सोमवार, 30 दिसंबर 2019

यात्रा वृतांत – गड़सा घाटी के एक शांत-एकांत रिमोट गाँव में, भाग-2


जापानी फल के मॉडल बाग में
हमारे सामने एक प्रयोगधर्मी किसान के 27 वर्षों के तप का फल, एक लहलहाता फलदार बगीचा सामने था, जो किसी भी बागवानी प्रेमी व्यक्ति का स्वप्न हो सकता है। जापानी फल से लदे पेड़ नेट से ढके थे, जो एक ओर चमगादड़ों के आतंक से फलों की रक्षा करते हैं, तो दूसरी ओर औलों की मार से। मालूम हो कि खराब मौसम में औलों की बौछार फलों को बर्वाद कर देती है, इनसे बचाव के लिए नेट का उपयोग किया जाता है। इस बार दुर्भाग्य से हवाईशा साईड से भयंकर औलावारी हुई थी, जिसका आंशिक असर यहाँ भी हुआ, महज आधे घंटे में नेट के बावजूद चालीस फिसदी फल इनसे बर्वाद हुए थे। इस नुकसान का दर्द एक किसान भली-भांति समझ सकता है, जो पूरे साल भर दिन-रात एक कर अपने खून-पसीने से उमदा फसल तैयार कर रहा होता है।
अपने अभिनव प्रयोग पर चर्चा करे हुए श्री हुकुम ठाकुर ने वताया कि इस बगीचे का रोपण 27 वर्ष पूर्व किया गया था, जब इस फल की कोई मार्केट वेल्यू नहीं थी। मात्र 4-5 रुपए किलो तब यह बिकता था। शौकिया तौर पर इसकी शुरुआत हुई थी। चण्डीगढ़ किसी फल प्रदर्शनी में एक किसान प्रतिनिधि के रुप में वे गए थे, जहाँ इज्रायल से आए डेलीगेशन ने जापानी फलों को प्रदर्शनी में सजाया था, इसका स्वाद चखाया व इसकी तारीफ की थी। हुकुम ठाकुर को आश्चर्य हुआ कि इस फल के इक्का दुक्का पेड़ तो हमारे इलाके में भी घर के आस-पास उगाए जाते हैं, क्यों न इसका पूरा बगीचा तैयार किया जाए।
इस तरह लगभग 100 वृक्षों के साथ घर के साथ जापानी फल का बगीचा खड़ा होता है। लोगों के लिए यह एक पागलपन था, क्योंकि इलाके में ऐसे बगीचों का कोई चलन नहीं था, न ही इस फल की कोई मार्केट थी। लेकिन अपनी धुन के पक्के हुकुम ठाकुर अपने जुनून और शौक को असीम धैर्य, अथक श्रम एवं उत्साह के साथ खाद-पानी दे रहे थे। साथ ही अपनी जान-पहचान व पहुँच के आधार पर मार्केट तैयार होती है। फल की गुणवत्ता में अपनी प्रयोगधर्मिता के आधार पर इजाफा होता है। इसके आकार व रंग आदि में सुधार होता है और आज एक उम्दा फल के रुप में इस बाग का जापानी फल सीधे दिल्ली में स्पलाई हो रहा है, जहाँ यह फाईव स्टार होटलों की पार्टियों की शोभा बनता है।
मालूम हो कि जापानी एक ऑर्गेनिक फल है, जिसमें रसायन, कीटनाशक छिड़काव आदि का झंझट नहीं रहता, क्योंकि इसमें किसी तरह की बिमारी नहीं होती। बस समुचित खाद-पानी की व्यवस्था इसकी उमदा फसल के लिए करनी होती है। फिर यह पौष्टिकता से भरपूर एक स्वादिष्ट फल है, जिसमें विद्यमान एंटी ऑक्सिडेंटस ह्दय रोग व मधुमेह में राहत देने वाले होते हैं। यह बजन कम करने में सहायक है। इसमें रक्तचाप व कोल्सट्रोल को कम करने की गुणवत्ता भी है। फाईवर से भरपूर यह फल पेट के मरीजों के लिए बहुत उपयोगी है व एसिडिटी से राहत देता है। विटामिन ए की प्रचुरता के कारण आँखों के लिए बहुत उपयोगी है। पौष्टिकता के साथ स्वाद में यह फल बहुत मीठा होता है, जिसका नाश्ते में या भोजन के बाद आनन्द लिया जा सकता है। इसका पका, रसीला फल तो स्वाद में लाजबाव होता है, जिसका लुत्फ तो खाकर ही उठाया जा सकता है।
ग्लोबल वार्मिंग की मार झेल रहे सेब उत्पादक क्षेत्रों के लिए जापानी फल एक वेहतरीन बिकल्प भी है, जो अपनी विभिन्न विशेषताओं के कारण किसी बरदान से कम नहीं। घाटी में श्री हुकुम ठाकुर के इस बगीचे की प्रेरणा से कई किसान अपने-अपने स्तर पर इसके बाग तैयार कर रहे हैं। हुकुम ठाकुर के यहाँ एक नया बगीचा भी तैयार है, जहाँ 7-8 वर्ष के पौधे जापानी फलों से लदे हैं। इन्हीं के साथ जापानी फल की उम्दा नर्सरी भी, जिनकी एडवांस बुकिंग रहती है। 
जापानी फल के पेड़ की विशेषता है यह 80-100 वर्षों तक फल देता है। पतझड़ में इसके पत्ते लाल-पीले रंगत लेते हैं, जिनसे लदे बगीचे की सुंदरता देखते ही बनती है।
जीजाजी के बगीचे के दर्शन के बाद इनके घर पर पारम्परिक चाबल, राजमाँ व देशी घी के साथ स्वागत होता है। बगीचे के जापानी फलों का आचार लाजबाव लगा। तीन दशकों के बाद अपनी बोवा(बहन) से मुलाकात होती है। इनके नाति-पोतों से भरे परिवार को देखकर बहुत खुशी होती है। इनके बच्चे अपनी नौकरी पेशे में व्यस्त हैं, व खुद दादा-दादी बन कर परिवार व बगीचे को संभाल रहे हैं।
घर के छत व आँगन से हमें यहाँ की लोकेशन मनभावन लगी। सामने गगनचुम्बी पर्वत, जहाँ शिखर पर आस्था के केंद्र देवालय हैं, जहाँ से होकर जल की धार नीचे उतरती है, गाँव को सींचित करती है। दायीं ओर देवदार-बाँज के घने जंगल, पीछे आवाद गाँव, घर के ऊपर-नीचे और साइड में फैला जापानी फल से लदा बगीचा। सब मिलाकर यहाँ का शांत-एकांत एवं रिमोट क्षेत्र हमें सृजन के लिए ऊर्बर स्थल लगा। आश्चर्य नहीं कि ऐसे उर्बर परिवेश से एक विचारशील किसान-बागवान के सृजनधर्मी ह्दय से कविताएं, साहित्य व अनूठा जीवन दर्शन फूट पडे।
मालूम हो कि श्री हुकुम ठाकुर एक उत्कृष्ट कवि भी हैं। इनकी कविताएं पहल, सदानीरा, अकार, अनहद और बया जैसी राष्ट्रीय स्तर की पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रही हैं।  इन पर पीएचडी स्तर के शोध-कार्य भी चल रहे हैं। कविता कोश में (http://kavitakosh.org/kk/हुकम_ठाकुर) इनकी प्रतिनिधि कविताओं को पढकर इनके सृजन की एक झलक पाई जा सकती है। इनके उत्कृष्ट सृजन को कई पुरस्कारों के लिए चयनित किया गया है, लेकिन इस औघड़ कवि को इनकी कोई परवाह नहीं। प्रचार-प्रसार व दिखावे से दूर ये कवि अपनी कविताओं के प्रति उदासीन व निर्मोही दिखे।
बापसी में जीजाजी अपनी कविता संग्रह पुस्तक – ध्वनियों के मलबे से भेंट करते हैं। एक कवि के रुप में इनकी कविताओं में मिट्टी की सौंधी खुश्बू, एक मेहनतकश किसान की रफ-टफ जिंदगी की कठोरता एवं एक दार्शनिक की गूढ़ता रहती है। बिम्बों के माध्यम से गूढ़ तथ्यों को समझाने की इनकी कला बेजोड़ है, जिनको समझने के लिए कभी-कभी माथे पर बल पड़ जाते हैं। लेखक परिचय देते हुए प्रियंवद(अकार) के शब्दों में – कुल्लू शहर से 20 किलोमीटर दूर पहाडों के बीच धुर निर्जनता में किसानी, बागवानी करते हुए हुकुम ठाकुर की कविताओं में इसीलिए अनाज और फूलों की गंध है। भाषा की ताजगी, बिंबों की अपूर्वता और संवेदना की अनगढ़ता इनकी कविताओं की अलग पहचान बनती है।
संसार-समाज की दुनियादारी से दूर किसानी के साथ हुकुम ठाकुर जीवन के गूढ़ सत्यान्वेषण में मग्न हैं, एक औघड़ इंसान के रुप में रह गाँव व क्षेत्र के अंधविश्वास व प्रतिगामिता से भी इनका संघर्ष चल रहा है। सत्यपथ के राही के रुप में इनकी वैज्ञानिक दृष्ठि, खोजधर्मिता व एकांतिक निष्ठा गहरे छू जाती है। कविताओं के साथ दर्शन इनका प्रिय विषय है, जिसके अंतर्गत इनकी अगली रचना ब्रह्मसुत्र, महाभारत एवं टाईम वार्प पर आधारित उपन्यास है, जो अभी प्रकाशनाधीन है। 
इस तरह सृजन में मग्न ये प्रगतिशील किसान हमें अपनी कोटि के एक अद्भुत इंसान लगे, जो पुरस्कारों के लिए लालायित वर्तमान साहित्यकारों की पीढ़ी के बीच निर्लिप्तता एवं औघडपन के साथ एक विरल सृजनकारों की नस्ल का प्रतिनिधित्व करते हैं, जिनकी तादाद अधिक नहीं है।
सौभाग्यशाली हैं यहाँ रह रहे लोग, जो इनकी प्रयोगधर्मिता एवं सृजनशीलता के एक अंश को लेकर अपने व इलाके के जीवन को संवारने में अपनी योगदान दे सकते हैं। हालाँकि ऐसे दुर्गम क्षेत्रों की व्यवहारिक दुश्वारियां भी कम नहीं। खासकर जब यहाँ सड़कें नहीं बनीं थीं, आधुनिक सुबिधाएं उपलब्ध नहीं थी। लेकिन आज गाँव तक बिजली, पानी, सड़क, इंटरनेट जैसी सभी सुबिधाएं उपलब्ध हैं। अतः नयी पीढ़ी के लिए जीवन यहाँ सरल हो चला है।
शाम का अंधेरा यहाँ घाटी-गाँव में छा रहा था, आज ही हमें बापिस लौटना था, सो इनसे आज की यादगार मुलाकात की प्रेरक बातों व प्रयोगधर्मी शिक्षाओं को समेटते हुए इनसे सपरिवार बिदाई लेते हैं और बापिस अपने गाँव चल देते हैं, इस आश्वासन एवं भाव के साथ कि अगली बार अधिक समय लेकर यहाँ आएंगे और शेष रही बातों को पूरा करेंगे।
यदि इसका पहला भाग न पढ़ा हो, जो आगे दिए लिंक पर पढ़ सकते हैं - कुल्लू घाटी के एक शांत-एकाँत रिमोट गाँव में

यात्रा वृतांत – कुल्लु घाटी के एक शांत-एकांत रिमोट गाँव में, भाग-1



जापानी फल के एक अद्भुत बाग में
  गड़सा घाटी के सुदूर गाँव भोसा की ओर
कई वर्षों से निर्धारित हो रही यात्रा का संयोग आज नवम्बर माह के दूसरे सप्ताह में बन रहा था। पिछले तीन दशकों से गड़सा घाटी के इस रिमोट गांव के वारे में सुना था। यहाँ की यात्रा का मन बन चुका था, यहाँ के प्रगतिशील किसान, कवि, दार्शनिक एवं सामाजिक कार्यकर्ता श्री हुकुम ठाकुर से आज मिलने का संकल्पित प्रयास फलित हो रहा था। रिश्ते में बैसे हमारे जीजाजी लगते हैं, लेकिन प्रत्यक्ष मुलाकात आज पहली बार होने वाली थी।
इनके जापानी फल के प्रयोग को अपने भाईयों से सुन चुका था, जो यदा-कदा इनसे मिलते रहते हैं। प्रत्यक्षतः इस अभिनव प्रयोग को देखने का मन था। इनका जापानी फल को समर्पित बाग संभवतः कुल्लु ही नहीं बल्कि पूरे हिमाचल एवं भारत के पहाडी प्राँतों का पहला सुव्यव्थित बाग है, जो रिकोर्ड उत्पादन के साथ रिकोर्ड आमदनी भी देता है।
यह इनकी प्रयोगधर्मिता एवं अथक श्रम का परिणाम है कि सीधे दिल्ली से फल बिक्रेता इनके फल की एडवांस बुकिंग करते हैं, बगीचे में ही इन्हें मूंह माँगा दाम मिल जाता है। होर्टिकल्चर यूनिवर्सिटी के शोधार्थियों के लिए इनका बाग एक जीवंत प्रयोगशाला है, जहाँ वे अपने शोध-अध्ययन के उद्देश्य से आते रहते हैं। जापानी फल को सेब से बेहतर ब्राँड बना चुके इस प्रगतिशील बागवान के बगीचे व गाँव को देखने की चिरप्रतिक्षित इच्छा आज पूरा हो रही थी।
इस लिए यह यात्रा हमारे लिए विशेष थी, विशिष्ट थी। यह एक संकल्पित यात्रा थी, जो न जाने कितनी परिस्थितिजन्य बिघ्न-बाधाओं के विषम प्रवाह को चीरते हुए सम्पन्न हो रही था, जिसकी योजना गंभीरतापूर्वक पिछले दो-तीन सालों से बन रही थी। फिर दोनों भाईयों संग यात्रा का संयोग बहुत अर्से बाद बन रहा था।
भूंतर हवाई अड्डे के आगे बजौरा से वायीं ओर लिंक रोड़ से होकर पुल पार करते ही थोड़ी देर में हम गड़सा घाटी में प्रवेश कर रहे थे।
यह घाटी भूंतर से होकर जाने वाली मणिकर्ण घाटी जैसी ही संकरी घाटी है व उसी के समानान्तर आगे बढती है। अंतर इतना है कि यह थोड़ा चौड़ी है, जिसमें अनार के बगीचे बहुतायत में लगे हुए हैं। यह क्षेत्र थोड़ा कम ऊँचाई का है, अतः यहाँ सेब की बजाए अनार अधिक फलता है। इस सीजन में इसके पत्ते पीला रंग ले रहे थे। सो दूर से ही इसके बगीचों के पीले रंग के पैच के साथ घाटी एक अलग ही रंगत लिए दिख रही थी। इसकी राह में शांत स्वभाव की गड़सा नदी का निर्मल जल धीमे-धीमे व्यास नदी की ओर प्रवाहमान था। नदी के किनारे बीएड कालेज की भव्य इमारत ध्यान आकर्षित करती है। साथ ही आगे नदी के किनारे कई किमी तक फैला भेड़ पालन का भारत का सबसे बड़ा केंद्र, जो इस बीहड़ एकांत में अपनी अद्भुत उपस्थिति दर्ज कर रहा था।
इसके आगे गड़सा कस्बा आता है, जिसके कुछ आगे वायीं ओर से लिंक रोड़ दियार-हवाईशाह इलाके की ओर जाता है, जो पीछे पहाड़ों की ऊँचाईयों में बसे गाँव हैं। इसी लिंक रोड़ पर दो किमी आगे वायीं ओर एक संकरा लिंकरोड़ भोसा गाँव की ओर बढ़ता है, जो हमारा आज का गन्तव्य स्थल था। पहाड़ी सड़क के सहारे हम आगे बढ़ रहे थे। ढलानदार खेतों में पारम्परिक खेती-वाड़ी ही अधिक दिखी। कुछ खेतों में अनार के पनप रहे बगीचे दिखे, जिसमें किसान काम कर रहे थे। घाटी के उस पार एक गाँव से धुँआ उठ रहा था, संयोग से हमारी मंजिल यही गाँव था।
लो ये क्या, गाड़ी एक स्थान पर रुक गई। यहाँ से घाटी के उस पार गाँव के दर्शन हो रहे थे और साथ ही जापानी फल के बगीचे के दूरदर्शन भी। घर के साथ सटे घने हरे पत्तों से भरे एक पैच में लाल-पीले फल हरियाली के बीच स्पष्ट झाँक रहे थे। इलाके का यह इक्लौता बगीचा इस विरान घाटी में कुछ ऐसे शोभायमान था, जैसे बीहड़ बन में जंगल का राजा शेर। शीघ्र ही हम जापानी फल के इस अभिनव प्रयोग के प्रत्यक्षदर्शी होने जा रहे थे।
रास्ते में एक नाला पड़ा, जो पीछे पहाड़ों से होकर आता है। यही नाला यहां की जीवन रेखा है, जो यहाँ के खेतों एवं बागों को सींचित करता है। कुछ ही मिनटों में हम गाँव के बीच पहुँच चुके थे। स्वागत के लिए जीजाजी सड़क पर खडे थे। 
घनी दाढ़ी, मध्यम कद-काठी, गठीला शरीर। एक विचाशील, गंभीर एवं रफ-टफ किसान की छवि। एक-दूसरे से चिर आकाँक्षित मुलाकात की खुशी दोनों ओर से झलक रही थी। उनके पीछे चलते हुए हम सड़क के नीचे इनके बगीचे से होते हुए घर तक पहुँचते हैं। यहाँ आंगन में सजी कुर्सियों पर बैठते हैं, जहाँ सामने जापानी फलों से लदे हरे-भरे सुंदर पेड़ अपनी पूर्ण भव्यता के साथ विराजमान थे और अपनी शानदार उपस्थिति के साथ हमें रोमाँँचित कर रहे थे। कई प्रश्न जेहन में कौंध रहे थे, जिनका समाधान अगली चर्चा के साथ होना था।
श्री हुकुम ठाकुरजी से हुई चर्चा और इनके जापानी फल के बाग की सैर के अनुभव अगली ब्लॉग पोस्ट में शेयर कर रहे हैं। (जारी...अगली ब्लॉग पोस्ट - जापानी फल के मॉडल बाग में)