सोमवार, 26 नवंबर 2018

स्वाध्याय संदोह - महापुरुषों की साधु संगत


आत्म-कल्याण की भी चिंता की जाए


आत्मिक कल्याण आवश्यक होने के साथ-साथ थोड़ कठिन भी है। कठिन इसलिए कि मनुष्य प्रायः जन्म-जन्म के संस्कार अपने साथ लाता है। ये संस्कार प्रायः भौतिक तथा सांसारिक ही होते हैं। इसका प्रमाण यह है कि जब मनुष्य का देहाभिमान नष्ट हो जाता है तो वह मुक्त हो जाता है। उसे शरीर धारण करने की लाचारी नहीं रहती। चूँकि सभी मनुष्य की अभिव्यक्ति शरीर से हुई, इसलिए यह सिद्ध है कि उसमें अभी शारीरिक संस्कार बने हुए हैं। पूर्व संस्कारों पर विजय पाकर इन्हें आधुनिक रुप में मोड़ लेना-या यों कह लिया जाए कि शारीरिक संस्कारों का आत्मिक संस्कारों से स्थानापन्न कर लेना सहज नहीं होता। संस्कार बड़े प्रबल व शक्तिशाली होते हैं। इन दैहिक संस्कारों को बदलने का सरल सा उपाय यह है कि जिस प्रकार सांसारिक कार्यों और शारीरिक आवश्यकताओं की चिन्ता की जाती है, उसी प्रकार आत्म-कल्याण की चिंता की जाए। जिस प्रकार सांसारिक सफलताओं के लिए निर्धारित एवं सुनियोजित कार्यक्रम बनाकर प्रयत्न तथा पुरुषार्थ किया जाता है, उसी प्रकार मनोयोगपूर्ण आध्यात्मिक कार्यक्रम बनाए और प्रयत्नपूर्वक पूरे किए जाते रहें। इस प्रकार मनुष्य अपने विचारकोण के साथ-साथ पुरुषार्थ की धारा बदल डाले तो निश्चत ही उसके संस्कार परिवर्तित हो जायेंगे और वह शरीर की ओर से मुड़कर आत्मा की ओर चल पड़ेगा।                   - युगऋषि पं. श्रीराम शर्मा आचार्य






अंतस का दीपक जलता रहे


क्या केवल ध्यान के समय ही ईश्वर का चिंतन करना चाहिए और दूसरे समय उन्हें भूले रहना चाहिए। मन का कुछ अंश सदा ईश्वर में लगाए रखना चाहिए। तुमने देखा होगा, दुर्गापूजन के समय देवी के पास एक दीपक जलाना पड़ता है। उसे लगातार जलाए रखा जाता है, कभी बुझने नहीं दिया जाता। उसके बुझ जाने पर गृहस्थ का अमंगल होता है। इसी प्रकार ह्दयकमल में इष्टदेवता को प्रतिष्ठित करने के बाद उनके स्मरण-चिन्तनरुपी दीपक को सदा प्रज्वलित रखना चाहिए। संसार के कामकाज करते हुए बीच-बीच में भीतर की और दृष्टि डालकर देखते रहना चाहिए कि वह दीपक जल रहा है या नहीं।                           -  श्रीरामकृष्ण परमहंस

प्रेम का पथ


आत्मनिरीक्षण का पथ कठिन है। प्रेम का पथ सहज है। शिशु के समान बनो। विश्वास और प्रेम रखो तब तुम्हें कोई हानि नहीं होगी। धीर और आशावान बनो, तब तुम सहज रुप से जीवन की सभी परिस्थितियों का सामना करने में समर्थ हो सकोगे। उदार ह्दय बनो। क्षुद्र अहं और अनुदारता के सभी विचारों को निर्मूल कर दो। पूर्ण विश्वास के साथ स्वयं  को ईश्वर के प्रति समर्पित कर दो। वे तुम्हारी सभी बातों को जानते हैं। उनके ज्ञान पर विश्वास करो। वे कितने पितृतुल्य हैं। सर्वोपरि वे कितने मातृतुल्य हैं। अनन्त प्रभु अपनी अनन्ता में तुम्हारे दुःख के सहभागी हैं। उनकी कृपा असीम है। यदि तुम हजार भूलें करो तो भी प्रभु तुम्हें हजार बार क्षमा करेंगे। यदि दोष भी तुम पर आ पड़े तो वह दोष नहीं रह जाएगा। यदि तुम प्रभु से प्रेम करते हो तो अत्यन्त भयावह अनुभव भी तुम्हें प्रेमास्पद प्रभु के सन्देशवाहक ही प्रतीत होंगे। वस्तुतः प्रेम के द्वारा ही तुम ईश्वर को प्राप्त करोगे। क्या माँ सर्वदा प्रेममयी नहीं होती। वह आत्मा का प्रेमी भी उसी प्रकार है। विश्वास करो। केवल विश्वास करो। फिर तुम्हारे लिए सब कुछ ठीक हो जाएगा। तुमसे जो भूलें हो गई, उनसे भयभीत न होओ। मनुष्य बनो। जीवन का साहसपूर्ण सामना करो। जो भी हो होने दो। तुम शक्तिशाली बनो। स्मरण रखो तुम्हारे पीछे अनन्त शक्ति है। स्वयं ईश्वर तुम्हारे साथ है। फिर तुम्हें किस बात का भय हो सकता है।

-   एफ.जे. अलेक्जेंडर



अंतरात्मा की पुकार और समर्पण भाव




अपने कार्य को आरंभ करने के लिए ऊपर की ज्योति हमसे जो कुछ मांगती है वह है अंतरात्मा की पुकार और मन में सहारे के लिए पर्याप्त बिंदु। ........ आरंभ में विचार अपर्याप्त हो सकता है और होना भी चाहिए। अभीप्सा संकीर्ण और अपूर्ण हो सकती है, श्रद्धा धुंधली-सी हो सकती है क्योंकि वह निश्चित रुप से ज्ञान की चट्टान पर आधारित नहीं होती, इसलिए घटती-बढ़ती, अनिश्चित और आसानी से कम होनेवाली होती है। प्रायः वह बुझ भी सकती है और उसे तुफानी घाटी में मशाल की तरह फिर से कठिनाई के साथ सुलगाना होता है। लेकिन अगर एक बार भीतरी गहराईयों में दृढ़ आत्म-समर्पण हो, यदि अंतरात्मा की पुकार के प्रति जाग्रति आ जाए तो ये अपर्याप्त चीजें भागवत प्रयोजन के लिए पर्याप्त उपकरण बन  सकती हैं। इसलिए बुद्धिमान लोग हमेशा भगवान की ओर के रास्तों को सीमित करने से कतराते रहे हैं, वे उनके प्रवेश के लिए सबसे तंग दरबाजे, सबसे निचली और अंधेरी सुरंग, सबसे निचले दरीचे को भी बंद नहीं करते। कोई भी नाम, रुप, प्रतीक, कोई भी भेंट पर्याप्त मानी जाती है यदि उसके साथ समर्पण-भाव हो, क्योंकि स्वयं भगवान खोज करनेवाले के ह्दय में होते हैं और उसके नैवेद्य को स्वीकार करते हैं।     -श्रीअरविंद
 
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