शनिवार, 30 अगस्त 2025

जब आया बुलावा अयोध्या धाम का, भाग-4

गायत्री शक्तिपीठ अयोध्या में कुछ यादगार पल

निर्माणाधीन, गायत्री शक्तिपीठ अयोध्या

राममंदिर से बाहर निकलकर वाईं ओर मुढ़ते हुए हम हनुमान गढ़ी की ओर बढ़ते हैं। समय बचाने व नया अनुभव लेने के लिए हम विशेष रिक्शा-वाहन में सवार हो जाते हैं, जो कुछ ही मिनट में हमें हनुमान गढ़ी के बाहर सड़क पर उतार देता है। रास्ते भर दोनों ओर बाजार की सजावट देखने लायक थी और तीर्थयात्रियों की चहचाहट पीछे जैसी ही थी। संकरी गलियों को पार करते हुए हम हनुमान गढ़ी मंदिर के सामने पहुँचते हैं। यह एक पहाड़ी टीले की चोटी पर स्थिति मंदिर है, जिसमें प्रवेश के लिए 58 सीढ़ियों को चढ़ना पड़ता है।

हम भी सीढ़ियाँ चढ़ते हुए पंक्ति में लग जाते हैं, अधिक भीड़ नहीं थी। लेकिन लाइन बीच में ठहरी हुई थी। अभी दोपहर के सवा तीन बजे थे। पता चला कि दर्शन चार बजे से होंगे। सो हम वहीं से भाव निवेदन करते हुए बापिस मुड़ जाते हैं, क्योंकि आज का ही दिन हमारे पास शेष था, कुछ घंटे बचे थे, जिसमें इस धर्म नगरी का आवलोकन करना था।

रास्ते में माथे में चंदन व तिलक छाप लगाने वालों की भीड़ लगी थी। इनका चिपकू रवैया थोड़ा असहज करता है, चित्त की शांति व भक्ति भाव की लौ को बिखेर देता है। तीर्थ स्थलों पर इनका जमावड़ा एक तरह से भक्ति दर्शन में व्यवधान ही रहता है। ऊपर से जब माथा पसीने से तर-बतर हो और चेहरे पर गंगा-जमुना बह रही हो तो, तिलक छापा लगाने का कोई औचित्य नहीं लगता। लेकिन इनका अपना धंधा जो ठहरा, सो ये अपनी निष्ठा के साथ लगे रहते हैं, भक्तों की भाव-संवेदना का संदोहन करने। लगा कि इनके उचित नियोजन की आवश्यकता है। मंदिर प्रबन्धन इस दिशा में कुछ कर सकता है। राममंदिर में इस तरह का कोई व्यवधान नहीं था।

यहाँ से आगे बढ़ते हैं, अगला पड़ाव कनक भवन था। यह कितनी दूरी पर स्थित है, पूछने पर स्थानीय लोगों का एक ही उत्तर रहता – बस दो सौ मीटर। कितने दो सौ मीटर निकल गए, लेकिन हर जगह पूछने पर दौ सौ मीटर की ही हौंसला फजाई मिलती रही। यहाँ सड़कें काफी चौड़ी की गई हैं और साफ सूथरी भी। एक तरह से तीर्थ कोरिडोर के तहत लगा पर्याप्त कार्य हुआ है। बीच में साइड में रुकने के उचित स्थल भी दिख रहे थे। पूजन सामग्री से लेकर खान-पान की तमाम दुकानों के साथ मार्केट पूरी तरह से सज्जी हुई थीं। हर दुकान में पेढ़ों के ढेर लगे थे। विविध आकार में, गोल से लेकर चपटे व सिलेंडर आकार के, जो काफी मशहूर माने जाते हैं।

इसी क्रम में कनक महल के गेट से दर्शन होते हैं। यह पिछला गेट था, जहाँ से प्रवेश निशिद्ध था, अतः बाहर से ही दर्शन कर आगे बढ़ते हैं। हम गायत्री शक्तिपीठ की खोज में भी थे, जो पता चला कि ठीक इसके पिछली साइड पड़ता है, सो पीछे मूड़कर एक गली से होकर आगे बढ़ते हैं। कनक भवन के दूसरी ओर के गेट के बाहर भोजन प्रसाद की उत्तम व्यवस्था के विज्ञापन लगे थे। अभी तो सेवा बंद थी। 70 रुपए से 120 रुपए में थाली की व्यवस्था दिख रही थी।

कनक भवन से ठीक आगे किनारे पर गायत्री शक्तिपीठ का प्रवेश द्वार दिखा। इसके व्यवस्थापक बाबा राम केवल यादव से मुलाकात होती है। जिनकी लम्बी-लम्बी शुभ्रवर्णी दाढ़ी और केशों से सजा भव्य व्यक्तित्व विशेष ध्यान आकर्षित कर रहा था। इनके संवाद पर थोड़ी ही देर में अहसास हुआ कि एक गायत्री साधक से संवाद हो रहा है। संवाद के तार कहीं गहरे जुड़ रहे थे। इसी बीच हमारी सेवा में चाय-बिस्कुट आ जाते हैं। पास में ही तीन वरिष्ठ स्वयंसेवक पदाधिकारी अपने आसनों में शोभायमान थे और सभी अपने ऑफिशयल कार्यों में व्यस्त थे।

फिर हम ऊपर कक्ष में आकर थोड़ा विश्राम करते हैं। यहीं व्यवस्थापक महोदय से उनकी व शक्तिपीठ की कहानी का श्रवण करते हैं। जो रोचक ही नहीं रोमाँचक भी थी। हमारे लिए ज्ञानबर्धक भी। स्वयंसेवक माताजी बीच में बेल का शर्वत लेकर आती हैं। संवाद पर बाबाजी एक अद्भुत व्यक्तित्व के व्यक्ति निकले। 1981 से आचार्य़ श्रीरामशर्माजी से इनकी पहली मुलाकात होती है और तभी से मात्र आलू व चना पर निर्वहन कर रहे हैं।

परमपूज्य गुरुदेव द्वारा वर्ष 1981 में यहाँ अयोध्या आगमन हुआ था और उन्हीं के करकमलों द्वारा शक्तिपीठ की नींव पड़ी थी। इस भूमि की कई विशेषताओं की ओर हमारा ध्यान आकर्षित किया और वर्तमान गतिविधिय़ों के प्रति हमारी जिज्ञासाओं का समाधान किया। इसे गायत्री तीर्थ शांतिकुंज का ही एक प्रतिरुप कह सकते हैं, जहाँ नाना प्रकार की गतिविधियाँ संचालित होती हैं। नियमित गायत्री साधना, यज्ञ, संस्कार के साथ यहाँ विभिन्न साधना सत्र, स्वावलम्बन, योग, संगीत, प्राकृतिक चिकित्सा, धर्म विज्ञान, आपदा प्रबन्ध, आओ गढ़ें संस्कारवान पीढ़ी जैसे लोकोपयोगी कार्यक्रमों की भी व्यवस्था है।

इनके संचालन हेतु पांच मंजिला भवन तैयार हो रहा है। इसकी छत से अयोध्या नगरी का विहंगम दृश्य देखने लायक था। सभी तीर्थ स्थल यहाँ से दिख रहे थे। श्रीराममंदिर से लेकर हनुमानगढ़ा और दूर सरयू नदी। जिसका अवलोकन नीचे दिए वीडियो में कर सकते हैं।

शक्तिपीठ परिसर में ही निचले तल पर गायत्री मंदिर, सजल श्रद्धा-प्रखर प्रज्ञा, भटका हुआ देवता और यज्ञशाला स्थापित हैं। बाहर बारिश शुरु हो चुकी थी, लग रहा था जैसे देव अभिसिंचन हमारे ऊपर हो रहा है। बाबा रामकेवलजी से विदाई लेकर हम लोग इस अभिसिंचन का आनन्द लेते हुए हनुमान गढ़ी की ओर बढ़ते हैं। बारिश ओर तेज हो रही थी। सो आज दर्शन की संभावना नहीं थी। मंदिर के बाहर एक दुकान से यहाँ के स्पेशन खुरचन वाले पेढ़े का प्रसाद लेते हैं।

फिर पतली गलियों से बाहर निकलते हुए मुख्य मार्ग पर आते हैं, स्पेशन रिक्शा वाहन में ऑटो स्टेंड पहुँचते हैं। और दूसरे ऑटो से घनौरा चौक। वहाँ से पैदल चलते हुए बापिस अतिथि गृह में पहुँचते हैं। इस तरह आज के अयोध्या धाम में तीर्थस्थलों के यथासंभव दर्शन का क्रम पूरा होता है। कल अवध विश्वविद्यालय में क्राँफ्रेंस में प्रतिभाग लेना था, जिसका हमें बेसव्री से इंतजार था। (इसे भाग2, लखनऊ से अयोध्या और अवध विश्वविद्यालय कैंपस पढ़ सकते हैं)

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