सामने व्यवहार की कलई उतरते देर नही लगती, असली चेहरा सामने आ जाता है। चरित्र निर्माण इस संकट से व्यक्ति को उबारता है, उसकी पहचान, छवि को  बनाए रखने में मदद करता है, सुख के साथ आनन्द का मार्ग प्रशस्त करता है।
  
   चिंतन, चरित्र और व्यवहार -
   हम जैसा चिंतन करते हैं बैसा ही हमारा चरित्र बनता जाता है और वैसा ही व्यवहार निर्धारित होता है। कहावत प्रसिद्ध है, चिंतन, चरित्र और व्यवहार। वास्तव में चिंतन और व्यवहार मिलकर जो छाप, इंप्रिंट चित्त पर डालते हैं, उनके अनुरुप हमारा चरित्र रुपाकार लेता है। बार बार जो हम सोचते हैं, वही करते हैं और वैसा ही चित्त पर संस्कारों के रुप में च्छाई-बुराई का जखीरा इकट्ठा होता जाता है। इन्हीं पॉजिटीव और नेगेटिव संस्कारों का सम्मिलित परिणाम ही हमारे चरित्र को परिभाषित करता है और वैसा ही हमारा स्वभाव बनता जाता है। यह संस्कार, स्वभाव ही हमारे चरित्र के रुप में हमारे व्यक्तित्व की विशिष्ट छवि निर्धारित करत हैं, पहचान बनात हैं और व्यावहारिक जीवन की सफलता, असफलता को निर्धारित करत हैं।

   पशुता से इंसानियत और देवत्व की महायात्रा का हमसफर - 
   इन्हीं संस्कारों के अनुरुप इंसान विरोधाभासी तत्वों की एक विचित्र सृष्टि है। मनुष्य के अंदर एक पशु भी छिपा है, एक इंसान भी और एक देवता भी। यदि पशु की नकेल न कसी जाए, मन-इंद्रियों को संयमित अनुशासित नहीं किया गया तो उसे पिशाच, राक्षस बनते देर नहीं लगती। आज जो पाश्विक, अमानवीय, पैशाचिक घटनाएं समाज में भ्रष्टाचार, दुराचार, अपराध, हिंसा, आतंक के रुप में ताण्डब नर्तन कर रही हैं, इनमें ऐसे ही कलुषित चित्त, विकृत मानसिकता बाले तत्व सक्रिय हैं। चरित्र निर्माण की प्रक्रिया ही मनुष्य को पशुता से उपर उठाकर इंसान बनाती है, मानव से महामानव बनने की ओर प्रवृत करती है, देवत्व जिसकी स्वाभाविक परिणति होती है। सार रुप में कहें तो इंसान के पतन और उत्थान दोनों की कोई सीमा नहीं है, सारा खेल चरित्र के उत्थान पतन के ईर्द-गिर्द घूमता है। 
  
   चरित्र - स्थायी व टिकाऊ सफलता का आधार -
   प्रतिभा या योग्यता व्यक्ति को समाज में पहचान व स्थान दे सकती है, एक रेप्यूटेशन दे सकती है, लेकिन उसको टिकाऊ व स्थायी चरित्र ही बनाता है। हर कसौटी पर खरा उतरने की सामर्थ्य चरित्र देता है। चरित्र के अनुरुप ही व्यक्ति के कुछ असूल, मानदण्ड, जीवन मूल्य तय होते हैं, जिनका पालन व्यक्ति हर परिस्थिति में करता है। ये आचरण-व्यवहार की स्वनिर्धारित लक्ष्मणरेखाएं हैं जिसका वह हर हालत में पालन करता है, जिनका उल्लंघन वह होशोहवाश में नहीं कर सकता। यदि परिस्थितिवश भूल-चूक हो भी गई तो इनका प्रायश्चित परिमार्जन किए बिन चैन से नहीं बैठ सकता। यह संवेदनशीलता, यह इमानदारी ही चरित्र निर्माण का आधार है, जो व्यक्ति को विशिष्ट पहचान देती है, उसकी यूएसपी बनती है, अघोषित ब्राँड तय करती है। यह व्यक्तित्व को वह विश्वसनीयता, प्रामाणिकता देती है, जो काल के कपाट पर अपने व्यक्तित्व की अमिट छाप छोड़ती है।
  
   आदर्श का सही चयन महत्वपूर्ण
   जीवन में उच्च आदर्श के अनुरुप हम चित्त के संस्कारों का प्रक्षालन, परिमार्जन कर व्यक्तित्व को मनमाफिक रुपाकार दे सकते हैं। जीवन को दशा व दिशा का मनचाहा निर्धारण कर सकते हैं। अंतर की पाश्विक वृतियों को परिष्कृत कर जीवन की उच्चतर संभावनाओं को साकार कर सकते हैं। इस प्रक्रिया में आदर्श का निर्धारण चरित्र निर्माण का एक निर्णायक तत्व है। आदर्श का सही निर्धारण डाकू बाल्मीकि को संत बना सकता है, वेश्या आम्रपाली को साध्वी बना सकता है, काम लोलुप तुलसी और सूरदास को एक संत बना सकता है, नास्तिक भगतसिंह को युवाओं का आदर्श बना सकता है, संशयग्रस्त नरेंद्र को कालजयी युगपुरुष बना सकता है, पश्चिमी शिक्षा में शिक्षित अरविंद को क्राँतिकारी महायोगी बना सकता है। और यही आदर्श एक आम इंसान को क्रमशः उत्थान की सीढियों पर आगे बढ़ाते हुए जीवन के चरमोत्कर्ष तक ले जा सकता है।

   चरित्र का व्यवहारिक मापदण्ड
   वस्तुतः चरित्र हमारे जीवन की सफलता, बुलंदी, चरमोत्कर्ष की सीमा का निर्धारक तत्व भी है। हम जीवन में किन ऊँचाइयों को छू पाएंगे, इसका निर्धारण चरित्र ही करता है। क्योंकि चरित्र हमारे व्यक्तित्व की जडे हैं, यह कितनी गहरी हैं या उथली, कितनी मजबूत हैं या नाजुक – ये जीवन की संभावनाओं को तय करती हैं। वास्तव में चरित्र हमारे व्यक्तित्व रुपी जंजीर की सबसे कमजोर कडी से तय होता है। हम किस बिदुं पर आकर वहक, बिखर, फिसल व टूट जाते हैं, यही हमारे चरित्र का व्यवहारिक मापदण्ड हैं, जिसके आइने में हम रोज अपनी समीक्षा कर सकते हैं। और चरित्र निर्माण की प्रक्रिया को जीवन का एक अभिन्न अंग बनाते हुए, रोज खुद को तराशते हुए, अपनी संकल्प सृष्टि का निर्माण कर सकते हैं।
 
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