शुक्रवार, 21 दिसंबर 2018

प्रकृति से तालमेल में छिपे समाधान युग के


कुदरत संग दोस्ती से हासिल मंज़िलें

कहावत प्रसिद्ध है कि जितना हम प्रकृति से जुड़ते हैं उतना हम संस्कृति से जुड़ते हैं। जितना हम प्रकृति व संस्कृति से जुड़ते हैं उतना हम अपनी अंतरात्मा से जुड़ते हैं। ऐसे में हमारा संवेदशनशीलता जाग्रत होती है, समाज सेवा सहज रुप में बन पड़ती है। चारों ओर सुख-समृद्धि व शांति का माहौल तैयार होता है, परिवेश में स्वर्गीय परिस्थितियाँ हिलौरें मारती हैं। आज अगर देश-समाज व विश्व में परिस्थितियाँ नारकीय बनी हुई हैं, वातावरण में अशांति, बिक्षुव्धता, दहश्त व घुटन फैली है तो कहीं न कहीं हम प्रकृति व संस्कृति से हमारा अलगाव कारण है। जिसके चलते अंतरात्मा से हमारा सम्बन्ध विच्छेद हो चला है और समाज के प्रति संवेदशनशीलता कुंद पड़ चुकी है।
ऐसे में प्रकृति के दौहन-शौषण का सिलसिला ब्दस्तूर जारी है, जिसके परिणाम हमारे सामने हैं। नदियाँ सूख रही हैं, जलस्रोत्र दूषित हो रहे हैं। गंगा नदी हजारों करोड़ रुपयों के खर्च के बाद भी मैली की मैली पड़ी है। जमुना का पानी गंदे नाले में तबदील हो चुका है। ऐसे ही कितनी ही नदियों का अस्तित्व खतरे में है, कितनी प्रदूषण की मार से दम तोड़ रही हैं। संवेदनहीनता का आलम कुछ ऐसा है कि इन नदियों में डुबकी लगाकर, आचमन कर अपने पाप-संताप हरने का भाव तो करते हैं, लेकिन इनके अस्तित्व से खिलबाड़ करते सीवरेज के गंदे द्रव्य, कारखानों के बिषैले अवशिष्ट, प्लास्टिक कचरे जैसे विजातीय एवं घातक तत्वों को इसमें विसर्जित करने से बाज नहीं आ रहे हैं। जीवन का आधार इन जलस्रोत्रों के प्रति न्यूनतम संवेदनशीलता से हीन ऐसी श्रद्धा-भक्ति समझ से परे है।
जबकि श्रद्धा-भक्ति में तो प्रकृति के घटकों के प्रति सहज रुप में संवेदनशीलता एवं आदर का भाव रहता है, क्योंकि प्रकृति के माध्यम से भक्त ईश्वर को झरता महसूस करता है। ऐसा ही भाव जागा तो बाबा बलवीर सिंह सिचेवाला का जब उन्होंने अपने इलाके में दम तोड़ती नदी काली बेईं को देखा। 

यह वही नदी है जिसकी गोद में सिखधर्म का आदि मंत्र गुरु नानकदेव के मानस में प्रकट हुआ था। लेकिन कालक्रम में मानवीय हस्तक्षेप ने 160 किमी लम्बी इस पावन नदी की दुर्गति कर दी। सीवरेज से लेकर कारखानों का गंदा व विषैला जल इसमें गिरने लगा, जिसके चलते गंदे नाले में तबदील हो गई।  इसकी दुर्दशा ने बाबाजी को झकझोर कर रख दिया था। गुरुग्रंथ साहिव की गुरुवाणी - पवन गुरु, पानी पिता, माता धरत महत, दिवस रात दुई दाई दया, खेलाई सकल जगत  उनका जाग्रत संकल्प बना और नदी को शुद्ध करने का बेड़ा लिया।
जनसहयोग जुटा औऱ तमाम बिरोध एवं विषमताओं के बीच वे इसके कायाकल्प करने में सफल हुए। इस अथक श्रम का नतीजा रहा कि नदि का जल नल के जल से अधिक शुद्ध है। जल जीवन इसमें लहलहा रहा है, इसके किनारे हजारों हरेभरे वृक्ष लहलहा रहे हैं, इसके सुंदर घाट और इसके पावन तट तीर्थ का रुप ले चुके हैं। बाबाजी का कहना है कि आज जरुरत है कुदरत के साथ जुड़ने की, इसके सत्कार करने की। साथ ही दरिया और धरती को हराभरा करने के लिए अधिक से अधिक पेड़ लगाने की। यहि आने वाली पीढ़ी के हमारा सर्वोत्तम उपहार हो सकता है। 
 
इसी तरह एक सेवानिवृत फोजी जब अपने गाँव में महिलाओं को दूर जंगल से घास लाता देखता है, पानी के लिए दूर भटकते देखता है, इससे होने वाले कष्ट पीड़ा से संवेदित होता है, तो वह अपने गाँव के चारों ओर जंगल लगाने की ठान लेता है। इस प्रयास में वर्षों बीत जाते हैं। अकेले दम पर वह एक मिश्रित बन तैयार करता है, इस तरह 10-15 वर्षों के अथक श्रम के बाद जब बन तैयार होता है तो गाँव की समस्याओं का समाधान होने लगता है।
आज इस जंगल में पशुओं के लिए चारा उपलब्ध है। वनीय पशु-पक्षियों का यह बसेरा बना हुआ है, जिसमें इनकी चहक व हलचल एक जीवंत प्राकृतिक परिवेश का अहसास होता है। जल स्रोत रिचार्ज हो चुके हैं, गाँव का झरना बारहों मास झर रहा है, पानी की समस्या का समाधान हो चुका है। साथ ही जड़ी-बूटियों से लेकर कैश क्रोप की खेती के साथ गांववासियों के आर्थिक स्वाबलम्बन का पुख्ता आधार यहाँ तैयार है। 

ग्लोबल वार्मिंग के दौर में मिश्रित वन का यह प्रयोग समाधान की उज्जली किरण के रुप में प्रकाश स्तम्भ की भाँति सामने खड़ा है। इस प्रयोग के लिए जगत सिंह जंगली को उत्तराखण्ड के ग्रीन एम्बेसडर सहित तमाम पुरस्कार मिल चुके हैं, लेकिन वे जंगली उपनाम को ही अपनी पहचान मानते हैं। दूर-दूर से आकर लोग इस अद्भुत प्रयोग को देखने आते हैं और अपने क्षेत्रों में लागू कर रहे हैं। प्रकृति के साथ सामंज्य बिठाकर किस तरह सामाजिक समस्याओं का समाधान किया जा सकता है, यहाँ देखा व समझा जा सकता है।
इसके साथ ही प्रकृति की गोद में जीवन के उच्चतर दर्शन को भी समझा जा सकता है। अमेरिकन दार्शनिक, राजनैतिक विचारक एवं प्रकृतिविद हेनरी डेविड थोरो का जीवन इसका एक जीवंत उदाहरण है। गाँधीजी ने थोरो के सिविल डिसओविडिएंस की अवधारणा को असहयोग आंदोलन के रुप में प्रयोग किया था। जीवन को समग्र रुप से समझने के लिए थोरो मेसाच्यूट्स शहर से सटे कोंकार्ड पहाडियों की गोद में स्थित बाल्डेन सरोवर के किनारे आ बसते हैं। 

दो वर्ष, दो माह और दो दिन वहाँ सरोवर के किनारे कुटिया बनाकर वास करते हैं। खेत में मटर, बीन्स, मक्का, शलजम आदि की खेती करते हैं। कुदाल लेकर एक किसान की भूमिका में अपने लिए आहार तैयार करते हैं। कृषि के साथ ऋषि जीवन जीते हैं। आध्यात्मिक ग्रंथों का स्वाध्याय करते हैं और प्रकृति की गोद में आत्मचितन-मनन के गंभीर पलों को जीते हैं।

बन्य जीवों को अपना सहचर बनाते हैं, झील में नाव के सहारे नौकायान करते हैं, झील की गहराई से लेकर इसके बदलते रंगों का मुआईना कर वैज्ञानिक दस्तावेज तैयार करते हैं। बर्फ पड़ने पर सर्द ऋतुओं में यहाँ के प्रकृति परिवेश की विषम परिस्थियों के बीच पूरी तैयारी के साथ जीवन के रोमाँचक पलों को जीते हैं। यहाँ की सुबह, दोपहरी शाम व रात्रि के पलों की बदलती परिस्थियोँ व मनःस्थिति को बारीकी से निहारते हैं। प्रवास के अनुभवों को वाल्डेन ग्रंथ के रुप में एक कालजयी रचना भावी पीढ़ी को दे जाते हैं।
 
सार रुप में प्रकृति के साथ सामंजस्य में ही जीवन के शांति, सृजन व समाधान के राज छिपे हैं। समाज का कल्याण भी इसी में निहित है। जितना हम प्रकृति से जुड़ेंगे, इसका संरक्षण करेंगे, इससे तालमेल बिठाकर रहेंगे, उतना ही हम इसके वरदानों को अनुभव करेंगे। जितना हम इसका दोहन-शौषण करेंगे, इससे खिलबाड़ करेंगे, उतना ही हमें इसके कोपों को भोगने के लिए तैयार रहना होगा। यह हम आप पर पर निर्भर है कि हम किस रुप में प्रकृति के साथ बरताव करते हैं, इसी में हमारा, समाज व धरती का भविष्य छिपा हुआ है। (दैनिक ट्रिब्यून, चण्डीगढ़, 29जनवरी,2018 को प्रकाशित)

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