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गुरुवार, 23 जुलाई 2026

हमारी अविस्मरणीय मदमहेश्वर यात्रा, भाग-5


नानू से मदमहेश्वर

अब बारिश थम चुकी थी। नानू चट्टी से हम धीरे-धीरे आगे बढ़ते हैं। थोड़ा आगे बढ़ने के बाद अब ऊपर का जिगजैग मार्ग दूर तक दिख रहा था, जिसमें यात्रियों का आवागमन चल रहा था। ऊपर से बापिस आ रहे यात्रियों में कुछ ही चुस्त-दुरुस्त अंदाज में नीचे उतर रहे थे। अधिकाँश की चाल में थकान व ठहराव दिख रहा था। कुछ तो नंगे पैर ही धीरे-धीरे नीचे उतर रहे थे, स्पष्टया पैर में छाले पड़ने के कारण उनको चलने में दिक्कत हो रही थी। कुछ किसी तरह स्वयं को नीचे घसीट रहे थे।

स्पष्ट है कि यह ट्रैक यात्रियों से पूरी तैयारी की माँग करता है। उत्साह में उठकर किसी के कहने पर चल देने वालों के लिए यह ट्रेक नहीं है। जो पहले से ही लम्बी यात्रा के अभ्यस्त हों या इसके लिए पर्य़ाप्त तैयारी करके आए हों, उनके यह ट्रेक पूरे एडवेचर एवं आनन्द से भरा हुआ है। क्योंकि इसकी खूबी इसकी प्राकृतिक समृद्धता है, जो अभी अपने नैसर्गिक रुप में बर्करार है। लेकिन ट्रैक की चढ़ाई अपनी जगह चुनौतियों के पहाड़ की तरह यात्रियों की कदम-कदम पर परीक्षा लेने के लिए तैयार दिखती है। ऐसे ट्रेक में सही जुत्तों का भी अपना महत्व रहता है। यदि जुत्ते सही न हों तो येही रास्ते का एक बड़ा व्यवधान बन जाते हैं, जो इस रुट पर दिखा रहा था। कुछ लोग जुत्ता उतारकर नंगे पैर ही नीचे उतर रहे थे।

हर-हर महादेव की गुंजार आते-जाते यात्रियों के उत्साह में बर्धन कर रहा था। थोड़ी ही देर में हम एक ऐसी जगह पहुंचते हैं, जहाँ सड़क के ऊपर नीचे दो-चार दुकानें सजीं थी। यहाँ रिफ्रेशमेंट के लिए यात्रियों की भीड़ लगी थी। हम नीचे वाले ढावे में प्रवेश करते हैं। यहाँ मैगी और चाय का आनन्द लेते हैं। हालाँकि स्वाद में राँसी वाला स्वाद नहीं था, लेकिन इस ऊंचाई व विरान इलाके में पेट भरने की यह कामचलाऊ व्यवस्था भी कम नहीं थी। यहाँ भी पूरा परिवार इस कार्य में लगा दिखा।

यहाँ से आगे का जिगजैग रास्ता काफी दूर तक स्पष्ट दिख रहा था। और बीच में काफी सीधा भी। रास्ते में खड़ी चट्टानें व गहरी खाइयाँ स्वागत कर रही थीं, जो कई हजार फीट नीचे सीधे नीचे मधुगंगा की ओर ईशारा कर रही थीं। लेकिन रास्ते का प्राकृतिक सौंदर्य़ इन खतरों पर भारी था, अतः ध्यान अपने रास्ते पर रहता है, जहाँ थोड़ा दम भरते, वहाँ से सामने व चारों ओर के नजारों पर भी एख नज़र डालते, जो काफी सुकूनदायी व ऊर्जा भरने वाला रहता।

बता दें कि इस रुट में खड़ी चढ़ाई के बाद, जहाँ भी थोडा सा सीधा रास्ता मिलता, वहीं कुछ राहत का भाव जागता, क्योंकि सीधी खड़ी चढ़ाई में सांस फूल रही थी। ऊंचाई 9000 फीट से अधिक बढ़ने के साथ ऑक्सीजन का स्तर कम होता जा रहा था, फैफड़े को अतिरिक्त ऑक्सीजन की जरुरत महसूस हो रही थी, जिस कारण दिल की धड़कनें बढ़ जाती और इस पर दबाव स्पष्ट अनुभव हो रहा था। और कुछ पल विश्राम करने पर वह सामान्य हो जाता है। और शरीर उस ऊँचाई के प्रति अभ्यस्त (acclimatize) हो जाता और फिर हम आगे बढ़ चलते। सीधे रास्ते में यह चुनौती हट रही थी। अतः सीधा मार्ग हर चढ़ाई के बाद राहत का सबब बनकर यात्रा को कुछ सरल बना रहा था।

रास्ते में अब जिगजैग मार्ग लगभग समाप्त हो रहे थे, व आगे मोड़ से वाएं मुड़ते हुए हम नए परिवेश में प्रवेश करने वाले थे। अहसास जग रहा था कि हम महमहेश्वर के समीप पहुँच रहे हैं। हालांकि वहां के दर्शन अभी नदारद थे। यहां मैखम्ब नाम की एक छोटी सी चट्टी नजर आई, जहाँ सड़क से थोड़ा हटकर एक लम्बे से भवन में दुकानें दिखीं और सड़क के किनारे पानी की टंकी व नल थे। यहाँ से पानी पीकर व बोटल में भरकर आगे ब़ढ़ते हैं।

रास्ते में साठ से ऊपर के एक बुजुर्ग दम्पति के दर्शन हुए, जो महमहेश्वर जा रहे थे। इनमें माताजी का जीवट देखते ही बन रहा था। वे इस ऊँचाई में भी सधे कदमों के साथ एकचित्त होकर आगे बढ़ रही थी।


रास्ते में इनके सुपुत्र से मुलाकात होने पर पता चला कि माताजी तन से दुबली पतली दिखने पर भी मन की बहुत मज़बूत हैं। बाबा के प्रति प्रगाढ़ आस्था के चलते ये आत्मबल की धनी हैं। निसंदेह रुप में इस रुट पर आस्था का महत्व अपनी जगह भूमिका निभाता है।

पास में ऊपर दाईँ ओऱ के वन्यक्षेत्र में पेड-पौधों का रंग व स्वरुप बदल रहा था। पास के स्थानीय लडके से पूछा कि ये किसके जंगल हैं, उत्तर संतोषजनक नहीं मिला। जबकि हमारा अनुभव कह रहा था कि ये भूरे वृक्षों के जंगल कुछ न कुछ विशेष व वेशकीमती वनसंपदा हैं, क्योंकि इस ऊंचाई पर उगने वाले सभी पेड़-पौधे व झाड़ियाँ विशिष्ट गुण लिए होते हैं। हम अपनी अज्ञानतावश इनके गुण व महत्व को न समझ पाए, वह बात दूसरी है।

आगे से हम इस राह के अंतिम जिगजैग मोड़ से मुड़ चुके थे। और कून चट्टी के समीप पहुँचने वाले थे। यहीं हमें एक गाइड मिलते हैं, जो उम्रदराज व अनुभवी प्रतीत हो रहे थे। पता चला कि वो यहीं के स्थानीय वासी हैं, पिछले कई वर्षों से गाइड का काम कर रहे हैं और आज भी एक ग्रुप के साथ गाइड की भूमिका में थे। उनसे पूछने पर पता चला की ये खोरसू के जंगल हैं, जो हिमालयन इकॉलोजी का एक महत्वपूर्ण स्तम्भ माने जाते हैं।


इन्हें बाँज की ही ऊंचाइयों में उगने वाली एक प्रजाति माना जाता है, जिनके (बाँज) दर्शन हमे बनतौली के ऊपर से होना प्रारम्भ हुए थे व नानू चट्टी के ऊपर तक होते रहे।

रास्ते में इनके जंगलों के बीच यात्रा आगे बढ़ती रही। एक बिंदु पर विश्राम के दौरान नीचे घाटी से बादलों का सैलाव ऊपर उठता दिखा, जो कुछ ही पल में पूरी घाटी को ढक लता है, हम लोगों को छूता हुआ यह ऊपर बढ़ता है। निश्चित रुप से इस ट्रेक का यह एक यादगार अनुभव था, लगा जैसे बादल भी हमारा स्वागत कर रहे हों।

इस तरह हम कून चट्टी पहुँचते हैं, जो अब मदमहेश्वर से पहले इस मार्ग की अंतिम मानवीय बस्ती है। इसके प्रवेश द्वार पर ही एक बड़ी सी चट्टान के नीचे रुकने के लिए दो-तीन तम्बुओ की व्यवस्था दिखी, चाय नाश्ते का भी अस्थ्यी इंतजाम वग्ल में दिखा। हमारे पीछे आ रही दो युवतियां तो यहीं रुक गई थीं। थोड़ी आगे एक मोड़ पार कर ऊपर कून चट्टी का भवन व स्टाल मिला, शाम होने के कारण हलचल नहीं थी, अभी यहाँ का शटर बंद था, वग्ल में बस एक चूल्हा जला था। बस यात्री बेंच पर विश्राम के लिए रुके थे। यहाँ नीचे खाली स्थान में तम्बू लगे थे। यहाँ भी रुकने की व्यवस्था थी। पौने सात बज चुके थे, शाम का धुंधलका छा रहा था, हम तो अपनी गिरी हालत के चलते यहाँ भी रुकने की सोच रहे थे, लेकिन साथियों का भाव था कि दो-तीन किमी ही तो शेष बचे हैं, वहीं पहुँचकर विश्राम करते हैं। यहाँ पर स्पष्ट चेतावनी थी कि आगे के 2 किमी तक जल का कोई स्रोत नहीं है। अतः यहाँ के नल से बोटल में जल भरते हैं, और यहाँ के सुन्दर दृश्य को कैप्चर करते हुए आगे बढ़ चलते हैं।

आगे रास्ते में फिर उम्रदराज गाइड से मुलाकात होती है, जो हमें आगे मदमहेश्वर के रास्ते की स्टीक जानकारी भी मिली कि थोड़ा आगे तक तो दो तीन मोड तक कुछ चढ़ाई है, फिर अंत में सीधा रास्ता मदमहेश्वर तक जाता है। इनकी बातों को सुनकर बहुत राहत मिली। वाकि अब तक रास्ते भर बापिस लौट रहे अधिकाँश यात्रियों के निराशाजनक व हतोत्साहित करने वाले ही उत्तर मिलते रहे। खट्टरा व नानू के बीच में एक व्यक्ति ने तो यहाँ तक कह दिया कि अब तक तो वार्म अप ट्रेक था, असली चढ़ाई तो अब आने होने वाली है।

किसी तरह से अपने पूरे जीवट और साहस को वटोर कर सफर कर रहे थके पथिकों के लिए यह परामर्श उसके विश्वास की ढोर को तोड़ने वाला सिद्ध हो रहा था। कूनचटी से ऊपर एक व्यक्ति ने तो ओर भी खतरनाक परामर्श दे डाला था कि मदमहेश्वर से पहले दो-तीन सौ मीटर पानी से भरी फिसलन भरी चढ़ाई है, वहाँ संभल कर चलाना। अंधेरे में सफर कर रहे पथिकों के लिए यह एक खतरनाक चुनौती प्रतीत हो रही थी, पता नहीं अंधेरे में इसे कैसे पार करेंगे, यही पेच मन में पड़ चुका था। जबकि वहाँ से गुजरते हुए ऐसा कुछ भी नहीं निकला। रास्ते में नाले का कुछ पानी सड़क पर फैला हुआ था, जिसकी इतनी खतरनाक व्याख्या की जा रही थी।

अतः हमारा तो सुझाव है कि अपरिवक्व व नौसिखिया यात्रियों से आगे के रास्ते का परामर्श न लेंकोई अनुभवी, परिपक्व या स्थानीय व्यक्ति से ही रास्ते का हिसाब किताब पूछें, जो सही सटीक व आशावादी परामर्श के साथ आपके कदमों का सहारा बनें। वाकि अपनी अंतःप्रेरणा के हिसाब से, अपने होमवर्क के आधार पर अनुमान के सहारे चलते रहने में भी कौन सी बुराई है। रास्ता तो इन्हीं कदमों के सहारे पुरा होना है, सो धीमे-धीमे आगे बढ़ाते रहें।

कून चट्टी से बढ़ते हुए रास्ते में अंधेरा छा रहा था। आगे का रास्ता कहीं चढ़ाई भरा मिला, फिर सीधे रास्ते की राहत और फिर चढ़ाई। अंधेरा बढ़ने के कारण मोबाइल टॉर्च जलाते हैं। रास्ते में दिल्ली की दो ट्रेक्कर आगे बढ़ने के लिए संघर्ष करती दिखीं। इनमें से बजनदार ट्रेकर को चढ़ने में दिक्कत हो रही थी। साथी ट्रेक्कर हौंसला बधाई कर चलने का दबाब बना रही थी।

मैं भी इसी कैटेगरी में आगे बढ़ रहा था और बच्ची की तकलीफ को अनुभव कर पा रहा था। यहाँ मात्र हौंसला फजाई या दबाव से काम चलने वाला नहीं था। यात्री की वास्तविक स्थिति को समझने की आवश्यकता थी। थोड़ा दूर चलने, जहाँ धड़कन अधिक बढ़ने लगे, वहाँ थोड़ा रुकने, श्वांस को सामान्य करने व फिर चलने का रुटीन ऐसे में काम आ रहा था, वही उसको बताया। इस तरह धीरे-धीरे अंधेरे को चीरते हुए हम लोग मोबाइल टॉर्च के सहारे आगे बढ़ रहे थे।

अंधेरे में चढ़ाई वाला रास्ता समाप्त ही नहीं हो रहा था, लग रहा था कि इस अंतहीन यात्रा की अंतिम मंजिल के दर्शन कब होंगे। अंधेरे में हमारा दल इन बच्ची के सहचर सहयोगी की भूमिका में इसको आगे बढ़ाता रहा। अब मदमहेश्वर मुश्किल से एक-डेढ़ किमी रहा होगा। इनके ग्रुप का गाइड टोर्च लाइट के साथ इनको खोजते हुए आ चुका था व धीरे-धीरे हम अंतिम चढ़ाई पार करते हैं और फिर समतल रास्ता और सामने मंदिर की टिमटिमाती रोशनी मंजिल तक पहुँचने का आश्वासन दे रही थी और कुछ ही देर में हम लोग मंदिर परिसर में प्रवेश करते हैं। रात के साढ़े दस बज चुके थे। शुरु में तम्बुओं की कतार स्वागत करती नज़र आ रही थी, जिसमें यात्री रुके थे, कुछ सोने की तैयारी कर रहे थे।

जल्दी महदमहेश्वर पहुँचकर कमरा बुक करने के चक्कर में हमारे एक साथी कुछ घंटे पहले की यहाँ पहुँच चुके थे, लेकिन नेटवर्क बाधित होने के कारण हम लोगों का संपर्क कट चुका था। यहाँ भी मुख्य मंदिर ऑफिस से पता करने व तम्बुओं के पास आवाज देने पर भी कोई सुराग नहीं मिल पाया। लगा कि देर रात तक इंतजार करते-करते थककर सो न गया हो।

अतः एक भवन के सामने लगी कुर्सी मेज पर समान रखकर, हमारे साथी रुकने की व्यवस्था खोजते हैं। बाहर खुले में ठंड इस कदर थी, कि हवा के झौंकों के साथ वह वदन के आर-पार हो रही थी। लेकिन यहाँ इसको झेलने व इंतजार के अतिरिक्त कोई चारा नहीं था। रुकने की वातचीत होने पर हमारे साथी आते हैं और ऊपर मुख्य ऑफिस के बाहर लगे कुर्सी-मेज पर रात का दाल-चाबल खाते हैं। अंदर चूल्हा जल रहा था, लेकिन जुत्ता पहने अंदर प्रवेश संभव नहीं था। बाहर से ही बीरबल की आग की तरह दूरदर्शन से ही इसका ताप लेते रहे। भोजन के उपरान्त यहाँ से उपलब्ध गाइड के साथ समान लेकर नीचे एक खेत में लगे तम्बूओं की कतार की ओर बढ़ते हैं। जंगली घास और ढलानदार खेत के बीच होते हुए नीचे उतरते हैं।

इसी क्रम में हमारा एक साथी ढलान की गिली मिट्टी पर फिसल जाता है, लगा कहीं चोट ज्यादा तो नहीं आ गई। पता चला कि कंधे पर हल्की चोट आई है, बाकि सब ठीक है। फिर हम सब संभल कर आगे बढ़ते हैं और कौने पर एक खाली तम्बू में प्रवेश करते हैं। जूत्ते तम्बू के बाहर गैलरी में रखकर, अपना समान तम्बू के कौने में समेट कर मैट पर बिछे गद्दे पर लेटते हैं, मोटे-मोटे दो कम्बल ओढ़कर मदमहेश्वर बाबा का धन्यवाद ज्ञापन करते हैं कि सही सलामत उनके प्राँगण में पहुँच गए और बाबा को याद करते हुए सो जाते हैं। (जारी, शेष अगले भाग-6 में, मदमहेश्वर से बनतोली)

बुधवार, 16 दिसंबर 2020

शिमला के आसपास के दर्शनीय स्थल

                                 शिमला से कुफरी, चैयल, नारकण्डा, मशोवरा और सराहन

शिमला हिमालय की वादियों में

शिमला के बाहर आस-पास घूमने के कुछ बेहतरीन स्थल हैं, जहाँ हिमालय की वादियों में भ्रमण का आनन्द लिया जा सकता है। एडवांस्ड स्टडी में रहते हुए प्रायः एक माह का स्पैल पूरा होने पर हम अपने साथियों के साथ एक टैक्सी हायर कर इनका अवलोकन करते रहे। इसमें कुफरी, चैयल, मशोबरा, नारकण्डा, हाटू पीक, सराहन भीमाकाली मंदिर आदि उल्लेखनीय हैं, जो एक-दो दिन में आसानी से कवर हो जाते हैं। यहाँ शिमला के ग्रामीण आँचल में हो रहे खेती एवं बागवानी के प्रयोगों की एक झलक उठा सकते हैं। प्रकृति के वैभव को समेटे यहाँ की हिमालयन वादियों के बीच यात्रा सदैव रोमाँचक अनुभव रहता है और ज्ञानबर्धक भी।

फूलों से आच्छादित सेब के पेड़

ग्रामीण शिमला की ओर शिमला शहर से बाहर निकलने के दो रास्ते हैं। एक लक्कड़ बाजार से होकर। विक्टरी टन्नल को पार करते ही थोड़ी देर में लक्कड़ बाजार बस स्टैंड आता है, इसके आगे कुछ ही समय में सफर एक पुल के नीचे से होकर गुजरता है। आगे आता है शिमला का इंदिरा गाँधी मेडिकल कालेज एवं हॉस्पिटल। यहाँ तक व इसके थोड़ा आगे संजोली तक राजधानी की बढ़ती आबादी के दबाब को अनुभव किया जा सकता है। बेतरतीव भवन निर्माण, ढलान में भी बिल्डिंग के ऊपर बिल्डिंग खड़ी करने का चलन, सबकुछ शिमला के प्राकृतिक सौंदर्य पर तुषारापात करता प्रतीत होता है। भवन निर्माण और शहर की प्लानिंग के संदर्भ में सरकार एवं जनता के बीच किसी मानक रोड़मैप का न होना कचोटता है।

दूसरा मार्ग पुराने बस स्टैंड से होकर आगे सचिवालय भवन से होकर शिमला के सघन बनप्रदेश से गुजरता है। बन विभाग द्वारा संरक्षित इस क्षेत्र से सफर में शिमला के प्राकृतिक सौंदर्य की झलक मिलती है, कुछ पल शांति-सुकून के गुजरते हैं। इस दूरदर्शिता के लिए बन विभाग एवं सरकार के प्रति आभार के भाव फूटते हैं। इसी राह पर प्रतिष्ठित लेडीज सेंट बीड कालेज पड़ता है और इसके वायीं ओर से मोटर मार्ग जाखू मंदिर के लिए जाता है।

जाखू मंदिर, शिमला, हनुमान बजरंगबली

इसको पार करते ही संजोली क्षेत्र में प्रवेश होता है और फिर होते हैं ढलान के ऊपर कंक्रीट के जंगल के दर्शन, जो प्रकृति प्रेमी को व्यथित करते हैं। कई संजौली को शिमला का दिल कहते हैं, लेकिन बिना हरियाली, स्वस्थ आवोहवा के यह दिल कितने दिन धड़केगा और शिमला को स्वस्थ रखेगा, विचारणीय है। विषय गंभीर है, इस पर अधिक चर्चा न करते हुए आगे बढ़ते हैं। संजोली को पार करते ही आगे मानवीय हस्तक्षेप कम हो जाता है। दायीं ओर ग्रीन वैली के दर्शन होते हैं, जिसे एशिया का सबसे घना देवदार का जंगल माना जाता है। निश्चित ही इसमें जंगली जानवर बहुतायत में विचरण करते होंगे। सड़क पर भी हम कई बार बाघ के दर्शन कर चुके हैं। यहाँ हिरण, चकोर, जंगली मुर्गा, मोनाल आदि के दर्शन तो सामान्य घटना है। यहाँ कुछ पल रुककर कुछ यादगार फोटो के साथ आगे बढ़ा जा सकता है। 

इसके बाद आता है कुफरी, जो शिमला के समीपस्थ एक लोकप्रिय स्थल है, क्योंकि अधिक ऊँचाई (8924 फीट) पर होने के कारण यहाँ शिमला से अधिक बर्फ गिरती है तथा ठण्ड भी अधिक रहती है। यहाँ पर सीढ़ीदार खेतों में घूमना, स्लोप में फिसलना पर्यटकों को प्रकृति की गोद में कुछ पल खोने का मौका देता है।

बर्फ से ढकी कुफरी की ढलानें

इसके साथ यहाँ घोडे या खच्चर पर बैठकर यहाँ की यात्रा का आनन्द लिया जा सकता है। ऊपर पहाड़ी पर एक चिडियाघर भी है, जिसमें बाघ, तेंदुआ, काला भालू, ब्राउन बीयर, जंगली बकरी तथा अन्य पक्षी पर्याप्त प्राकृतिक परिवेश में रखे गए हैं। यहाँ पर ऊँचाई के बाँज बृक्षों के दर्शन किए जा सकते हैं, जिनके पत्ते मोटे, चमकीले, डार्क ग्रीन तथा कंटीले होते हैं। ऊँचाई के साथ बाँज के वृक्षों में कैसे परिवर्तन होता है, यहाँ देखा जा सकता है। अंदर चाय-नाश्ता के भी ठिकाने हैं। कुल मिलाकर कुफरी का टूर परिवार के साथ पैसा बसूल टूर साबित होता है। यदा-कदा यहाँ फिल्म शूटिंग के सीन भी देखे जा सकते हैं। बाहर गिफ्ट शॉप्स से कुछ यादगार चीजें खरीदीं जा सकती हैं।

कुफरी से नीचे उतरकर दायीं ओर शिमला के समानान्तर रास्ता चैयल की ओऱ जाता है। जहाँ कई दर्शनीय स्थल हैं। रास्ता देवदार के घने जंगलों से होकर गुजरता है। बीच-बीच में रास्ता धार (रिज) से होकर गुजरता है, ऐसे में दायीं ओर शिमला के दर्शन होते हैं और वायीं ओर जंगल विरल होने पर नीचे गाँव और दूर की घाटियोँ के दर्शन होते हैं। इस राह में चाय-नाश्ते के भी कुछ बेहतरीन ठिकाने मिलते हैं, जहाँ पर आवश्यकता पड़ने पर तरोजाजा हुआ जा सकता है।

चैयल पैलैस का विहंगम दृश्य

बीच में चैयल की पहाड़ियाँ दिखना शुरु हो जाती हैं। नीचे ढलान में सेब के बाग मिलते हैं। कुछ ही देर में घने बुराँश-देवदार के जंगल के बीच मुख्यमार्ग से रास्ता वाएं मुड़कर चैयल पैलेस की ओर बढ़ता है। थोड़ी ही देर में चैयल पैलेस आता है, जो अंग्रेजों के समय पटियाला के राजघराने का गर्मी का विश्रामगृह हुआ करता था। आज इसे एक हेरिटेज होटल में कन्वर्ट किया गया है। इसके अंदर सुंदर म्यूजियम है तो बाहर मैदान में चहलकदमी के लिए बेहतरीन लॉन और रुकने के ठिकाने। निसंदेह रुप में यहाँ परिवार के साथ कुछ समय अन्दर-बाहर शाही शानो-शौकत का अवलोकन व बजट के हिसाब से खर्च करते हुए विताए जा सकते हैं।

इसके आगे सिद्ध बाबा का मंदिर पड़ता है। माना जाता है कि बाबा महाराजा भूपिन्द्र सिंह के सपने में आते हैं और निर्देश देते हैं कि इस स्थान पर मैंने ध्यान किया था। महाराजा यहाँ पर मंदिर बनाते हैं। हमें इस मंदिर में एक औघड़ बाबाजी मिले थे। काफी पहुँचे हुए लग रहे थे। धुनी रमा कर बैठे थे। हमें चाय पिलाते हैं, कुशल-क्षेम पूछते हैं और कुछ व्यवहारिक ज्ञान की बातें बताकर विदा करते हैं। यहाँ से थोड़ा आगे क्रिकेट स्टेडियम पड़ता है, जिसे विश्व का सबसे अधिक ऊँचाई (7380 फीट) पर बना स्टेडियम माना जाता है। इसे पटियाला के महाराजा ने 1893 में बनाया था। आज इस मैदान का उपयोग चैयल मिलिट्री स्कूल के बच्चों के खेल के मैदान के रुप में होता है तथा सेना द्वारा इसका रख रखाब किया जाता है।

इसके थोड़ी दूरी पर काली का टिबा या काली मंदिर आता है, जो पहाड़ी की चोटी पर स्थित एक शांत-एकाँत स्थल है। चीड़, देवदार और बाँज के घने जंगल से होकर यहाँ का रास्ता जाता है, पहाड़ी के कौने पर सबसे ऊँचे स्थान पर बने इस मंदिर से चारों ओऱ का विहंगम नजारा देखते ही बनता है। साफ मौसम में यहाँ से चूड़ चांदनी और शिवालिक श्रृंखलाओं का नजारा दर्शनीय रहता है। यहाँ से हम बापस शाम तक 44 किमी दूरी तय करते हुए शिमला आते हैं। चैयल से दूसरा रास्ता सोलन की ओऱ जाता है, जो यहाँ से 45 किमी पड़ता है। यदि घूम कर आना हो तो इस रास्ते से भी शिमला आया जा सकता है।

कुफरी के पहले ही नीचे से एक रास्ता मशोबरा के लिए जाता है, जो आगे नालदेरा से होते हुए तता पानी तक पहुँचता है। इस रूट पर एक दिन का टूर प्लान हो सकता है। ततापानी में सतलुज नदी के बर्फिले जल के किनारे गर्म पानी के स्रोत थे, जो अब सतलुज नदी पर डैम बनने के कारण जल मग्न हो गए हैं, लेकिन इसके रुके पानी में बोटिंग से लेकर वार्टर स्पोर्टस का आनन्द लिया जा सकता है। साथ ही नदी के उपर रास्ते में बने तप्त जलकुण्डों में स्नान का लुत्फ उठाया जा सकता है। नालदेरा में पहाड़ों का सबसे पुराना और बेहतरीन गोल्फ कोर्स है। इसके अतिरिक्त यहाँ देवदार के घने वृक्षों के बीच पार्क बना हुआ है, जहाँ परिवार के साथ कुछ पल मौज-मस्ती के बिताए जा सकते हैं। राह में पड़ते स्थल मशोवरा में बागवानी से सम्बन्धित शोध संस्थान हैं। शिमला शहर के लिए फल एवं सब्जी का यह मुख्य आपूर्तिकर्ता है। इसके आसपास वाइल्ड़ फलावर हाउस, महासू देवता मंदिर तथा रिजर्व वन अभ्यारण्य पधार सकते हैं और समय हो तो यहाँ एडवेंचर एक्टिविटीज में भाग लिया जा सकता है। ततापानी जहाँ शिमला से लगभग 50 किमी की दूरी पर है, नालदेरा 23 किमी तथा मशोवरा 10 किमी की दूरी पर स्थित है।

जुलाई-अगस्त माह में तैयार सेब की फसल

कुफरी से आगे नारकण्डा की ओर रास्ता जाता है, जो मार्ग में ठियोग, मतियाना आदि कस्बों से होकर गुजरता है। यह रास्ता भी देवदार के घने जंगलों के बीच लुकाछिपी करते हुए पार होता है। एक मोड़ के बाद जंगल कम हो जाते हैं और सामने दिखती हैं कई घाटियाँ, जिनमें सेब के बगानों को बहुतायत में देखा जा सकता है। इन पर लगे सफेद और हरे रंग के नेट नए पर्यटकों में कौतुक जगाते हैं। वास्तव में ये सेब के फल को औलों से बचाने के लिए बगीचों के ऊपर ओढ़ा गया आच्छादन है। जिस इलाके में औलावृष्टि अधिक होती है, वहाँ इनका उपयोग किया जाता है। अन्यथा बागवानों की साल भर की मेहनत पर कुछ ही मिनटों में पानी फिर सकता है।

इस राह पर मतियाना में प्रायः हम भोजन के लिए रुकते रहे हैं। यह इलाका फल व सब्जि उत्पादन का एक मुख्य केंद्र है। इनके साथ इलाके की आर्थिकी में सुधार हुआ है, लेकिन साथ ही रसायनिक खाद एवं विषैले कीटनाशकों के बहुतायत में प्रयोग के साथ फल एवं सब्जियों के साथ जमीं पर भी इसके दुष्प्रभाव नजर आने लगे हैं। इसमें मेहनत करते किसानों पर भी इसकी घातक मार के समाचार आ चुके हैं। यह सब देखते हुए निसंदेह रुप में ऑर्गेनिक खेती औऱ बागवानी की ओर गंभीरता से बिचार करने का समय आ गया है। यह एक इलाके का नहीं पूरे प्रदेश एवं देश यहाँ तक कि पूरे विश्व पर लागू होता है, जहाँ जाने अनजाने ऐसे प्रयोग धड्ड़ले से चल रहे हैं।

औलों से बचाव के लिए नेट से ढके सेब को बागान

यहाँ से आगे नारकण्डा का रास्ता एक और पहाड़ों की गोद तो दूसरी ओर सेब, चैरी के बगीचों के बीच आगे बढ़ता है। मई माह में हम यहाँ पर पेड़ों में पीली और सुर्ख लाल चैरी के फलों का अवलोकन कर चुके हैं, जो देखने में बहुत सुंदर लगती हैं हालाँकि सेब तब कच्चे ही थे। सड़कों पर छोटे बक्सों में सजाकर किसानों को इनका विक्रय करते देखा। ऐसे दृश्यों के बीच हम नारकण्डा पहुँचते हैं। बीच में पानी की किल्लत की मार इस इलाके में दिखी। इसके लिए दूर-दूर से पाईपों से अपने खेत तथा बगीचों तक जल की व्यवस्था करते तथा बूंद-बूंद पानी का नियोजन करते किसानों को देखा। कितने पाईपों के जाल इस रास्ते में बिछे मिले।

नारकण्डा में फिर देवदार के सघन बन शुरु हो जाते हैं। यहाँ पर दायीं ओऱ से रास्ता हाटू पीक की ओर जाता है, जो स्वयं में एक बहुत ही रोमाँचक तथा नयनाभिराम यात्रा का अहसास देता है। रास्ते भर देवदार बुराँश के घने जंगल मिलते हैं और ऊपर हाईट के समीप ऊँचाई के बाँज वन। एक दम शिखर पर पेड़ कम हो जाते हैं, तथा बुग्याल अधिक। इन्हीं के बीच नवनिर्मित हाटू मंदिर के दर्शन किए, जो काली माता को समर्पित है। यहाँ पहाड़ी शैली में बना यह सुंदर मंदिर बहुत बारीक लकड़ी की नक्काशी लिए है, रामायण-महाभारत कालीन दृश्यों के साथ विविध देवी देवताओं के चित्र उत्कीर्ण हैं।

हाटू पीक पर स्थित शक्ति पीठ

मालूम हो कि हाटू पीक शिमला के आसपास 11,152 फीट की ऊँचाई पर सबसे ऊँचा बिंदु है। यहाँ पास के टीले पर चढ़कर चारों और घाटियों, दूर गाँव, खेत बगानों और बर्फ की चोटियों के नयनाभिराम दर्शन किए जा सकते हैं। नारकण्डा से ही एक रास्ता वायीं ओर नीचे उतरता है, जो आगे किन्नौर की ओर बढ़ता है। इसकी राह में चार-पाँच घण्टे बाद रामपुर शहर पड़ता है, जिसके थोड़ा आगे रास्ता जेओरी से सराहन गाँव की ओर मुड़ता है, जिसके एक छोर पर पड़ता है भीमाकाली मंदिर का भव्य परिसर।

नारकण्डा से रास्ता घने देवदार के जंगल के बीच ऩीचे उतरता है, रास्ते में फलों के बगीचे शुरु हो जाते हैं। इनके आगे दायीं ओर नीले रंग के फूलों से आच्छादित कई पेड़ कतारबद्ध मिले। काफी देर तक इनका सान्निध्य सफर में एक शीतल अहसास घोलता रहा। संभवतः ये मिल्ट्री के जवानों द्वारा रोपे गए लगे, जिनका कैंप आगे रास्ते में मिला। इसके बाद फिर इनके दर्शन दुर्लभ हो जाते हैं। इसी रास्ते में नीचे सतलुज नदी की घुमावदार रेखा के दर्शन होते हैं, जो कुछ ही देर में नीचे पास हो जाती हैं। रास्ता इसके किनारे आगे बढता है। इसका मटमेला रंग और इसका तेज बहाव पीछे ग्लेशियरों से इसके पिघल कर तैयार होते रुप को दर्शाता है। निसंदेह रुप में यह बहुत ठण्डा होगा, ऐसा हम अनुमान लगाते रहे, जैसा कि हमारे इलाके में ब्यास नदी के साथ होता है।

इसी तरह हम रामपुर शहर पहुँचते हैं। यहाँ रात को सतलुज नदी के किनारे एक धर्मशाला में रुकते हैं। सुबह सतलुज के गर्जन तर्जन करते तेज बहाव को देखते रहे, उस पार चट्टानीं टीले पर लोगों के घर को देखकर आश्चर्य करते रहे कि लोग कहाँ-कहाँ बस सकते हैं। यहाँ से चाय नाश्ता कर सराहन की ओर चल पड़े। बस रामपुर-सराहन वाया ज्यूरी थी। आगे का रास्ता चट्टानों को काटकर बनाया गया था, जो पहाड़ों के खालिस चट्टानी सत्य से हमें रुबरु करा रहा था। ज्यूरी से बस दायं मुड़ जाती है। आगे का रास्ता हरा भरा और पर्याप्त उर्बर लगा। रास्ते में ही आर्मी का कैंप मिला, इसकी व्यवस्थित संरचना, अनुशासन सदैव से ही मन में श्रद्धा का भाव जगाता है। कुछ ही देर में हम सराहन बस स्टैंड पहुँच चुके थे।

यहाँ सामने बर्फ से ढके किन्नर कैलाश के दिव्य दर्शन होते हैं। थोड़ा पैदल चलने के बाद हम भीमाकाली मंदिर के परिसर में थे। अंदर के प्रवेश द्वार पर हाथ पैर धोकर प्रसाद भेंट लेकर माता के द्वार में प्रवेश करते हैं। तीन-चार मंजिला यह मंदिर अद्भुत नक्काशी और बास्तुशिल्प का नमूना है, जो स्वयं में अद्वितीय प्रतीत होता है। भीमाकाली राजपरिवार की कुलदेवी भी हैं। इस क्षेत्र में ही नहीं बल्कि पूरे हिमाचल में शक्ति उपासकों के बीच इनकी विशिष्ट मान्यता है। असुरों के संहार के लिए इनका अवतरण काली रुप में हुआ था। दुर्गासप्तशती में भगवती का आश्वासन है कि हर युग में देवताओं अर्थात सज्जनों की रक्षा तथा असुरों अर्थात दुष्टों के संहार के लिए मैं देवताओं की सम्वेत पुकार पर अवतरित होउँगी।

भीमाकील मंदिर, सराहन

मंदिर के बहुमंजिले भवन में तीसरी मंजिल से अंदर प्रवेश हुआ, भीमाकाली के दर्शन होते हैं, अपना भाव निवेदन के साथ यहाँ बाहर परिसर में आते हैं। यहाँ गुलाब के सुंदर फूलों के दर्शन होते हैं, साफ सुथरे परिसर में भवनों का अवलोकन करते हैं। यहाँ की कैंटीन में पेट पूजा करते हैं बाहर निकल कर परिक्रमा पथ पर सराहन गाँव के दर्शन करते हैं। रास्ते में सेब के नए बगान दिखे, कुछ घरों के बाहर जापानी फल के पेड़ लगे मिले। यहाँ से पीछे हरे-भरे देवदार-बाँज के जंगल शीतल अनुभव दे रहे थे। परिक्रमा पूरा कर हम बापिसी में मंदिर परिसर के बाहर मैदान में चल रहे भण्डारे में भोजन-प्रसाद ग्रहण करते हैं और बापिसी की बस में बैठकर अपने गन्तव्य शिमला की ओर उसी रास्ते से घर आते हैं।

इस तरह शिमला में रहते हुए 1-2 दिन में आसपास के इन स्थलों का भ्रमण और अवलोकन किया जा सकता है। इनके अतिरिक्त और भी कई स्थल हैं, जिनको इस सूचि में जोड़ा जा सकता है।

शिमला की ऐतिहासिक विरासत संजोए दर्शनीय स्थल, IIAS, SHIMLA,  भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान, शिमला

भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान (IIAS) Shimla


मंगलवार, 29 सितंबर 2020

कुल्लु से मानाली वाया राइट बैंक

ब्यास नदी के किनारे सफर का रोमाँच 

ब्यास नदी एवं कुल्लु-मानाली घाटी

कुल्लू-मानाली का नाम प्रायः एक साथ लिया जाता है। यहाँ के लिए नए आगंतुकों के लिए स्पष्ट कर दें कि कुल्लू हिमाचल प्रदेश का एक जिला है और कुल्लु इसके एक शहर के रुप में इसका मुख्यालय भी। तथा मानाली कुल्लु शहर से उत्तर की ओर स्थित 45 किमी दूरी पर बसा दूसरा शहर है, जो अधिक ऊँचाई के कारण हिल स्टेशन का दर्जा प्राप्त है। कुल्लु की औसतन ऊँचाई 4000 फीट के आसपास है, जबकि मानाली की ऊँचाई 6730 फीट के लगभग है। बर्फ से ढकी धौलाधार पहाड़ियाँ तथा पीर-पंजाल रेंज पास होने के कारण यहाँ हाईट के हिसाब से ठण्ड अधिक रहती है। शिमला की औसतन ऊँचाई (7238 फीट) मानाली से अधिक है, लेकिन बर्फ की पहाड़ियों से दूरी के कारण वहाँ ठण्ड मानाली से थोड़ा कम रहती है।

मानाली शहर का प्रवेश द्वार

    कुल्लू से मानाली का 45 किमी का सफर दोनों और पहाड़ियों के बीच 2 से 4 किमी चौड़ी घाटी से होकर गुजरता है, जिसके केंद्र में रहती है कलकल बहती हुई ब्यास नदी की निर्मल धार। जब कोई हवाई मार्ग से आता है तो वह भुन्तर हवाई अड्डे पर उतरता है और उसका सफर कुल्लू से 10 किमी पहले से शुरु हो जाता है और जो कोई बस से आता है तो वह कुल्लू से आगे मानाली की ओर बढ़ता है। 
 
भुन्तर हवाई अड्डा, बिजली महादेव से

भुन्तर व कुल्लु से मानाली के लिए लेफ्ट और राइट बैंक दोनों ओर से पक्की सड़के हैं। लेफ्ट बैंक के सफर का जिक्र हम पिछले यात्रा वृतांत में कर चुके हैं, यहाँ राइट बैंक से रास्ते में आने बाले मुख्य पड़ाव तथा रास्ते की विशेषता का विहंगावलोकन कर रहे हैं, जिससे यात्री कभी यहाँ से गुजरे तो उसको बाहर के नजारों को समझना आसान हो जाए।
 
कुल्लू-मानाली राइट बैंक एवं व्यास नदीं

भून्तर से निकलते ही वाहन भुन्तर कस्बे से होकर गुजरता है, जो बीच में माहौल कस्बे से आगे बढ़ता है। बीच में दायीं ओर एसएसबी का प्रशिक्षण केंद्र पढ़ता है और वायीं ओर आईटीआई संस्थान। इसके थोडी आगे कुल्लु शाल व टोपी-मफलर के लिए प्रख्यात भूटिको बुनकरों का मुख्यालय पड़ता है। इसी के साथ उस पार जिया गाँव पड़ता है, जिसके लिए झुला पुल से पार किया जा सकता है। इसी के आगे दायीं और सड़क के साथ शनि मंदिर स्थित है, जिसमें ओघड़ बाबाजी धुनी रमाय मिलेंगे, यदि समय हो तो इनका बेहतरीन सत्संग किया जा सकता है।

कुल्लू घाटी का नया प्रवेश रुट वाया जिया

इसके आगे दायीं ओर ब्यास नदी प्रत्यक्ष दिखती है, जिसके किनारे अंगोरा खरगोश का फार्म है, जहाँ शाल तैयार की जाती है। इसके साथ ही पिरड़ी वाटर राफ्टिंग केंद्र है, जो ब्यास नदी में राफ्टिंग की सुबिधाएं देता हैं, जो नीचे झिड़ी तक जाता है। इसके आगे गाँधीनगर शहर पड़ता है, जहाँ कुछ योगा सेंटर भी हैं, जो विदेशियों के बीच खासे लोकप्रिय रहते हैं। इसके समाप्त होते ही ढालपुर मैदान शुरु होता है। 

ढालपुर मैदान, कुल्लू शहर का प्रवेश द्वार

देवदार  के कतारबद्ध वृक्ष यहाँ प्रवेश करते ही स्वागत करते हैं। आगे चौड़ा मैदान दिखेगा, जहाँ कुल्लू का प्रख्यात दशहरा मेला हर माह अक्टूबर में आयोजित किया जाता है। यहीं पर वायीं ओर कला केंद्र है, जहाँ रात्रिकालीन सांस्कृतिक कार्यक्रम चलते हैं। इसके निचली ओर डिग्री कालेज औऱ आगे जिला अस्पताल के कई मंजिले भवन हैं। मैदान के चारों और बुढ़े देवदार के पेड़ यहाँ की विशेष पहचान है, अब इनके साथ नए पेड़ विकसित हो रहे हैं।

ढालपुर से होकर बस दायीं ओर सीनियर सेंकेडरी स्कूल के नीच से गुजरती है, जहाँ से लिंक रोड़ डुग्गीलग घाटी की ओर जाती है। 

कुल्लू-मानाली हाईवे एवं डुग्गी लग लिंक रोड़

लेकिन दायीं ओर का रास्ता सरवरी पुल को पार करते ही यू टर्न के साथ सरवरी नदीं के वाएं तट पर बस स्टैंड की ओर जाता है। रास्ते में पुल के पास शीतला माता का भव्य मंदिर पड़ता है। बहुमंजिला सरवरी बस स्टैंड निर्माणाधीन है, इसे शिमला टुटी कण्डी बस स्टैंड की तर्ज में आधुनिकतम रुप दिया जा रहा है। यहाँ कुछ देर बस रुकने के बाद आगे बढ़ती है तो रास्ते में कुल्लू का मुख्य बाजार अखाड़ा बाजार पड़ता है। घनी आबादी के बीच बसों के लिए रास्ता तंग पड़ता है, इसलिए भूतनाथ से लिंक रोड़ उस पार जाता है, जो आगे 1-2 किमी लैफ्ट बैंक के साथ आगे बढ़ते हुए रामशिला पुल से राइट बैंक की ओऱ मुड़ता है।

कुल्लू से मानाली की ओर...

 सस्पेंशन ब्रिज पिछले की बर्षों तैयार हुआ है, उसे पार करते हुए बस राइट बैंक से आगे बढ़ती है, जो थोड़ी देर में बैष्णों माता के मंदिर से होकर गुजरती है। समय हो तो ऊपर गुफा में बने इस मंदिर के दर्शन किए जा सकते हैं। इसके आगे हिमाचल परिवहन की वर्कशॉप और पुलिस लाईन को पार कर बस बाशिंग नामक छोटे कस्बे से होकर गुजरती है, जो शाल उद्योग के लिए जाना जाता है। हाल ही में विकसित यह उद्यौगिक कस्बा तमाम कारोबार से जुड़ा है। यहाँ से उतराई के बाद सेऊबाग का पुल आता है, जिसके पार सेऊबाग गाँव पड़ता है, जिसके विहंगम दर्शन बाशिंग से ही होना शुरु हो जाते हैं।

व्यास नदी के संग घाटी का विहंगम दृश्य

आगे दायीं ओर आईटीबीपी का कैंप है, जहाँ रंगरुटों का विशेष प्रशिक्षण चलता रहता है। इसके बाद बबेली कस्वा आता है, जिसमें शाल के साथ वाटर राफ्टिंग की सुबिधा रहती है। इसके आगे बन्द्रोल गाँव पड़ता है, जहाँ इलाके की बड़ी सब्जी मंडी है, लोक्ल किसानों के फल व सब्जियाँ यहीँ खप जाती हैं। ज्ञात हो कि सबसे पहले कैप्टन ली ने बंद्रोल गाँव में ही शौकिया तौर पर सेब के बाग लगाए थे। अभी यहाँ आर्मी के आफिसर रहते हैं।

लेफ्ट बैंक से रायसन साइड का नजारा

इसके आगे रायसन इलाका आता है, जो प्लम फल के लिए प्रख्यात है। यहीं पर यूथ कलब के कैंप्स ब्यास नदीं के किनारे लगे हैं, जहाँ से ट्रैकिंग की गतिविधियाँ चलती हैं। कई फिल्मों की शूटिंग भी यहाँ होती रही हैं। इसके आगे बढ़ते ही रास्ते से उस पार नग्गर घाटी तथा पृष्ठभूमि में हिमाच्छादित पर्वतश्रृंखलाएं दर्शन देना शुरु करती हैं, जो आगे काफी देर तक सफर को रोमाँचक बनाए रहती हैं। 

राइट बैंक से नग्गर, अप्पर वैली का दृश्य

इसके बाद डोबी पुल पड़ता है, जहाँ से लिंक रोड़ फोजल घाटी तक जाता है। फोजल नाला पार करते ही आगे कटराईं कस्बा पड़ता है, जिसके कुछ आगे पतलीकुहल कस्बा पड़ता है, जो यहाँ का एक प्रमुख व्यापारिक केंद्र है। यहाँ से दायीं और का लिंक रोड़ लेफ्ट बैंक नग्गर तक जाता है औऱ वायीं और का लिंक रोड़ बडा ग्राँ व अन्य गाँवों को जोड़ता है। तथा मुख्य मार्ग मानाली की ओर बढ़ता है। यह कुल्लू-मानाली के बीचों बीच स्थित है। कटराई में पुरानी सड़क के दायीं ओर कृषि अनुसंधान केंद्र और गायत्री प्रज्ञापीठ के दर्शन किए जा सकते हैं।

कुल्लू-मानाली के बीचों-बीच कटराईं से गुजरते हुए

इसके बाद वरान आता है, जहाँ स्पैन रिजोर्ट है। जहाँ कई फिल्मों की शूटिंग हुई हैं। रजनीश औशो मानाली प्रवास के दौरान यहीं रुके थे। इसके बाद 17 मील, फिर 18 मील आता है। ब्यास नदी का उछलता कूदता निर्मल जल यहाँ सड़क के साथ बहता मिलता है और पुल से उस पार लेफ्ट बैंक के गाँव जुड़ते हैं। फिर क्लाथ आता है, जहाँ गर्म पानी के कुण्ड सड़क के दोनों ओर हैं। 

मानाली की ओर...

 

यहीं पर आलु ग्राउँड प्रख्यात है, जहाँ लाहौल से आने वाला बेहतरीन आलु स्टोर होता है। इसके बाद राँगड़ी, जहाँ से उस पार पर्वतारोहण संस्थान के जंगल व भवनों का विहंगावलोकन किया जा सकता है। रास्ते में उस पार के कई नालों के  ब्यास नदीं के साथ संगम के अद्भुत दृश्य देखे जा सकते हैं। पहले सीधा मानाली शहर में प्रवेश के साथ बस स्टैंड पहुँचते थे। अब पिछले ही वर्ष नयी सड़क बनने के साथ ब्यास नदी के किनारे देवदार के जंगल के साथ सड़क आगे बढ़ती है औऱ पुल से मुड़कर मानाली बस स्टैंड तक पहुँचती है। 

मानाली में प्रवेश, नया रुट

इस तरह एक ढेड़ घण्टे में बस कुल्लू से मानाली पहुँच जाती है। रास्ते भर ब्यास नदी का किनारा और सामने के पर्वत शिखर, सुंदर हरी-भरी वादियों इस यात्रा को बहुत ही सुखद, रोमाँचक एवं यादगार बनाती हैं। यदि अपना वाहन हो तो बीच-बीच में रुककर इन नजारों का मनमाफिक लुत्फ लिया जा सकता है। 

मानाली पहुँच कर, यहाँ क्या देखा जा सकता है, यदि यह जानना हो तो पढ़ सकते हैं अगली ब्लॉग पोस्ट - मानाली से सोलांग वैली एवं दर्शनीय स्थल।

यदि कोई कुल्लू से मानाली वाया लैफ्ट बैंक की रोमाँचक यात्रा का विहंगावलोकन करना चाहता हो, तो पढ़ सकता है,यात्रा वृताँतकुल्लू से नेहरुकुंड-वशिष्ठ वाया मानाली लेफ्ट बैंक

राईट बैंंकग से पर्वतारोहण संस्थान मानाली के दर्शन

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