मंगलवार, 26 मई 2020

यात्रा वृतांत – 6, पोलैंड का छिपा नगीना, तोरुण शहर


तोरुण के मध्यकालीन ऐतिहासिक शहर में...

आज का दिन हमारा बिडगोश शहर के पास के ऐतिहासिक शहर तोरुण के दर्शन का था। ज्ञात हो कि यह पोलैंड ही नहीं पूरे यूरोप का अपनी ऐतिहासिक विरासत को संजोए सबसे सुन्दर शहर माना जाता है। यह एक ऐसा सौभाग्यशाली शहर है जो द्वितीय विश्वयुद्ध में हुए ध्वंस एवं हवाई हमलों से बचा रहा। अतः इस की ऐतिहासिक इमारतों एवं समारकों का अपना विशिष्ट महत्व है, जो पौलेंड की मध्यकालीन संस्कृति की झलक देते हैं। अपनी ऐतिहासिक विशेषताओं के कारण तोरुण यूनेस्को द्वारा नामित विश्व की ऐतिहासिक धरोहरों में शुमार है, साथ ही प्रख्यात खगोल वैज्ञानिक कॉपर्निक्स की जन्म एवं कर्मस्थली होने के कारण इस शहर का अपना महत्व है।
बिडगोश शहर से प्रातः नाश्ता कर हम तोरुण शहर के लिए निकल पड़ते हैं। काजिमीर विल्की यूनिवर्सिटी से काल्का मेडेम के पति प्रो. क्रिस्टोफ स्वयं ड्राईविंग कर रहे थे। वे कॉपर्निक्स विश्वविद्यालय में दर्शन विभाग के विजिटिंग प्रोफेसर भी हैं। मितभाषी, स्वयं में मस्त-मग्न सरल स्वभाव के धनी प्रोफेसर साहब 100-120 किमी प्रति घंटे की गति के साथ गाड़ी को यहाँ की स्पाट, सुंदर सड़कों पर दौड़ा रहे थे। ट्रैफिक के नियम स्पष्ट होने के कारण शायद यहाँ ड्राइविंग सरल रहती होगी। गाड़ी की वायीं ओर ड्राईवर सीट हमारे लिए सदा की तरह नया अनुभव थी। रास्ता घने जंगलों, हरे-भरे खेतों एवं सुंदर गाँवों से होकर गुजर रहा था। बिडगोश शहर के बाहर निकलते ही विस्तुला नदी को पार करते हुए लगा जैसे गंगा नदी को पार कर रहे हैं।
यह नदी पोलैंड की सबसे लम्बी नदी है, जो पौलेंड के आर-पार 1047 किमी की यात्रा तय करते हुए बाल्टिक सागर में जा गिरती है। पौलेंड के दक्षिण की पर्वतश्रृंखलाओं से निकलने वाली इस नदी को पोलैंड की सांस्कृतिक एवं राष्ट्रीय पहचान के रुप में देखा जाता है। तोरुण में पुनः इसके दर्शन होने वाले थे, जो इसके किनारे बसा हुआ ऐतिहासिक शहर है।
रास्ते में ही भव्य गिरिजाघर के दर्शन हुए, जो आधुनिक वास्तुशिल्प के साथ एक अलग ही नजारा पेश कर रहा था। एक घण्टे के सुखद सफर के बाद हम तोरुण के कॉपर्निक्स विश्वविद्यालय के कैंप्स में पहुँच चुके थे, जहाँ हमें यहां की गाईड केरोलिना शहर का भ्रमण करवाती हैं। यहीं शहर में ही निर्मित ईँट से बने ऐतिहासिक भवन में प्रवेश से शुरुआत होती है, जिसके अन्दर नगरीय व्यवस्था की प्रारम्भिक प्रशासनिक एवं कानूनी प्रक्रिया के हिसाब से बने भवन की जानकारी मिलती है।
इसी के मार्ग में गगनचूम्बी चार दिवारी में बने मध्यकालीन चर्च के दर्शन होते हैं। यहाँ मदर मेरी की प्रतिमा को देखकर ऐसा लग रहा था जैसे माँ भगवती के ही दर्शन हो रहे हों और प्रेम के प्रतीक भगवान ईसा मसीह की भव्य प्रतिमा बहुत सुंदर लग रही थी।
दिवार में संत भाई लारेंस के चित्र हमें इनके अगाध प्रभु प्रेम की याद दिलाते हैं। गीताप्रेस गोरखपुर द्वारा इन पर लिखी पुस्तक – भाई लारेंस के पत्र सहज ही स्मरण आईं, जो हर आध्यात्मिक जिज्ञासु के लिए पठनीय है। लगा सभी धर्म बाहरी रुप में भिन्न होते हुए, मूल भाव तो सबके एक ही हैं, जिन्हें एक आध्यात्मिक पिपासु होकर, खुले मन से विचार कर ह्दयंगम किया जा सकता है।
यहीं चौराहे पर खगोलविद कोपर्निक्स का समारक शहर का विशिष्ट आकर्षण लगा, जिसके सामने पर्यटकों की फोटो खिंचाने की होड़ लगी थी, हम भी एक यादगार फोटो के साथ आगे बढ़ते हैं। शहर के ही दूसरे छोर पर कोपर्निक्स की जन्म स्थली के भी दर्शन होते हैं, जो इनके समृद्ध पारिवारिक पृष्ठभूमि पर भी प्रकाश डालते हैं व अब यह भव्य भवन संग्रहालय के रुप में विकसित एवं संरक्षित है। मालूम हो कि कॉपर्निक्स ने सबसे पहले यह बताने की कोशिश की थी कि पृथ्वी सूर्य के गिर्द घूमिती है, जो प्रचलित धार्मिक मान्यताओं के खिलाफ था। इससे पहले कि इनको कोई सजा होती, कॉपर्निक्स अपना शरीर छोड़ चुके थे।
यहीं चौराहे के उस पार एक स्टील का गधा बना हुआ दिखा, जिसके चारों ओर काफी भीड़ लगी थी। पता चला कि यह यहाँ की मध्यकालीन न्याय व्यवस्था का एक हिस्सा था, जब अपराधियों को इसके ऊपर कई घण्टों बैठने की सजा दी जाती थी। इसकी पीठ पर कुछ सेमी ऊँची पट्टी लगी हुई है, जिस पर बैठना निसन्देह रुप में अपराधियों के लिए एक कष्टदायक अनुभव रहता रहा होगा।
यहाँ के ऐतिहासिक भवनों को पार करते हुए हम जिंजर-कूकीज की सजी दुकानों को देखते हुए आगे बढ़ते हैं, जिन्हें यहाँ के पारम्परिक आटे, शहद एवं विशिष्ट मसालों के साथ बनाया जाता है।
यह परम्परा चौदहवीं सदी से चल रही है, अतः तोरुण शहर की जिंजर कुकीज पौलेंड में विशेष दर्जा रखती हैं। यूरोप के व्यवसायिक मार्ग पर स्थित होने के कारण तोरुण की ये कूकीज पौलेंड एवं यूरोप के दूसरे हिस्सों में भी निर्यात होती रही हैं व हो रही हैं।
विस्तुला नदी भी शहर का एक प्राकृतिक आकर्षण है, जिसके तट पर यह बसा हुआ है। शहर को बाढ़ एवं बाह्य हमलों से संरक्षण देती ईंट की मोटी चार दिवारी को पार करते ही हम बिस्तुला नदी के सामने खड़़े थे। नदी का तट बहुत सुन्दर एवं भव्य लग रहा था, जिसमें छोटी नाव एवं बड़े स्टीमर चल रहे थे। स्पष्ट था कि नदी भी यहाँ यातायात का एक प्रमुख साधन है, जिसके माध्यम से व्यापार की बात हम कर चुके हैं।
शहर के एक कौने पर हमें झूकी मीनार के दर्शन होते हैं, जिसे पीसा की झुकी मीनार से भी अधिक प्राचीन माना जाता है औऱ लोग यहाँ खड़ा होकर स्वयं के पापी एवं पुण्यात्मा होनी की परीक्षा करते हैं। यदि मीनार के साथ खड़े होकर कुछ सैकण्ड टिककर खड़े हो सके तो पुण्यात्मा अन्यथा पापात्मा। इस परीक्षा में कोई विरला ही पास होता हो।
शहर का चप्पा-चप्पा मध्यकालीन वास्तुशिल्प की सुंदर स्मृतियों को समेटे हुए एक अलग ही अनुभव दे रहा था। यहाँ के गोइथिक शैली में बने भवन एवं एतिहासिक इमारतें अपनी अलग-अलग कहानी व्याँ कर रहे थे।
इसकी पारम्परिक साज-सज्जा में घर-आंगन एवं चौराहे पर रंग-विरंगे फूलों के गमलों की सजावट प्राकृतिक सौंदर्य से जुड़़ी भव्य सांस्कृतिक परम्परा का अहसास दिला रही थी।
यहीं बीच में देशी जायके वाले रुबरु रेस्टोरेंट में हमारा दिन का भोजन होता है, जहाँ काल्का मेडेम और उनके पतिदेव प्रो. क्रिस्टोफ हमारा इंतजार कर रहे थे। रुचि के अनुकूल उनके लिए नोन-वेज भोजन आता है और हम शाकाहारी भोजन ग्रहण करते हैं।
यह बिडगोश के रुबरु होटल की ही श्रृंखला का विस्तार था, जिसे यहाँ के स्थानीय लोग चला रहे थे, लेकिन कुक नेपाल के भाई रोमेश थे, जिनसे मिलकर आत्मीयता का अहसास हुआ।
भोजन के बाद हम यहाँ की स्थानीय दुकानों से स्मृति स्वरुप कुछ उपहार खरीदते हैं, जो जलोटी में उचित दाम पर हमें मिले। गाइड केरोलिना के साथ भावभरी विदाई के साथ तोरुण के ऐतिहासिक शहर का यादगार सफर पूरा होता है। हालाँकि इतने कम समय में इस ऐतिहासिक शहर का एक विहंगावलोक ही हो सकता था, इसके विस्तार से दर्शन को भविष्य के लिए छोड़, हम हरे-भरे सुंदर मार्ग से होते हुए बापिस बिडगोश शहर आते हैं, जहाँ आकादमिक एक्सचेंज के कार्यक्रम सम्पन्न होने थे, जिसे आप अगली ब्लॉग पोस्ट, पोलैंड यात्रा, भाग-7 अकादमिक संवाद एवं पारंपरिक कॉफी का स्वाद, में पढ़ सकते हैं।

बुधवार, 20 मई 2020

मेरा गाँव मेरा देश - बचपन का पर्वत प्रेम और ट्रैकिंग एडवेंचर, भाग-2


पहाड़ों के बीहड़ बन की गहराईयों से पहला गाढ़ा परिचय
प्रातः चाय-नाश्ता कर हम बीहड़ वन की गहराईयों को एक्सप्लोअर करने के लिए आगे बढ़ते हैं। गेस्ट हाउस से पीछे शाड़ी नामक ढलानदार थोड़े खुले क्षेत्र से होकर गुजरते हैं, जहाँ जंगली पालक बहुतायत में लगी थी। जरुरत पड़ने पर इसका चाबल या रोटी के साथ भोजन में बेहतरीय प्रयोग किया जा सकता था। अब देवदार का जंगल घना होता जा रहा था। थोड़ी देर में एक पहाड़ी नाला आता है, इसको पार कर हम दूसरी ओर एक ढलानदार मैदान की ओर चढ़ाई करते हैं। यहाँ भांड पात्थर नामक स्थान पर एक बड़ी सी समतल चट्टान पर चढ़कर यहाँ का सुंदर नजारा लेते हैं। यहाँ देवदार से घिरे बुग्याल में चम्बा के खजियार और काश्मीर की घाटियों की झलक आ रही थी। यह बुग्याल भेड़-बकरियों के चरने के लिए एक आदर्श स्थल था।
यहीं पर सत्तु-गुड़ का हल्का नाश्ता लेते हैं। यहाँ ठण्ड इतनी थी कि हाथ की ऊँगलियाँ जैसे जम रही थी। नाश्ते के बाद हम वुग्याल के पार दाएं ऊपर की ओर जंगल में प्रवेश करते हैं। यह थोड़ा चट्टानी क्षेत्र था, जहाँ आगे देवदार के पेड़ के दो-तिहाई ऊँचाई को छूते दो समानान्तर चट्टानों को लेकर एक चूल्हानुमा आकृति हमें रोमांचित करती है, जो पाँडू चूल्हा नाम से जाना जाता है। मान्यता है कि पाण्डव अज्ञातवास के दौरान यहाँ से गुजरे थे और यह उनका बनाया हुआ चूल्हा है, जिसको पीछे से जाकर चढ़कर इसकी समतल चट्टानों पर बैठकर इसका अनुभव लेते हैं। अनुमान लगाते रहे कि पाण्डव कितने ताकतवर रहे होंगे, साथ ही कितना ऊँचे भी। 
फिर हम नीचे उतरे और भांड़ पात्थर पहुँचे। यहाँ से तिरछी ऊँचाई पर ऊपर देऊधाणा स्थल पड़ता है, जो भेड-बकरियों के विश्राम के लिए अनुकूल स्थान माना जाता है, जहाँ फुआल (गड़रिए) अपने झुंडों के साथ रहते हैं। आज समय अभाव के कारण वहाँ पहुँचना संभव नहीं था। भाण्ड पात्थर से दक्षिण की ओर सीधा रास्ता माऊट नाग नामक बीहड़ एकाँत में स्थित तीर्थ स्थल एवं वन्य संरक्षित इलाके से होकर
आगे मुख्य मार्ग से मिलता है और सीधे घाटी के छोर पर पहाड़ की चोटी पर स्थित प्रख्यात बिजली महादेव मंदिर तक जाता है। हम इसके ठीक बिपरीत उत्तर दिशा की ओर सीधी पगडंडी के सहारे आगे बढ़ रहे थे। रास्ते में यहाँ भालूओं के जमीन को खोदने के निशान दिखे। हालाँकि ये ताजा नहीं थे। मालूम हो कि भालू जड़ी बूटियों का भी शौकीन होता है और इनकी जड़ों को खोदकर खाता है। शहद उसका पसंदीदा भोजन माना जाता है। जंगल में उगने वाले कैंट, एक तरह के जंगली बागूकोशा के पक्के मीठे फलों को भालू पड़े चाव से खाता है। खैर हम बीहड़ बन में आगे बढ़ रहे थे, पूरी साबधानी के साथ, कुछ हल्ला व शौर करते हुए, जिससे कि यदि कोई भालू कहीं हो तो दूर भाग जाए।
रास्ते में उबल्दा स्थान आता है, जहाँ जमीं से फूटता पानी का चश्मा किसी चमत्कार से कम नहीं लग रहा था।
यह शीतल एवं निर्मल जल उबाल के साथ बाहर निकल रहा था, जिस कारण इसका नाम ऐसा (उबल्दा) पड़ा। भादों की बीस (प्रायः सितम्बर माह का पहला सप्ताह, जब ये वुग्याल जंगली फूलों के सजे होते हैं) को लोग विशेषरुप में यहाँ पुण्य स्नान के लिए आते हैं। इसके जल को औषधीय गुणों से भरपूर माना जाता है और दिव्य भी। यहाँ पर हल्का नाश्ता कर हम आगे बढ़ते हैं। ऐसे पहाड़ों में ट्रेकिंग करने वालों का यह आम अनुभव रहता है कि यहाँ का जल इतना सुपाच्य एवं औषधीय होता है कि भूख बहुत जल्द लगती है, जठाग्नि जैसे अपने चरम पर प्रदीप्त होती है और कुछ भी खाओ जैसे तुरन्त पच जाता हो।
आगे रास्ते में दूंअधड़ा थाच पड़ा, जहाँ लकड़ी व घास की झौंपड़ी में ग्वाले अपने मवेशियों के साथ रह रहे थे। थोड़ा नीचे आगे तंदला सोर (सरोवर या ताल) पड़ता है, जिसके बारे में मान्यता है कि इसके तल पर कोई पत्ता तक नहीं गिरता। चिडिया गिरते पत्तों के तुरंत उठा लेती है। हम समय अभाव के कारण इसके भी दर्शन नहीं कर पाए।
हम सीधा आगे बढ़ रहे थे। आगे पटोऊल स्थान हमारा आज का गन्तव्य स्थल था, जहाँ नीचे फूटा सोर (सरोवर) पडता है।
मान्यता है कि भगवती दशमी वारदा (इलाके में मान्य दुर्गा माता का कन्या रुप) ने अपनी कनिष्ठिका उँगली से इसको फेर कर कभी भयंकर सूखे का निवारण किया था और यहाँ पर अधिकार जमाए असुर का बध किया था। यहाँ आज भी दलदली सरोवर बीच में टापू का आकार लिए हए है। यहाँ से हम पीछे पहाड़ के सबसे ऊचे बिंदु पर चढ़ जाते हैं, जहाँ से पीछे की मणिकर्ण घाटी के दर्शन प्रत्यक्ष थे। नीचे पार्वती नदी बह रही थी, और ऊपर घाटी में क्षाधा-बराधा और दूसरे गाँव उस पार दिख रहे थे। यह हमारे लिए एक अदभुत नजारा था, क्योंकि पहाड़ के शीर्ष से क्या दिखता होगा, यह आज समझ आ रहा था। आसमान तक जाने का तो कोई रास्ता संभव नहीं दिखा, लेकिन पीछे दूसरी अनेकों घाटियों के दर्शन और सुदूर हिमाच्छादित विराट पर्वतश्रृंखलाओं के मनोरम नजारे हमें रोमाँचित कर रहे थे।
यही हमारा आज का गन्तव्य स्थल था और आज तक बचपन की वाल जिज्ञासाओं का समाधान भी। इसके आगे रास्ता रूमसू टॉप से होकर चंद्रखणी पास पहुँचता है और आगे मलाना गाँव (विश्व का सबसे प्राचीन लोकतंत्र) पड़ता है। अब तक दोपहर हो चुकी थी। हम यहीं से बापिस हो जाते हैं, उबल्दा पहुँचते हैं और शॉर्ट कट से नीचे मुख्य मार्ग में पहुँचते हैं और कच्चे मोटर रुट के साथ नग्गर-बिजली महादेव कीसड़क पर आगे बढ़ते हैं। 
 रास्ते में रेउँश गेस्ट हाउस मिलता है, जहाँ हम रात को रुके थे तथा सुबह बीहड़ वन को एक्सप्लोअर करने का अभियान शुरु किए थे।
    इसके आगे रास्ते में चट्टानी पहाड़ को काटकर बनाए रास्ते को देखते हैं, जहाँ गुफानुमा स्थलों में नाईट हाल्ट की कामचलाऊ व्यवस्था दिखी। इस राह की खासियत देवदार के साथ रई-तोष के घने जंगल लगे एवं साथ में जल की प्रचुरता, जो सीधे नीचे सेऊबाग नाले को समृद्ध करते हैं, जिसका जिक्र हम पिछले कई ब्लॉग्ज में विस्तार से कर चुके हैं।
हाइणी थाच स्थान से हम मुख्य मार्ग से हटकर पगडंडी के सहारे नीचे की और बापसी के रास्ते चल देते हैं। सूर्य भगवान लगभग अस्त हो रहे थे। यहाँ हम सीधी धार (रिज) की उतराई भरी कच्ची पगडंडियों पर तेज कदमों के साथ नीचे उतर रहे थे। लक्ष्य अब एक ही था, अँधेरा होने से पहले घर पहुँचना। रास्ते में काली जोनी व मेंह स्थलों को पार करते हुए दाड़ू री धारा स्थान पर पहुँचते हैं। अभी भी यहाँ से नीचे गाँव-घर के दर्शन नदारद थे। यहाँ से हाका देने री धारा स्थल को पार कर नीचे छाऊँदर नाला के टॉप पर पहुँचते हैं, जहाँ से अब नीचे गाँव-घर के दर्शन हो रहे थे।
लग रहा था कि अब हम लोग घर पहुँच ही गए। कुछ मिनटों में सेऊबाग नाला के समानान्तर चट्टानी उतराई के साथ केक्टस के जंगल को पार करते हुए हनुमान मंदिर पहुँचते हैं। फिर सीधे रास्ते अपने-अपने घर की ओर कूच करते हैं। 
सफर हालाँकि थका देने वाला था, लेकिन आज जितने सवालों के जबाब मिल रहे थे, वे महत्वपूर्ण थे। मन की कई जिज्ञासाएं शांत हो गईं थीं। पहाड़ों के प्रति रूमानी भाव के साथ एक नयी समझ, एक व्यवहारिक अंतर्दृष्टि विकसित हो चुकी थी। 
    ऐसा ही बाद का एक ट्रैकिंग एडवेंचर अपने भाईयों व मित्रों के साथ हमें याद है, अप्रैल या मई माह के दिन थे, जब ऊँचाईयों में हल्की बर्फ जमीं थी। इस टूर में पांडू चूली के पास बर्फ में भालू के ताजा निशां दिखे थे। इस बार हमारा शेरु कुत्ता भी साथ में था। भालूओं के सामना होने पर इनसे भिड़ने की तैयारी हमारी अधूरी थी, अतः हम सब लोग दबे पाँव बापिस हट गए थे, जो हमारा समझदारी भरा कदम था।
आगे दूंअधड़ा के पास बर्फ इतना अधिक थी कि हम आगे बढ़ने की स्थिति में नहीं थे, बार-बार ढलान में फिसलने का खतरा बढ़ रहा था और इसके साथ यहाँ भी भालूओं के पंजों के ताजा निशां मिल चुके थे और हम बापिस आ गए। लेकिन इस बार हम उबल्दा से मुख्य मार्ग में न उतर कर सीधा भाण्ड पात्थर से होकर माऊट नाग पहुंचते हैं,
इसके संरक्षित क्षेत्र में फूलों से सजे बुग्याल को पार करते हुए नग्गर-बिजली महादेव सड़क पर उतरने के बाद बिजली महादेव तक गए थे। बापसी में हाइणी थाच से होते हुए इस बार अपने पैतृक गाँव गाहर से होकर नीचे उतरे थे। यहाँ से गाँव के दर्शन तो नदारद थे, लेकिन कुल्लू-ढालपुर मैदान के विहंगम दर्शन हो रहे थे और पीछे लग वैली और मंडी साईड की पर्वतश्रृंखाएं दिख रही थीं। गाहर गाँव से हम फिर सेऊवाग गाँव तक पैदल आधा-पौन घंटे में पहुँचे थे। (आज पक्की सड़क बन चुकी है, जिसमें मात्र 10-15 मिनट में सेऊबाग से गाहर गाँव का रास्ता तय हो जाता है)
हर यात्रा हमें पहाड़ों के प्रति और गहराई में उतार रही थी। घरवालों, पड़ोसियों एवं गांव वालों के सवाल के चिरपुरातन प्रश्न का जबाब अब भी हमारे पास नहीं था कि इन पहाड़ों में ऐसा रखा क्या है, जो छुट्टियों में सीधे यहाँ घूमने चल देते हो। लेकिन नियति हमें किसी निर्धारित गन्तव्य की ओर ले जा रही थी। काल के गर्भ में पकती इस खिचड़ी का स्वरुप कुछ वर्षों बाद स्पष्ट होता है, जब अपनी बीटेक की पढ़ाई पूरा करने के बाद हमें मानाली स्थित पर्वतारोहण संस्थान में प्रवेश मिलता है और यहाँ से अनुभवी प्रशिक्षकों के कुशल मार्गदर्शन में एडवेंचर और बेसिक कोर्स करने का सुअवसर मिलता है, जिसकी रोचक, रोमाँचक एवं कहीं-कहीं रोंग्टे खड़े करने वाली दास्ताँ हिमवीरु के अगली पोस्टों में शेयर होती रहेगी, जिसका पहला भाग आप नीचे की पोस्ट में पढ़ सकते हैं।
 
 
वर्तमान ब्लॉग पोस्ट का पहला भाग आप नीचे पढ़ सकते हैं -
 

रविवार, 26 अप्रैल 2020

मेरा गाँव मेरा देश - बचपन का पर्वत प्रेम और ट्रैकिंग एडवेंचर, भाग-1

बीहड़ वन की गोद में विताए वो यादगार रोमाँचक पल
बचपन में जब से होश संभाला, पहाड़ हमेशा मन को रोमाँचित करते रहे और साथ ही गहरी जिज्ञासा के भाव भी जगाते रहे। हमारा घर दो पहाड़ों के बीच फैली 2 से 3 किमी हल्की ढलानदार घाटी में स्थित था। जब भी घर की खिड़कियों या आँगन से झांकते तो दोनों और से गगनचुंबी पर्वतों से घिरा पाते। साथ ही उत्तर और दक्षिण में दोनों ओर फैली 30-40 किमी लम्बी घाटी का आदि अंत भी पर्वतों में ही पाते।
कुल मिलाकर स्वयं को चारों ओर से कितनी ही पर्वत श्रृंखलाओं से घिरा पाते, लेकिन सबसे प्रत्यक्ष थे घर के पूर्व और पश्चिम में खड़े समानान्तर दो आसमान छूते पहाड़, जहाँ से होकर क्रमशः सुबह सूर्य भगवान प्रकट होते और शाम को पर्वत के पीछे छिप जाते। दोनों पहाड़ों को ब्यास नदी की अविरल धारा विभाजित करती, जिसका कलकल निनाद ब्रह्ममुहूर्त में कानों में एक दिव्य अनुभूति के साथ गुंजार करता। हमारा गाँव ब्यास नदी के वायीं ओर मौजूद था, अतः इस साईड के पहाड़ गाँव के लोकजीवन से सीधे जुड़े हुए थे। नदी के उस पार के पहाड़ों से परिचय थोड़ा कम था, क्योंकि वहाँ जाना कम होता।
इन पहाड़ों के उपर क्या है, हमेशा ही बालमन के कौतुहल का विषय रहते। ये पहाड़ तो सीधा आसमाँ को छूते प्रतीत होते हैं, तो क्या वहाँ पहुँचकर सीढ़ियों के सहारे आसमान तक पहुँचा जा सकता है। और फिर बादल घिरने पर तो कितना सारा पानी आसमान से बरसता है, तो क्या वहाँ पर कोई बड़ी सी झील है, जो बरसात में फूट पड़ती है। जो भी हो बचपन की ये जिज्ञासाएं थोड़ा बड़ा होते-होते कुछ समाधान पाने लगीं, जब इन पहाड़ों से विचरण कर आए घर के बड़े-बुजुर्गों की कथा-किवदंतियाँ एवं रोमाँचक गाथाएं सुनने को मिलती। हर श्रवण के साथ इनको प्रत्यक्ष देखने की तमन्ना और बलवती हो जाती। अंततः ऐसा संयोग बना अपने गाँव के वरिष्ठ भाईयों के साथ घूमने का, जो पहले वहाँ अपने मवेशियों के साथ हो आए थे तथा रास्ते से भली भांति परिचित थे। मालूम हो कि हमारे यहाँ तब गैर-दूधारु पालतु मवेशियों को जंगल में ग्वालों की देखरेख में भेजने का चलन था, जो बर्फ पिघलने के बाद अप्रैल से ठण्ड बढ़ने के पहले सितम्बर-अक्टूबर माह तक वहाँ रहते थे।
संभवतः यह अक्टूबर का माह था, सन तो याद नहीं। 1980 के दशक का पूर्वार्ध रहा होगा।
इस यात्रा के साथ हम पहली बार इन पहाड़ों से प्रत्यक्ष परिचय पाने वाले थे. इनसे सीधा साक्षात्कार करने वाले थे, जिनको निहारते-निहारते हम बचपन से किशोरावस्था की दहलीज तक आ पहुँचे थे। घर वालों व गांववासियों का हमेशा ही सबाल रहता था कि इन पहाड़ों में रखा क्या है, जो हमेशा ही इनके बारे में इतने लालायित रहते हो। इनके प्रति अज्ञात से आकर्षण का जवाब तो हमारे पास भी नहीं था, लेकिन कुछ तो बात है इन पहाड़ों में, जो इनको देखने व सोचने भर से हमारा दिल धड़कता था। फिर वर्तमान से असंतुष्ट और सदा अज्ञात को जानने-अन्वेषण करने और नित नए शिखरों के आरोहण का नैसर्गिक जज्बा हिलोरें मार रहा था, जो हर जिज्ञासु इंंसान की फितरत रहती है।
खैर हम अपनी आवश्यक तैयारी के साथ प्रातः तड़के घर से कूच कर जाते हैं। साथ में देशी घी, मक्खन, गुड़, सत्तु, चाबल, दाल, आलू, तेल-मसाला, चाकू, लाठी आदि मार्ग के पाथेय रखते हैं। साथ ही कुछ अखरोट व घर के संग्रहित सेब आदि फल। रास्ते में नाश्ता के लिए परौंठा आदि की व्यवस्था भी नानी अम्मा ने कर रखी थीं। धीरे-धीरे हमारी टोली गाँव के ऊपर पहाड़ की ओर आरोहण शुरु करती है। गाँव की वस्तियाँ, खेत-बगीचे आदि पीछे छूटते जाते हैं। कझोरा नाले से हम शांभल (दारु हल्दी) झाड़ियों से भरे ढलानदार विरान ढलान से होकर उपर चढ़ते हैं, फिर कझोरा नाला पार कर हल्की चढ़ाई बाले रास्ते कोहू (जंगली जैतून) के घने जंगल के बीच सीधा कोहू री धारा स्थान पर पहुंचते हैं, जहाँ चट्टानी विश्राम स्थल पर कोहू का इक्लौता पुराना एवं वृहद पेड़ था। थके राहियों को इसकी शीतल छाया और प्राकृतिक हवा कुछ मिनटों में तरोताजा कर देती। यह एक ऐसा बिंदु था, जहाँ से नीचे घर-गाँव के विहंगम दृश्य़ प्रत्यक्ष थे।
यहां नीचे सीधी गहरी खाईयों में सेऊबाग नाला अदृश्य रुप में बह रहा था, जो नीचे झरने के पास प्रकट होता है। यहाँ पहाड़ के आर-पार इक्का-दुक्का घर ही दिख रहे थे। तरोताजा होकर यहाँ से बायीं ओर खेत की मेड़ के साथ आगे बढ़े, जहाँ जंगली कैक्टस के सफेद फूल हमारा स्वागत कर रहे थे। यहाँ के दायीं ओर नाले की साईड के ढलानदार बुग्याल घास के लिए प्रख्यात हैं। जिनमें कई फुट लम्बी घास उगी रहती। गाँव की महिलाएं इनको काटकर घर ले जाती। मवेशियों के लिए भी यह आदर्श चरागार रहती। लेकिन आगे गहरी खाई के कारण खतरनाक भी था, एक कदम की भी चूक सीधे खाई में समाधी लगा सकती थी।
इसको पार करते ही हम पत्थरों के बने दूसरे विश्राम स्थल थोड़ी पहुंचे। यहाँ से कुछ आगे नए गाँव एवं घाटी के दर्शन होते हैं।
  फाडमेह गाँव सामने था, जो हमारे गाँव से नहीं दिखता। यहाँ थान देवता का मंदिर है, जिनको माथा टेकते हुए हम यहाँ से कोई 1-1.5 किमी की ऊँचाई पर बनोगी गाँव पहुँचते है, जो गिरमल देवता का स्थल है। हमारे घर से यहाँ के प्रत्यक्ष दर्शन हर रोज सुबह-शाम होते, आज हम यहाँ से नीचे अपने घर-गाँव के दर्शन कर रहे थे और यहां से गुजरते हुए गिरमल देवता को रास्ते से ही माथा टेकते हुए आगे बढ़ जाते हैं। अपने बुआ के बेटे पुना भाई साहब के खेत एवं बगीचे में पूरे अधिकार के साथ कुछ भुट्टा और ताजा लाल सेब तोड़कर रास्ते के लिए रख लेते हैं। इस ऊँचाई में सेब अभी पेड़ों में बचे थे, जबकि हमारे गाँव की निचली ऊँचाईयों के पेड़ों में इनके दर्शन दुर्लभ थे। ज्ञात हो कि उस दौर में हमारे गाँव के निचले ईलाके में सेब का व्यवसायिक चलन अपनी प्रारम्भिक अवस्था में था, बस शौकिया तौर पर घर के आस-पास लगाए पेड़ ही सेब से लदे होते थे, जबकि बनोगी गाँव की ऊँचाई में हमारे पुना भाई साहब एक प्रगतिशील बागवान के रुप में पूरा बगीचा तैयार कर चुके थे।
कुछ मिनटों में हम गाँव के ऊपर नरेयंडी स्थल पर पहुँचते हैं, जो देवताओं का पावन स्थल है। फागली (देवताओं का वार्षिक उत्सव) जैसे महत्वपूर्ण कार्यक्रम यहीं सम्पन्न होते हैं। कुछ ही मिनटों में हम सब देवदार के गगनचूंबी वृक्षों के बीच विचरण कर रहे थे। नीचे पनाणी शिला की देवस्थली के दूरदर्शन हो रहे थे और आगे देवदार का घना जंगल। जहाँ थक जाते वहाँ विश्राम के लिए बने चट्टानी चबूतरों पर बैठ जाते और आराम करते।
 रास्ते में भूख काफी तेज लग रही थी, सो रास्ते में ही नाश्ता करते हैं और फिर घने जंगल के बीच आगे बढ़ते हैं। रास्ते में मातन छेत स्थान से गुजरते हैं, जहाँ देवदार के जंगलों के बीच कुछ मैदान सरीखे खेत दिखे, जिनमें बहुतायत में शैयण नाम की झाड़ियाँ लगीं थी, जिनकी मजबूती एवं लचक के कारण इनका प्रयोग रस्सी की भांति लकड़ी के लट्ठों को खींचने या घास को बाँधने में होता है।
इनकी झाड़ियों के बीच अचानक पक्षियों के झुंड की आवाजाही प्रतीत होती है, छोटे बच्चों के साथ पूरा झुंड तेजी से दौड़ता हुआ सामने से गुजरता है। इस फुर्तीले एवं शर्मिले पक्षी को हम पहली बार देख रहे थे, जो जंगल की इस ऊँचाई में ही विचरण करता है व यहाँ इसको कड़ेशा या जंगली मुर्गा (Kalij pheasant) कहते हैं। इसके बाद कुछ जंगल को पार करते ही हम अपने आज के गन्तव्य स्थल रेऊँश पहुँचते हैं, जहाँ वन विभाग का सरकारी विश्राम गृह बना है। यहीं से होकर नग्गर-बिजली महादेव कच्ची सड़क जाती है। विश्राम गृह में तो ताले लटके थे, लेकिन निर्जन होने के चलते इसका खुला बरामदा और स्टोर रुम हमारे लिए रात्रि विश्राम का कामचलाऊ ठिकाना बन गए। चौकीदार को भी इसमें कोई आपत्ति नहीं थी।
यहाँ से नीचे कूल्लू घाटी का विहंगम नजारा दिख रहा था। कुल्लू के पार दशहरे का ढालपुर ग्राऊंड सब यहाँ से दिख रहे थे। यहाँ पर फर-फर कर बहती ठण्डी हवा सफर की गर्मी और थकान को जैसे अपने साथ उड़ा ले रही थी।

इसके दायं, बाँए और पीछे देवदार के घने जंगल थे। साथ ही देवदार, कायल के साथ रई, तोष के जंगल भी यहाँ बहुतायत में दिखे, जिनके पेड़ों की रंगत, पत्तियों के आकार से इनको पहचाना जा सकता है। नए आगंतुक के लिए इन एक समाऩ दिखने वाले गगनचूम्बी वृक्षों में अंतर कर पाना काफी कठिन होता है।
यहाँ जल की धाराएं चारों और बह रही थीं, साथ ही पीछे नल की सुबिधा थी। कुछ पल विश्राम कर, कुछ फल-फूल खाकर हम आसपास सड़क के साथ आगे बढ़ते हैं और इसके दोनों ओर के निर्जन जंगलों को एक्सप्लोअर करते हैं। यहाँ वन विभाग की नर्सरी देखते हैं।
  बाढ़ लगे इसके संरक्षित क्षेत्र से परिचित होते हैं, जो कस्तुरी मृग एवं मोनाल पक्षी के लिए जाना जाता है, हालाँकि हमें इनके दर्शन नहीं हो पाए। गेस्ट हाउस के पीछे फुआल (गड़रिए) अपनी भेड़-बकरियों के साथ आज डेरा जमाए हुए थे। उनसे बकरी का दूध मिलता है और हम भी साथ लाए फल फूल उन्हें देते हैं। इनसे पता चलता है कि इन जंगलों में भालू रहते हैं। इंसान से वे प्रायः दूर ही रहते हैं, मवेशियों का रात में शिकार करते हैं। दिन में प्रायः निर्जन एकांत में विश्राम करते हैं। हमारे लिए यह राहत भरी बात थी।
आज की रात का भोजन साथ लाए सामान के साथ जंगली चूल्हे में तैयार करते हैं, साथ ही दिन भर की रोमाँचक यादों को ताजा करते हैं और कल की प्लानिंग करते हैं तथा भोजनोपरान्त कुछ गप्प-शप के बाद निद्रा देवी की गोद में चले जाते हैं।
अगले दिन बीहड़ वन में ट्रैकिंग के रोमाँचक सफर को अगले भाग में पढ़ सकते हैं, बचपन का पर्वत प्रेम और ट्रैकिंग एडवेंचर, भाग-2 में। (जारी)