सोमवार, 31 मई 2021

कोरोना काल के बीच उभरता जीवन दर्शन

अपनों के वियोग-विछोह की पीड़ा एवं आध्यात्मिक सम्बल

कोरोना काल ने कई मायनों में जीवन की परिभाषा और जिंदगी के मायने बदल दिए हैं, जिनमें एक है अपनों का असामयिक अवसान और इस जीवन की नश्वरता का तीखा बोध।

सबसे पहले ह्दय की गहराई से अपनी संवेदनापूरक श्रद्धाँजलि उन सभी दिवंगत मित्रों, परिवारजनों, परिजनों एवं जीवात्माओं को, जो कोरोना के कारण असमय ही अपनों को बिलखते हुए छोड़ गए। परमात्मा, भगवान, गुरुसत्ता उन सब दिवंगत आत्माओं को शांति दे, सद्गति दे, अपने चरणों में विश्राँति दे। साथ ही परमात्मा शोकाकुल एवं दुःखी परिवारजनों, आत्मीयजनों एवं मित्रों को इनके बिछुड़ने के असह्य दुःख को सहन करने की शक्ति दे।

निश्चित ही कोरोना के रुप में संव्याप्त जानलेवा अदृश्य वायरस ने एक आशंका, भय और आतंक का माहौल पैदा कर दिया है। प्रारम्भ में, पहली लहर के दौर में स्थिति इतनी विकट नहीं थी, जब मात्र बिमार या न्यून इम्यूनिटी बाले बृद्ध-बुजुर्गों को अपना निशाना बनाया था और इसका प्रभाव सीमित था तथा यह उतना घातक नहीं था। कोरोना की दूसरी लहर के साथ इसके घातक स्वरुप ने स्वस्थ लोगों तथा युवाओं को भी अपनी लपेट में ले लिया है। बहुत सारे इससे संक्रमित होकर उबर भी रहे हैं, लेकिन जब कोई अपना अचानक इसके खूनी शिकंजे में फंस जाता है, तो दिल सहम जाता है। प्रार्थना के स्वर उठते हैं, कि भगवान इनको जल्द ठीक कर दें। लेकिन प्रार्थना की भी एक सीमा होती है। हमेशा ही यह काम नहीं कर पाती।

फिर खबर आती है कि अमुक नहीं रहे। कई बार तो अनजाने में ही किसी मित्र को फोन करते हैं, तो जबाव किसी दूसरे  की आबाज में आता है, कि आप कौन बोल रहे हैं। परिचय पाने के बाद जब वो अपरिचित परिजन कहते हैं, कि अमुक तो अब नहीं रहे। ऐसा अनपेक्षित उत्तर सीधे शॉक करता है, पूरे अस्तित्व को हिला डालता है कि यह कैसे हो सकता है। अभी ही तो पिछले दिनों इनसे बातचीत हुई थी, स्वस्थ-सकुशल थे। अभी तो इनकी यात्रा शुरु ही हुई थी, अभी तो फूल को खिलना बाकि था। ऐसे असमय सबको बिलखता हुआ छोड़कर कैसे चले गए, कुछ समझ नहीं आता। परमात्मा के विधान पर भी कुछ पल के लिए तो संशय होता है। यह कैसा नियति का, ईश्वर का क्रूर विधान। लेकिन कुल मिलाकर अन्ततः जीवन-मरण के इस अकाट्य सत्य के सामने सर झुकाना पड़ता है। इस पर आखिर किसका वश।

ऐसे पलों में जीवन की नई परिभाषा, नए मायने, नया दर्शन अस्तित्व की गहराईयों से फूट पड़ता है। जब मृत्यु ही इस जीवन का अंतिम सत्य है, तो फिर इस जीवन के क्या मायने हैं। एक व्यक्ति के असामयिक अवसान पर तो यह सवाल और भी तल्ख हो जाते हैं।

फिर याद आते हैं, अपने बाबा, दादा-दादी, नाना-नानी और घर के बड़े बुजुर्गों की, जो एक-एक कर परिवार-संसार को छोड़ गए थे। कुछ भाई बंधु, मित्र, गुरुजन तो समय से पहले ही। इस मृत्युलोक का गहरा शॉकिंग अहसास इन पलों में हुआ था। जीवन की नश्वरता का गहरा तत्वबोध इन क्षणों में हुआ था। इंसान क्या, हमें याद है घर में हमारी प्यारी बिल्ली को जब घर के कुत्ते ने ही मार डाला था, अपना प्यारी गाय अचानक चल बसी थी या सड़क पर दुर्घटना में पशुओं को असामयिक इस देह से अलग होते देखा तो, बहुत की गहरे प्रश्न कौंधे थे जेहन में कि इस नश्वर जीवन का परमसत्य क्या है, जहाँ मृत्यु, वियोग-वछोह, दुःख, पीड़ा आदि गौण हो जाते हों, इनका उपचार मिल जाता हो। एक शाश्वत जीवन की खोज का जन्म इन पलों में हुआ था।

मित्रो, यह प्रश्न हमारे अध्यात्म के प्रति रुझान का एक बड़ा कारण रहा है। इन प्रश्नों की खोज में, इस नश्वर जीवन में शाश्वत की खोज ने, इस मृत्यु लोक में अमरता की संभाव्यता के दर्शन की पिपासा ने हमें अध्यात्म मार्ग में प्रवृत्त किया है। और यह हमारे विचार में हर संवेदनशील व्यक्ति की कहानी है। प्राय़ः जब कोई अपना बिछुड़ता है तो शमशान घाट पर हर व्यक्ति के ऊपर शमशान वैराग्य तो छा ही जाता है। जीवन की नश्वता का गहरा बोध इन पलों में होता है। यह बात दूसरी है कि कुछ समय बाद फिर जीवन पुराने ढर्रे पर आ जाता है और जीवन-मरण के प्रश्न, एक शाश्वत जीवन की अभिलाषा कहीं गौण हो जाती है।

लेकिन क्या अच्छा होता कि शमशान वैराग्य की लौ आगे भी सुलगती रहती, जीवन का एक हिस्सा बन जाती। व्यक्ति को हर पल जीवन की नश्वरता को बोध होता रहता और वह इसके अनावश्यक पहलुओं में न उलझकर एक सार्थक जीवन जीता। यह प्राय़ः नहीं हो पाता। लेकिन कोरोना काल ने इसे संभव कर दिखाया है। यह एक कटु सत्य है लेकिन इस विकट काल ने जीवन में नश्वरता का अहसास स्थायी सा कर दिया है। जब यदा-कदा कोई अपना अचानक छोड़कर जा रहा हो या अपने ही जीवन की कोरोना की चपेट में आने की नौवत आ रही हो, तो बार-बार विस्मृत कटु सत्य कौंधता है और सोचने के लिए मजबूर कर देता है।

भगवान करे कोरोना काल के ये दुखद पल जल्द ही खत्म हो जाएं और मानवीय जीवन इसके घातक शिकंजे से बाहर आ जाए। आम जीवन पटरी पर सरपट आगे बढ़े, सामाजिक-राष्ट्रीय जीवन विकास पथ पर अग्रसर हो, समूची मानवता स्वस्थ एवं सुरक्षित हो अमन-चैन से रहे। इस विकट काल में मिल रही अमूल्य सीख व सवकों को जीवन में धारण कर हम सभी एक स्वस्थ, सुखी, खुशहाल और उज्जवल भविष्य की ओर बढ़ें।

ओम शाँति, शाँति, शाँति।।

शनिवार, 29 मई 2021

शाश्वत जीवन की अकथ कहानी

                                             कीमत कितने जन्म, युगों है इसने चुकाई


सागर की शांत लहरों को देख,

कहाँ समझ आती है इसकी अतल गहराई।


घाटी से नीले आसमान को निहारते हुए,

कहाँ समझ आता है इसका विस्तार अनन्त।


जंगल के हरे सौंदर्य को दूर से निहारते,

कहाँ समझ आती है उसकी बीहड़ सच्चाई।


ऐसे ही एक शाँत-सौम्य, धीर-गंभीर, सरल-सह्दय रुह को देख,

कहाँ समझ आती है उसकी अथक गहराई, अनन्त विस्तार और बीहड़ सच्चाई।


उसकी सरलता-तरलता, सहजता-फक्कड़पन, वितरागिता, समता-स्थिरता देख,

कहाँ समझ आती है हिमालय से भी उत्तुंग उसके व्यक्तित्व की ऊँचाई।


कितने दुःख, कितने झंझावत, कितने आघात, कितने प्रहार खाकर-सहकर,

पहुँची है यह रुह आज चेतना के शिखर पर, लिए अंतरतम की वह गहराई।


जहाँ शाँति, समता, स्थिरता, निर्दन्दता, निश्चिंतता बसती है हर पल,

कितनी क्राँति, कितनी अशाँति, कितने मंजर, कितने संघर्ष के बाद,

पहुँची है वह सर्वस्व दाँव पर लगा, एकाँतिक निष्ठा के बूते इस मुकाम पर,

जिसकी कीमत हर पल, हर दिन, हर जन्म है युगों उसने भरपूर चुकाई।।

बुधवार, 26 मई 2021

यात्रा वृतांत कैसे लिखें?

                                                      यात्रा वृतांत लेखन के चरण

निश्चित रुप में यात्रा वृतांत का पहला ठोस चरण तो यात्रा के साथ शुरु होता है। व्यक्ति कहाँ की यात्रा कर रहा है, किस भाव और उद्देश्य के साथ सफर कर रहा है और किस तरह की जिज्ञासा व उत्सुक्तता लिए हुए है, इनकी गहनता, गंभीरता एवं व्यापकता एक अच्छे यात्रा वृतांत के आधार बनते हैं तथा यात्रा वृतांत में रोचकता और रोमाँच का रस घोलते हैं और साथ ही ज्ञानबर्धक भी बनाते हैं।

यात्रा वृतांत ज्ञानबर्धक बने इसके लिए यह भी आवश्यक हो जाता है कि यात्रा स्थल या रुट का पहले से कुछ अध्ययन किया गया हो। या कह सकते हैं कुछ रिसर्च की हो। पहले इसका एक मात्र साधन दूसरों के लिखे यात्रा वृतांत पढ़ना या वहाँ से घूम आए लोगों से की गई चर्चा होती थी। लेकिन आज इंटरनेट के जमाने में यह काम बहुत आसान हो गया है। लगभग हर लोकप्रिय ठिकानों पर ब्लॉग से लेकर वीडियोज मिल जाएंगे। बाकि कसर गूगल गुरु पूरा कर देते हैं, जिसमें किसी भी स्थान पर तमाम तरह की जानकारियाँ उपलब्ध रहती हैं।

यहीं से यात्रा वृतांत में नूतनता लाने के सुत्र भी मिल जाते हैं, कि अब तक दूसरे यात्री क्या कवर कर चुके हैं और इसमें कौन से पहलु या एंग्ल अभी बाकि हैं। हो सकता है कि अमुक यात्रा में आपकी रुचि के विषय पर अभी कोई प्रकाश ही न डाला गया हो या जो जानकारियाँ उपलब्ध है वे आपकी जिज्ञासा व उत्सुक्तता का समाधान नहीं कर पा रही हों। ऐसे में यह जानकारी का अभाव या खालीपन आपके यात्रा लेखन के नूतनता का एक प्रेरक तत्व बन जाता है।

उदाहरण के लिए हम एक शैक्षणिक भ्रमण में ऋषिकेश के पास कुंजादेवी शक्तिपीठ से बापसी में नीरझरना घूमना चाहते थे, लेकिन हमें कोई इसकी जानकारी देने वाला नहीं मिला। इंटरनेट खंगालने पर भी नीरझरने की कुछ फोटो या वीडियो के अलावा रुट की कोई जानकारी नहीं मिली। सो शिखर पर बसे कुँजापुरी से बापसी में लोगों से पूछते हुए, बीच में राह भटकते हुए हम इसको कवर किए थे। लेकिन यह स्वयं में एक रोचक एवं रोमाँचक यादगार यात्रा बन गई थी। इसे आप चाहें तो आगे दिए लिंक में पढ़ सकते हैं।यात्रा वृतांत - कुंजापुरी से नीरझरना ट्रैकिंग एडवेंचर।

और यदि स्थान बहुत लोकप्रिय है और इसमें पर्याप्त कवरेज हो चुकी है, तो भी यात्रा लेखक  अपने विशिष्ट नजरिए, अंदाज व शैली के आधार पर इसे नयापन दे सकता है, बल्कि देता है। एक ही स्थान को देखने के अनगिन नजरिए हो सकते हैं। किसी भी स्थान का प्राकृतिक सौंदर्य, भौगोलिक विशेषता, ऐतिहासिक-पौराणिक पृष्ठभूमि, वहाँ का रहन-सहन, खान-पान, लोक संस्कृति, विशिष्टता, राह की खास बातें आदि कितनी बातें, कितने तरीकों से व्यक्त हो सकती हैं। इसमें व्यक्ति के अपने मौलिक अनुभव एक नयापन घोलने में सक्षम होते हैं, जिससे कि यात्रा वृतांत एक ताजगी लिए तैयार होता है।

इसके साथ कोई भी स्थान या रुट कितना ही सुंदर, आकर्षक या मनभावन क्यों न हो, वहाँ कि कुछ कमियाँ, राह की दुर्गमताएं, समस्याएं या क्लचरल शॉक्स आदि भी यात्रा वृतांत के रोचक विषय बनते हैं, जो पाठकों के लिए उपयोगी हो सकते हैं। इससे नए यात्री या पर्यटक इनसे परिचित होकर आवश्यक तैयारी या सावधानी के साथ यात्रा का पूरा आनन्द ले पाते हैं। यदि लेखक किसी विषय की जानकारी रखता हो या विशेषज्ञता लिए हो तो स्थानीय समस्याओं के संभावित समाधान पर भी प्रकाश डाल सकता है, जो यात्रा वृतांत में ज्ञानबर्धन आयाम जोड़ते हैं और इसकी पठनीयता बढ़ जाती है। इसमें संवेदनशील व संतुलित रवैया उचित रहता है तथा दोषारोपण या छिद्रान्वेषण आदि से हर हालत में बचना उचित रहता है।

यात्रा वृतांत में राह में मिले अन्य यात्रियों, स्थानीय लोगों के साथ चर्चाएं भी यात्रा वृतांत के अनिवार्य पहलु रहते हैं, जो जानकारी को और प्रामाणिक तथा रोचक बनाते हैं। इससे पाठकों की कई सारी जिज्ञासाओं व प्रश्नों के समाधान बात-बात में मिल सकते हैं। अतः यात्रा में लोगों से संवाद एक महत्वपूर्ण तत्व रहता है, जिसे नजरंदाज नहीं किया जा सकता। यात्रा लेखक यदि घूमने के जुनून व जिज्ञासाओं से भरा हुआ है, तो ऐसे संवाद सहज रुप में ही घटित हो जाते हैं और प्रकृति भी राह में उचित पात्र के साथ मुलाकात में सहायक बनती है। इसमें कई लोगों को थोड़ा अचरज हो सकता है, लेकिन अनुभवी घुम्मकड़ ऐसे संयोगों को सहज रुप में समझ रहे होंगे व ऐसे संस्मरणों से नित्य रुबरु होते रहते हैं।

यात्रा वृतांत में फोटो का अपना महत्व रहता है। सटीक फोटो इसकी पठनीयत को बढ़ा देता है। यात्रा लेखक अपने लेखकीय कौशल के आधार पर जो कह नहीं पाता, वह एक उचित चित्र बखूबी व प्रभावशाली ढंग से स्पष्ट कर देता है, जिससे पाठक को यात्रा के साथ भाव चित्रण में सहायता मिलती है। हालाँकि किसी स्थल के प्राकृतिक सौंदर्य़, भौगोलिक विशेषता या भावों के सुंदर व जीवंत चित्रण को लेखक अपनी कलम से करने में काफी हद तक सक्षम होता है, जिसको पढ़ने का अपना आनन्द रहता है। किसी जमाने में जब फोटोग्राफी का चलन नहीं था, तो लोग पेन या पेंसिल के स्कैच से भी चित्रों का काम चला लिया करते थे।

यात्रा वृतांत लेखन में एक महत्वपूर्ण पहलू राह के पड़ाव व स्थानों के नाम व उनसे जुड़ी मोटी व खास जानकारियाँ भी रहते हैं। इसके लिए एक डायरी व पेन साथ में रहे, तो उचित रहता है। जहाँ भी जो स्थान आए, इनके नाम नोट किए जा सकते हैं। और यदि पहले से कुछ रिसर्च कर रखें हैं, तो इन स्थानों को पहले से ही डायरी में सुचिबद्ध कर रखा जा सकता है तथा साथ में सफर कर रहे लोगों से कुछ खास जानकारियों को बटोरा जा सकता है। फिर अपने अनुभव के आधार पर इनमें अतिरिक्त नयापन जोड़ा जा सकता है। अपनी डायरी या नोटबुक में नोट किए गए ये नाम या बिंदु बाद में लेखन में सहायक बनते हैं।

यात्रा पूरी होने के बाद फिर लेखन की बारी आती है। इसमें लेखन से जुड़े सर्वसामान्य नियमों का अनुसरण करते हुए पहला रफ ड्राफ्ट तैयार किया जाता है, जिसमें अपनी यात्रा के अनुभवों को एक क्रम में कागज या कम्पयूटर-लैप्टॉप पर उतारा जाता है। फिर शांत मन से कुछ और विचार मंथन व शोध के आधार पर दूसरे ड्रॉफ्ट में अतिरिक्त आवश्यक तथ्यों व जानकारियों को शामिल किया जा सकता है तथा इसमें भाषा की अशुद्धियों को ठीक करते हुए इसे पॉलिश किया जाता है। यदि लेखन की इस प्रक्रिया को विस्तार से जानना है तो हमारे ब्लॉग पर लेखन कला - लेखन की शुरुआत करें कुछ ऐसे को पढ़ा जा सकता है।

यात्रा वृतांत लेखन में यदि इन बातों का ध्यान रखा जाए व इन चरणों का अनुसरण किया जाए, तो निश्चित ही एक बेहतरीन यात्रा ब्लॉग तैयार हो जाएगा। और पाठक इसको पढ़कर यात्रा के साथ जुडी रोचकता व रोमाँच को अनुभव करेंगे। उनके ज्ञान में इजाफा होगा तथा वे आपके साथ भावयात्रा करते हुए सफर के आनन्द का हिस्सा बनेंगे। शायद यही तो एक यात्रा लेखन का मकसद रहता है।

लेखन कला के ऊपर दिए बिंदुओं को और बेहतर समझने के लिए नीचे दिए कुछ यात्रा वृतांतों को पढ़ा जा सकता है -

यात्रा वृतांत - हमारी पहली झारखण्ड यात्रा

यात्रा वृतांत - सुरकुण्डा देवी का वह यादगार सफर, भाग-1

यात्रा वृतात - कुल्लू से नेहरुकुण्ड-वशिष्ट वाया मानाली लेफ्ट बैंक

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