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सोमवार, 31 अगस्त 2026

साधु संग - 4, प्रकाश पथ की चुनौतियाँ और साधना पाथेय

नियति की चुनौती स्वीकार करें

युगऋषि वेदमूर्ति तपोनिष्ठ पं.श्रीराम शर्मा आचार्य

 आगत कठिनाइयों को देखकर निढाल हो बैठना और रोते-कलपते समय गंवाना विपत्ति को दूना करने के समान है। हमें यह मानकर ही चलना पडेगा कि जीवन आरोह-अवरोध के ताने-बाने से बुना गया है। धूप, छाँह की तरह सफलताओं और असफलताओं की उभयपक्षी हलचलें होती ही रहती हैं और होती ही रहेंगी। सर्वथा सुख-सुविधाओं से भरा जीवन क्रम कदाचित् ही कोई जीता है। ज्वार-भाटों की तरह उठाने और गिराने वाली परिस्थितियाँ अपने ढंग से आती और अपनी राह चली जाती हैं। तट पर बैठकर उतार-चढ़ाव का आनंद लेने वाले ही जीवन नाटक के अनुभवी कलाकार कहे जा सकते हैं।

सदा दिन ही बना रहे, रात कभी आये ही नहीं, भला यह कैसे हो सकता है? जन्मोत्सव ही मनाए जाते रहें, मरण का रुदन सुनने को न मिले, यह कैसे संभव है। सुख की घड़ियाँ ही सामने रहें, दुख के दिन कभी न आयें - यह मानकर चलना यथार्थता की ओर से आँखें मूंद लेने के समान है। बुद्धिमान वे हैं जो सुखद परिस्थितियों का समुचित लाभ उठाते हैं और दुख की घड़ी आने पर उसका सामना करने के लिए आवश्यक शौर्य और साधन इकट्ठा करते रहते हैं।

माता भगवती देवी शर्मा

परिस्थितियों की अनुकूलता और प्रतिकूलताओं से इन्कार नहीं किया जा सकता। शारीरिक संकट उठ खड़ा हो, कोई अप्रत्याशित रोग घेर ले यह असंभव नहीं। परिवार के सरल क्रम में से कोई साथी बिछुड़ जाय और शोक-संताप के आँखू बहाने पड़ें, यह भी कोई अनहोनी बात नहीं है। ऐसे दुर्दिन हर परिवार में आते हैं और हर व्यक्ति को कभी न कभी सहन करने पड़ते हैं। मनचाही सफलताएँ किसे मिली हैं। मनोकामनाओं को सदा पूरी करते रहने वाला कल्पवृक्ष किसके आँगन में उगा है? ऐसे तूफान आते ही रहते हैं जो सँजोई हुई साध के घोंसले उड़ाकर कहीं से कहीं फेंक दें और एक-एक तिनका बीनकर बनाए गए उस घरोंदे का अस्तित्व ही आकाश में छितरा दें, ऐसे अवसर पर दुर्बल मनःस्थिति के लोग टूट जाते हैं ।

नियति क्रम से हर वस्तु का, हर व्यक्ति का अवसान होता है। मनोरथ और प्रयास भी सर्वदा सफल कहाँ होते हैं। यह सब अपने ढंग से चलता रहे, पर मनुष्य भीतर से टूटने न पाए इसी में उसका गौरव है। समुद्र तट पर जमी हुई चट्टानें चिर अतीत से अपने स्थान पर जमी-अड़ी बैठी हैं। हिलोरों ने अपना टकराना बंद नहीं किया सो ठीक है, पर यह भी कहाँ गलत है कि चट्टान ने हार नहीं मानी।

न हमें टूटना चाहिए और न हार माननी चाहिए। नियति की चुनौती स्वीकार करना और उससे दो-दो हाथ करना ही मानवी गौरव को स्थिर रख सकने वाला आचरण है। 

            - युगऋषि वेदमूर्ति तपोनिष्ठ पं.श्रीराम शर्मा आचार्य

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सद्विचारों का कारवाँ तथा जीवन्त विश्वास के जल की व्यवस्था

ध्यान की घड़ियों में आत्मा ने स्वयं से कहा-मौन में ही शांति का निवास है। और शांति पाने के लिए तुम्हें बलवान होना आवश्यक है। त्याग की शक्तिशाली निस्तब्धता में जब इन्द्रियों का विक्षोभ डूब जाता है तब मौन आता है। इस संसार-मरुभूमि में तुम पथिक हो। यहाँ न रुकना जिससे कि तुम रास्ते में ही नष्ट न हो जाओ। अपने लिए सद्विचारों का कारवाँ बना लो तथा जीवन्त विश्वास के जल की व्यवस्था कर लो। सभी मृगतृष्णाओं से सावधान रहो। लक्ष्य वहाँ नहीं है। बाह्य आकर्षणों से भ्रमित न होओ। सभी त्याग कर उन पथों से जाओ जो तुम्हें स्वयं तुम्हारी अन्तर्दृष्टि के एकांत में ले जायेंगे। अनेकत्व के जाल में फँस कर उसका अनुसरण न करो। एकत्व के जिस लक्ष्य की ओर संतगण सबसे अलग और अकेले जाते हैं, उसी पथ में तुम भी जाओ। वीर होने का साहस करो। प्रारंभिक प्रयत्नों में ही असत्य को जीतो। विचलित न होओ। पवित्रता में डूब जाओ। एक उन्मत्त छलांग में स्वयं को ईश्वरीय समुद्र में डूबो दो। दिव्यत्व ही लक्ष्य है। 

ओ महान् ज्योतिर्मय की किरण! प्रकृति में तुम्हारे लिए और कोई वस्तु नहीं हो सकती। शीघ्रता करो जिससे कि तुम्हें पश्चाताप न करना पड़े। धार्मिक आंतरिकता और दृढ़ विश्वास के घोड़ों को पकड़ो। यदि आवश्यक हो तो स्वयं को कुचल डालो। किसी भी वस्तु को तुम्हारे रास्ते में बाधक न होने दो। तुम्हारा भाग्य संयोग पर निर्भर नहीं है। निश्चय और आत्मशक्ति के साथ आगे बढ़ो क्योंकि तुम्हारा लक्ष्य सत्य है। वस्तुतः तुम स्वयं ही सत्य हो। मुक्त हो जाओ। मुक्त हो जाओ। आत्मानुभूति की भाषा में बल के समान और कोई महत्त्वपूर्ण शब्द नहीं है। प्रारंभ में, अंत में, सदैव तुम बलवान बनो। स्वर्ग, नरक, देवता, राक्षस किसी से भी न डरते हुए आगे बढ़ो। तुम्हें कोई नहीं जीत सकेगा। ईश्वर स्वयं तुम्हारी सेवा करने को बाध्य है, क्योंकि वह स्वयं तुम्हारे भीतर विराजमान है, जिसके प्रति कि वह आकर्षित है। अतः एकत्व ही अति उदार अन्तर्दृष्टि का सार है, क्योंकि जो तुम्हारे भीतर है, जो तुम हो, वह ईश्वर है। वास्तव में तुम स्वयं ही दिव्य हो।

 – एफ जे अलक्जेन्डर, स्वामी विवेकानन्द के अमेरिकी शिष्य

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साधक सावधान 

शक्ति को व्यर्थ न जाने दो। आत्मशक्ति का अविराम संचय और उसकी सुरक्षा करते रहो। व्यर्थ विवाद, उत्तेजना, आलस्य, त्वरा, जड़ता, उहापोह के द्वारा नष्ट होने वाली शक्ति को बचाना होगा साधक।

वास्तविक विनम्रता का मतलब है, एक च्युतिरहित और निर्भूल भावात्मकता और क्रियात्मकता। अतः आत्म-महत्त्व, आत्म-प्रदर्शन, आत्मपोषण, आत्म-कारुण्य, आत्म-कथन से बचो। सही विनम्रता शक्ति-संरक्षक है। प्रतिक्षण अपनी भौतिक, मानसिक, प्राणिक सभी सीमाओं का अतिक्रमण करते रहो। "नहीं सकता हूँ", से "सकता हूँ" की ओर चलना ही साधना-संतुलन का मूल है।

हम स्वयं ही हमारी सीमा हैं। एक आत्म ज्ञान, एक आत्म शक्ति, एक संचेतना-बीज हमारे भीतर बंद है। उसे लगातार ढूंढते रहो, खोजते रहो । उसका उद्घाटन कर पाना ही जीवन की एक मात्र सफलता है।

अपनी आध्यात्मिक सफलता सिद्धि के सबसे बड़े शत्रु हम स्वयं ही हैं। हमारा ही एक भाग एक भयानक व मरणान्तक विष-क्रीड़ा में लगा रहता है, जो हमारे प्रत्येक ज्ञान-प्रयास के विरुद्ध बक-बक करता रहता है। हमें उठने से रोकता रहता है। हम नहीं सुनते तो अवसाद व विषाद की काली मोटी चादर से हमें सब ओर से लपेट कर हमारी सारी गतियाँ व शक्तियाँ कुंद कर देता है। अतः स्वयं का स्वयं से उद्धार कर साधक। तुझे यह करना ही होगा।

हमारे भीतर की अंध-शक्तियाँ हमारे मन के द्वारा हमसे ही चालाकी व धूर्त्तता करती रहती हैं, कि हम अपनी ज्योतिर्यात्रा को छोड़ दें। इससे बचने का एकमात्र उपाय है हर प्रकार की बाधा और निराशा व असफलता के बावजूद लगे रहना, डटे रहना, बढ़ते रहना।

मनुष्य में यह सामर्थ्य होनी ही चाहिए कि जब चाहे मन के संकल्प-विकल्प व स्व-वार्तालाप को बंद कर सके। प्रकाश की ओर दृष्टि जमाने में यह स्व-वार्तालाप बहुत बड़ी बाधा है। एक साधक को सर्वदा योद्धाभाव में स्थित होना चाहिए। सदा चुस्त, चौकन्ना व सावधान। कहीं से भी, कभी भी, कोई भी प्रहार किया जा सकता है। प्रमाद व गफलत साधक के सबसे महान शत्रु हैं।

साधक को सदा शांत, समाहित व संगठित चित्त रहना चाहिए व अपनी पकड़-साधना विषय से कभी भी हटने देना नहीं चाहिए। - श्री माँ

शनिवार, 27 सितंबर 2025

स्वाध्याय-सतसंग : जीवन साधना पाथेय

 

श्रीमाँ के संग

सहिष्णुता – अध्यवसाय - निष्ठा

सत्यनिष्ठा – पथ प्रदर्शिका, रुपांतरकारिणी शक्ति

प्रेम-भक्ति : ईश्वरीय संभावनाओं का प्रवेश द्वार

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सहिष्णुता – अध्यवसाय - निष्ठा

सहिष्णुता का सबसे स्थूल रुप है अध्यवसाय। जब तक तुम यह निश्चय नहीं कर लेते कि यदि आवश्यकता पड़े तो तुम एक ही चीज को हजार बार फिर से शुरु करोगे, तब तक तुम कहीं नहीं पहुँच सकते। लोग हताश होकर मेरे पास आते हैं और कहते हैं – “किंतु मैंने तो सोचा था कि यह काम हो चुका है, और मुझे फिर से शुरु करना पड़ रहा है।” और यदि उनसे यह कहा जाता है कि पर यह तो कुछ भी नहीं है, तुम्हें शायद सौ बार, दो सौ बार, हजार बार शुरु करना होगा, तो वे सारा साहस गंवा देते हैं।

तुम एक ढग आगे बढ़ते हो और मान लेते हो कि तुम मजबूत हो गये, परंतु सदा ही कोई-न-कोई ऐसी चीज रहेगी, जो थोड़ा आगे जाने पर वही कठिनाई ले आयेगी। तुम मान लेते हो कि तुमने समस्या हल कर ली है, किंतु, नहीं, वह समस्या तुम्हें फिर से हल करनी होगी, वह जिस रुप में आकर खड़ी होगी, वह देखने में थोड़ा-सा भिन्न होगी, किंतु समस्या ठीक वही-की-वही होगी।

अतएव, कुछ लोग ऐसे होते हैं, जिनको एक सुन्दर अनुभव होता है औऱ वे चिल्ला उठते हैं – “अब यह पूरा हो गया।” फिर चीजें धीरे-धीरे स्थिर होती हैं, धीमी होने लगती हैं, पर्दे के पीछे चली जाती हैं और अकस्मात कोई बिल्कुल अप्रत्याशित चीज, बिल्कुल ही सामान्य चीज, जो जरा भी दिलचस्प नहीं मालूम होती, उन लोगों के सामने आ खड़ी होती है औऱ मार्ग बंद कर देती है। तब वे रोने-धोने लगते और कहने लगते हैं, “मैंने जो प्रगति की, वह किस काम की हुई, यदि मुझे फिर से शुरु करना पड़े, ऐसा क्यों हुआ?  मैंने प्रयास किया, मैं सफल भी हुआ, मैंने कुछ पाया, और अब ऐसा लग रहा है मानो मैंने कुछ भी न किया हो। यह सब बेकार है।” इसका कारण यह है कि “मैं” अभी तक वर्तमान है और इस “मैं” में सहिष्णुता नहीं है। 

यदि तुममें सहिष्णुता हो तो तुम कहोगे, “ठीक है, जब तक आवश्यक होगा, तब तक मैं बार-बार आरंभ करुँगा, आवश्यकता हुई तो हजार बार, दस हजार बार, लाख बार भी आरंभ करुंगा, पर अंत तक जाऊँगा और कोई चीज मुझे मार्ग में रोक नहीं सकती।” यह (अध्यवसाय) बहुत ही आवश्यक है।

सहिष्णुता का एक और रुप होता है निष्ठा। निष्ठावान होना। तुमने एक निश्चय किया है और तुम उस निश्चय के प्रति एकनिष्ठ बने रहते हो, यही है सहिष्णुता। यदि तुममें लगन हो तो एक क्षण आयेगा, जब तुम्हें विजय प्राप्त हो जायेगी।

विजय उन्हें ही मिलती है, जिनमें सबसे अधिक लगन होती है।

सत्यनिष्ठा – पथ प्रदर्शिका, रुपांतरकारिणी शक्ति

सच्ची बात यह है कि जब तक तुम्हारे अंदर अहं है, तब तक प्रयत्न करने पर भी तुम पूर्णतया सत्यनिष्ठ नहीं बन सकोगे। तुम्हें अहं को पार कर जाना होगा, अपने-आपको पूर्णतः भागवत इच्छा के हाथों में डालना होगा और दे डालना होगा, बिना कुछ बचाये या हिसाब-किताब लगाये, केवल तभी तुम पूर्णतः सत्यनिष्ठ हो सकते हो, उससे पहले नहीं।

सत्यनिष्ठा ही है सारी सच्ची सिद्धि का आधार। यही साधन है, यही मार्ग है और यही लक्ष्य भी है। तुम निश्चित जानो कि सच्चाई के बिना तुम अनगिनत गलत डग भरोगे और अपने-आपको तथा दूसरों को जो क्षति पहुँचाओगे, उसकी पूर्ति में ही निरंतर तुम्हें लगे रहना होगा।

फिर, सत्यनिष्ठ होने का एक अद्भुत आनन्द होता है, सत्यनिष्ठा की प्रत्येक क्रिया अपना पुरस्कार अपने अंदर लिये रहती है, वह पवित्रता, उत्थान और मुक्ति का भाव जिसे मिथ्यात्व का, चाहे वह एक क्षण ही क्यों न हो, परित्याग करने पर मनुष्य अनुभव करता है। सत्यनिष्ठा ही है निरापदता और संरक्षण, वही है पथ-प्रदर्शिका। अंतिम रुप में फिर वही बन जाती है रुपांतरकारिणी शक्ति।

प्रेम-भक्ति : ईश्वरीय संभावनाओं का प्रवेश द्वार

प्रेम एक परम शक्ति है, जिसे शाश्वत चेतना ने स्वयं अपने अंदर से इस धूमिल और अंधकारच्छन्न जगत् में इसलिये भेजा है कि यह इस जगत और इसकी सत्ताओं को भगवान तक बापिस ले जाए। भौतिक जगत अपने अंधकार और अज्ञान के कारण भगवान् को भूल गया था। प्रेम अंधकार के अंदर उतर आया; वहां जो कुछ सोया पड़ा था सबको जगा दिया; उसने बंद कानों को खोलकर यह संदेश फूंका, “एक ऐसी चीज है, जिसके प्रति जागृत होना चाहिए, जिसके लिए जीना चाहिए, और वह है प्रेम!” और प्रेम के प्रति जागृत होने के साथ-साथ जगत् में प्रविष्ट हुई भगवान की ओर लौट जाने की संभावना। सृष्टि प्रेम के द्वारा भगवान की ओर जाती है और उसके उत्तर में उससे मिलने के लिए नीचे झुक आते हैं भागवत प्रेम औऱ करुणा। जब तक यह आदान-प्रदान नहीं होता, पृथिवी और परात्पर के बीच यह गाढ़ मिलन नहीं होता, भगवान् की ओऱ से सृष्टि के प्रति और सृष्टि की ओर से भगवान् के प्रति यह प्रेम की क्रिया नहीं होती, तब तक प्रेम अपने विशुद्ध सौंदर्य के साथ नहीं विद्यमान रहता, वह अपनी परिपूर्णता की स्वभावगत शक्ति और तीव्र उल्लास को नहीं धारण कर सकता।

प्रेम की यह मानवोचित क्रिया किसी ऐसी चीज को खोजती है, जो उसकी अभी प्राप्त की हुई चीज से भिन्न है, परंतु यह नहीं जानती कि उसे कहां पाया जा सकता है, वह यह भी नहीं जानती कि वह क्या चीज है। जिस क्षण मनुष्य की चेतना भागवत प्रेम के प्रति, जो प्रेम की मानवीय आकारों में होने वाली समस्त अभिव्यक्ति से स्वतंत्र और शुद्ध होता है, जागृत होती है, उस क्षण वह जान जाता है कि उसका ह्दय सब समय वास्तव में किस चीज के लिए लालायित रहा है। यही है आत्मा की अभीप्सा का प्रारम्भ, जिससे चेतना का जागरण होता है और भगवान के साथ एकत्व प्राप्त करने की लालसा उसमें उत्पन्न होती है।

भक्ति

भक्ति मानवीय प्रेम से बहुत ऊँची चीज है, यह आत्मदान का पहला पग है। * भक्ति है प्रेम और आदर-भाव और फिर उसके साथ जुड़ा हुआ है आत्मदान। * एक मात्र भगवान को चाहो। * एकमात्र भगवान को खोजो। * एकमात्र भगवान के साथ आसक्त होओ। * एकमात्र भगवान की पूजा करो। * एकमात्र भगवान की सेवा करो। * तुम्हारा शरीर चाहे जहाँ भी हो, जिसे तुम प्यार करते हो, उसी के पास तुम रहते हो। * तुम्हारा शरीर चाहे जहाँ कहीं भी क्यों न हो, यदि तुम अपने ह्दय में परम प्रभु के ऊपर एकाग्र होओ तो वह बस तुम्हारे साथ ही विद्यमान रहेंगे। * प्रेम संसार का मूलबिंदु है और प्रेम ही उसका लक्ष्य है। * कृतज्ञ होने का अर्थ है भगवान् की इस अद्भुत कृपा-शक्ति को कभी न भूलना, जो प्रत्येक व्यक्ति को, खुद उसके बावजूद, उसके अज्ञान तथा गलतफहमियों के बावजूद, उसके अहंकार तथा उस अहंकार के विरोधों और विद्रोहों के बावजूद, छोटे-से-छोटे रास्ते से उसके दिव्य लक्ष्य तक ले जाती है। * प्रेम ही है गुप्त रहस्य और प्रेम ही है साधन, प्रेम सर्वोच्च विजेता है। * भगवान् उन सबके साथ हैं जो सत्य को प्यार करते हैं और उनकी शक्ति उन्हें विजयी होने में सहायता कर रही है।

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