रविवार, 14 जून 2015

अथ योगानुशासन





शाश्वत स्रोत से जोड़ता राज मार्ग

21 जून को योग अंतर्राष्ट्रीय दिवस के रुप में योग को वैश्विक स्वीकृति मिल चुकी है। जीवन शैली, मानसिक स्वास्थ्य और वैश्विक अशांति के संकट से गुजर रही इंसानियत ने समाधान की उज्जली किरण के रुप में इसे एक मत से स्वीकारा है। यह इसके सार्वभौमिक, व्यवहारिक और वैज्ञानिक स्वरुप के कारण ही सम्भव हो पाया है। इसे किसी भी धर्म, जाति या सम्प्रदाय का व्यक्ति कर सकता है, अपना सकता है। यह किसी भी धार्मिक कर्मकाण्ड या आस्था से मुक्त एक आध्यात्मिक प्रक्रिया है। इसका सारोकार अपने ही तन-मन से है, इसके केंद्र में अपना ही बजूद है, अपनी ही सत्ता का यह अन्वेषण है, अपनी ही आत्म चेतना के केंद्र कहें या शिखर की यह यात्रा है, निताँत व्यैक्तिक, नितांत एकाकी।


हालाँकि समाज, परिवेश भी इस यात्रा में समाहित हैं, जिसके साथ न्यूनतम किंतु स्वस्थ-सार्थक सामंजस्य का इसमें प्रावधान है। योग अपने शब्द के अनुरुप जुड़ने की प्रक्रिया है, अपनी अंतरात्मा से, अपने परिवेश से और फिर परमात्मा से। योग एक संतुलन है, जो खुद के साथ एवं परिवेश-समाज के साथ एक सामंजस्य को लेकर चलता है। अष्टांग योग के रुप में इसकी शुरुआत महर्षि पातंजलि यम-नियम से करते हैं और आसन-प्राणायाम के साथ प्रत्याहार, धारणा ध्यान से होती हुई यह यात्रा समाधि की चरमावस्था तक पहुंचती है। 

योग की शुरुआत यम-नियम रुपी अनुशासन से होती है, जो कि इसके भव्य एवं दिव्य प्रासाद की नींव हैं। यम में सत्य, अहिंसा, ब्रह्मचर्य, अस्तेय, अपरिग्रह आते हैं, जो दूसरों के साथ एक संयमित, संतुलित और सामंजस्यपूर्ण व्यवहार संभव बनाते हैं। इसके बाद आते हैं नियम, जो क्रमशः- शौच, संतोष, स्वाध्याय, तप और ईश्वर प्रणिधान के रुप में तन-मन को उस अनुशासन में कसने की कवायद हैं, जो व्यक्ति को अगले चरणों के लिए तैयार करते हैं, जिनका चरम है समाधि – समाधान की, शांति-आनन्द की, स्वतंत्रता-मुक्ति की चिर आकांक्षित चरम-परम अवस्था अर्थात जीवन की पूर्णता। इस महासाध्य का प्रमुख साधन है धारणा-ध्यान। और प्रवेश बिंदु है प्रत्याहार। इसके पूर्व आसन प्राणायाम क्रमशः शरीर और प्राण को सबल बनाते हुए इस प्रयोग की पूर्व तैयारियां भर हैं। आसन ध्यान के लिए एक स्वस्थ-सबल-स्थिर आधार तैयार करता है और प्राणायाम चंचल प्राणों को स्थिर कर मन को लय में लाने का प्रयास है।

योग का केंद्रीय बिंदु कहें तो ध्यान ही है, जिसकी गहनता में चित्त की वृत्तियों को शांत किया जाता है, अपने केंद्र में स्थिर-स्थित होने की कसरत की जाती है। लेकिन अष्टांग योग में ध्यान सातवें नम्बर पर आता है। इससे पूर्व यम-नियम से लेकर प्रत्याहार-धारणा तक की छः सीढ़ियां इसके गंभीर प्रयोग को शक्य-संभव बनाती हैं और योग का वास्तविक अर्थ प्रकट होना शुरु होता है। इससे पूर्व योग के नाम पर जो भी होता है, वह सब शिखर आरोहण से पहले की नैष्ठिक तैयारियां, संघर्षपूर्ण अभ्यास भर हैं। 

यदि इतना समझ आ जाए तो फिर हमें पातंजल योग का पहला सुत्र - अथ योगानुशासन, समझ आ जाए। यह समझ, यह सम्यक दृष्टि हमें योग के वास्तविक साम्राज्य में प्रवेश दिलाती है। अब योग हमारे लिए शारीरिक कसरत व दीप ब्रीदिंग के सतही कुतुहुल तक सीमित नहीं है, न ही ध्यान एक औपचारिक कर्मकाण्ड या फैशन भरी अहं तुष्टि। अब हम अंतर्यात्रा के बेस केंप में चेतना के शिखर आरोहण के लिए तैयार हैं। पर्वतारोहण में जैसे बेस केंप में रॉक क्लाइंविंग, रिवर क्रोसिंग, बुश क्राफ्ट, स्नो वॉक, आइस क्राफ्ट जैसे अभ्यासों को किया जाता है। यम-नियम, आसन-प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा आदि ऐसे ही बेस केंप के समय साध्य एवं कष्ट साध्य अभ्यास एवं तैयारियाँ हैं।

इनके साथ व्यवहार का न्यूतन संतुलन, परिवेश के साथ न्यूनतम सामंजस्य सधता है। तन-मन की न्यूतम रफ-टफनेस, फिटनेस साथ रहती है। इसके लिए आवश्यक संयम, साधना, तप करने की क्षमता आती है। राह के अबरोधों की पर्याप्त समझ विकसित होती है। अपने बजूद के समाधान की मुमुक्षत्व भरी त्वरा आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करती है। अब कोई बहाना नहीं रहता कि ध्यान के लिए समय नहीं है या ध्यान में मन नहीं लग रहा। ध्यान अब थोंपा हुआ नियम या अनुशासन नहीं रहता। यह अपनी चेतना के शिखर आरोहण का एक अभियान बन जाता है या कहें अपनी अंतरतम गुहा में बजूद की पहेली को समाधान की एक मास्टर की बन जाती है। 

इस तरह योग हमें खुद को जानने व परमात्म चेतना से जुड़ने के पथ पर अग्रसर करता है। अब हम
आत्मानुशासन, ईश्वरीय अनुशासन की जद में आ जाते हैं। मन की निम्न वृतियों को अब हम विकृतियोँ के रुप में पहचानते हैं और इनके परिष्कार के लिए सचेष्ट प्रयास करते हैं। संस्कारवश या परिस्थितिवश यदि कोई गल्ती हो भी गई तो उसको पुष्ट करने का अब कोई आधार हमारे पास नहीं रहता। इसका प्रायश्चित किए बिन अब हम चुप शांत नहीं बैठ सकते। परम सत्य, परा चेतना के साथ अब हमारा अलिखित करार हो जाता है औऱ हम पूर्णता की राह के, शाश्वत जीवन के सचेत पथिक बन जाते हैं। अमृतस्य पुत्रः के रुप में पूर्णता अब हमें अपना जन्मसिद्ध अधिकार लगता हैआध्यात्मिक पूर्णता का आदर्श अब जीवन का ध्रुव लक्ष्य बन जाता है और योग इस परम लक्ष्य की ओर बढ़ने का राज मार्ग।

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