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शनिवार, 28 फ़रवरी 2026

साधु संग


अन्तरात्मा की आवाज सुनें

अन्तरात्मा के जिज्ञासु को चाहिये कि वह मन के कोलाहल की ओऱ से कान बन्द कर अन्तरात्मा का निर्देश सुनने और पालन करने लगे, निश्चय ही उस दिन से यथार्थ सुख-शांति का अधिकारी बन जायेगा। जिज्ञासा की प्रबलता से मनुष्य के कान उस तन्मयता को सरलता से सिद्ध कर सकता है। आत्मा मनुष्य का सच्चा मित्र है। वह सदैव ही मनुष्य को सत् पथ पर चलने और कुमार्ग से सावधान करने की चेतावनी देता रहता है, किन्तु खेद है कि मनुष्य मन के कोलाहल में खोकर उसकी आवाज नहीं सुन पाता। किन्तु यदि मनुष्य वास्तव में उसकी आवाज सुनना चाहे तो ध्यान देने से उसी प्रकार सुन सकता है, जिस प्रकार बहुत सी आवाजों के बीच भी उत्सुक शिशु अपनी माँ की आवाज सुनकर पहचान लेता है।                      - पं.श्रीराम शर्मा आचार्य


                                समाधि के सोपान

वत्स, प्रभु को पुकारो! सदैव प्रभु को पुकारो!! उनके और केवल उनके विषय में ही विचार करो और वह असीम शक्ति तुम्हारे चारों ओर एकत्र हो जायेगी तथा अनन्त प्रेम तुम्हारा आलिंगन करेगा। तथा प्रभु तुम्हारी आत्मा में अनुभव की वाणी बोलेंगे।

भगवान पर सच्ची निर्भरता सभी कठिनाइयों को दूर कर देती है। व्यक्ति-निर्माण की सच्ची प्रक्रिया परम प्रेम के प्रति पूर्ण समर्पण में है, यह अबाध ध्यान में प्रगट होती है। जब जीवन मिथ्या प्रतीत होता है, जब मृत्यु उपस्थित होती है, जब पीड़ा से हृदय ऐंठता है, तथा मनुष्य का संताप चूड़ान्त हो उठता है, तुम स्मरण रखने की चेष्टा करो, स्मरण रखो कि यह सब बातें शरीर की हैं; तुम आत्मा हो। प्रत्येक दिन को इस प्रकार ग्रहण करो मानो यह जीवन का अंतिम दिन है। जीवन के प्रत्येक क्षण में जप करो। प्रतिदिन अपना जीवन भगवान के चरणों में समर्पित कर दो। उनकी इच्छा की सर्वज्ञता को देखो, और तब बाघ के मुँह में भी, मृत्यु की उपस्थिति में भी, नरकद्वार में भी तुम ईश्वर को प्राप्त करोगे।

और यदि प्रभु का स्मरण ही तुम्हारा जीवन-श्रम हो तो एक महान् आनंद तथा निर्विकार शांति तुम्हें प्राप्त होगी; तथा जो बीभत्स लगता था, वह सुन्दर प्रतीत होगा और जो भयंकर लगता था वह सर्वप्रेममय प्रतीत होगा। और तब उस सन्त के साथ जिसने नाग द्वारा डसे जाने पर कहा था देखो, देखो, मेरे प्रीतम का संदेशवाहक आया है, तुम भी वही कहोगे; या उस सन्त के समान जिसने बाघ के मुँह में भी कहा था, शिवोऽहम् ! शिवोऽहम् ! तुम भी कहोगे, शिवोऽहम् ! शिवोऽहम् ! यही आत्मा की शक्ति है। यही वास्तव में उसका प्रगटीकरण है। यही दिव्यता का भाव है क्योंकि यही दिव्यता का दर्शन है।

मातृभूमि की रक्षा के लिए योद्धा तोप के मुँह में दौड़ जाता है। माँ अपने बच्चे की प्राणरक्षा के लिए अग्नि में दौड़ जाती है, गहरे जल में कूद पड़ती है, बाघ के मुँह में समा जाती है। मित्र अपने मित्र के लिए प्राण दे देता है। संन्यासी अपने आदर्श के लिए सभी प्रकार के कष्ट सहता है। तुम भी सभी प्रकार की कसौटियों को सहो, विपत्तियों का सामना करो, आदर्श का जीवन जीओ तथा ईश्वर के नाम पर निर्भीक बनो। तुम मेरे पुत्र हो। जीवन या मृत्यु में, पुण्य या पाप में, सुख या दुःख में, भले या बुरे में, जहाँ भी तुम जाओ, जहाँ भी तुम रहो, मैं तुम्हारे साथ हूँ। मैं तुम्हारी रक्षा करता हूँ। मैं तुम्हें प्रेम करता हूँ। क्योंकि मैं तुमसे बँधा हुआ हूँ। ईश्वर के प्रति मेरा प्रेम मुझे तुम्हारे साथ एक कर देता है। मैं तुम्हारी रक्षा करता हूँ। मैं तुम्हें प्रेम करता हूँ। मैं तुम्हारी आत्मा हूँ। वत्स ! तुम्हारा हृदय मेरा निवास स्थान है। (पृ.16-17)

अपरिग्रह की संतान बनो। पवित्रता की तीव्र इच्छा जागृत करो! काम कांचन ही सांसारिकता के ताने बाने हैं। इन्हें अपने स्वभाव से निर्मूल कर दो। इनकी सभी प्रवृत्तियों को विषवत् समझो। अपने स्वभाव से सभी मलिनताओं को निकाल फेंको। अपनी आत्मा की सभी अपवित्रताओं को धोकर साफ कर डालो। जीवन जैसा है, उसे उसी रूप में देखो और तब तुम समझ पाओगे कि यह माया है। यह न तो अच्छा है और न ही बुरा। किन्तु यह सर्वथा त्याज्य वस्तु है, क्योंकि यह शरीर तथा शरीरबोध से ही उत्पन्न होता है। अपने उच्च स्वभाव के प्रत्येक शब्द को ध्यान पूर्वक सुनो। अपनी आत्मा के प्रत्येक सन्देश को आग्रहपूर्वक पकड़ो। क्योंकि आध्यात्मिक अवसर एक अत्यन्त विरल सुयोग है तथा जब यह आध्यात्मिक वाणी मन के मौन में प्रवेश करती है उस समय यदि तुम इन्द्रिय-लिप्साओं में व्यस्त रहो और इसे न सुनो तो तुम्हारा व्यक्तित्व उन आदतों के पंजे में पड़ जायेगा जो तुम्हारे विनाश के कारण होंगे।

तुम्हारे लिए मेरा केवल एक ही सन्देश हैः- स्मरण रखो कि तुम आत्मा हो। तुम्हारे पीछे शक्ति है। निष्ठावान होना मुक्त होना है। अपने आध्यात्मिक उत्तराधिकार के प्रति प्रमाणिक रहो, क्योंकि प्रमाणिक होना मुक्त होने के समान है। तुम्हारा प्रत्येक पद आगे बढ़ने की दिशा में ही हो तथा जैसे जैसे तुम जीवन के राजपथ में बढ़ते जाओगे, वैसे वैसे ही तुम अधिकाधिक अपनी स्वतंत्रता का अनुभव करते जाओगे। यदि तुम्हारे पीछे प्रामाणिकता है तो तुम सभी व्यक्तियों का सामना कर सकते हो। स्वयं के प्रति ईमानदार बनो तब तुम्हारे शब्द सत्य की ध्वनि से गुंजित होंगे, तुम अनुभूति की भाषा बोलोगे तथा तुम वह शक्ति प्राप्त करोगे, जो दूसरों को भी पूर्ण बना देगी। (पृ.32)

शनिवार, 27 सितंबर 2025

स्वाध्याय-सतसंग : जीवन साधना पाथेय

 

श्रीमाँ के संग

सहिष्णुता – अध्यवसाय - निष्ठा

सत्यनिष्ठा – पथ प्रदर्शिका, रुपांतरकारिणी शक्ति

प्रेम-भक्ति : ईश्वरीय संभावनाओं का प्रवेश द्वार

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सहिष्णुता – अध्यवसाय - निष्ठा

सहिष्णुता का सबसे स्थूल रुप है अध्यवसाय। जब तक तुम यह निश्चय नहीं कर लेते कि यदि आवश्यकता पड़े तो तुम एक ही चीज को हजार बार फिर से शुरु करोगे, तब तक तुम कहीं नहीं पहुँच सकते। लोग हताश होकर मेरे पास आते हैं और कहते हैं – किंतु मैंने तो सोचा था कि यह काम हो चुका है, और मुझे फिर से शुरु करना पड़ रहा है। और यदि उनसे यह कहा जाता है कि पर यह तो कुछ भी नहीं है, तुम्हें शायद सौ बार, दो सौ बार, हजार बार शुरु करना होगा, तो वे सारा साहस गंवा देते हैं।

तुम एक ढग आगे बढ़ते हो और मान लेते हो कि तुम मजबूत हो गये, परंतु सदा ही कोई-न-कोई ऐसी चीज रहेगी, जो थोड़ा आगे जाने पर वही कठिनाई ले आयेगी। तुम मान लेते हो कि तुमने समस्या हल कर ली है, किंतु, नहीं, वह समस्या तुम्हें फिर से हल करनी होगी, वह जिस रुप में आकर खड़ी होगी, वह देखने में थोड़ा-सा भिन्न होगी, किंतु समस्या ठीक वही-की-वही होगी।

अतएव, कुछ लोग ऐसे होते हैं, जिनको एक सुन्दर अनुभव होता है औऱ वे चिल्ला उठते हैं – अब यह पूरा हो गया। फिर चीजें धीरे-धीरे स्थिर होती हैं, धीमी होने लगती हैं, पर्दे के पीछे चली जाती हैं और अकस्मात कोई बिल्कुल अप्रत्याशित चीज, बिल्कुल ही सामान्य चीज, जो जरा भी दिलचस्प नहीं मालूम होती, उन लोगों के सामने आ खड़ी होती है औऱ मार्ग बंद कर देती है। तब वे रोने-धोने लगते और कहने लगते हैं, मैंने जो प्रगति की, वह किस काम की हुई, यदि मुझे फिर से शुरु करना पड़े, ऐसा क्यों हुआ?  मैंने प्रयास किया, मैं सफल भी हुआ, मैंने कुछ पाया, और अब ऐसा लग रहा है मानो मैंने कुछ भी न किया हो। यह सब बेकार है। इसका कारण यह है कि मैं अभी तक वर्तमान है और इस मैं में सहिष्णुता नहीं है। 

यदि तुममें सहिष्णुता हो तो तुम कहोगे, ठीक है, जब तक आवश्यक होगा, तब तक मैं बार-बार आरंभ करुँगा, आवश्यकता हुई तो हजार बार, दस हजार बार, लाख बार भी आरंभ करुंगा, पर अंत तक जाऊँगा और कोई चीज मुझे मार्ग में रोक नहीं सकती। यह (अध्यवसाय) बहुत ही आवश्यक है।

सहिष्णुता का एक और रुप होता है निष्ठा। निष्ठावान होना। तुमने एक निश्चय किया है और तुम उस निश्चय के प्रति एकनिष्ठ बने रहते हो, यही है सहिष्णुता। यदि तुममें लगन हो तो एक क्षण आयेगा, जब तुम्हें विजय प्राप्त हो जायेगी।

विजय उन्हें ही मिलती है, जिनमें सबसे अधिक लगन होती है।

सत्यनिष्ठा – पथ प्रदर्शिका, रुपांतरकारिणी शक्ति

सच्ची बात यह है कि जब तक तुम्हारे अंदर अहं है, तब तक प्रयत्न करने पर भी तुम पूर्णतया सत्यनिष्ठ नहीं बन सकोगे। तुम्हें अहं को पार कर जाना होगा, अपने-आपको पूर्णतः भागवत इच्छा के हाथों में डालना होगा और दे डालना होगा, बिना कुछ बचाये या हिसाब-किताब लगाये, केवल तभी तुम पूर्णतः सत्यनिष्ठ हो सकते हो, उससे पहले नहीं।

सत्यनिष्ठा ही है सारी सच्ची सिद्धि का आधार। यही साधन है, यही मार्ग है और यही लक्ष्य भी है। तुम निश्चित जानो कि सच्चाई के बिना तुम अनगिनत गलत डग भरोगे और अपने-आपको तथा दूसरों को जो क्षति पहुँचाओगे, उसकी पूर्ति में ही निरंतर तुम्हें लगे रहना होगा।

फिर, सत्यनिष्ठ होने का एक अद्भुत आनन्द होता है, सत्यनिष्ठा की प्रत्येक क्रिया अपना पुरस्कार अपने अंदर लिये रहती है, वह पवित्रता, उत्थान और मुक्ति का भाव जिसे मिथ्यात्व का, चाहे वह एक क्षण ही क्यों न हो, परित्याग करने पर मनुष्य अनुभव करता है। सत्यनिष्ठा ही है निरापदता और संरक्षण, वही है पथ-प्रदर्शिका। अंतिम रुप में फिर वही बन जाती है रुपांतरकारिणी शक्ति।

प्रेम-भक्ति : ईश्वरीय संभावनाओं का प्रवेश द्वार

प्रेम एक परम शक्ति है, जिसे शाश्वत चेतना ने स्वयं अपने अंदर से इस धूमिल और अंधकारच्छन्न जगत् में इसलिये भेजा है कि यह इस जगत और इसकी सत्ताओं को भगवान तक बापिस ले जाए। भौतिक जगत अपने अंधकार और अज्ञान के कारण भगवान् को भूल गया था। प्रेम अंधकार के अंदर उतर आया; वहां जो कुछ सोया पड़ा था सबको जगा दिया; उसने बंद कानों को खोलकर यह संदेश फूंका, “एक ऐसी चीज है, जिसके प्रति जागृत होना चाहिए, जिसके लिए जीना चाहिए, और वह है प्रेम!” और प्रेम के प्रति जागृत होने के साथ-साथ जगत् में प्रविष्ट हुई भगवान की ओर लौट जाने की संभावना। सृष्टि प्रेम के द्वारा भगवान की ओर जाती है और उसके उत्तर में उससे मिलने के लिए नीचे झुक आते हैं भागवत प्रेम औऱ करुणा। जब तक यह आदान-प्रदान नहीं होता, पृथिवी और परात्पर के बीच यह गाढ़ मिलन नहीं होता, भगवान् की ओऱ से सृष्टि के प्रति और सृष्टि की ओर से भगवान् के प्रति यह प्रेम की क्रिया नहीं होती, तब तक प्रेम अपने विशुद्ध सौंदर्य के साथ नहीं विद्यमान रहता, वह अपनी परिपूर्णता की स्वभावगत शक्ति और तीव्र उल्लास को नहीं धारण कर सकता।

प्रेम की यह मानवोचित क्रिया किसी ऐसी चीज को खोजती है, जो उसकी अभी प्राप्त की हुई चीज से भिन्न है, परंतु यह नहीं जानती कि उसे कहां पाया जा सकता है, वह यह भी नहीं जानती कि वह क्या चीज है। जिस क्षण मनुष्य की चेतना भागवत प्रेम के प्रति, जो प्रेम की मानवीय आकारों में होने वाली समस्त अभिव्यक्ति से स्वतंत्र और शुद्ध होता है, जागृत होती है, उस क्षण वह जान जाता है कि उसका ह्दय सब समय वास्तव में किस चीज के लिए लालायित रहा है। यही है आत्मा की अभीप्सा का प्रारम्भ, जिससे चेतना का जागरण होता है और भगवान के साथ एकत्व प्राप्त करने की लालसा उसमें उत्पन्न होती है।

भक्ति

भक्ति मानवीय प्रेम से बहुत ऊँची चीज है, यह आत्मदान का पहला पग है। * भक्ति है प्रेम और आदर-भाव और फिर उसके साथ जुड़ा हुआ है आत्मदान। * एक मात्र भगवान को चाहो। * एकमात्र भगवान को खोजो। * एकमात्र भगवान के साथ आसक्त होओ। * एकमात्र भगवान की पूजा करो। * एकमात्र भगवान की सेवा करो। * तुम्हारा शरीर चाहे जहाँ भी हो, जिसे तुम प्यार करते हो, उसी के पास तुम रहते हो। * तुम्हारा शरीर चाहे जहाँ कहीं भी क्यों न हो, यदि तुम अपने ह्दय में परम प्रभु के ऊपर एकाग्र होओ तो वह बस तुम्हारे साथ ही विद्यमान रहेंगे। * प्रेम संसार का मूलबिंदु है और प्रेम ही उसका लक्ष्य है। * कृतज्ञ होने का अर्थ है भगवान् की इस अद्भुत कृपा-शक्ति को कभी न भूलना, जो प्रत्येक व्यक्ति को, खुद उसके बावजूद, उसके अज्ञान तथा गलतफहमियों के बावजूद, उसके अहंकार तथा उस अहंकार के विरोधों और विद्रोहों के बावजूद, छोटे-से-छोटे रास्ते से उसके दिव्य लक्ष्य तक ले जाती है। * प्रेम ही है गुप्त रहस्य और प्रेम ही है साधन, प्रेम सर्वोच्च विजेता है। * भगवान् उन सबके साथ हैं जो सत्य को प्यार करते हैं और उनकी शक्ति उन्हें विजयी होने में सहायता कर रही है।

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