सोमवार, 20 नवंबर 2017

पुस्तक सार, समीक्षा - वाल्डेन


प्रकृति की गोद में जीवन का अभूतपूर्व दर्शन

वाल्डेन, अमेरिकी दार्शनिक, विचारक एवं आदर्श पुरुष हेनरी डेविड़ थोरो की कालजयी रचना है। मेसाच्यूटस नगर के समीप काँकार्ड पहाड़ियों की गोद में स्थित वाल्डेन झील के किनारे रची गयी यह कालजयी रचना अपने आप में अनुपम है, बैजोड़ है। प्रकृति की गोद में रचा गया यह सृजन देश, काल, भाषा और युग की सीमाओं के पार एक ऐसा शाश्वत संदेश  लिए है, जो आज भी उतना ही ताजा और प्रासांगिक है।
ज्ञात हो कि थोरो दार्शनिक के साथ राजनैतिक विचारक, प्रकृतिविद और गुह्यवादी समाजसुधारक भी थे। महात्मा गाँधी ने इनके सिविल डिसओविडियेंस (असहयोग आंदोलन) के सिद्धान्त को स्वतंत्रता संघर्ष का अस्त्र बनाया था। यह थोरो का विद्रोही स्वभाव और प्रकृति प्रेम ही था कि वे जीवन का अर्थ खोजते-खोजते एक कुटिया बनाकर वाल्डेन सरोवर के किनारे वस गए। 
 थोरो के शब्दों में, मैने वन-प्रवास आरम्भ किया, क्योंकि मैं विमर्शपूर्वक जीवन व्यतीत करना चाहता था, जीवन के सारभूत तथ्यों का ही सामना करना चाहता था, क्योंकि मैं देखना चाहता था कि जीवन जो कुछ सिखाता है, उसे सीख सकता हूँ या नहीं। मैं यह भी नहीं चाहता था कि जीवन की संध्या वेला में मुझे पता चले कि अरे, मैंने तो जीवन को जीया ही नहीं। मैं तो गहरे में उतरना चाहता था।
इस उद्देश्य पूर्ति हेतु थोरो मार्च 1845 के वसन्त में वाल्डेन झील के किनारे पहुँच जाते हैं, और अपनी कुटिया बनाते हैं। चीड़ के वन से ढके पहाड़ी ढाल पर अत्यन्त मनोरम स्थान पर वे काम करते, जहाँ से झील का नजारा सहज ही उन्हें तरोताजा करता। झोंपड़ी के आस-पास की दो-ढाई एकड़ जमीन में बीन्स, आलू, मक्का, मटर, शलजम आदि उगाते हैं।

इस वन प्रवास में जंगली जीव उनके साथी सहचर होते। इस निर्जन स्थल पर प्रकृति की गोद में थोरो जीवन के सर्वोत्तम क्षण महसूस करते। जब वसन्त ऋतु या पतझड़ में मेह के लम्बे दौर के कारण दोपहर से शाम तक घर में कैद रहना पड़ता, तो ये थोरो के लिए सबसे आनन्दप्रद क्षण होते। एकांत प्रिय थोरो के अनुसार, साधारणतय संग-साथ बहुत सस्ते किस्म का होता है। हम एक-दूसरे से जल्दी-जल्दी मिलते रहते हैं, इसलिए एक-दूसरे के लिए कोई नई चीज सुलभ करने का मौका ही नहीं मिलता।...कम बार मिलने पर ही हमारी सबसे महत्वपूर्ण और हार्दिक बातचीत हो सकती है।
थोरो की दिनचर्या उषाकाल में शुरु होती। प्रातःकाल की शुद्ध वायु को थोरो सब रोगों की महाऔषधि मानते। अगस्त माह में जब हवा औऱ मेंह दोनों थम जाते और मेघों वाले आकाश के नीचे तीसरे पहर की नीरवता छा जाती तथा पक्षियों का संगीत इस किनारे से उस किनारे तक गूँज उठता, उस समय सरोवर का सान्निध्य सबसे मूल्यवान लगता।

कृषि को थोरो एक पावन कर्म मानते थे। थोरो सुबह पाँच बजे उठकर कुदाली लेकर जाते, दोपहर तक खेत की निंढाई-गुढ़ाई करते और दिन का शेष भाग दूसरे काम में गुजारते। थोरो सादा जीवन, उच्च विचार के हिमायती रहे। उनका वन प्रवास इसका पर्याय था। थोरो के शब्दों में - सैंकड़ों-हजारों कामों में उलझने के बजाय दो-तीन काम हाथ में ले लीजिए। अपने जीवन को सरल बनाइए, सरल। समूचे राष्ट्र की हालत, समुचित ध्येय के बिना दुर्दशाग्रस्त है। इसका एक ही इलाज है - सुदृढ़ अर्थव्यवस्था, जीवन की कठोर सादगी और ऊँचा लक्ष्य। इसके बिना अभी तो मानव बर्बादी के रास्ते पर चल रहा है।
थोरो जंगल प्रवास में हर पल जी भरकर जीए तथा इसी का वे संदेश देते हैं। उनके अनुसार - लोग समझते हैं कि सत्य कोई बहुत दूर की, दूसरे छोर की, दूर तारे के उस पार की । जबकि ये स्थान, काल, अवसर आदि सभी यहीं पर हैं, अभी इसी क्षण हैं। स्वयं ईश्वर का महानतम रुप वर्तमान में ही प्रकट होता है।...हम अपना एक दिन प्रकृति के समान संकल्पपूर्वक बिताकर तो देखें और छोटी-मोटी बाधा से पथ-भ्रष्ट न हों। प्रातः जल्दी उठें और शांत भाव से व्रत रखें। हम यथार्थ की ठोस चट्टानी जमीन पर नींव डालकर स्थिर होकर खड़े होकर तो देखें। जीवन का अर्थ बदल जाएगा। थोरो इस तरह प्रयासपूर्वक अपने जीवन का उत्थान करने की संशयहीन क्षमता को सबसे उत्साहबर्धक चीज मानते थे।

जीवन के सचेतन विकास के लिए थोरो स्वाध्याय पर विशेष बल देते और स्वयं भी ग्रंथों के संग समूचे आध्यात्मिक जगत की यात्रा का लाभ लेते। उनके अनुसार, क्लासिक ग्रन्थ मानव की श्रेष्ठतम संग्रहित विचार पूंजी हैं, इनमें देववाणी निहित है और इनका अध्ययन एक कला है। इनसे कुछ सीखने के लिए हमें पंजों के बल खड़ा होना पड़ता है, जीवन के सबसे जागरुक और सतर्कतम क्षण अर्पित करने होते हैं। थोरो का वन प्रवास बहुत कुछ इसी का पर्याय रहा।
वे नित्य भगवद्गीता के विराट विश्वोत्पत्ति सम्बन्धी दर्शन का अवगाहन करते। उनके शब्दों में, इसके सामने हमारा आधुनिक संसार औऱ साहित्य अत्यन्त तुच्छ और महत्वहीन लगता है। इसकी विराटत्व हमारी कल्पना की अवधारणाओं से भी परे का है। इसके परायण के साथ थोरो वाल्डेन औऱ गंगा के पवित्र जल को आपस में मिलता देखते।

शाकाहर के पक्षधर - विगत सालों में मैंने अनेक बार महसूस किया है कि मैं जब भी मछली मारता हूँ, तो हर बार थोडा-सा आत्म-सम्मान घट जाता है। हर बार मछली मारने के बाद अनुभव किया है कि यदि मैंने यह न किया होता तो अच्छा होता।...मेरा विश्वास है कि जो भी अपनी श्रेष्ठतर मनोवृतियों को उत्तम अवस्था में सुरक्षित रखने का इच्छुक होता है, वह मांसाहार और किसी भी प्रकार के भोजन से बचने की ओर मुड़ता है। फिर, अधिक खाना तो कीट की लार्वावस्था ही में होता है।
सरोवर के तट पर दो वर्ष, दो माह, दो दिन के बाद थोरो यहाँ से विदा लेकर जीवन के अगले पड़ाव की ओर रुख करते हैं। सरोवर के तट पर प्रकृति की गोद में विताए अनमोल पलों को वाल्डेन के रुप में एक कालजयी रचना भावी पीढ़ी को दे जाते हैं, जिसका अवगाहन आज भी सुधि पाठकों को तरोताजा कर देता है।

बुधवार, 8 नवंबर 2017

मेरा गाँव, मेरा देश – मौसम सर्दी का और यादें बचपन की


तैयारी पूरी हो तो सर्दी से अधिक रोमाँचक कुछ नहीं


सर्दी का मौसम आ चला। जैसे ही पहाड़ों में बारिश क्या हुई, पर्वत शिखरों ने बर्फ की हल्की सी चादर ओढ़ ली और सर्दी ने दरबाजे पर दस्तक दे दी। जीवन के असली आनन्द का मौसम आ गया। हालाँकि शीत लहर के चलते देश-दुनियाँ में होने वाले नुक्सान के साथ पूरी संवेदना व्यक्त करते हुए कहना चाहूँगा कि यदि सर्दी का इंतजाम पूरा हो तो इससे अधिक रोमाँचक और सुखद शायद ही कोई दूसरा मौसम हो। पतझड़ के साथ आते शिशिर ऋतु के अपने ही रंग हैं, ढंग हैं, मजे हैं और अपने ही आनन्द हैं, जिनको अपने बचपन की यादों के समृद्ध स्मृति कोश से बाहर निकालकर गुदगुदाने की अपनी ही मौज है। अपने बचपन के घर से दूर, बहुत दूर, फुर्सत के पलों में हम इतना तो कर ही सकते हैं।
दशहरा आते ही हमारे गाँव में सर्दी की शुरुआत हो जाती थी, क्योंकि हम ऊनी कोट पहनकर दशहरे के कलाकेंद्र में रात्रिकालीन प्रोग्राम देखने जाया करते थे। दशहरे के ठीक 20 दिन बाद दिवाली तक ठंड़ की मार ठीक ठाक अनुभव होती थी, जिसका स्वागत हम खेतों में तिल के सुखे गट्ठों को जलाकर किया करते थे।


सर्दी की तैयारियाँ समय से पहले ही शुरु हो जाती थी। खेतों में सूखे पेड़ों के तने, जड़ों व ठूँठों पर कुल्हाड़ी से फाड़ कर इन्हें बटोरते। और मजबूत लकड़ी के लिए जंगल की ओर रुक्सत करते। बोन(बाँज) की सूखी लकडियों सबसे मजबूत मानी जाती थी, जिनसे ऊमदा किस्म का कोयला तैयार होता था। इसके साथ कोऊश (अतीश) की लकड़ी आसानी से कट जाती थी। सुबह भौर होते ही किल्टा और कुल्हाड़ी लेकर हम परिवार के बड़े-बुजुर्गों व भाईयों के संग जंगल जाया करते। सूर्योंदय तक घर बापिस हो जाते। इसके साथ युवाओं की टोली बीहड़ बन की गहराईयों में सूखे चील-देवदार-कैल आदि के सीधे, सूखे तनों को गेल(लम्बे लट्ठे) बनाकर इनको कुंदे व रस्सी में बाँधकर दरघीश (लट्ठों को घसीटने का बना मार्ग) से होकर घसीटकर घर तक लाते। ग्रामीण युवाओं के बीच इसका एक अलग ही रोमाँच रहता।
 जैसे-जैसे हम पहाड़ी में ऊपर चढ़ते, घर-गाँव की छतों पर छाया धुआँ घरों में जल रहे चूल्हों व पक रहे भोजन की चुग्ली करता। यह धुआँ लोकजीवन का सहज हिस्सा था, जिसका आज के दमघोंटू प्रदूषण से कोई वास्ता नहीं था। घर में सुलग रहे तंदूर में लकड़ी के टुकडों का हवन होता। इनके सुलगते टुकड़ों की गर्मी तंदूर की चादर से विकरित होकर कमरे के हर कौने को गर्म रखती। तंदूर पर पानी का बर्तन गर्म होता रहता, जिससे बीच-बीच में हॉट ड्रिंक की व्यवस्था होती रहती। गैंहू, मक्का, सोयावीन की धाणा (पॉपकोर्न) भूनना ऐसे में प्रिय शग्ल रहता। इसे गुड़ व अखरोट के साथ खाने का अपना ही मजा रहता। ठंड ज्यादा होती तो, चाय-पकौड़ी का विशेष इंतजाम रहता।

बैसे सेब, प्लम की प्रूनिंग से कटी टहनियाँ देशी चूल्हे के लिए आदर्श ईँधन रहतीं। इसके साथ कोहू, बोन(बाँज) जैसी हरि पत्ती वाली लकड़ियाँ भेड़-बकरियाँ के चरने के बाद आँगन के किनारों पर सूखने के लिए ढेर लगाकर रखी जाती। खुले चूल्हे के लिए ये बेहतरीन ईँधन साबित होती।

सर्दी का असली नजारा बर्फवारी के साथ शुरु होता। तापमान जमाब बिंदु के आसपास आ गिरता। पहाड़ियों व सामने के ऊँचाई पर बसे गाँव तक बफ गिरने के साथ घाटी का नजारा कुछ ओर रहता। सुबह हिमाच्छाति ध्वल शिखर से स्वर्णिम सूर्योदय सदैव दिव्य भाव झंकृत करता। घर-गाँव में बर्फ गिरने पर तो जीवन तंदूर के ईर्द-गिर्द सिमट जाता, क्योंकि बाहर कोई खास काम नहीं रहता। लोकजीवन इन पलों में जैसे ठहर सा जाता, कमरों तक सीमित हो जाता। बड़े बुजुर्गों से कथा कहानी सुनना, पहेली बुझाना ऐसे में पसंदीदा टाइमपास काम रहते। बच्चों की आपसी उछल-कूद के साथ घर में भेड़-बकरी के मेंमनों के बाढ़े में घुसकर उनके बीच खेलना रुचिकर काम रहते। (उस बक्त कैमरा एक दुर्लभ यंत्र था, अतः किन्हीं फोटो के साथ अनुभव शेयर करना संभव नहीं)


आंगन में पत्थर के ऊखलों में पानी की मोटी परत जमी रहती, जिनके शुभ दर्शन सुबह-सुबह होते। रास्ते में पानी के स्रोतों के पास बर्फ की मोटी परतों को डंडे या पत्थरों से तोड़कर सीसे के आकार के टुकडों से खेलते। घास पर औंस की जमीं बूंदें राह में स्वागत करती। पूरा खेत जैसे पाले की एक हल्की सफेद चादर ओढ़े दिखता। ठंड के चर्म पर पानी के नल जम जाते। रात को इनसे झरती पानी की बूंदें सुई का रुप लेकर नल से लटकती दिखती। जैसे ही सूर्योदय होता, जमी बर्फ की परत पिघलना शुरु होती। पूरे खेत व रास्ते में कीचड-कीचड़ हो जाता।

 

परीक्षा के दिनों में तंदूर से हटकर बाहर बरामदे में ठंड़ में पढ़ने का ऱोमाँच कुछ ओर ही रहता। दिन को छत पर धूप में बैठकर खेत व वादी का विहंगावलोकन करते हुए पढ़ना एक अलग ही अनुभव था। दोपहर शाम को खेत में किसी चट्टान या मखमली घास पर आसन जमाकर एकांत में अध्ययन का अपना ही आनन्द रहता।
धान की पुआल से माँदरी (चटाई) बनने की कबायत चलती। गाँव के हर घर में प्रायः महिलाओं को दिन की धूप में इसको बुनते व्यस्त देखा जा सकता था। घर के एक कौने में बने हथकरघे में पट्टू व ऊनी कम्बल तैयार होते। फुर्सत के समय में महिलाएं ऊन की जुरावें, दस्ताने व स्वाटर बुनने में मश्गूल रहती। तब घर में भेड़-बकरियाँ बहुतायत में थी, ऐसे में बुजुर्गों को इनकी ऊन को तकली से कातते देखते, जो आज किन्हीं बिरले घरों तक सीमित हैं। 


घर की छत्तों पर रंग-विरंगे कद्दू सूखने के लिए रखे होते, जो अपना ही रंग बिखेरते - लाल, हरे, पीले व भूरे। जापानी फल के पीले पत्ते वाले पेड़ बहुत सुंदर लगते। इसी तरह खनोर(चेस्टनेट) के बड़े-बड़े पेड़ पीले आच्छादन के साथ अपना रंग बिखेरते।
ठंड में धूप का अलग ही आनन्द रहता। सुबह की ठंड में अकड़ी नस-नाडियाँ जैसे बाहर आंगन में धूप सेकते ही खुल जाती, चैतन्य हो उठती। इसके साथ गाँव का नाला व ब्यास नदी का निर्मल जल हिमालयन टच लिए रहते। ब्यास नदी के किनारे बिहाल (विहार) में अतीश के सूखे पत्ते बटोरने का क्रम खूब चलता। सुबह व शाम को गाँव की महिलाओं व बच्चों को किल्टों में बटोरकर इनकी पुआली को ले जाते देख सकते थे। नदी के किनारे कूल्हों(पानी की छिछली धार) में मछली पकड़ने का खेल खूब चलता। बच के दलदल में बनमुर्गी को पकड़ने की कसरत, अपने पसंदीदा खेलों में शुमार रहता।


पतझड़ के कारण सेब, अखरोट, खुमानी से लेकर अतीश के पेड़ अस्थि पंजर से खड़े दिखते। इनकी विरलता के बीच गाँव, घाटी पर ब्यास नदी के उसपार आईटीबीपी कैंप का नजारा स्पष्ट दिखता। सूखते पीले पत्ते, बगानों को पीले रंग से पोत देते। घाटी में पीले, हरे व भूरे पैच प्रकृति के कैन्वास पर उस अदृश्य जादूगर की कारीगरी की बेमीसाल झलक देते और जब आसमान में बादल भी रंग बिरंगे व नाना आकार के उमड़ते-घुमड़ते दिखते, तो नजारा कुछ ओर ही रहता।


घास के टूहके सूखे मक्का की घास से लदे रहते। इसमें कौओं द्वारा छुपाए अखरोटों का जखीरा बच्चों को खूब भाता। पेड़ में बचे अखरोट सूखकर खुद व खुद गिरते रहते, जिनको बटोरना अपने आप में एक सुखद अहसास रहता। जो सूखे अखरोट छिलकों से झांक रहे होते, उन पर पत्थर से निशाना लगाने की होड़ बच्चों में लगी रहती। इसी के बीच फूलों के नाम नरगिस का फूल अपनी ध्वल फूल पतियों के बीच सोने के कटोरे को समेटे हवा में मादक सुगन्ध बिखेरने लगता। इसी के साथ शिशिर के समाप्न व बसन्त के शुभ आगमन का संकेत मिलता। अब पूरी शीतऋतु में तपस्वियों सा वेश धारण किए, शीत निद्रा में सोए तमाम वृक्ष एवं पेड़-पौधे कलियों में सिमटे पुष्पों के साथ वसन्त के स्वागत के लिए तैयार होते।

मंगलवार, 17 अक्तूबर 2017

पर्व-त्यौहार - दशहरा कुल्लू का


सांस्कृतिक उल्लास का अनूठा देव-संगम
कुल्लू का दशहरा स्वयं में अनूठा है। हिमाचल प्रदेश का सबसे बड़ा यह उत्सव तब शुरु होता है जब देश के बाकि हिस्सों में दशहरा खत्म होता है। आश्विन नवरात्रि के बाद दशमी के दिन इसके शुभारम्भ के कारण इसे विजय दशमी कहा जाता है, जिसमें भगवान राम द्वारा रावण के संहार, माँ दुर्गा द्वारा महिषासुर के मर्दन के साथ असुरता पर देवत्व, असत्य पर सत्य और अधर्म पर धर्म की जीत का भाव रहता है। हालांकि कुल्लू के दशहरे में रावण को जलाया नहीं जाता, यहाँ का दशहरा भगवान रघुनाथ और घाटी के देवी-देवताओं के समागम के इर्द-गिर्द सिमटा हुआ है, जिसकी अपनी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि है।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि – कुल्लू में दशहरे की शुरुआत आज से लगभग साढ़े चार सौ साल पहले यहाँ के राजा जगतसिंह द्वारा 17वीं शताब्दी में (1660) हुई बतायी जाती है। राजा जगतसिंह एक ब्राह्मण के शाप के कारण कुष्ठरोग से पीडित हो गए थे। ब्रह्महत्या के पाप से मुक्ति के लिए उन्हें अयोध्या से रघुनाथ के विग्रह को अपने यहाँ स्थापित करने का आदेश मिलता है, जिसका पालन करते हुए वे सुलतानपुर में भगवान राम की स्थापना करते हैं। सारा राजपाट रघुनाथ के चरणों में अर्पित कर, प्रथम सेवक के रुप में राजकाज चलाते हैं। क्रमशः राजा रोगमुक्त हो जाते हैं। भगवान रघुनाथ को अपनी श्रद्धांजलि स्वरुप कुल्लू में दशहरे का चलन शुरु होता, जिसमें घाटी के लगभग 365 देवी-देवता भगवान रघुनाथ को अपना भावसुमन अर्पित करते हुए सात दिन ढालपुर मैदान के अस्थायी शिविरों में वास करते हैं। पहले दिन रथ यात्रा से अंत में मुहल्ला व लंका दहन के साथ दशहरा सम्पन्न होता है। इस रुप में कुल्लू के दशहरे को सांस्कृतिक-आध्यात्मिक उल्लास का देवसमागम कहें तो अतिश्योक्ति न होगी।
देवसमागम एवं रथ यात्रा पहला दिन – मेले की शुरुआत कुल्लू घाटी से पधारे देवताओं की भगवान रघुनाथ के दरवार में हाजिरी से होती है। लगभग 3 बजे के करीब भगवान रघुनाथ की पालकी कुल्लू नरेश के निवासस्थल सुलतानपुर से चलती है और ढालपुर मैदान के ऊपरी छोर पर रथ में इसे सजाया जाता है। इस स्थल पर घाटी भर से पधार रहे देवी-देवता रंग-बिरंगे फूलों व रेशमी चादरों से सजे रथों में देवलुओं के कंधों पर सवार होकर रघुनाथजी की सभा में शामिल होते हैं। देवताओं के समागम का उत्साह, उनकी हलचलें व देवक्रीडा का अद्भुत दृश्य दर्शकों को रोमाँचित करता है। सुलतानपुर के ऊपर पहाड़ पर विराजमान देवी भेखली माता का ईशारा पाते ही भगवानराम, सीतामाता, हनुमानजी, बिजली महादेव, माँ हिडिम्बा आदि की जयकार के साथ रथ यात्रा शुरु होती है।
राजपुरोहित और छड़ीबरदार राजा की उपस्थिति में काफिला आगे बढ़ता है। दर्शक रथ के रस्सों को हाथ लगाकर धनभाग अनुभव करते हैं तथा रथ को मैदान के दूसरे छोर तक खींचते हैं। भगवान रघुनाथ का रथ देवी-देवताओं के काफिले व दर्शकों के अपार समूह के साथ आगे बढ़ता है। राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय स्तर के मीडिया को इस अदभुत दृश्य को कैद करते देखा जा सकता है। दिव्य भावों के साथ आगे बढ़ रहा स्वअनुशासित जनसमूह अपने आप में एक अद्भुत नजारा रहता है। इसी के साथ भगवान रघुनाथ सहित सभी देवी-देवता अपने निर्धारित स्थान पर, अस्थायी शिविरों में स्थापित होकर दशहरे की शोभा बढ़ाते हैं और सात दिन तक विराजमान रहते हैं। 
प्रातः-साँय आरती, देवधुन – प्रातः-सांय देवी-देवताओं की आरती का क्रम चलता है। इनकी देवधूनों के साथ पूरे मैदान व घाटी में सकारात्माक ऊर्जा का संचार होता है, लगता है जैसे आसुरी व नकारात्मक शक्तियाँ यहाँ से तिरोहित हो रही हैं। घाटी भर से आ रहे दर्शनार्थी अपने ईष्ट देवताओं के दर्शन करते हैं और अपनी श्रद्धांजलि व भेंट अर्पित करते हैं। कुछ देवलुओं को दिन में फुर्सत के पलों में नाटी का लुत्फ उठाते देखा जा सकता है, जो उनके उल्लास की सहज अभिव्यक्ति होती है। शाम को रघुनाथ के शिविर में पारंपरिक शैली में रासलीला व अन्य देवनृत्यों का भी मंचन होता है।
ऋतु संधि का उल्लास एवं कृषि-बागवानी प्रदर्शनी – वास्तव में दशहरे का पर्व ऋतु संधि की बेला में मनाया जाता है, जब किसान व बागवान फसल, फल, सब्जी आदि के कृषि कार्यों से लगभग मुक्त हो चुके होते हैं। ऐसे में फसल के पकने का उल्लास भी इस मेले में देखा जा सकता है। घाटी भर के किसान व बागवान अपने फल-सब्जी-अनाज के श्रेष्ठ उत्पादों के साथ आते हैं। कृषि एवं उद्यान विभाग द्वारा आयोजित प्रदर्शनियों में इनकी नुमाईश होती है और बेहतरीन उत्पादों को प्रथम, द्वितीय व तृतीय पुरस्कारों से नवाजा जाता है। किसानों के बेहतरीन उत्पादों का दर्शन एक शैक्षणिक व प्रेरक अनुभव रहता है जो जिज्ञासु दर्शकों का खासा ज्ञानबर्धन करता है। इसी तरह यहाँ तमाम तरह के घरेलु उत्पादों की प्रदर्शनियां लगी होती हैं, जिन्हें वाजिब दामों में खरीदा जा सकता है।
खरीददारी, मार्केट – एक धार्मिक उत्सव के साथ दशहरे का अपना अर्थशास्त्र भी है। कुल्लू लाहौल-स्पिति जैसे उच्च हिमालयी क्षेत्र तथा पंजाब जैसे मैदानी क्षेत्र के बीच का स्थल है। सर्दी में नबम्बर के बाद जनजातीय क्षेत्र भारी बर्फ के कारण यहाँ से कट जाते हैं, इसलिए अपने जरुरत के सामानों की खरीद दशहरे में जमकर होती है। इसी तरह वे अपने यहाँ से तैयार उत्पाद इसमें बेचते हैं। 
आश्चर्य नहीं कि मेले का एक बढ़ा आकर्षण रहती है पूरे ढालपुर मैदान में आर-पार फैली मार्केट, जिसमें सर्दी के कपड़ों से लेकर, पारम्परिक परिधान, महिलाओं के साज-सज्जा के सामान, बच्चों के खिलौने व घर-परिवार व खेत-बागान में उपयोग होने बाले हर तरह के सामान उपलब्ध रहते हैं। कहने की जरुरत नहीं कि इसमें कुल्लबी शाल, टोपी, पट्टू, मफलर, ऊनी जुराबें व अन्य उत्पाद सहज रुप में उपलब्ध रहते हैं। देशभर के कौने-कौने से व्यापारी इसमें पधारते हैं। यहाँ ब्रांडेड क्लाविटी प्रोडक्ट से लेकर क्वाड़ी मार्केट, हर तरह के सामान मिलते हैं। खास बात रहती है इनका वाजिब व सस्ते दामों में उपलब्ध रहना। अनुमान रहा कि इस वर्ष (2017) लगभग 5000 व्यापारी इसमें पधारे थे।
फूड कॉर्नर और देसी जायके – हर मेले की तरह खान-पान की विशेष सुविधा यहाँ रहती है। प्रचलित मिठाइयों से लेकर लंच-डिन्नर की व्यवस्था तो रहती ही है, खान-पान के उभरते नए चलन यहाँ देखे जा सकते हैं, जिसमें देसी जायकों की भरमार खास रहती है। कुल्लू के पारम्परिक व्यंजनों में सिड्डू की लोकप्रियता सबपर भारी दिखी। सिड़्डू कॉर्नर के नाम से तमाम दुकानों के नाम दिखे। इसी तरह मंडी की कचोरी, पंजाब के मक्के दी रोटी व सरसों का साग तथा चाइनीज मोमोज भी इसमें अपना स्वाद घोलते दिखे। नॉन वेज की जगह वेज उत्पादों का बढ़ता चलन मेले की देवपरम्परा को पुष्ट करता प्रतीत हुआ।
कलाकेंद्र – घाटी की शान स्व. लालचंद प्रार्थी के नाम अर्पित कलाकेंद्र संगीत, नृत्य व कला प्रदर्शनों के साथ गुलजार रहता है। बैसे तो दिन भर ही यहाँ नाटी के साथ सांस्कृतिक कार्यक्रम चलते रहते हैं, लेकिन रात को 7 से 10 बजे के बीच कलाकेंद्र आकर्षण का केंद्र रहता है, जिसमें देश ही नहीं दुनियां के कौने से आए कलाकार इसमें अपनी प्रस्तुती देते हैं। दशहरे का अंतर्राष्ट्रीय स्वरुप इन कार्यक्रमों में भलीभांति देखा जा सकता है। सकारात्मक संदेशों के साथ सांस्कृतिक उल्लास का स्फोट यहाँ होता देखा जा सकता है।
नाटी के संग बेटी बचाओ का संदेश – नाटी जहाँ घाटी का लोकप्रिय नृत्य है, जिसके बिना मेले की चर्चा अधूरी मानी जाएगी। इस बार 12000 महिलाओं द्वारा इसका वृहद आयोजन आकर्षण का केंद्र रहा, जिसे वेटी बचाओ के सामाजिक संदेश के साथ आयोजित किया गया। पिछले ही वर्ष सामूहिक नाटी को गिनिज बुक ऑफ रिकोर्ड में स्थान मिला था।
 
खेलकूद – खेलकूद मेले का अभिन्न हिस्सा रहता है। बालीवाल, कब्ड़डी से लेकर बॉक्सिंग के मैच देखे जा सकते हैं। खेल प्रेमियों का जमाबड़ा इनमें मश्गूल देखा जा सकता है। इसे स्थानीय  स्तर पर भी आयोजित किया जाता है और अंतर्राजीय स्तर पर भी, जिसमें हर वर्ग व हर स्तर की प्रतिभा को भाग लेते देखा जा सकता है। निसंदेह रुप में नवोदित खिलाड़ियों को इसमें उभरने को मौका मिलता है।

कैटल मार्केट, मेले के निचले छोर पर किसानों के लिए आकर्षण का केंद्र रहता है। जिसमें एक से एक नस्लों की गाय-बैल, भेड़-बकरियों, घोड़े, खच्चर आदि की खरीद-फरोख्त होती है। इसमें खरीदे मनपसंद मवेशियों को साथ लेकर घर की ओर बढते किसान परिवारों की खुशी व उत्साह देखते ही बनते हैं। इनके साथ मेले में भांति-भांति के झूलों से लेकर, मौत का कुँआ व सरकस आदि मनोरंजक खेल बच्चों से लेकर युवाओं एवं बुजुर्गों का मनोरंजन करते हुए मेले में एक नया रंग घोलते देखे जा सकते हैं।  
दशहरे अंतिम दो दिन - मेले के छट्ठे दिन मुहल्ला मनाया जाता है, जिसमें देवताओं का आपसी मिलन होता है। साथ ही घाटी से आए देवता भगवान रघुनाथ को श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं। अंतिम दिन लंका दहन का रहता है, जिसमें राजपरिवार की कुलदेवी माता हिडिम्बा के नेतृत्व में देव काफिला व्यास नदी के किनारे बेकर(टापू) तक बढ़ता है।
वहाँ झाड़-झंखारों को जलाने व इसके बीच रावण, मेघदूत व कुंभकरण के मुखौटों को तीर से भेदने के साथ लंका दहन व लंका विजय का भाव किया जाता है। इसी के साथ बलि प्रथा का चलन भी जुड़ा हुआ है, जिसमें भैंसे से लेकर मेढ़ा, सुअर, मुर्गा व मछली की बलि दी जाती है। हालांकि 2014 में हाईकोर्ट के आदेशानुसार इस पर पाबंदी लगी थी लेकिन कुल्लू नरेश की अपील पर मामला फिर विचाराधीन है। 
हालांकि इस प्रथा की शुरुआत जिन भी परिस्थितियों में हुई हो, देवसंस्कृति के नाम पर निरीह पशुओं की बलि दशहरे जैसे सांस्कृतिक-आध्यात्मिक पर्व की मूल भावना के अनुकूल नहीं है। इसे जितना जल्द बंद किया जा सके, उचित होगा। निरीह पशुओं के प्राणों की बलि की जगह अगर दशहरे के इस कर्मकाण्ड को इंसानियत के प्राणों का हनन करने वाले दोष-दुगुर्ण रुपी आंतरिक पशुओं की बलि की ओर मोड़ा जा सके तो शायद दशहरे का पावन भाव तात्विक रुप में जीवंत-जाग्रत हो सके और इस अंतर्राष्ट्रीय पर्व के साथ असत्य पर सत्य, असुरता पर देवत्व और अधर्म पर धर्म की विजय का मूल संदेश पूरे विश्व में देवसंस्कृति की मूल भावना के अनुरुप गुंजायमान हो उठे।