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बुधवार, 16 दिसंबर 2020

शिमला के आसपास के दर्शनीय स्थल

                                 शिमला से कुफरी, चैयल, नारकण्डा, मशोवरा और सराहन

शिमला के बाहर आस-पास घूमने के कुछ बेहतरीन स्थल हैं, जहाँ हिमालय की वादियों में भ्रमण का आनन्द लिया जा सकता है। एडवांस्ड स्टडी में रहते हुए प्रायः एक माह का स्पैल पूरा होने पर हम अपने साथियों के साथ एक टैक्सी हायर कर इनका अवलोकन करते रहे। इसमें कुफरी, चैयल, मशोबरा, नारकण्डा, हाटू पीक, सराहन भीमाकाली मंदिर आदि उल्लेखनीय हैं, जो एक-दो दिन में आसानी से कवर हो जाते हैं। यहाँ शिमला के ग्रामीण आँचल में हो रहे खेती एवं बागवानी के प्रयोगों की एक झलक उठा सकते हैं। प्रकृति के वैभव को समेटे यहाँ की हिमालयन वादियों के बीच यात्रा सदैव रोमाँचक अनुभव रहता है और ज्ञानबर्धक भी।

ग्रामीण शिमला की ओर शिमला शहर से बाहर निकलने के दो रास्ते हैं। एक लक्कड़ बाजार से होकर। विक्टरी टन्नल को पार करते ही थोड़ी देर में लक्कड़ बाजार बस स्टैंड आता है, इसके आगे कुछ ही समय में सफर एक पुल के नीचे से होकर गुजरता है। आगे आता है शिमला का इंदिरा गाँधी मेडिकल कालेज एवं हॉस्पिटल। यहाँ तक व इसके थोड़ा आगे संजोली तक राजधानी की बढ़ती आबादी के दबाब को अनुभव किया जा सकता है। बेतरतीव भवन निर्माण, ढलान में भी बिल्डिंग के ऊपर बिल्डिंग खड़ी करने का चलन, सबकुछ शिमला के प्राकृतिक सौंदर्य पर तुषारापात करता प्रतीत होता है। भवन निर्माण और शहर की प्लानिंग के संदर्भ में सरकार एवं जनता के बीच किसी मानक रोड़मैप का न होना कचोटता है।

दूसरा मार्ग पुराने बस स्टैंड से होकर आगे सचिवालय भवन से होकर शिमला के सघन बनप्रदेश से गुजरता है। बन विभाग द्वारा संरक्षित इस क्षेत्र से सफर में शिमला के प्राकृतिक सौंदर्य की झलक मिलती है, कुछ पल शांति-सुकून के गुजरते हैं। इस दूरदर्शिता के लिए बन विभाग एवं सरकार के प्रति आभार के भाव फूटते हैं। इसी राह पर प्रतिष्ठित लेडीज सेंट बीड कालेज पड़ता है और इसके वायीं ओर से मोटर मार्ग जाखू मंदिर के लिए जाता है।

इसको पार करते ही संजोली क्षेत्र में प्रवेश होता है और फिर होते हैं ढलान के ऊपर कंक्रीट के जंगल के दर्शन, जो प्रकृति प्रेमी को व्यथित करते हैं। कई संजौली को शिमला का दिल कहते हैं, लेकिन बिना हरियाली, स्वस्थ आवोहवा के यह दिल कितने दिन धड़केगा और शिमला को स्वस्थ रखेगा, विचारणीय है। विषय गंभीर है, इस पर अधिक चर्चा न करते हुए आगे बढ़ते हैं। संजोली को पार करते ही आगे मानवीय हस्तक्षेप कम हो जाता है। दायीं ओर ग्रीन वैली के दर्शन होते हैं, जिसे एशिया का सबसे घना देवदार का जंगल माना जाता है। निश्चित ही इसमें जंगली जानवर बहुतायत में विचरण करते होंगे। सड़क पर भी हम कई बार बाघ के दर्शन कर चुके हैं। यहाँ हिरण, चकोर, जंगली मुर्गा, मोनाल आदि के दर्शन तो सामान्य घटना है। यहाँ कुछ पल रुककर कुछ यादगार फोटो के साथ आगे बढ़ा जा सकता है। 

इसके बाद आता है कुफरी, जो शिमला के समीपस्थ एक लोकप्रिय स्थल है, क्योंकि अधिक ऊँचाई (8924 फीट) पर होने के कारण यहाँ शिमला से अधिक बर्फ गिरती है तथा ठण्ड भी अधिक रहती है। यहाँ पर सीढ़ीदार खेतों में घूमना, स्लोप में फिसलना पर्यटकों को प्रकृति की गोद में कुछ पल खोने का मौका देता है।


इसके साथ यहाँ घोडे या खच्चर पर बैठकर यहाँ की यात्रा का आनन्द लिया जा सकता है। ऊपर पहाड़ी पर एक चिडियाघर भी है, जिसमें बाघ, तेंदुआ, काला भालू, ब्राउन बीयर, जंगली बकरी तथा अन्य पक्षी पर्याप्त प्राकृतिक परिवेश में रखे गए हैं। यहाँ पर ऊँचाई के बाँज बृक्षों के दर्शन किए जा सकते हैं, जिनके पत्ते मोटे, चमकीले, डार्क ग्रीन तथा कंटीले होते हैं। ऊँचाई के साथ बाँज के वृक्षों में कैसे परिवर्तन होता है, यहाँ देखा जा सकता है। अंदर चाय-नाश्ता के भी ठिकाने हैं। कुल मिलाकर कुफरी का टूर परिवार के साथ पैसा बसूल टूर साबित होता है। यदा-कदा यहाँ फिल्म शूटिंग के सीन भी देखे जा सकते हैं। बाहर गिफ्ट शॉप्स से कुछ यादगार चीजें खरीदीं जा सकती हैं।

कुफरी से नीचे उतरकर दायीं ओर शिमला के समानान्तर रास्ता चैयल की ओऱ जाता है। जहाँ कई दर्शनीय स्थल हैं। रास्ता देवदार के घने जंगलों से होकर गुजरता है। बीच-बीच में रास्ता धार (रिज) से होकर गुजरता है, ऐसे में दायीं ओर शिमला के दर्शन होते हैं और वायीं ओर जंगल विरल होने पर नीचे गाँव और दूर की घाटियोँ के दर्शन होते हैं। इस राह में चाय-नाश्ते के भी कुछ बेहतरीन ठिकाने मिलते हैं, जहाँ पर आवश्यकता पड़ने पर तरोजाजा हुआ जा सकता है।

बीच में चैयल की पहाड़ियाँ दिखना शुरु हो जाती हैं। नीचे ढलान में सेब के बाग मिलते हैं। कुछ ही देर में घने बुराँश-देवदार के जंगल के बीच मुख्यमार्ग से रास्ता वाएं मुड़कर चैयल पैलेस की ओर बढ़ता है। थोड़ी ही देर में चैयल पैलेस आता है, जो अंग्रेजों के समय पटियाला के राजघराने का गर्मी का विश्रामगृह हुआ करता था। आज इसे एक हेरिटेज होटल में कन्वर्ट किया गया है। इसके अंदर सुंदर म्यूजियम है तो बाहर मैदान में चहलकदमी के लिए बेहतरीन लॉन और रुकने के ठिकाने। निसंदेह रुप में यहाँ परिवार के साथ कुछ समय अन्दर-बाहर शाही शानो-शौकत का अवलोकन व बजट के हिसाब से खर्च करते हुए विताए जा सकते हैं।

इसके आगे सिद्ध बाबा का मंदिर पड़ता है। माना जाता है कि बाबा महाराजा भूपिन्द्र सिंह के सपने में आते हैं और निर्देश देते हैं कि इस स्थान पर मैंने ध्यान किया था। महाराजा यहाँ पर मंदिर बनाते हैं। हमें इस मंदिर में एक औघड़ बाबाजी मिले थे। काफी पहुँचे हुए लग रहे थे। धुनी रमा कर बैठे थे। हमें चाय पिलाते हैं, कुशल-क्षेम पूछते हैं और कुछ व्यवहारिक ज्ञान की बातें बताकर विदा करते हैं। यहाँ से थोड़ा आगे क्रिकेट स्टेडियम पड़ता है, जिसे विश्व का सबसे अधिक ऊँचाई (7380 फीट) पर बना स्टेडियम माना जाता है। इसे पटियाला के महाराजा ने 1893 में बनाया था। आज इस मैदान का उपयोग चैयल मिलिट्री स्कूल के बच्चों के खेल के मैदान के रुप में होता है तथा सेना द्वारा इसका रख रखाब किया जाता है।

इसके थोड़ी दूरी पर काली का टिबा या काली मंदिर आता है, जो पहाड़ी की चोटी पर स्थित एक शांत-एकाँत स्थल है। चीड़, देवदार और बाँज के घने जंगल से होकर यहाँ का रास्ता जाता है, पहाड़ी के कौने पर सबसे ऊँचे स्थान पर बने इस मंदिर से चारों ओऱ का विहंगम नजारा देखते ही बनता है। साफ मौसम में यहाँ से चूड़ चांदनी और शिवालिक श्रृंखलाओं का नजारा दर्शनीय रहता है। यहाँ से हम बापस शाम तक 44 किमी दूरी तय करते हुए शिमला आते हैं। चैयल से दूसरा रास्ता सोलन की ओऱ जाता है, जो यहाँ से 45 किमी पड़ता है। यदि घूम कर आना हो तो इस रास्ते से भी शिमला आया जा सकता है।

कुफरी के पहले ही नीचे से एक रास्ता मशोबरा के लिए जाता है, जो आगे नालदेरा से होते हुए तता पानी तक पहुँचता है। इस रूट पर एक दिन का टूर प्लान हो सकता है। ततापानी में सतलुज नदी के बर्फिले जल के किनारे गर्म पानी के स्रोत थे, जो अब सतलुज नदी पर डैम बनने के कारण जल मग्न हो गए हैं, लेकिन इसके रुके पानी में बोटिंग से लेकर वार्टर स्पोर्टस का आनन्द लिया जा सकता है। साथ ही नदी के उपर रास्ते में बने तप्त जलकुण्डों में स्नान का लुत्फ उठाया जा सकता है। नालदेरा में पहाड़ों का सबसे पुराना और बेहतरीन गोल्फ कोर्स है। इसके अतिरिक्त यहाँ देवदार के घने वृक्षों के बीच पार्क बना हुआ है, जहाँ परिवार के साथ कुछ पल मौज-मस्ती के बिताए जा सकते हैं। राह में पड़ते स्थल मशोवरा में बागवानी से सम्बन्धित शोध संस्थान हैं। शिमला शहर के लिए फल एवं सब्जी का यह मुख्य आपूर्तिकर्ता है। इसके आसपास वाइल्ड़ फलावर हाउस, महासू देवता मंदिर तथा रिजर्व वन अभ्यारण्य पधार सकते हैं और समय हो तो यहाँ एडवेंचर एक्टिविटीज में भाग लिया जा सकता है। ततापानी जहाँ शिमला से लगभग 50 किमी की दूरी पर है, नालदेरा 23 किमी तथा मशोवरा 10 किमी की दूरी पर स्थित है।

कुफरी से आगे नारकण्डा की ओर रास्ता जाता है, जो मार्ग में ठियोग, मतियाना आदि कस्बों से होकर गुजरता है। यह रास्ता भी देवदार के घने जंगलों के बीच लुकाछिपी करते हुए पार होता है। एक मोड़ के बाद जंगल कम हो जाते हैं और सामने दिखती हैं कई घाटियाँ, जिनमें सेब के बगानों को बहुतायत में देखा जा सकता है। इन पर लगे सफेद और हरे रंग के नेट नए पर्यटकों में कौतुक जगाते हैं। वास्तव में ये सेब के फल को औलों से बचाने के लिए बगीचों के ऊपर ओढ़ा गया आच्छादन है। जिस इलाके में औलावृष्टि अधिक होती है, वहाँ इनका उपयोग किया जाता है। अन्यथा बागवानों की साल भर की मेहनत पर कुछ ही मिनटों में पानी फिर सकता है।

इस राह पर मतियाना में प्रायः हम भोजन के लिए रुकते रहे हैं। यह इलाका फल व सब्जि उत्पादन का एक मुख्य केंद्र है। इनके साथ इलाके की आर्थिकी में सुधार हुआ है, लेकिन साथ ही रसायनिक खाद एवं विषैले कीटनाशकों के बहुतायत में प्रयोग के साथ फल एवं सब्जियों के साथ जमीं पर भी इसके दुष्प्रभाव नजर आने लगे हैं। इसमें मेहनत करते किसानों पर भी इसकी घातक मार के समाचार आ चुके हैं। यह सब देखते हुए निसंदेह रुप में ऑर्गेनिक खेती औऱ बागवानी की ओर गंभीरता से बिचार करने का समय आ गया है। यह एक इलाके का नहीं पूरे प्रदेश एवं देश यहाँ तक कि पूरे विश्व पर लागू होता है, जहाँ जाने अनजाने ऐसे प्रयोग धड्ड़ले से चल रहे हैं।

यहाँ से आगे नारकण्डा का रास्ता एक और पहाड़ों की गोद तो दूसरी ओर सेब, चैरी के बगीचों के बीच आगे बढ़ता है। मई माह में हम यहाँ पर पेड़ों में पीली और सुर्ख लाल चैरी के फलों का अवलोकन कर चुके हैं, जो देखने में बहुत सुंदर लगती हैं हालाँकि सेब तब कच्चे ही थे। सड़कों पर छोटे बक्सों में सजाकर किसानों को इनका विक्रय करते देखा। ऐसे दृश्यों के बीच हम नारकण्डा पहुँचते हैं। बीच में पानी की किल्लत की मार इस इलाके में दिखी। इसके लिए दूर-दूर से पाईपों से अपने खेत तथा बगीचों तक जल की व्यवस्था करते तथा बूंद-बूंद पानी का नियोजन करते किसानों को देखा। कितने पाईपों के जाल इस रास्ते में बिछे मिले।

नारकण्डा में फिर देवदार के सघन बन शुरु हो जाते हैं। यहाँ पर दायीं ओऱ से रास्ता हाटू पीक की ओर जाता है, जो स्वयं में एक बहुत ही रोमाँचक तथा नयनाभिराम यात्रा का अहसास देता है। रास्ते भर देवदार बुराँश के घने जंगल मिलते हैं और ऊपर हाईट के समीप ऊँचाई के बाँज वन। एक दम शिखर पर पेड़ कम हो जाते हैं, तथा बुग्याल अधिक। इन्हीं के बीच नवनिर्मित हाटू मंदिर के दर्शन किए, जो काली माता को समर्पित है। यहाँ पहाड़ी शैली में बना यह सुंदर मंदिर बहुत बारीक लकड़ी की नक्काशी लिए है, रामायण-महाभारत कालीन दृश्यों के साथ विविध देवी देवताओं के चित्र उत्कीर्ण हैं।

मालूम हो कि हाटू पीक शिमला के आसपास 11,152 फीट की ऊँचाई पर सबसे ऊँचा बिंदु है। यहाँ पास के टीले पर चढ़कर चारों और घाटियों, दूर गाँव, खेत बगानों और बर्फ की चोटियों के नयनाभिराम दर्शन किए जा सकते हैं। नारकण्डा से ही एक रास्ता वायीं ओर नीचे उतरता है, जो आगे किन्नौर की ओर बढ़ता है। इसकी राह में चार-पाँच घण्टे बाद रामपुर शहर पड़ता है, जिसके थोड़ा आगे रास्ता जेओरी से सराहन गाँव की ओर मुड़ता है, जिसके एक छोर पर पड़ता है भीमाकाली मंदिर का भव्य परिसर।

नारकण्डा से रास्ता घने देवदार के जंगल के बीच ऩीचे उतरता है, रास्ते में फलों के बगीचे शुरु हो जाते हैं। इनके आगे दायीं ओर नीले रंग के फूलों से आच्छादित कई पेड़ कतारबद्ध मिले। काफी देर तक इनका सान्निध्य सफर में एक शीतल अहसास घोलता रहा। संभवतः ये मिल्ट्री के जवानों द्वारा रोपे गए लगे, जिनका कैंप आगे रास्ते में मिला। इसके बाद फिर इनके दर्शन दुर्लभ हो जाते हैं। इसी रास्ते में नीचे सतलुज नदी की घुमावदार रेखा के दर्शन होते हैं, जो कुछ ही देर में नीचे पास हो जाती हैं। रास्ता इसके किनारे आगे बढता है। इसका मटमेला रंग और इसका तेज बहाव पीछे ग्लेशियरों से इसके पिघल कर तैयार होते रुप को दर्शाता है। निसंदेह रुप में यह बहुत ठण्डा होगा, ऐसा हम अनुमान लगाते रहे, जैसा कि हमारे इलाके में ब्यास नदी के साथ होता है।

इसी तरह हम रामपुर शहर पहुँचते हैं। यहाँ रात को सतलुज नदी के किनारे एक धर्मशाला में रुकते हैं। सुबह सतलुज के गर्जन तर्जन करते तेज बहाव को देखते रहे, उस पार चट्टानीं टीले पर लोगों के घर को देखकर आश्चर्य करते रहे कि लोग कहाँ-कहाँ बस सकते हैं। यहाँ से चाय नाश्ता कर सराहन की ओर चल पड़े। बस रामपुर-सराहन वाया ज्यूरी थी। आगे का रास्ता चट्टानों को काटकर बनाया गया था, जो पहाड़ों के खालिस चट्टानी सत्य से हमें रुबरु करा रहा था। ज्यूरी से बस दायं मुड़ जाती है। आगे का रास्ता हरा भरा और पर्याप्त उर्बर लगा। रास्ते में ही आर्मी का कैंप मिला, इसकी व्यवस्थित संरचना, अनुशासन सदैव से ही मन में श्रद्धा का भाव जगाता है। कुछ ही देर में हम सराहन बस स्टैंड पहुँच चुके थे।

यहाँ सामने बर्फ से ढके किन्नर कैलाश के दिव्य दर्शन होते हैं। थोड़ा पैदल चलने के बाद हम भीमाकाली मंदिर के परिसर में थे। अंदर के प्रवेश द्वार पर हाथ पैर धोकर प्रसाद भेंट लेकर माता के द्वार में प्रवेश करते हैं। तीन-चार मंजिला यह मंदिर अद्भुत नक्काशी और बास्तुशिल्प का नमूना है, जो स्वयं में अद्वितीय प्रतीत होता है। भीमाकाली राजपरिवार की कुलदेवी भी हैं। इस क्षेत्र में ही नहीं बल्कि पूरे हिमाचल में शक्ति उपासकों के बीच इनकी विशिष्ट मान्यता है। असुरों के संहार के लिए इनका अवतरण काली रुप में हुआ था। दुर्गासप्तशती में भगवती का आश्वासन है कि हर युग में देवताओं अर्थात सज्जनों की रक्षा तथा असुरों अर्थात दुष्टों के संहार के लिए मैं देवताओं की सम्वेत पुकार पर अवतरित होउँगी।

मंदिर के बहुमंजिले भवन में तीसरी मंजिल से अंदर प्रवेश हुआ, भीमाकाली के दर्शन होते हैं, अपना भाव निवेदन के साथ यहाँ बाहर परिसर में आते हैं। यहाँ गुलाब के सुंदर फूलों के दर्शन होते हैं, साफ सुथरे परिसर में भवनों का अवलोकन करते हैं। यहाँ की कैंटीन में पेट पूजा करते हैं बाहर निकल कर परिक्रमा पथ पर सराहन गाँव के दर्शन करते हैं। रास्ते में सेब के नए बगान दिखे, कुछ घरों के बाहर जापानी फल के पेड़ लगे मिले। यहाँ से पीछे हरे-भरे देवदार-बाँज के जंगल शीतल अनुभव दे रहे थे। परिक्रमा पूरा कर हम बापिसी में मंदिर परिसर के बाहर मैदान में चल रहे भण्डारे में भोजन-प्रसाद ग्रहण करते हैं और बापिसी की बस में बैठकर अपने गन्तव्य शिमला की ओर उसी रास्ते से घर आते हैं।

इस तरह शिमला में रहते हुए 1-2 दिन में आसपास के इन स्थलों का भ्रमण और अवलोकन किया जा सकता है। इनके अतिरिक्त और भी कई स्थल हैं, जिनको इस सूचि में जोड़ा जा सकता है।

मंगलवार, 29 सितंबर 2020

कुल्लु से मानाली वाया राइट बैंक

ब्यास नदी के किनारे सफर का रोमाँच 

ब्यास नदी एवं कुल्लु-मानाली घाटी

कुल्लू-मानाली का नाम प्रायः एक साथ लिया जाता है। यहाँ के लिए नए आगंतुकों के लिए स्पष्ट कर दें कि कुल्लू हिमाचल प्रदेश का एक जिला है और कुल्लु इसके एक शहर के रुप में इसका मुख्यालय भी। तथा मानाली कुल्लु शहर से उत्तर की ओर स्थित 45 किमी दूरी पर बसा दूसरा शहर है, जो अधिक ऊँचाई के कारण हिल स्टेशन का दर्जा प्राप्त है। कुल्लु की औसतन ऊँचाई 4000 फीट के आसपास है, जबकि मानाली की ऊँचाई 6730 फीट के लगभग है। बर्फ से ढकी धौलाधार पहाड़ियाँ तथा पीर-पंजाल रेंज पास होने के कारण यहाँ हाईट के हिसाब से ठण्ड अधिक रहती है। शिमला की औसतन ऊँचाई (7238 फीट) मानाली से अधिक है, लेकिन बर्फ की पहाड़ियों से दूरी के कारण वहाँ ठण्ड मानाली से थोड़ा कम रहती है।

मानाली शहर का प्रवेश द्वार

    कुल्लू से मानाली का 45 किमी का सफर दोनों और पहाड़ियों के बीच 2 से 4 किमी चौड़ी घाटी से होकर गुजरता है, जिसके केंद्र में रहती है कलकल बहती हुई ब्यास नदी की निर्मल धार। जब कोई हवाई मार्ग से आता है तो वह भुन्तर हवाई अड्डे पर उतरता है और उसका सफर कुल्लू से 10 किमी पहले से शुरु हो जाता है और जो कोई बस से आता है तो वह कुल्लू से आगे मानाली की ओर बढ़ता है। 
 
भुन्तर हवाई अड्डा, बिजली महादेव से

भुन्तर व कुल्लु से मानाली के लिए लेफ्ट और राइट बैंक दोनों ओर से पक्की सड़के हैं। लेफ्ट बैंक के सफर का जिक्र हम पिछले यात्रा वृतांत में कर चुके हैं, यहाँ राइट बैंक से रास्ते में आने बाले मुख्य पड़ाव तथा रास्ते की विशेषता का विहंगावलोकन कर रहे हैं, जिससे यात्री कभी यहाँ से गुजरे तो उसको बाहर के नजारों को समझना आसान हो जाए।
 
कुल्लू-मानाली राइट बैंक एवं व्यास नदीं

भून्तर से निकलते ही वाहन भुन्तर कस्बे से होकर गुजरता है, जो बीच में माहौल कस्बे से आगे बढ़ता है। बीच में दायीं ओर एसएसबी का प्रशिक्षण केंद्र पढ़ता है और वायीं ओर आईटीआई संस्थान। इसके थोडी आगे कुल्लु शाल व टोपी-मफलर के लिए प्रख्यात भूटिको बुनकरों का मुख्यालय पड़ता है। इसी के साथ उस पार जिया गाँव पड़ता है, जिसके लिए झुला पुल से पार किया जा सकता है। इसी के आगे दायीं और सड़क के साथ शनि मंदिर स्थित है, जिसमें ओघड़ बाबाजी धुनी रमाय मिलेंगे, यदि समय हो तो इनका बेहतरीन सत्संग किया जा सकता है।

कुल्लू घाटी का नया प्रवेश रुट वाया जिया

इसके आगे दायीं ओर ब्यास नदी प्रत्यक्ष दिखती है, जिसके किनारे अंगोरा खरगोश का फार्म है, जहाँ शाल तैयार की जाती है। इसके साथ ही पिरड़ी वाटर राफ्टिंग केंद्र है, जो ब्यास नदी में राफ्टिंग की सुबिधाएं देता हैं, जो नीचे झिड़ी तक जाता है। इसके आगे गाँधीनगर शहर पड़ता है, जहाँ कुछ योगा सेंटर भी हैं, जो विदेशियों के बीच खासे लोकप्रिय रहते हैं। इसके समाप्त होते ही ढालपुर मैदान शुरु होता है। 

ढालपुर मैदान, कुल्लू शहर का प्रवेश द्वार

देवदार  के कतारबद्ध वृक्ष यहाँ प्रवेश करते ही स्वागत करते हैं। आगे चौड़ा मैदान दिखेगा, जहाँ कुल्लू का प्रख्यात दशहरा मेला हर माह अक्टूबर में आयोजित किया जाता है। यहीं पर वायीं ओर कला केंद्र है, जहाँ रात्रिकालीन सांस्कृतिक कार्यक्रम चलते हैं। इसके निचली ओर डिग्री कालेज औऱ आगे जिला अस्पताल के कई मंजिले भवन हैं। मैदान के चारों और बुढ़े देवदार के पेड़ यहाँ की विशेष पहचान है, अब इनके साथ नए पेड़ विकसित हो रहे हैं।

ढालपुर से होकर बस दायीं ओर सीनियर सेंकेडरी स्कूल के नीच से गुजरती है, जहाँ से लिंक रोड़ डुग्गीलग घाटी की ओर जाती है। 

कुल्लू-मानाली हाईवे एवं डुग्गी लग लिंक रोड़

लेकिन दायीं ओर का रास्ता सरवरी पुल को पार करते ही यू टर्न के साथ सरवरी नदीं के वाएं तट पर बस स्टैंड की ओर जाता है। रास्ते में पुल के पास शीतला माता का भव्य मंदिर पड़ता है। बहुमंजिला सरवरी बस स्टैंड निर्माणाधीन है, इसे शिमला टुटी कण्डी बस स्टैंड की तर्ज में आधुनिकतम रुप दिया जा रहा है। यहाँ कुछ देर बस रुकने के बाद आगे बढ़ती है तो रास्ते में कुल्लू का मुख्य बाजार अखाड़ा बाजार पड़ता है। घनी आबादी के बीच बसों के लिए रास्ता तंग पड़ता है, इसलिए भूतनाथ से लिंक रोड़ उस पार जाता है, जो आगे 1-2 किमी लैफ्ट बैंक के साथ आगे बढ़ते हुए रामशिला पुल से राइट बैंक की ओऱ मुड़ता है।

कुल्लू से मानाली की ओर...

 सस्पेंशन ब्रिज पिछले की बर्षों तैयार हुआ है, उसे पार करते हुए बस राइट बैंक से आगे बढ़ती है, जो थोड़ी देर में बैष्णों माता के मंदिर से होकर गुजरती है। समय हो तो ऊपर गुफा में बने इस मंदिर के दर्शन किए जा सकते हैं। इसके आगे हिमाचल परिवहन की वर्कशॉप और पुलिस लाईन को पार कर बस बाशिंग नामक छोटे कस्बे से होकर गुजरती है, जो शाल उद्योग के लिए जाना जाता है। हाल ही में विकसित यह उद्यौगिक कस्बा तमाम कारोबार से जुड़ा है। यहाँ से उतराई के बाद सेऊबाग का पुल आता है, जिसके पार सेऊबाग गाँव पड़ता है, जिसके विहंगम दर्शन बाशिंग से ही होना शुरु हो जाते हैं।

व्यास नदी के संग घाटी का विहंगम दृश्य

आगे दायीं ओर आईटीबीपी का कैंप है, जहाँ रंगरुटों का विशेष प्रशिक्षण चलता रहता है। इसके बाद बबेली कस्वा आता है, जिसमें शाल के साथ वाटर राफ्टिंग की सुबिधा रहती है। इसके आगे बन्द्रोल गाँव पड़ता है, जहाँ इलाके की बड़ी सब्जी मंडी है, लोक्ल किसानों के फल व सब्जियाँ यहीँ खप जाती हैं। ज्ञात हो कि सबसे पहले कैप्टन ली ने बंद्रोल गाँव में ही शौकिया तौर पर सेब के बाग लगाए थे। अभी यहाँ आर्मी के आफिसर रहते हैं।

लेफ्ट बैंक से रायसन साइड का नजारा

इसके आगे रायसन इलाका आता है, जो प्लम फल के लिए प्रख्यात है। यहीं पर यूथ कलब के कैंप्स ब्यास नदीं के किनारे लगे हैं, जहाँ से ट्रैकिंग की गतिविधियाँ चलती हैं। कई फिल्मों की शूटिंग भी यहाँ होती रही हैं। इसके आगे बढ़ते ही रास्ते से उस पार नग्गर घाटी तथा पृष्ठभूमि में हिमाच्छादित पर्वतश्रृंखलाएं दर्शन देना शुरु करती हैं, जो आगे काफी देर तक सफर को रोमाँचक बनाए रहती हैं। 

राइट बैंक से नग्गर, अप्पर वैली का दृश्य

इसके बाद डोबी पुल पड़ता है, जहाँ से लिंक रोड़ फोजल घाटी तक जाता है। फोजल नाला पार करते ही आगे कटराईं कस्बा पड़ता है, जिसके कुछ आगे पतलीकुहल कस्बा पड़ता है, जो यहाँ का एक प्रमुख व्यापारिक केंद्र है। यहाँ से दायीं और का लिंक रोड़ लेफ्ट बैंक नग्गर तक जाता है औऱ वायीं और का लिंक रोड़ बडा ग्राँ व अन्य गाँवों को जोड़ता है। तथा मुख्य मार्ग मानाली की ओर बढ़ता है। यह कुल्लू-मानाली के बीचों बीच स्थित है। कटराई में पुरानी सड़क के दायीं ओर कृषि अनुसंधान केंद्र और गायत्री प्रज्ञापीठ के दर्शन किए जा सकते हैं।

कुल्लू-मानाली के बीचों-बीच कटराईं से गुजरते हुए

इसके बाद वरान आता है, जहाँ स्पैन रिजोर्ट है। जहाँ कई फिल्मों की शूटिंग हुई हैं। रजनीश औशो मानाली प्रवास के दौरान यहीं रुके थे। इसके बाद 17 मील, फिर 18 मील आता है। ब्यास नदी का उछलता कूदता निर्मल जल यहाँ सड़क के साथ बहता मिलता है और पुल से उस पार लेफ्ट बैंक के गाँव जुड़ते हैं। फिर क्लाथ आता है, जहाँ गर्म पानी के कुण्ड सड़क के दोनों ओर हैं। 

मानाली की ओर...

 

यहीं पर आलु ग्राउँड प्रख्यात है, जहाँ लाहौल से आने वाला बेहतरीन आलु स्टोर होता है। इसके बाद राँगड़ी, जहाँ से उस पार पर्वतारोहण संस्थान के जंगल व भवनों का विहंगावलोकन किया जा सकता है। रास्ते में उस पार के कई नालों के  ब्यास नदीं के साथ संगम के अद्भुत दृश्य देखे जा सकते हैं। पहले सीधा मानाली शहर में प्रवेश के साथ बस स्टैंड पहुँचते थे। अब पिछले ही वर्ष नयी सड़क बनने के साथ ब्यास नदी के किनारे देवदार के जंगल के साथ सड़क आगे बढ़ती है औऱ पुल से मुड़कर मानाली बस स्टैंड तक पहुँचती है। 

मानाली में प्रवेश, नया रुट

इस तरह एक ढेड़ घण्टे में बस कुल्लू से मानाली पहुँच जाती है। रास्ते भर ब्यास नदी का किनारा और सामने के पर्वत शिखर, सुंदर हरी-भरी वादियों इस यात्रा को बहुत ही सुखद, रोमाँचक एवं यादगार बनाती हैं। यदि अपना वाहन हो तो बीच-बीच में रुककर इन नजारों का मनमाफिक लुत्फ लिया जा सकता है। 

मानाली पहुँच कर, यहाँ क्या देखा जा सकता है, यदि यह जानना हो तो पढ़ सकते हैं अगली ब्लॉग पोस्ट - मानाली से सोलांग वैली एवं दर्शनीय स्थल।

यदि कोई कुल्लू से मानाली वाया लैफ्ट बैंक की रोमाँचक यात्रा का विहंगावलोकन करना चाहता हो, तो पढ़ सकता है,यात्रा वृताँतकुल्लू से नेहरुकुंड-वशिष्ठ वाया मानाली लेफ्ट बैंक

राईट बैंंकग से पर्वतारोहण संस्थान मानाली के दर्शन

सोमवार, 26 फ़रवरी 2018

यात्रा वृताँत - हरिद्वार से कुल्लू वाया देहरादून-चंडीगढ़



पहाड़ एवं घाटियों के बीच सफर का रोमाँच

कई वर्षों की अचेतन में दबी इच्छा संकल्प का रुप ले चुकी थी, कुछ गहन जिज्ञासा वश तो कुछ अतीत की सुखद स्मृतियों को गहराईयों से पुनः कुरेदने की दृष्टि से। दो-तीन माह पूर्व ही इस बार की बनोगी फागली में जाने का संकल्प ले चुके थे। यह एक नितांत व्यैक्तिक जिज्ञासा से उत्तर की खोज का हिस्सा थी, लेकिन इसकी परिणति सामाजिक एवं व्यापक होगी, ऐसा सुनिश्चित था। देवभूमि की देव-परम्परा को समझने की गहन जिज्ञासा हमें अपने जन्मभूमि की ओर बढ़ने के लिए प्रेरित कर रही थी।
सो हरिद्वार से फागली उत्सव के दो दिन पूर्व चल पड़ते हैं। गूगल गुरु में मौसम का मिजाज काफी चौंकाने वाला था। गृहक्षेत्र कुल्लू से भी उँच्चे हिलस्टेशन मानाली एवं शिमला में बारिश की भविष्यवाणी हो रही थी। लेकिन इनसे कम ऊँचाई पर स्थित कुल्लू क्षेत्र में बर्फवारी की भविष्यवाणी हो रही थी। हम इसे अपनी चिर इच्छा से जोड़कर देख रहे थे, औऱ कहावत याद आ रही थी कि नेचर नेवर डिड विट्रे द हर्ट, देट ट्रूअली लव्ड हर। हमें प्रकृति माँ के उपहार की पूरी आशा थी कि इस बार निराश नहीं करेगी, हालाँकि मूल प्रयोजन बनोगी फागली को नजदीक से देखने का था।
हरिद्वार से रात का सफर देहरादून, पौंटासाहिब, नाहन, चंडीगढ़, रोपड, कीर्तपुर साहिब, नालागढ़, बिलासपुर, सुन्दरनगर, मंडी, पंडोह, ऑउट से होते हुए कुल्लू घाटी में प्रवेश करता है। देहरादून से गुजरते हुए हमेशा ही महाभारतकालीन यादें जेहन में कौंधती हैं। यहाँ द्रोणाचार्य की तपःस्थली, अश्वत्थामा की जन्मस्थली आज भी सहस्रधारा, टपकेश्वर (तमसा नदी के किनारे) के रुप में विराजमान है। गुरु रामराय के डेरे से भी इसका नाम जोड़ा जाता है। देहरादून तमाम तरह के अकादमिक एवं राष्ट्रीय महत्व के संस्थानों के लिए प्रसिद्ध है। बस रूट में भारतीय पेट्रोलियम संस्थान, भारतीय वन संस्थान व इंडियन मिलिट्री अकादमी के दर्शन तो चलती बस में ही किए जा सकते हैं। हालांकि राजधानी बनने के बाद ट्रेफिक जाम एक बड़ी समस्या के रुप में ऊभर कर आया है, जिसके समाधान के लिए रास्ते में कई जगह फलाईओवर पर काम चल रहा है।



प्रेमनगर से आगे उत्तराखण्ड यूनिवर्सिटी, हिमगिरी जी-यूनिवर्सिटी आदि रास्ते में आते हैं। 
सघन बनों एवं हरे-भरे खेतों से होता हुआ रास्ता आगे पोंटा साहिब की ओर बढ़ता है। पोंटा साहिब में सिक्खों के दशमगुरु गोविंद सिंह के अंतिम वर्षों की सृजन साधना स्थली है। यह स्थल विद्वानों की आश्रयस्थली रही, जहाँ गुरु साहिबान ने तमाम तरह के ग्रँथों की रचना की थी। हमेशा ही यमुना नदी पर बने पुल से गुजरते हुए इस पावन गुरुद्वारे के दर्शन नतमस्तक कर देते हैं।

इसके बाद हिमाचल प्रदेश में प्रवेश होता है। हल्की चढाई के साथ जंगलों के बीच मोड़दार सड़क पर सफर नाहन शहर की ओर बढ़ता है। नाहन शिवालिक पहाड़ी की गोद में बसा शहर है। शहर से होती हुई बस आगे काला अम्ब स्थान पर रात्रि भोजन के लिए रुकती है। पूछने पर कि स्थान का नाम ऐसा क्यों पड़ा, तो पता चला कि यहाँ कभी काले रंग के आम होते थे। और आज भी इसका पेड़ कहीं अंदर गाँव में की चर्चा होती है। इसमें कितनी सच्चाई है, यह तो समय निकालकर जाँच-पड़ताल पर ही पता चलता। लेकिन आधी रात में आधे घंटे के बस स्टॉप की समय सीमा में यह सब कभी संभव नहीं हो पाया। यहाँ का काला आम अभी हमारे लिए जिज्ञासा एवं समाधान का विषय है।
चंडीगढ़ से प्रवेश करते ही हमेशा माँ दुर्गा के भगवती रुप चण्डी का सुमरण आना स्वाभाविक है, जिनके नाम से शहर का नाम पड़ा है। चंडीगढ़ में प्रवेश करते ही इसकी चोढ़ी सडकें, इसके दोनों ओर स्वागत करते सुंदर वृक्ष, वृताकार फूलों व सुंदर झाड़ियों से सजे चौराहे, व्यवस्थित भवन एवं साफ-सुथरा शहर - शायद यही सब मिलकर इसे सिटी बिऊटीफुल बनाते हैं। 

मालूम हो कि चंडीगढ़ देश का पहला योजनाबद्ध से बनाया गया शहर है जो फ्रांसिसी वास्तुकार ली.कार्बुजियर की देखरेख में बना था। मुख्य मार्ग से थोड़ा हटकर इसके कई आकर्षण हैं, जिनका अवलोकन किया जा सकता है, जैसे-रोज गार्डन, रॉक गार्डन, सुखना झील, चंड़ीगढ़ यूनिवर्सिटी, पीजी होस्पीटल, सेक्टर-17 आदि।
डीएवी कालेज भी यहाँ का एक जाना-माना शैक्षणिक संस्थान है, जिसमें दसवीं के बाद दो वर्ष पढ़ने का सौभाग्य हमें मिला। चंड़ीगढ़ से गुजरते हुए याद आते हैं यहाँ के बीटीसी हॉस्टल में विताए दिन, जहाँ ते जिम में जीवन में पहली बार मिस्टर पंजाब युनिवर्सिटी को तराशते देखकर बॉडी बिल्डिंग की चिंगारी किशोर ह्दय में स्पार्क कर गई थी। विभिन्न प्रादेशिक एवं भाषायी पृष्ठभूमि से आए विद्यार्थियों से इंटरएक्शन उस समय अपने आप में एक अनूठा अनुभव था। 

और इससे भी गहन रुप में याद आता है विवेकानन्द स्टूडेंट होम का वह एक वर्ष जहाँ रामकृष्ण परमहंस और स्वामी विवेकानन्द के विचारों से परिचय हुआ और भावी जीवन की दिशाधारा का बीजारोपण हुआ। हॉस्टेल के वार्डन-अविभावक स्वामी तत्वारुपानन्दजी का बात्सल्यपूर्ण व्यवहार एवं मार्गदर्शन किशोर ह्दय के लिए चिरप्रेरक अनुभव रहे और उनकी भेंट की हुई पुस्तकें द काल टू द नेशन एवं मेडीटेशन एंड स्प्रीचुअल लाईफ मार्गदर्शक पाथेय की भाँति साथ देती रही।

चंड़ीगढ को पार करते हुए सफर आगे मोहाली रोपड़ से होते हुए कीरतपुर साहिब आता है, जो पुनः गुरु गोविंद सिंह की कुछ वर्षों की आश्रस्थली रही। व्यास-सतलुज नदी का जल भाखड़ा नंगल से होकर यहाँ नहर रुप में पंजाब से होकर बहता है। यहीं से पुनः हिमाचल में प्रवेश होता है। शिखर पर टिमटिमाती हुई रोशनी के रुप में भगवती नैनादेवी के दर्शन देवभूमि में सुरक्षित-संरक्षित प्रवेश का अहसास दिलाता है। यह प्रख्यात 52 शक्तिपीठों में से एक है। मान्यता है कि माता सत्ती के नयन यहाँ गिरे थे। 

कीर्तपुर से चढ़ाईदार रास्ते से होते हुए आगे पहाड़ी के शिखर पर स्वारघाट स्टेशन आता है, जहाँ से एक ओर नीचे पंजाब के मैदानों में रात के अंधेरे में टिमटिमाते शहरों की रोशनी का विहंगावलोक किया जा सकता है, तो दूसरी ओर थोड़ा सा आगे बढ़ते ही बिलासपुर व सुदूर हिमाच्छादित धौलाधार पर्वत श्रृंखला के दूरदर्शन किए जा सकते हैं।। स्वारघाट से बिलासपुर शहर तक का सफर गोविंदसागर झील की परिक्रमा करते हुए आगे बढ़ता है। ज्ञातव्य हो कि सतलुज नदी पर बना भागड़ा बाँध की झील 90 किमी लम्बी है, जिसका 90 फीसदी हिस्सा बिलासपुर में आता है। रास्ते में सरोवर के विंहगम दर्शन यदा-कदा होतेे रहते हैं।

 बिलासपुर से आगे सलापड़ पुल से होकर सफर आगे बढ़ता है, जहाँ भूमिगत सुरंग से जल पहाड़ी से नीचे सतलुज नदी में मिलता है। यहीं राह में एसीसी सीमेंट का वृहद कारखाना यात्रियों का ध्यान आकर्षित करता है, जो रात की रोशनी में जगमगा रहा होता है। आगे के सफर में सुंदरनगर के पास ऊँचे शिखर पर भगवती मुरारी माता के शक्तिपीठ का दर्शन रोमाँचक रहता है। इसे देखकर मन ललचाता है कि यहाँ से चारों ओर का विहंगम दृश्य कितना अद्भुत रहता होगा। सुंदरनगर में व्यास नदी के जल को नहर के साथ एक बैराज के रुप में एकत्र किया गया है, जो भूमिगत टनल के माध्यम से पहाड से होकर सलापड़ स्थान पर उसपार सतलुज नदी में मिलता है।


प्रायः सुंदरनगर से मंडी के बीच सुबह हो जाती है। बीच में नैरचॉक स्टेशन पड़ता है। चारों ओर सुदूर पर्वतश्रृंखलाओं से घिरी इस मैदानी एवं उर्बर घाटी के बीच का सफर एक ताजगी भरा अनुभव रहता है। व्यास नदी के किनारे बसे मंडी शहर को इसके प्रख्यात मंदिरों के कारण छोटी काशी भी कहा जाता है। मान्यता है कि यहाँ महान संत मांडव ने तप कर आलौकि शक्तियाँ अर्जित की थी व ग्रंथों की रचना की थी। अपनी केंद्रीय स्थिति के कारण यह ऐतिहासिक नगर लम्बे समय से व्यावसायिक गतिविधियों का केंद्र रहा है। जहाँ मार्च में महाशिवरात्रि का विश्वविख्यात मेला मनाया जाता है। पिछले कुछ वर्षों से आईआईटी की स्थापना से शैक्षणिक कारणों से भी यह शहर चर्चा में है। 

बस स्टैंड के सामने यहाँ का क्रिकेट स्टेडियम काफी बेहतरीन है, जहाँ बड़े मैच होते रहते हैं। यहीँ से पंडोह से होते हुए तंग घाटी में प्रवेश होता है। पंड़ोह डैम सदा से ही यात्रा के बीच का आकर्षण रहता है। रात को तो इसकी वृहद-शांत जलराशी में टिमटिमाटे बल्बों की रंगबिरंगी रोशनी एक अद्भुत नजारा पेश करती है। जलस्तर उच्च होने पर नीचे से बाहर बहता हुआ पानी का प्रवाह भी भयमिश्रित आश्चर्य के साथ दर्शनीय रहता है।

पंडोह से आगे मार्ग और भी तंग घाटी से होकर गुजरता है। आज तो सड़क काफी चौड़ी बन चुकी है। कभी सड़क बहुत तंग व नीचे बाँध की झील के किनारे से होकर गुजरती थी। यात्री दिल की धड़कनों को थाम कर इस तंग घाटी को पार करते थे। उस दौर में यह मार्ग कितनी ही लोमहर्षक दुर्घटनाओं का साक्षी रहा है। लेकिन अब सड़क काफी चौड़ी होने के कारण यात्रा सुरक्षित हो गई है। इस रास्ते में हनोगी माता का मंदिर दर्शनीय रहता है। हर वाहन यहाँ भगवती से सुरक्षित यात्रा का आशीर्वाद लेकर आगे बढ़ता है।

इसकी राह में आगे पर्वतों से झरते झरने यात्रियों का ध्यान आकर्षित करते हैं। आगे लगभग 1.5 किमी लम्बी सुरंग से होकर आउट पहुँचते हैं। यहाँ कुल्लू की बंजार घाटी के मौसमी फल उत्पादों को दुकानों के बाहर सजाया देखा जा सकता है, जो बाजिव दामों पर उपलब्ध रहते हैं। यहाँ से कुछ किमी के बाद नगवाईं आते ही खुली घाटी में प्रवेश होता है, जहाँ से दूर शिखर के मध्य बिजलेश्वर महादेव के दर्शन होते हैं। इसी राह से होते हुए पनारसा, बंजार एवं भुंतर आता है। बंजार में शिव का प्राचीन मंदिर है। राह में ही होर्टिक्लचर यूनिवर्सिटी,नौनी का क्षेत्रीय शोध अनुसंधान केंद्र मुख्य मार्ग के दाईं ओर पड़ता है। इसी के समानान्तर व्यास नदी के दूसरी ओर गढ़सा घाटी आती है, जो कम ऊँचाई के कारण अनार और जापानी फल के लिए जाना जाता है। भुंतर में हवाई पट्टी है, जहाँ चंडीगढ़ या केलांग से आने वाले छोटे यानों व हेलीकॉप्टरों के उतरने की व्यवस्था है।
यहाँ से जिया पुल से होकर कुल्लू की ओर लेफ्टबैंक में निर्माणाधीन फोरलेन सड़क से यात्रा आगे बढ़ती है। राह में मणिकर्ण घाटी से आ रही पार्वती नदी व कुल्लू-मानाली की ओर से आरही व्यास नदी का संगम स्थल पुल से दर्शनीय रहता है। घाटी के देवताओं के स्नान का यह पावन तीर्थ स्थल भी है। 

पुराना रास्ता गाँधीनगर ढालपुर मैदान से होकर कुल्लू पहुंचता है। ढालपुर मैदान कुल्लू शहर का प्रवेश द्वार है। विश्वविख्यात दशहरा मेला इसी मैदान मे मनाया जाता है, जब घाटी के सैंकड़ों देवी-देवता यहाँ एकत्र होते हैं। यहाँ प्रवेश द्वार पर देवदार के सघन बनों का आरोपण करने वाले निष्काम कर्मयोगी साधुवाद के पात्र हैं, जिनके पुण्य प्रयास से यात्रियों के चित्त पर देवभूमि में प्रवेश का एक पावन भाव जगता है। हमारे विचार में देवदार के वृक्षों को देखते ही पहाड़ी स्थल के साथ हिमालयन टच स्वतः ही जुड़ जाता है, जो यहाँ की भव्यता में एक दिव्यता का पावन भाव घोलता है।

ढालपुर के आगे डुग्गीलग बैली से आरही सरवरी नदी को पार कर इसके ही किनारे नया बस स्टैंड आता है, जिसका नवनिर्माण द्रुतगति से चल रहा है। यहाँ से मानाली महज 44 किमी की दूरी पर है। ब्यास नदी के दोनों ओर मोटर रोड़ बने हैं। जल्द ही यहाँ रेल्वे ट्रेक बनने की बात की जा रही है। बस स्टैंड के ऊपर टीले पर सुलतानपुर शहर बसा है, जहाँ घाटी के अधिपति कुल्लु के रघुनाथ(भगवान राम) का निवास स्थान है। कुल्लू से मानाली का पुराना रास्ता अखाड़ा बाजार से होकर गुजरता है, जिसके निचले छोर पर भूतनाथ(शिव) का मंदिर है तो उत्तरी छोर पर हनुमान(रामशीला), बीच में लक्ष्मीनारायण मंदिर है तो पुराने बस स्टैंड के पास पावन गुरुद्वारा श्री सिंह सभा। इस रुट में बढ़ती आवादी, ट्रैफिक और तंग सड़क के चलते बस रुट को लेफ्ट बैंक से डायवर्ट किया गया है, जो आगे चलकर रामशीला के आगे बने पुल से पुनः राइट बैंक से होकर आगे बढ़ता है। 



यहीं से व्सास नदी के किनारे सफर आगे मानाली की ओर बढ़ता है। रास्ते में वैष्णुमाता के मंदिर से होकर सफर आगे बढ़ता है। पुलिस एवं आईटीबीपी कैंप से होते हुए कुल्लू-मानाली सड़क पर कुछ किमी का सफर तय करते हुए सेऊबाग स्टेशन आता हैं और नदी को पार करते ही अपने गन्तव्य स्थल में प्रवेश हो जाता है। कभी घाटी में सेब के शुरुआती दौर की प्राथमिक प्रयोगशाला के रुप में यहाँ रोपे गए सेब के बागों के नाम से गाँव का नाम सेऊबाग पड़ा, जो आज यहाँ के प्रगतिशील किसानों व बागवानों के अथक प्रयास के साथ अपना नाम सार्थक करता प्रतीत हो रहा है।