सोमवार, 22 नवंबर 2021

हिंदी में यात्रा लेखन की परम्परा एवं इसका महत्व


घुमक्कडी इंसानी फितरत, जन्मजात प्रवृति है और जिज्ञासा उसका नैसर्गिक स्वभाव। दोनों का जब मिलन हो जाता है, तो एक घुम्मकड, खोजी यात्री, अन्वेषक, यायावर, एक्सप्लोअरर जन्म लेता है।

आदि काल से देश व दुनियाँ के हर कौने में ऐसे लोग हुए, जिन्होंने विश्व के चप्प-चप्पे को छान मारा। शायद ही धरती पर कोई क्षेत्र ऐसा हो, जो उसके लिए अगम्य रहा हो। सागर की अतल गहराई, वीहड़ बनों के अगम्य क्षेत्र, रेगिस्तान के विषम विस्तार और बर्फीले प्रदेशों की दुर्गम चोटियाँ और देश-दुनियाँ का कोई क्षेत्र उसकी पहुँच से दूर नहीं।

इन स्थलों के प्राकृतिक सौंदर्य, भौगोलिक विशेषता, सामाजिक ताना-बाना, सांस्कृतिक-आध्यात्मिक विरासत का अनुभव, इनका सांगोपांग वर्णन तो यात्रा साहित्य का सृजन। इससे पाठकों का ज्ञानबर्धन, मनोरंजन व शिक्षण होता है और साथ ही मानवीय समाज, संभ्यता एवं संस्कृति की विकास यात्रा आगे बढ़ती है।

कुछ परिभाषाएं, टिप्पणियाँ –

जब उत्साह एवं उल्लास के भाव से यात्रा, सौंदर्यबोध की दृष्टि से प्रकृति-परिवेश को निहारते व हद्यंगम करते हैं, एक जिज्ञासु की दृष्टि से समाज का अवलोकन और उसकी मुक्तभाव से अभिव्यक्ति, उसे यात्रा साहित्य या यात्रा वृतांत का सृजन होता हैं।

यायावरी या घुमक्कड़ी एक प्रकार का नशा, जिसके चलते वह अधिक समय तक टिक कर बैठ नहीं सकता।

 'जिसने एक बार घुमक्कड़-धर्म अपना लिया, उसे फिर पेंशन कहाँ, उसे फिर विश्राम कहाँ? - किन्नर देश में राहुल सांकृत्यायन   

अज्ञेयजी लिखते हैं - 'यायावर को भटकते चालीस बरस हो गए, किंतु इस बीच न तो वह अपने पैरों तले घास जमने दे सका है, न ठाठ जमा सका है, न क्षितिज को कुछ निकट ला सका है।' ऐसे घुमक्कड़ सृजनशीलों की कलम से यात्रा-साहित्य सहज रुप में नाना रुपों में प्रवाहित होता है, जैसे हिमवान से बहती नाना प्रकार की हिमनदियाँ।

सार रुप में, सरल शब्दों में, यात्रा वृतांत को यात्रा के रोचक, रोमाँचक और ज्ञानबर्धक अनुभवों का सांगोपांग वर्णन कह सकते हैं। जो आपने अनुभव किया, उसको पाठकों के साथ साझा करने का भाव, ताकि वे भी कुछ बैसा ही आनन्द ले सकें। साथ में कुछ ऐसी मूलभूत और नयी जानकारियाँ पा सकें, जो उनकी यात्रा को सरल व सुखद बनाए।

यात्रा साहित्य के प्रकार

चार प्रमुख प्रवृत्तियाँ  

1.वर्णनात्मक अथवा परिचयात्मक, जैसे - राहुल सांकृत्यायन   

2.सामाजिक-स्थिति का प्रस्तुतीकरण, जैसे - डॉ.सत्यनारायण सिन्हा 'आवारे यूरोप की यात्रा'   

3.वैयक्तिक प्रतिक्रिया को व्यक्त करनेवाली, जैसे - मोहन राकेश का 'आखिरी चट्टान तक

4.साहित्यिक, इसे लेखन की सर्वश्रेष्ठ पद्धति कह सकतके हैं, जैसे - अज्ञेय के यात्रा-वृतांत

इसके साथ पाँचवी प्रवृति को जोड़ सकते हैं, जो है –

5. आध्यात्मिक, जैसे आचार्य पं श्रीराम शर्मा आचार्य की रचना – सुनसान के सहचर

 

नामवर सिंह ने यात्रा साहित्य को देसी और मार्गी दो भागों में बांट दिया है।

देसी यात्रा वृतांत की शुरुआत हिंदी लेखन में भारतेंदु से होती हुई नागार्जुन तक आती है। तथा मार्गी परम्परा की शुरुआत अज्ञेय ने की। बाद में इसी परम्परा में मोहन राकेश, सर्वेश्वर दयाल सक्सेना और निर्मल वर्मा आते हैं।

यात्रा लेखन की परम्परा एवं विकास यात्रा -

पौराणिक यात्रा विवरण -

रामायण में राम सहित लक्ष्मण, सीता की वनवास यात्राएं, भाई भरत का राम से मिलन व

हरण हुई सीता माता की खोज की यात्राओं का विवरण

महाभारत में पांडवों के बन गमन से लेकर अज्ञात वास के समय की यात्राओं का विशद विवरण।

कालान्तर में कालिदास एवं वाणभट्ट के संस्कृत साहित्य में यात्रा विवरण मिलते हैं, हालाँकि ये प्रकृति के विवरण प्रधान रहे हैं।

ऐतिहासिक यात्रा विवरण –

विदेशी यात्रियों एवं इतिहासकारों के यात्रा विवरणों, जैसे - अलबरूनी, इब्नबतूता, अमीर खुसरो, हेनसांग, फाह्यान, मर्कोपोलो, सेल्यूकस निकेटर आदि, जिनसे हमें मौर्य काल, गुप्तकाल, मुगल काल, अंगेजी शासन के समय की की सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनैतिक, आर्थिक, भौगोलिक जानकारियाँ मिलती हैं।

हिंदी साहित्य में यात्रा वृतांत की विधिवत शुरुआत – भारतेंदु-युग (19वीं सदी का उत्तरार्द्ध) से मानी जा सकती है। जिसमें वे कविवचन सुधा पत्रिका में हरिद्वार, लखनऊ, जबलपुर, सरयूपार, वैद्यनाथ, जनकपुर आदि की यात्रा पर खड़ी बोली में यात्रा वृतांत लिखते हैं। इसके बाद स्वतंत्रतापूर्व काल में जयशंकर प्रसाद युग में यात्रा वृतांतों में नए आयाम जुड़ते हैं। इस दौरान घुम्मकड़ी के लिए समर्पित पं. राहुल सांकृत्यायन अपनी देश-विदेश के एक छोर से दूसरे छोर एवं आर-पार की साहसिक यात्राएं करते हैं। जिनमें उल्लेखनीय रचनाएं रहीं - मेरी तिब्बत यात्रा’, ‘मेरी लद्दाख यात्रा’, ‘किन्नर देश में’, ‘रूस में 25 मास’, ‘तिब्बत में सवा वर्ष’, ‘मेरी यूरोप यात्रा’, ‘यात्रा के पन्ने’, ‘जापान, ईरान, एशिया के दुर्गम खंडों मेंआदि। 1948 में वे घुम्मकड़ी के लिए मार्गदर्शनक घुम्मकड़ शास्त्रग्रन्थ की रचना करते हैं।

राहुल सांकृत्यायन के बाद अज्ञेयजी यात्रा वृतांत को नए साहित्यिक मुकाम तक पहुँचाते हैं। वे इसे यात्रा संस्मरण कहना अधिक पसंद करते थे। इनके उल्लेखनीय यात्रा संस्मरण रहे भारत भ्रमण को लेकर अरे यायावर रहेगा याद’ (1953) और विदेशी यात्राओं को लेकर एक बूँद सहसा उछली’ (1960)। उनका मानना था कि यात्राएँ न केवल बाहर की जाती हैं बल्कि वे हमारे अंदर की ओर भी की जाती हैं। 

इस क्रम में, उल्लेखनीय यात्रा वृतांत, पं. श्रीरामशर्मा आचार्य की कृति सुनसान के सहचर है, जो यात्रा लेखन में एक नया आयाम जोड़ती है।

1961 में सम्पन्न हिमालय यात्रा का जीवंत चित्रण इसमें मिलता है, जिसमें प्रकृति के विराट सौंदर्य के साथ उद्दात जीवन दर्शन पग-पग पर पाठकों को आलोकित करता है। बाहर के साथ अन्दर की यात्रा का भी सुन्दर, विलक्षण एवं प्रेरक प्रस्तुतीकरण मिलता है।

इसके साथ आज़ादी के बाद हिंदी साहित्य में उल्लेखनीय यात्रा-साहित्य का सृजन होता है, जिसमें मोहन राकेश तथा निर्मल वर्मा जैसे रचनाकार नए आयाम जोड़ते हैं। 

 

यात्रा लेखन के महत्व (Importance of travel writing)

0 जिज्ञासा को शाँत करे, ज्ञान का विस्तार करे, दिलो-दिमाग के कपाट को खोले और व्यक्ति को एक अधिक जिम्मेदार, ज्ञानवान, संवेदनशील, काँफिडेंट, मजबूत और संजीदा इंसान बनाए।

 

1 ऐतिहासिक डॉक्यूमेंटेशन, एक ऐतिहासिक, सांस्कृतिक एवं साहित्यिक धरोहर।

makes a place immortal, creating a history...Exploring the unexplored….

 

2 एक सांस्कृतिक सेतु,

promote cultural tourism...Intercultural communication…

 

3 मानवीय सम्बन्धों को सशक्त करे,

fostering human connection with one other

 

4 मानसिक स्वास्थ्य एवं प्रसन्नता का आधार

important for human happiness and mental health

 

5 स्वयं से कन्नेकट होते हैं, दूसरों से जुड़ते हैं, जीवन के प्रवाह से जुड़ते हैं। एक आध्यात्मिक अनुभवSpiritual benefits, refreshing experience

 

6 साथ में जब यात्रा अनुभवों को लिखते हैं, तो सृजन का आनन्द,

Creative adventure

 

7 दूसरों के कुछ काम की जानकारियाँ साँझा करने की संतुष्टि, 

Satisfaction of adding value in others life

 

8 आर्थिक लाभ, एक स्वरोजगार का माध्यम।

Economic benefits, a means of self employment as a -

1फ्री लांसर Freelancer (अखबार, मैगजीन, वेबपोर्टल)

2यात्रा ब्लॉगर Travel blogger.

3पुस्तक लेखक Travel Book…

 

9 उपर दिए पहलुओं के साथ जीवन में परिपूर्णता का अहसास, Sense of fulfillment.

शुक्रवार, 29 अक्तूबर 2021

शांघड़ - सैंज घाटी का छिपा नगीना

 

शांग्चुल महादेव के पावन धाम में


शांघड़ सैंज घाटी के एक गुमनाम से कौने में प्रकृति की गोद में बसा एक अद्भुत गाँव है, जिसकी सैंज घाटी में प्रवेश करने पर शायद ही कोई कल्पना कर पाए। इसके नैसर्गिक सौंदर्य को शब्दों में वर्णन करना हमारे लिए संभव नहीं, इसे तो वहाँ जाकर ही अनुभव किया जा सकता है।

शांघड़ देवदार के गगनचुम्बी वृक्षों से घिरा 228 बीघे में फैला घास की मखमली चादर ओढ़े ढलानदार मैदान है, जिसे देवसंरक्षित माना जाता है, क्योंकि यहाँ पर शांग्चुल महादेव का शासन चलता है। किसी को इस क्षेत्र में अवाँछनीय गतिविधियों की इजाजत नहीं। यहाँ के परिसर में किसी तरह की अपवित्रता न फैले, इसके लिए यहाँ कायदे-कानून बने हुए हैं। कोई यहाँ शोर नहीं कर सकता, शराब व नशा नहीं कर सकता, मैदान तक बाहन का प्रवेश वर्जित है। यहाँ तक कि पुलिस अपनी बर्दी व चमड़े की बेल्ट के साथ प्रवेश नहीं कर सकती। नियमों के उल्लंघन पर शांग्चुल महादेव की ओर से दण्ड का विधान भी है। इस तरह दैवीय विधान द्वारा संरक्षित शांघड़ प्रकृति का एक नायाव तौफा है, जिसके आगोश में कोई भी प्रकृति प्रेमी गहनतम शांति व आनन्द की अनुभूति पाता है और यहाँ बारम्बार आने व लम्बे अन्तराल तक रुकने के लिए प्रेरित होता है।

अक्टूबर माह में हमारी यहाँ की पहली यात्रा का संयोग बनता है, कह सकते हैं कि बाबा का बुलावा आ गया था, क्योंकि कार्य़क्रम यकायक बन गया था। इस स्थान के बारे में पहले काफी कुछ सुन व देख चुके थे, लेकिन प्रत्यक्ष दर्शन शेष थे। कल्पना के आधार पर एक मोटा-मोटा अक्स बन चुका था, जो प्रत्यक्ष दर्शन के बाद कहीं टिक नहीं पाया। यहाँ के प्राकृतिक सौंदर्य में प्रवेश करते ही मन किसी दूसरे लोक में विचरण की अनुभूतियों के साथ आनन्द से सरावोर हो उठा।

घर से निकलते ही कुछ मिनटों में कुल्लू लेफ्ट बैंक से होकर यात्रा आगे बढ़ती है। बिजली महादेव के नीचे जिया पुल से होकर पार्वती नदी पार करते हुए नवनिर्मित भुंतर – बजौरा फोरलेन बाईपास से आगे बढ़ते हैं। फिर ब्यास नदी को पार करते हुए बजौरा से होकर राईट बैंक से नगवाईं, पनारसा होते हुए ओउट टन्नल को पार करते हैं। इसके बाहर वायें मुड़ते हैं और लारजी के छोटे बाँध को पार करते हुए सैंज घाटी में प्रवेश करते हैं। रास्ते में सैंज नदी और तीर्थन नदी का संगम दिखता है, जिसके आगे पुल पार करते ही दायीं सड़क बंजार की ओर जाती है, जो आगे तीर्थन घाटी से लेकर जलोड़ी पास तक पहुँचाती है, लेकिन हम वाईँ ओर मुड़कर सैंज घाटी में प्रवेश करते हैं।

यह हमारी सैंज घाटी की पहली यात्रा थी, सो इस यात्रा के प्रति उत्सुक्तता और रोमाँच के भाव स्वाभाविक थे। साथ में अपने भतीजे के फेवरेट चिप्स, कुरकुरे व फ्रूट जूस के संग आंशिक भूख की तृप्ति करते हुए यात्रा का आनन्द लेते रहे। सैंज नदी के किनारे कई झरने व जल स्रोत मिले। इस घाटी में विद्युत परियोजनाओं के दर्शन कदम-कदम पर होते गए। पता चला कि मणिकर्ण घाटी में वरशैणी के पास चल रहे हाइडेल प्रोजेक्ट से जल सुरंग के माध्यम से इस घाटी में जल पहुँचता है और इसके संग कई स्थानों पर विद्युत उत्पादन का कार्य चल रहा है, जिनके दिग्दर्शन मार्ग में कई स्थानों पर होते रहे।

रास्ते भर कहीं पहाड़ीं की गोद में, तो कहीं पहाड़ों के शिखर पर, तो कहीं जैसे बीच हवा में टंगे गाँव दिखे। कई गाँवों तक पहाड़ काटकर जिगजैग सड़कों को जाते देखा, तो कुछ लगा अभी भी नितांत एकांतिक शांति में बसे हुए हैं। 


देखकर आश्चर्य होता रहा कि लोग कितना दूर व दुर्गम क्षेत्रों में बसे हैं और ये कभी किन परिस्थितियों में ऐसे दुर्गम स्थलों में बसकर घर-गाँव तैयार किए होंगे। ये स्वयं में एक शोध की विषय वस्तु लगी, जो कभी इनके बीच रहकर अनावृत की जा सकती है।

इस संकरी घाटी के अंत में रोपा स्थान से एक सड़क दायीं ओर मुड़कर आगे बढ़ती है, जहाँ साईन बोर्ड देखकर पता चला कि यहाँ से शांघड़ मेहज 6 किमी दूर रह गया है। अब आगे की सड़क चढ़ाई भरी एवं मोड़दार निकली। क्रमशः ऊँचाई के साथ प्राकृतिक सौंदर्य़ में भी निखार आता जा रहा था। सामने घाटी में आबाद गाँव की एकाँतिक स्थिति मन में रुमानी भाव जगाती रही, कि यहाँ के लोग कितने सौभाग्यशाली हैं, जो इतने एकाँत-शांत स्थल में रहने का सौभाग्य सुख पा रहे हैं।

देवदार के पेड़ हिमालयन ऊँचाईयों में प्रवेश का पावन अहसास दिला रहे थे। कुछ ही वाहन रास्ते में मिले जो शांघड़ से बापिस आ रहे थे। राह में देसी नस्ल के नंदी व गाय देखने को मिले। लगा इस इलाके में अभी कृषि-गौपाल की देसी परम्परा कायम है। ऐसे में सड़क के किनारे चरती भेड़-बकरियों को देखकर कोई आश्चर्य नहीं हुआ। थोड़ी ही देर में साईन बोर्ड व देवदार के जंगलों से घिरी घाटी को देखकर अहसास हो चला कि हम मंजिल के करीव पहुँच गए हैं। कुछ दुकानों को पार करते हुए हम एक खाली स्थान पर गाड़ी पार्क करते हैं और शांघड़ मैदान की ओर चल देते हैं।


रास्ते में शाग्चुल महादेव की कमेटी द्वारा टंगे बोर्ड में इस पावन स्थल से जुड़े नियमों को पढ़ा। सो हम इसकी पावनता का ध्यान रखते हुए आगे कदम बढ़ाते हैं। इस बुग्यालनुमा मैदान का विहंगम दृश्य विस्मित करता है और इसके चारों ओर देवदार के गगनचुम्बी वृक्षों तथा इनके पीछे कई पर्वतश्रृंखलाओं के दिग्दर्शन रोमाँचित करते हैं। इस आलौकिक सौंदर्य को एक जगह बैठकर निहारते रहे। सामने ढलानदार बुग्याल, इसमें चरती गाय, भेड़-बकरियों के झुण्ड। इसके पार एक काष्ट मंदिर, जो शिव को समर्पित है। यहाँ से फिर हम नीचे स्लेटों से जड़ी पैदल पगडंडी तक पहुँचते हैं और इसके संग शांग्चुल महादेव के नवनिर्मित मंदिर की ओर बढ़ते हैं, जो शांघड़ गाँव में लगभग 5-700 दूरी पर बसा है।

5-7 मंजिले इस मंदिर की भव्य उपस्थिति दूर से ही ध्यान आकर्षित करती है, जो क्रमशः पास आने पर और निखर रही थी। मैदान को पार करने के बाद हम खेतों के बीच बनी पगडंडियों के साथ आगे बढ़ रहे थे। सड़क के दोनों ओर राजमां, मक्की, चौलाई जैसी यहाँ की पारम्परिक फसलें पकती दिखीं, जिनका कहीं-कहीं पर कटान भी चल रहा था। साथ ही कुछ खेतों में सेब, नाशपति व अन्य फलों के पौधे दिखे।

इस तरह कुछ मिनटों में हम शांग्चुल महादेव के मंदिर परिसर में प्रवेश करते हैँ। गाँव के उस पार निकल कर दूसरी ओर से मंदिर का नजारा निहारते हैं और साथ लाए पुष्प एवं प्रसाद को अंदर शिवमंदिर में चढ़ाकर आशीर्वाद लेते हैं। यहाँ पर 90 वर्षीय बुजुर्ग पुजारी पं. नरोत्तम शर्मा के सर्वकामधुक आशीर्वचनों के साथ कृतार्थ होकर बापिस आते हैं। रास्ते में गाय और बछड़े के साथ मुलाकात हुई, जो खेलने के मूड़ में थे। मंदिर परिसर में चाय-नाश्ता व भोजन आदि की उचित व्यवस्था दिखी। खेतों में साग-सब्जियाँ आदि उगती दिखी, जो घरेलु उपयोग में काम आती होंगी।

गाँव के खेतों को पार करते हुए हम फिर मैदान के बीच पगडंडी पर बढ़ रहे थे। यहाँ घास के मैदान में चर रही गाय, भेड़-बकरियों का दृश्य देखने लायक था। हमें पता चला कि इस मैदान को पाण्डवों ने एक रात में तैयार किया था। अज्ञातवास के दौरान पाण्डवों ने यहाँ कुछ समय विताया था। यहाँ की मिट्टी को छानकर धान की खेती की थी। आश्चर्य़ नहीं कि इसके मैदान में एक भी पत्थर नहीं खोज सकते। देवदार से घिरे इस मैदान को देख खजियार का दृश्य याद आता है। इसके नैसर्गिक सौंदर्य के आधार पर इसे मिनी स्विटजरलैंड की संज्ञा दें, तो अतिश्योक्ति न होगी। बल्कि इससे जुड़ी दैवी आस्था व पौराणिक महत्व के आधार पर यह श्रद्धालुओं व प्रकृति प्रेमियों के लिए एक सिद्ध तीर्थ स्थल है, जहाँ माना जाता है कि आपके सच्चे मन से की गई हर मनोकामना पूर्ण होती है।

यहाँ पर कुछ क्वालिटी समय बिताने के पश्चात अपने बाहन में बापिसी का सफर तय होता है। अचानक बना आज का ट्रिप हालाँकि एक ट्रैलर जैसा लगा। पूरी फिल्म तो आगे कभी खुला समय निकालकर यहाँ कुछ दिन बिताकर ही पूरा होगी। शाम को सामने के पहाड़ों से सूर्यास्त के नजारे के बीच हम नीचे रोपा तक उतरते हैं और आगे सैंज घाटी से होते हुए लारजी-आउट पहुँचते हैं और फिर बजौरा-भुन्तर होते हुए जिया पुल से पार्वती नदी को पार कर अपने गन्तव्य स्थल तक पहुँचते हैं।

समय अभाव के कारण यह टूर हमें अधूरा ही प्रतीत हुआ। लेकिन यहाँ की सुखद स्मृतियों का खुमार कई दिनों तक सर चढ़कर बोलता रहा। देखते हैं अब बाबा का अगला बुलावा कब आता है, जब इस यात्रा की पूर्णाहुति विधान के साथ पूरा कर पाते हैं। जो भी हो अकूत सौंदर्य व शांति को सेमेटे शांघड़ सैंज घाटी का एक छिपा नगीना है, प्रकृति का विशिष्ट उपहार है, जो हर खोजी यात्री व प्रकृति प्रेमी के लिए किसी वरदान से कम नहीं और आस्थावान के लिए एक प्रत्यक्ष तीर्थ। यदि आप कुल्लू-मानाली की ओर आते हैं, तो एक वार अवश्य इस डेस्टिनेशन को आजमा सकते हैं।

यहाँ आने के लिए बस, टैक्सी आदि की समुचित व्यवस्था है। शांघड़ कुल्लू से लगभग 60 किमी, भूंतर हवाई अड्डे से 45 किमी तथा समीपस्थ रेल्वे स्टेशन बैजनाथ से 117 किमी की दूरी पर है। कुल्लू से यहाँ के लिए बस और टैक्सी सुविधा उपलब्ध रहती है। बाकि चण्डीगढ़ से यहाँ के लिए मण्डी से होकर आया जा सकता है, शिमला से जलोड़ी पास या मण्डी से होकर सैंजघाटी में प्रवेश किया जा सकता है।

गुरुवार, 28 अक्तूबर 2021

ग्रीन एप्पल के गुण हजार

 

विदेशों में लोकप्रिय किंतु भारत में उपेक्षित हरा सेब



सेब विश्व का एक लोकप्रिय फल है, जो अमूनन ठण्डे और बर्फीले इलाकों में उगाया जाता है। हालाँकि अब तो इसकी गर्म इलाकों में उगाई जाने वाली किस्में भी तैयार हो रही हैं, लेकिन ठण्डे इलाकों में तैयार सेब का कोई विकल्प नहीं।

सेब में भी यदि भारत की बात करें, तो लाल रंग को ही अधिक महत्व दिया जाता है। सेब की मार्केट वैल्यू इसकी रंगत के आधार पर ही तय की जाती है और खरीदने वाले भी लाल रंग को ही तबज्जो देते हैं। ग्राहकों व मार्केट की इस माँग को देखते हुए सेब में लाल रंगत को बढ़ाने के लिए किसान अपने स्तर पर जुगाड़ भिड़ाते हैं, जिनमें ईथर जैसे रसायनों का छिड़काव भी शामिल है, जिसका चलन स्वास्थ्य की दृष्टि से उचित नहीं।

मालूम हो कि सेब की लाल रंग के अलावा पीली और हरी किस्में भी पाई जाती हैं। अब तो सफेद सेब भी तैयार हो चला है। पीले रंग की किस्म को गोल्ड़न सेब कहते हैं, जो स्वाद में काफी मीठा होता है, लेकिन लाल रंग के अभाव में इसकी भी मार्केट वेल्यू कम ही रहती है, जिसे संतोषजनक नहीं कहा जा सकता। इसी तरह हरे सेब की लोकप्रिय किस्म ग्रेन्नी स्मिथ है, जो स्वाद में खट्टी होती है और समय के साथ इसमें मिठास आना शुरु होती है।


यह विश्व में सबसे लोकप्रिय सेब की वेरायटी में से एक है। हालाँकि यह बात दूसरी है कि सेब की इस किस्म को भारत में बहुत कम लोग जानते हैं, ठेलों पर शायद ही इसके दर्शन होते हों। जबकि अमेरिका में यह सबसे लोकप्रिय सेब की किस्मों में शुमार है, जो अकारण नहीं है। वहाँ लोग सेब के रंग की बजाए इसकी गुणवत्ता को आधार बनाकर प्राथमिकता देते हैं। इस जागरुकता का अभी हमारे देश में अभाव दिखता है।

ग्रीन एप्पल के गुण – ग्रीन एप्पल की शेल्फ लाईफ अधिक होती है अर्थात इसे पेड़ से तोड़ने के बाद 4-5 महिने तक बिना किसी खराबी के सामान्य तापमान (रुम टेम्परेचर) पर स्टोर किया जा सकता है। भारत के पहाड़ी इलाकों में अक्टूबर माह में तुड़ान के बाद इसे मार्च-अप्रैल तक सुरक्षित रखा जा सकता है। साथ ही समय के साथ इस खट्टे सेब में मिठास आना शुरु हो जाती है। अपने खट्ट-मिठ स्वाद के कारण इसके सेवन का अपना ही आनन्द रहता है। साथ ही यह सेब ठोस होता है तथा इसमें भरपूर रस होता है, अतः इससे बेहतरीन जूस तैयार किया जा सकता है। इसकी चट्टनी बनाकर या बेक कर उपयोग किया जा सकता है। अन्य़था दूसरी ओर लाल रंग के सेब की शेल्फ लाईफ कम होने की वजह से इन किस्मों को लम्बे समय तक दुरुस्त रखने के लिए कोल्ड स्टोरेज में रखना पड़ता है, जो छोटे किसानों के बूते की बात नहीं रहती। साथ ही बड़े व्यापारियों द्वारा संरक्षित ऐसे सेब को आम ग्राहक महंगे दाम पर खरीदने के लिए विवश होते हैं।


ग्रीन एप्पल बेस्ट पॉलिनाईजर किस्म की वेरायटी में आता है, जिस कारण सेब के बगीचे में बीच-बीच में इसके पौधे होने से पूरे बगीचे में बेहतरीन परागण होती है और सेब की उम्दा फसल सुनिश्चित होती है। साथ ही ग्रीन एप्पल में फ्लावरिंग शुरु से अंत तक बनी रहती है।

स्वास्थ्य की दृष्टि से हरा सेब एंटी ऑक्सिडेंट गुणों से भरपूर पाया गया है, जो स्वास्थ्य की दृष्टि से अपना महत्व रखता है। बजन कम करने के लिए ग्रीन एप्पल को सबसे प्रभावशाली सेब पाया गया है।


हरे सेब में पेक्टिन नाम का तत्व पाया जाता है, जो आंत के स्वास्थ्यबर्धक बैक्टीरिया के विकास में सहायक होता है। इसमें मौजूद फाईबर पाचन तंत्र को दुरूस्त करता है व कब्ज के उपचार में प्रभावशाली रहता है। हरे सेब में पोटेशियम, विटामिन-के और कैल्शियम प्रचूर मात्रा में रहते हैं, जो हड्डियों को मजबूत करते हैं। इसमें विद्यमान विटामिन-ए आँखों की रोशनी के लिए बहुत लाभकारी रहता है। अपने इन गुणों के आधार पर हरा सेब कॉलेस्ट्रल, शुगर व बीपी के नियंत्रण में मदद करता है व भूख सुधार में सहायक होता है। हरे सेब में विद्यमान फ्लेवोनॉयड्स को फैफड़ों के लिए लाभदायक पाया गया है व यह अस्थमा के जोखिम को कम कर देता है। इसे एक अच्छा ऐंटीएजिंग भी माना जाता है, जो आयुबर्धक है तथा त्वचा का साफ रखता है।

आश्चर्य़ नहीं कि इतने गुणों व विशेषताओं के आधार पर ग्रीन एप्पल विश्व के विकसित देशों में एक लोकप्रिय सेब के रुप में प्रचलित है, जबकि भारत में यह एक उपेक्षित वैरायटी है। न ही आम लोग इससे अधिक परिचित हैं और न ही मार्केट में इसको उचित भाव मिलता है। इसलिए बागवान व किसान भी इसको व्यापक स्तर पर लगाने के लिए प्रेरित व प्रोत्साहित नहीं होते। हालाँकि बड़े शहरों में स्वास्थ्य के प्रति सजग लोगों के बीच बढ़ती जागरुकता के चलते अब बड़ी मंडियों में ग्रीन एप्पल को उत्साहबर्धक भाव मिलना शुरु हो रहे हैं। लेकिन व्यापक स्तर पर इसके प्रति जागरुकता के अभाव में अभी हरे सेब को मुख्यधारा की सेब वैरायटीज में स्थान मिलना शेष है।


बुधवार, 25 अगस्त 2021

अटल टनल – विश्व की सबसे लम्बी सुरंग

 

कुल्लू – मानाली लेफ्ट बैंक से होकर यहाँ तक का सफर

अटल टनल रोहतांग

अटल टनल के बारे में बहुत कुछ पढ़ सुन चुके थे, लेकिन इसको देखने का मौका नहीं मिल पाया था। अगस्त माह के पहले सप्ताह में इसका संयोग बनता है। माता पिता के संग एक साथ घूमने की चिर आकाँक्षित इच्छा भी आज पूरा होने जा रही थी। भाई राजू सारथी के रुप में सपिवार शामिल होते हैं। सभी का यह पहला विजिट था, सो इस यात्रा के प्रति उत्सुक्तता के भाव गहरे थे और यह एक यादगार रोमाँचक यात्रा होने जा रही है, यह सुनिश्चित था।   

इस बीच पूरा हिमाचल कई भूस्खलनों की लोमहर्षक घटनाओं के साथ दहल चुका था। इन्हीं घटनाओं के बीच पिछले सप्ताह से पर्यटकों को ऊँचाईयों से बापिस नीचे भेजा जा रहा था। मानाली में होटलों में मात्र 10 प्रतिशत यात्री शेष थे और नई बुकिंग बंद हो चुकी थीं। इसी बीच जब मानाली साईड बारिश कम होती है, तो एक साफ सुबह हमारा काफिला अटल टनल की ओर निकल पडता है।

ब्यास नदी के संग कुल्लू-मानाली लैफ्ट बैंक रुट
हम कुल्लु से मानाली लेफ्ट बैंक से होकर वाया नग्गर जा रहे थे। मालूम हो कि कुल्लू से मानाली लगभग 45 किमी पड़ता है। यह घाटी दो से चार किमी चौडी है तथा इसके बीचों बीच ब्यास नदी बहती है। जो अपने निर्मल जल के कारण ट्राईट मछलियों के लिए जानी जाती है। इसकी दुधिया एवं तेज धार में राफ्टिंग भी सीजन में खूब होती है, इस समय बरसात के चलते नदी पूरे उफान पर रहती है, अतः इस समय राफ्टिंग की ऑफ सीजन चल रहा था।

ब्यास नदी
कुल्लू से मानाली का प्रचलित मार्ग राईट बैंक से है, जो पतलीकुल्ह-कटराईं से होकर जाता है। लेकिन हम इसके समानान्तर लेफ्ट बैंक से आगे बढ़ रहे थे। एक तो हमारा घर इस ओर पड़ता है, दूसरा इस ओर की घाटी अधिक चौड़ी एवं खुली है। रास्ते के नजारे भी अधिक सुदंर हैं। और इस मार्ग का मध्य बिंदु पड़ती है नग्गर, जो कभी कुल्लू रियासत की राजधानी रहा है।  

नगर से पहले हम कायस, कराड़सु, बनोगी, अरछण्डी, हिरनी, लराँकेलो व घुडदौड़ जैसे पड़ाव से होकर गुजरते हैं। इस समय सड़क के दोनों ओर सेब के बाग लाल लाल सेब से लदे थे। सेब का सीजन लगभग शुरु हो चुका था।

नगर - कुल्लू मानाली का मध्य बिंदु
नगर के बाद छाकी, सरसेई, हरिपुर, गोजरा, जगतसुख, शूरु, पीणी व अलेऊ जैसे पड़ाव पड़ते हैं। इस मार्ग में भी कदम कदम पर बर्फीले पहोड़ों से पिघलकर दनदनाते नाले मिले, जिनके कारण कभी यहाँ की सेर (सीढ़ीनुमा खेतों की विशाल श्रृंखला) धान की फसल के लिए जानी जाती थी, लेकिन आज सेबों का बगीचों से ये खेत अटे पड़े हैं। केबल 10 प्रतिशत खेतों में ही पारम्परिक अन्न उगाए जा रहे हैं।

पारम्परिक खेती का सिकुड़ता दायरा
इस मार्ग में एक और जहाँ देवदार के घने जंगलों से भरे पहाड़ राहभर एक शीतल अहसास दिलाते हैं, वहीं सामने धोलाधार पर्वत श्रृंखलाएं और आगे मानाली साईड़ के पहाड़ राह को हिमालय की वादियों में विचरण का दिव्य अहसास दिलाते हैं। बागवानी एवं पर्य़टन के साथ यहाँ की समृद्ध हो रही आर्थिकी के दर्शन यहाँ के भव्य भवनों, होटलों एवं वाहनों आदि को देखकर सहज ही किए जा सकते हैं। इसमें क्षेत्र के लोगों की दूरदर्शिता एवं अथक श्रम का अपना योगदान रहा है। इस मार्ग में भी राह के ऊपर व नीचे कई ऐतिहासिक एवं पौराणिक स्थल पड़ते हैं, जिनका वर्णन किसी अलग ब्लॉग में करते हैं।

अलेऊ के बाद सफर मानाली के दायीँ और से गुजरता , जो आगे अटल टनल की ओर बढ़ता है। 

मानाली के आगे सोलांग घाटी की ओर
इस राह में बाँहग, नेहरु कुण्ड, कुलंग, पलचान जैसी स्टेश आते हैं, जिसके बाद ब्यास नदी के ऊपर पुल पार करते ही सोलांग वैली में प्रवेश होता है। रास्ते में ही स्कीईँग स्लोप क दर्शन होते हैं, जो बर्फ पड़ने पर पर्टयकों से गुलजार रहती है। इस घाटी का अंतिम गाँव सोलाँग गाँव भी थोड़ी देर में दायीं और अपने दर्शन देता है। और फिर नाले के ऊपर बने पुल को पार करते ही धुँधी के दर्शन होते हैं, जहाँ से रास्ता आगे व्यास कुण्ड की ओर जाता है।

धुंधी - ब्यास कुण्ड की प्रस्थान बिंदु
और यहीं से सड़क रोड़ दायीँ और से आगे बढ़ते हुए अटल टनल पहुँचता है। इस मार्ग की खासियत इसका प्राकृतिक सौंदर्य है और सुन्दर घाटियाँ हैं, जो किसी भी रुप में विश्व की सुन्दरतम घाटियों से कम नहीं। यह क्षेत्र पहले पर्यटकों के लिए दुर्गम था और अटल टनल के लिए मार्ग बनने से इसके अकूत प्राकृतिक सौंदर्य़ संपदा के दर्शन किए जा सकते हैं।

सोलांग घाटी का दिलकश प्राकृतिक सौंदर्य
इसको देखकर, इसे निहार कर मन शीतल हो जाता है, आल्हादित हो जाता है। मन करता है कि इसका प्राकृतिक ताजगी ऐसी ही अक्षुण्ण रहे। ताकि हर पर्य़टकों युगों तक इसकी गोद में आकर इसकी शीतल एवं सुकूनदायी स्पर्श पाकर धन्य हो जाए। हम सबका कर्तव्य बनता है कि इसके संरक्षण में अपना योगदान दें व जब भी ऐसे क्षेत्रों से गुजरें, इसके सौंदर्य, संतुलन व जैव विविधता को बिना किसी नुकसान पहुँचाए यहाँ का आनन्द लें।

सोलांग घाटी की स्कीइंग स्लोप्स - बर्फ के इंतजार में
अटल टनल की विशेषताएं -

·        विश्व की सबसे लम्बी हाई अल्टिच्यूट सुरंग, जो 10,000 फीट की औसतन ऊँचाई लिए हुए है। मानाली की ओर का दक्षिणी छोर लाहौल की ओर का उत्तरी छोर।

·        पीर पंजाल रेंज के नीचे आरपार बनायी गई है।

·        मानाली से 25 किमी दूर।

·        कुल लम्बाई 9.02 किमी

·        इसको भारतीय सेना की विशिष्ट संस्था बोर्डर रोड ऑर्गेनाइजेशन ने बनाया है। इसमें विदेशी कम्पनियों का सहयोग भी मिला है।

·        इसको बनाने में 10 साल लगे और बजट रहा 3500 करोड़ रुपए के लगभग।

·        सुरंग आधुनिकतम सुरक्षा उपकरणों से सुसज्जित है तथा आपातकालीन निकास द्वारों से युक्त है।

आधुनिकतम उपकरणों से सुसज्जित अटल सुरंग

·        इसकी स्पीड़ लिमिट 40 से 60 घण्टे हैं।

·        इसने मानाली-लेह हाईवे की दूरी 45 किमी कम कर दी है, अर्थात् 4 से 5 घण्टे के सफर को कम किया है।

·        लाहौल घाटी के लिए यह सुरंग किसी वरदान से कम नहीं है, जो छः माह सर्दी में भारी बर्फवारी के चलते बाहर की दुनियाँ से कटी रहती थी, क्योंकि रोहताँग दर्रा भारी बर्फ के कारण आबाजाही के लिए बंद रहता था।

अटल टनल के बाहर लाहौल घाटी में प्रवेश

·        पर्यटकों के लिए भी एक वरदान की तरह से है, जो सर्दियों में लाहौल घाटी में बर्फ का आनन्द ले सकते हैं।

·        हाँ, थोड़ा चिंता का विषय भी है, कि पर्यटकों के गैर जिम्मेदाराना रवैये एवं अधिक भीड़ के चलते यहाँ के पर्यावरण, जैवविविधता एवं वातावरण पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।

पुनः पधारने का आमंत्रण देती अटल टनल



रविवार, 25 जुलाई 2021

अपनी गरिमा रहे बर्करार

                                                        गढ़ता चल तू अपना संसार

अपनी गरिमा न गिरने देना,

अपनी गुरुता रखना बर्करार,

ये झलके आपके वाणी - आचरण से,

येही आपके चरित्र के आधार ।1।

 

कोई कैसा व्यवहार कर रहा,

कैसे हैं उसके वाणी आचार,

मत करना अधिक परवाह इनकी,

ये उसकी सम्पत्ति, उसकी इज्जत, उसका संसार ।2।

 

तुम तो रहना संयत जीवन में,

विनम्र, उदात्त और श्रेष्ठ विचार,

रहना विनीत अढिग अपने सत्य पर, 

संग अपनी स्थिरता, शांति और स्वाभिमान ।3।

 

आएंगी अग्नि परीक्षाएं अनगिन,

शुभचिंतकों, भ्रमितों के औचक प्रहार,

स्वागत करना खुले दिल से इनका भी,

रहना हर एडवेंचर के लिए तैयार ।4।

 

यही तो खेल जिंदगी का इस धरा पर,

धारण कर क्षणभंगुर जीवन का सार,

 राह की हर कसौटी पर कसते,

गढ़ता चल तू अपना संसार ।5।