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शनिवार, 19 सितंबर 2026

पितर हमारे अदृश्य सहायक, भाग-5 (अंतिम किश्त)

                                                                     श्राद्धकर्म का तत्वदर्शन

पितरों के प्रति श्रद्धा-कृतज्ञता की अभिव्यक्ति

भारतीय संस्कृति ने यह तथ्य घोषित किया है कि मृत्यु के साथ जीवन समाप्त नहीं होता। अनन्त जीवन श्रृंखला की एक कड़ी मृत्यु भी है। इसलिए संस्कारों के क्रम में 'जीव' की उस स्थिति को भी बाँधा गया है, जब वह एक जन्म पूरा करके अगले जीवन की ओर उन्मुख होता है। कामना की जाती है कि सम्बन्धित जीवात्मा का अगला जीवन पिछले की अपेक्षा अधिक सुसंस्कारवान् बने। इस निमित्त जो कर्मकाण्ड किए जाते हैं, उनके लाभ जीवात्मा की क्रिया-कर्म करने वालों की श्रद्धा के माध्यम से ही मिलते हैं। इसीलिए मरणोत्तर संस्कार को श्राद्धकर्म भी कहा जाता है।

इस दृश्य संसार में स्थूल शरीर वालों को जिस इन्द्रिय भोग, वासना, तृष्णा एवं अहंकार की पूर्ति में सुख मिलता है, उसी प्रकार पितरों का सूक्ष्म शरीर शुभ कर्मों से उत्पन्न सुगन्ध का रसास्वादन करते हुए तृप्ति अनुभव करता है। उनकी प्रसन्नता तथा आकांक्षा का केन्द्र बिन्दु श्रद्धा है। श्रद्धा भरे वातावरण के सानिध्य में पितर अपनी अशान्ति खोकर आनन्द का अनुभव करते हैं। श्रद्धा ही उनकी भूख है, इसी से उन्हें तृप्ति होती है। इसलिए पितरों की प्रसन्नता के लिए श्राद्ध एवं तर्पण किए जाते हैं। 

मुक्त आत्माओं और पितरों के प्रति मनुष्यों को वैसा ही श्रद्धाभाव दृढ़ रखना चाहिए, जैसा देवों-प्रजापतियों तथा परमात्म-सत्ता के प्रति। मुक्तों, देवों, प्रजापतियों एवं ब्रह्म को तो मनुष्यों की किसी सहायता की आवश्यकता नहीं होती। किन्तु पितरों को ऐसी आवश्यकता होती है। उन्हें ऐसी सहायता दी जा सके, इसीलिए मनीषी-पूर्वजों ने पितर-पूजन, श्राद्ध-कर्म की परम्परायें प्रचलित की थीं। उनकी सही विधि और उनमें सन्निहित प्रेरणा को जानकर पितरों को सच्ची भावना श्रद्धाञ्जलि अर्पित करने पर वे प्रसन्न पितर बदले में प्रकाश, प्रेरणा, शक्ति और सहयोग देते हैं। पितरों को स्थूल सहायता की नहीं, सूक्ष्म भावात्मक सहायता की ही आवश्यकता होती है। क्योंकि वे सूक्ष्म शरीर में ही अवस्थित होते हैं। इस दृष्टि से मृत्यु के पश्चात् पितृपक्ष में, मृत्यु की तिथि के दिन अथवा पर्व-समारोहों पर श्राद्ध कर्म करने का विधान देव-संस्कृति में है।

श्राद्ध किस तत्त्व पर टिका है? शरीर के नष्ट हो जाने पर भी जीव का अस्तित्व नहीं मिटता। वह सूक्ष्म रूप में हमारे चारों ओर वातावरण में घूमते रहते हैं। जीव का फिर भी अपने परिवार के प्रति कुछ-न-कुछ ममत्व रह जाता है। सूक्ष्म आत्मायें आसानी से सब लोकों से आकर हमारे चारों ओर चक्कर लगाया करती हैं। हमारे विचार और भावनायें इस सूक्ष्म वातावरण में फैलते हैं। इन्हें हम जिस तेजी से बाहर के वातावरण में फेंकते हैं, ये उसी गति से दूर-दूर फैल जाते हैं। अतः श्राद्ध में किए गए पूर्वजों के प्रति हमारे आत्मीय, स‌द्भावना, कृतज्ञता के भाव उन आत्माओं के पास पहुँच जाते हैं। उसे उनसे सुख शान्ति, प्रसन्नता और स्वस्थता मिलती है।

श्राद्ध में हविष्यान्न पिण्डों के द्वारा श्रद्धाभिव्यक्ति की जाती है। ये पिण्ड साधन-दान के प्रतीक होते हैं। स्वर्गस्थ आत्माओं की तृप्ति के लिए तर्पण किया जाता है। जल की एक अञ्जलि भरकर कृतज्ञता के भाव से भरकर हम स्वर्गीय पितृ-देवताओं के चरणों में उसे अर्पित कर देते हैं। इस प्रकार श्रद्धा, प्रेम, कृतज्ञता, अभिनन्दन सभी का मिश्रित रूप श्राद्ध है।

योगवासिष्ठ के अनुसार मरने के समय प्रत्येक जीव मूर्छा का अनुभव करता है। वह मुर्छा महाप्रलय की रात्रि के समान होती है। उसके उपरान्त प्रत्येक व्यक्ति स्वयं ही अपने स्वप्न और संकल्प के अनुसार अपने परलोक की सृष्टि करता है, यह बात इन श्लोकों में कही गयी है-

मरणादिमयी मूर्च्छा प्रत्येकेनानुभूयते। यैषा तां विद्धि सुमते महाप्रलययामिनीम्।। तदन्ते तनुते सर्ग सर्व एव पृथक् पृथक्। सहज स्वप्नसंकल्पान्संभ्रमाचल नृत्यवत्।। - योगवासिष्ठ ३।४०।३१ व ३२

इसी सन्दर्भ में आगे बताया गया है कि- स्ववासनानुसारेण प्रेता एतां व्यवस्थितम्। मूर्छान्तेऽनुभवन्त्यन्तः क्रमेणैवाक्रमेण च।। - योगवासिष्ठ ३।५५।२६

अर्थात्, प्रेत अपनी-अपनी वासना के अनुसार ही भावनात्मक उतार-चढ़ावों का अनुभव करते हैं। मरे हुए व्यक्ति की प्रेतावस्था में जिन लोगों से आसक्ति जुड़ी रहती है, उनकी भाव संवेदनायें और उनकी परिस्थितियाँ-मनःस्थितियाँ प्रेतों को तीव्रता से प्रभावित करती हैं। पिण्डदान और श्राद्ध कर्म का महत्त्व यही है कि उन क्रियाओं के साथ-साथ जो भावनायें जुड़ी होती हैं, वे प्रेतों-पितरों को स्पर्श करती हैं। इसी प्रकार पितरों के संस्कारों के अनुभव अपने प्रियपात्रों की स्थितियाँ उन्हें आन्दोलित करती हैं।

योगवासिष्ठ में बताया गया है कि मृत्यु के उपरान्त प्रेत यानी मरे हुए जीव अपने बन्धु बान्धवों के पिण्डदान द्वारा ही अपना शरीर बना हुआ अनुभव करते हैं-

आदौ मृता वयमिति बुध्यन्ते तदनुक्रमात्। बंधु पिण्डादिदानेन प्रोत्पन्ना इति वेदिनः।। - योगवासिष्ठ ३।५५।२७

अर्थात्, प्रेत अपनी स्थिति इस प्रकार अनुभव करते हैं कि हम मर गये हैं और अब बन्धुओं के पिण्डदान से हमारा नया शरीर बना है।

स्पष्ट है कि यह अनुभूति भावनात्मक ही होती है। अतः पिण्डदान का वास्तविक महत्त्व उससे जुड़ी भावनाओं के कारण होता है। जिसके प्रति आत्मीयता होती है, उसके भावनात्मक अनुदान से प्रेत प्रभावित होता है। क्योंकि मरणोत्तर जीवन की अनुभूतियाँ वासना और संस्कारों के प्रभाव की ही प्रतिच्छाया होती हैं। इसलिए जिससे आत्मीयता का संस्कार अंकित हो, उसकी भावनायें परलोकस्थ जीव को प्रभावित करती हैं।

गीता के ८ वें अध्याय में कहा गया है- हे अर्जुन! जो अन्त समय में जिन भावों का स्मरण करता हुआ देह छोड़ता है, उन्हीं भावों से अनुप्राणित होकर वैसा ही नया शरीर, नया व्यक्तित्व प्राप्त करता है।

संन्यासी से इसीलिए संन्यास लेते समय उसके श्राद्ध-संस्कार भी उसी के द्वारा करा दिए जाते हैं, कि उसकी कोई भी आकांक्षा आसक्ति सूक्ष्म रूप में भी शेष न रहे।

मरे हुए व्यक्तियों का श्राद्ध-कर्म से कुछ लाभ है कि नहीं? इसके उत्तर में यही कहा जा सकता है कि होता है, अवश्य होता है। संसार एक समुद्र के समान है, जिसमें जलकणों की भाँति हर एक जीव है। विश्व एक शिला है, तो व्यक्ति एक परमाणु। जीवित या मृत आत्मा इस विश्व में मौजूद है और अन्य समस्त आत्माओं से सम्बद्ध है। संसार में कहीं भी अनीति, युद्ध, कष्ट, अनाचार, अत्याचार हो रहे हों, तो सुदूर देशों के निवासियों के मन में भी उद्वेग उत्पन्न होता है। जाडे और गर्मी के मौसम में हर एक वस्तु ठण्डी और गर्म हो जाती है। छोटा सा यज्ञ करने पर भी उसकी दिव्यगन्ध व भावना समस्त संसार के प्राणियों को लाभ पहुँचाती है। इसी प्रकार कृतज्ञता की भावना प्रकट करने के लिए किया हुआ श्राद्ध समस्त प्राणियों में शान्तिमयी स‌द्भावना की लहरें पहुँचाता हैं। यह सूक्ष्म भाव तरंगे तृप्तिकारक और आनन्ददायक होती हैं। सद्भावना की तरंगें जीवित मृत सभी को तृप्त करती हैं, परन्तु अधिकांश भाग उन्हीं को पहुँचता है, जिनके लिये वह श्राद्ध विशेष प्रकार से किया गया है।

शास्त्रों की तर्पण व्यवस्था -

श्राद्ध प्रक्रिया में देव तर्पण, ऋषि तर्पण, दिव्य मानव तर्पण, दिव्य पितृ तर्पण, यम तर्पण, मनुष्य पितृ तर्पण नाम से ६ तर्पण कृत्य किये जाते हैं। इन सबके पीछे भिन्न-भिन्न दार्शनिक पृष्ठभूमि है।

देव तर्पण अर्थात् ईश्वर की उन सभी महान् विभूतियों के प्रति श्रद्धाभिव्यक्ति जो मानव कल्याण हेतु निःस्वार्थ भाव से प्रयत्नरत हैं। वायु, सूर्य, अग्नि, चन्द्र, विद्युत् एवं अवतारी ईश्वर अंशों की मुक्त आत्माएँ इसके अन्तर्गत आती हैं।

ऋषि तर्पण व्यास, वशिष्ठ, याज्ञवल्क्य, कात्यायन, जमदग्नि, अत्रि, गौतम, विश्वामित्र, नारद, चरक, सुश्रुत, पाणिनि, दधीचि आदि ऋषियों के प्रति श्रद्धाभिव्यक्ति के निमित्त किया जाता है।

दिव्य मानव तर्पण अर्थात् उनके प्रति अपनी कृतज्ञता की अभिव्यक्ति, जो लोकमंगल के प्रति समर्पित हो, त्यागी जीवन जिए एवं विश्वमानव के लिये प्राणोत्सर्ग कर गए। 

दिव्य पितृ तर्पण, दिव्य पितर वे, जो कोई बड़ी लोकसेवा तो न कर सके, पर व्यक्तिगत रूप से आदर्शवादी जीवन जी कर अनुकरणीय पवित्र सम्पत्ति अपने पीछे छोड़ गए।

यम तर्पण, यम अर्थात् जन्म मरण का नियंत्रण करने वाली शक्ति। कुमार्ग पर चलने से रोक लगाने वाली विवेक शक्ति ही यम है। इसकी निरन्तर पुष्टि होती रहे, मुत्यु का भाव बना रहे, इसलिये यमतर्पण किया जाता है।

अन्त में मनुष्य पितृ तर्पण की व्यवस्था है। इससे परिवार से सम्बन्धित दिवंगत नर-नारी, पिता, बाबा-परबाबा, माता, दादी, परदादी, पत्नी, पुत्र, पुत्री, चाचा, नाना, परनाना, भाई, बुआ, मौसी, सास-ससुर एवं अन्त में गुरु-पत्नी, शिष्य एवं मित्रगण आते हैं।

इस प्रकार श्राद्ध तर्पण की सार्वभौम व्यवस्था में सारे समुदाय के प्रति कृतज्ञता की अभिव्यक्ति समाहित है। यह मात्र कर्मकाण्ड तक सीमित न रहकर व्यवहार में उतरे, वसुधा एक विराट् परिवार है, इस भावना के रूप में साकार हो, उदार दानशीलता के रूप में लोकमंगल के कार्य बन पड़ें, तो ही इनकी सार्थकता है।

पितृपक्ष का हिन्दू धर्म एवं संस्कृति में विशेष माहात्म्य है। जो पितरों के नाम पर श्राद्ध और पिण्डदान नहीं करता, वह सनातन धर्मी, सच्चा देव संस्कृति का अनुयायी नहीं माना जा सकता। शास्त्र मान्यतानुसार मृत्यु होने पर मनुष्य की जीवात्मा चन्द्रलोक की तरफ जाती व ऊपर उठकर पितृलोक में पहुँचती हैं। उन मृतात्माओं को अपने नियत स्थान तक पहुँचने की शक्ति प्रदान करने-शान्ति देने के निमित्त ही पिण्डदान एवं श्राद्ध का विधान किया गया है। श्रद्धा से श्राद्ध शब्द बना है। श्रद्धापूर्वक किया गया कार्य ही श्राद्ध कहलाता है। श्राद्ध से श्रद्धा जीवित रहती है। हमारे अदृश्य सहायक पितर गण गुरुजनों एवं पूर्वजों के प्रति श्रद्धा प्रकट करने के निमित्त मात्र श्राद्ध-तर्पण के रूप में ही बन पड़ता है। मृत पितरों के प्रति कृतज्ञता के उन भावों का स्थिर रहना हमारी संस्कृति के अनुयाइयों ने वर्ष में पंद्रह दिन का समय पृथक् निकाल लिया है। पितृभक्ति का इससे उज्ज्वल उदाहरण और कहीं देखने को नहीं मिलता है।

यह बात सदैव स्मरण रखना चाहिए कि यदि पितरों को सच्ची श्रद्धा दी जाएगी. उन्हें तृप्त रखा जाएगा तो वे निश्चय ही शक्ति, प्रकाश, प्रेरणा मार्गदर्शन सहयोग व भावनात्मक अनुदान देंगे। पितरों के प्रति व्यक्त की गयी कृतज्ञता उलटे लौटकर बहुगुणित होकर स्वयं पर बरसती है। अपनी मोटी बुद्धि को तार्किक बनाते हुए हमें परोक्ष जगत् के अस्तित्व को श्रद्धा के साथ स्वीकार करना चाहिए तथा वहाँ विद्यमान सहायक आत्माओं से सम्पर्क स्थापित कर उनके अनुदानों से लाभान्वित होना चाहिए। (अंतिम किश्त)

शनिवार, 31 जनवरी 2026

मरणोतर जीवन रहस्य, भाग-3

 

पितर हमारे अदृश्य सहायक-3

अविज्ञात की अनुकम्पा भी अदृश्य सत्ता का ही अनुदान

उपनिषद् के ऋषि का अनुभव है कि आत्मा जिसे वरण करता है उसके सामने अपने रहस्यों को खोलकर रख देता है। इस उक्ति का निष्कर्ष यह है कि रहस्यों का उद्घाटन चेतना की गहराइयों से होता है। मानवी संसार की सामयिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए वह अनुदान इस धरती पर उतारता रहता है। यह अवतरण जिनके माध्यम से होता है, वे सहज ही श्रेयाधिकारी बन जाते हैं।

वैज्ञानिक आविष्कारों का श्रेय यों उन्हें मिलता है जिनके द्वारा वे प्रकाश में आने योग्य बन सकें। किन्तु यहाँ यह विचारणीय है कि क्या उसी एक व्यक्ति ने उस प्रक्रिया को सम्पन्न कर लिया? आविष्कर्ता जिस रूप में अपने प्रयोगों को प्रस्तुत कर सके हैं, उसे प्रारम्भिक ही कहा जा सकता है। सर्वप्रथम प्रदर्शन के लिए जो आविष्कार प्रस्तुत किये गये वे कौतुहलवर्धक तो अवश्य थे, आशा और उत्साह उत्पन्न करने वाले भी पर ऐसे नहीं थे, जो लोकप्रिय हो सकें और सरलतापूर्वक सर्वसाधारण की आवश्यकता पूरी कर सकें। रेल, मोटर, टेलीफोन हवाई जहाज आदि के जो नमूने पंजीकृत कराये गये थे, उनकी स्थिति ऐसी नहीं थी कि उन्हें सार्वजनिक प्रयोग के लिए प्रस्तुत किया जा सके यह स्थिति तो धीरे-धीरे बनी है और उस विकास में न्यूनाधिक उतना ही मनोयोग और श्रम पीछे वालों को भी लगाना पड़ा है जितना कि आविष्कर्ताओं को लगाना पड़ा था।

संसार के महान् आन्दोलन आरम्भिक रूप में बहुत छोटे थे। उनके आरम्भिक स्वरूप को देखते हुए कोई यह अनुमान नहीं लगा सकता था कि कभी इतने सुविस्तृत बनेंगे और संसार की इतनी सेवा कर सकेंगे। किन्तु अविज्ञात ने जहाँ उन आन्दोलनों को जन्म देने वाली प्रेरणा की निर्झरणी का उद्‌गम उभारा, किसी परिष्कृत व्यक्ति के माध्यम से उसे विकसित किया, साथ ही इतनी व्यवस्था और भी बनाई कि उस उत्पादन को अग्रगामी बनाने के लिए सहयोगियों की श्रृंखला बनती बढ़ती चली जाय। ईसा, बुद्ध, गाँधी आदि के महान आन्दोलनों का आरम्भ और अन्त-बीजारोपण और विस्तार देखते हुए लगता है यह श्रेय-साधन किसी अविज्ञात शक्तियों में पितर-सत्ताओं का भी समावेश है।

जिन आविष्कर्ताओं को श्रेय मिला, उन्हें सौभाग्यशाली कहा जा सकता हैं। गहरे मनोयोग के सत्परिणाम क्या हो सकते हैं ? इसका उदाहरण देने के लिए भी उनके नामों का उत्साहवर्धक ढंग से उल्लेख किया जा सकता है। गहराई में उतरने की प्रेरणा भी उस चर्चा से कितनों को ही मिलती है। पर यह भुला न दिया जाना चाहिए कि उन आविष्कारों के आरम्भ के रहस्य प्रकृति ही अपना अन्तराल खोलकर प्रकट करती है। हाँ इतना अवश्य है कि इस प्रकार के रहस्योद्घाटन हर किसी के सामने नहीं होते। प्रकृति को भी पात्रता परखनी पड़ती है। अनुदान और अनुग्रह भी मुफ्त में नहीं लूटे जाते, उन्हें पाने के लिए भी उपयुक्त मनोभूमि तो उस श्रेयाधिकारी को ही विर्निमित करनी पड़ती है।

आविष्कार की चर्चा इतिहास पुस्तकों में जिस प्रकार होती है, वह बहुत पीछे की स्थिति है। आरम्भ कहाँ से होता है यह देखना हो तो पता चलेगा कि उन्हें आवश्यक प्रकाश और संकेत अनायास ही मिला था। इनमें उनकी पूर्व तैयारी नहीं के बराबर थी। दूसरे शब्दों में कहा जाय तो यह भी कह सकते हैं कि उन पर इलहम जैसा उतरा और कुछ बड़ा कर गुजरने के लिए आवश्यक मार्ग दर्शन देकर चला गया। संकेतों को समझने और निर्दिष्ट पथ पर मनोयोगपूर्वक चल पड़ने के लिए तो उन आविष्कर्ताओं की प्रत्तिभा को सराहना ही पड़ेगा।

बात लगभग दो हजार वर्ष पुरानी है। एशिया माइनर के कुछ गड़रिये पहाड़ी पर भेड़े चरा रहे थे। उनकी लाठियों के पेंदे में लोहे की कीलें जड़ी थीं। उधर से गुजरने पर गड़रियों ने देखा कि लाठी पत्थरों से चिपकती है और जोर लगाने पर ही छूटती। पहले तो इसे भूत-प्रेत समझा गया फिर पीछे खोजबीन करने से चुम्बक का विज्ञान यहीं से आरम्भ हुआ। आज तो चुम्बक एक बहुत बड़ी शक्ति की भूमिका निभा रहा है।

यह गड़रिये चुम्बक का आविष्कार करने का उद्देश्य लेकर नहीं निकले थे। और न उनमें इस प्रकार के तथ्यों को ढूँढ निकालने और विश्वव्यापी उपयोग के लायक किसी महत्त्वपूर्ण शक्ति को प्रस्तुत कर सकने की क्षमता थी।

न्यूटन ने ने देखा कि पेड़ से टूटकर सेव का फल जमीन पर गिरा। यह दृश्य देखते सभी रहते हैं, पर न्यूटन ने उस क्रिया पर विशेष ध्ययान दिया और माथापच्ची की कि फल नीचे ही क्यों गिरा, ऊपर क्यों नहीं गया? सोचते-सोचते उसने पृथ्वी की आकर्षण शक्ति का पता लगाया और पीछे सिद्ध किया कि ग्रह-नक्षत्रों को यह गुरुत्वाकर्षण ही परस्पर बाँधे हुए है। इस सिद्धान्त के उपलब्ध होने पर ग्रह विज्ञान की अनेकों प्रक्रियाएँ समझ सकना सरल हो गया।

पेड से फल न्यूटन से पहले किसी के सामने न गिरा हो ऐसी बात नहीं है। असंख्यों ने यह क्रम इन्हीं आँखों से देखा होगा पर किसी अविज्ञात ने अकारण ही उसके कान में गुरुत्त्वाकर्षण की सम्भावना कह दी और उसने संकेत की पूँछ मजबूती से पकड़ कर श्रेय प्राप्त करने वाली नदी पार कर ली।

अब से ३०० वर्ष पुरानी बात है। हालैंड का चश्मा बेचने वाला ऐसे ही दो लैंसों को एक के ऊपर एक उलट पुलट कर कौतुक कर रहा था, दोनों शीशों को संयुक्त करके आँख के आगे रखा तो विचित्र बात सी दिखाई पड़ी। उसको गिरजा बहुत निकट लगा और उस पर की गई नक्कासी बिल्कुल स्पष्ट दीखने लगी। दूरबीन का सिद्धांत इसी घटना से हाथ लगा और अब अनेक प्रकार के छोटे-बड़े दूरबीन विज्ञान की शोधों में महत्त्वपूर्ण योगदान दे रहे हैं।

एक्सरे के आविष्कार का श्रेय जिस व्यक्ति को मिला, उसने जान बूझ कर नहीं बनाया था। उस संयोग के पीछे कोई अविज्ञात ही काम कर रहा होगा। अन्यथा ऐसे-ऐसे संयोग आये दिन न जाने कितने सर्वसाधारण के सामने आते रहते हैं। उसकी ओर ध्यान जाने का कोई कारण भी नहीं होता।

बात आविष्कारों की हो या आन्दोलनों की, श्रेय साधनों का शुभारम्भ 'अविज्ञात' की प्रेरणा से होता है। इस अविज्ञात को ब्रह्म कंहा जाय या प्रकृति, इस पर बहस करने की आवश्यकता नहीं। श्रेय लक्ष्य है। प्रगति अभीष्ट है। वह आत्मा के, परमात्मा के उद्गम से आविर्भूत होता है। एक सहयोगी श्रृंखला का परिपोषण पाकर विकसित होता है। एक सहयोगी पितरों, स्वर्गीय श्रेष्ठ आत्माओं द्वारा भी प्राप्त होता है। देवसत्ताओं द्वारा भी तथा सर्वोच्च सत्ता की अव्यक्त प्रेरणा द्वारा भी।

गड़रियों ने जब अग्नि का आविष्कार किया, उस समय पहले तो आग की चिन्गारियों को उन्होंने भूतों का ही उपद्रव समझा, पीछे पितरों की कृपा मान कर उत्सव मनाया, आनन्दित हुए और पितरों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त की।

श्रद्धा-भाव रखने तथा श्रेष्ठ जीवन क्रम अपनाए रहने पर उच्च स्तरीय पितर-सत्ताएँ सचमुच ऐसे ही महत्त्वपूर्ण सहयोग अनुदान प्रकाश-प्रेरणाएं प्रदान करती हैं, जो व्यक्ति एवं समाज के जीवन को सुख-सुविधाओं से भर देती है। उन पितरों की अपेक्षा यही रहती है कि इन उदार अनुदानों का दुरुपयोग न हो। परमेश्वर की भी तो मनुष्यों से यही अपेक्षा रहती है। पर कृतघ्न मनुष्य इतनी-सी अपेक्षा भी पूरी नहीं कर पाता। (जारी...)

रविवार, 21 दिसंबर 2025

मरणोतर जीवन रहस्य, भाग-2

 

पितर हमारे अदृश्य सहायक-2


सतत अनुग्रह बरसाने वाले सदाशय पितर –

मरण और पुनर्जन्म के बीच के समय में जो समय रहता है, उसमें जीवात्मा क्या करता है, कहाँ रहता है, आदि प्रश्नों के सम्बन्ध में भी विभिन्न प्रकार के उत्तर हैं, पर उनमें भी एक बात सही प्रतीत होती है कि उस अवधि में उसे अशरीरी, किंतु अपना मानवी अस्तित्व बनाए हुए रहना पड़ता है।

जीवन मुक्त आत्माओँ की बात दूसरी है। वे नाटक की तरह जीवन का खेल खेलती हैं और अभीष्ट उद्देश्य पूरा करने के उपरान्त पुनः अपने लोक को लौट जाती हैं। इन्हें वस्तुओं, स्मृतियों, घटनाओं एवं व्यक्तियों का न तो मोह होता है और न उनकी कोई छाप इन पर रहती है। किंतु सामान्य आत्माओं के बारे में यह बात सही नहीं है।

वे अपनी अतृप्त कामनाओं, विछोह, संवेदनाओं, राग, द्वेष की प्रतिक्रियाओं से उद्गिन रहती हैं। फलतः मरने से पूर्व वाले जन्मकाल की स्मृति उन पर छाई रहती है और अपनी अतृप्त अभिलाषाओं को पूर्ण करने के लिए ताना-बाना बुनती रहती हैं। पूर्ण शरीर न होने से वे कुछ अधिक तो नहीं कर सकती, पर सूक्ष्म शरीर से भी वे जिस-तिस को अपना परिचय देती हैं। उस स्तर की आत्माएं भूत कहलाती हैं।

वे दूसरों को डराती या दबाव देकर अपनी अतृप्त अभिलाषाएं पूरी करने में सहायता करने के लिए बाधित करती हैं। भूतों के अनुभव प्रायः डरावने और हानिकारक ही होते हैं। पर जो आत्माएं भिन्न प्रकृति की होती हैं, वे डराने, उपद्रव करने से विरत ही रहती हैं। अमेरिका के राष्ट्रपति भवन में समय-समय पर जिन पितरों के अस्तित्व अनुभव में आते रहते हैं, उनके आधार पर यह मान्यता बन गई है कि वहाँ पिछले कई राष्ट्रपतियों की प्रेतात्माएं डेरा डाले पडी हैं। इनमें अधिक बार अपने अस्तित्व का परिचय देने वाली आत्मा अब्राह्म लिंकन की है। ये आत्माएं वहाँ रहने वालों को कभी कष्ट नहीं पहुँचाती। वस्तुतः उपद्रवी आत्माएं तो दुष्टों की ही होती हैं।

मरण के समय में विक्षुब्ध मनःस्थिति लेकर मरने वाले अक्सर भूत-प्रेत की योनि भुगतते हैं, पर कई बार सद्भाव सम्पन्न आत्माएं भी शांति और सुरक्षा के उद्देश्य लेकर अपने जीवन भर सम्बन्धित व्यक्तियों को सहायता देती-परिस्थितियों को सम्भालती तथा प्रिय वस्तुओं की सुरक्षा के लिए अपने अस्तित्व का परिचय देती रहती हैं। पितृवत् स्नेह, दुलार और सहयोग देना भर उनका कार्य होता है।

पितर ऐसी उच्च आत्माएं होती हैं जो मरण और जन्म के बीच की अवधि को प्रेत बनकर गुजारती हैं और अपने उच्च स्वभाव संस्कार के कारण दूसरों को यथासम्भव सहायता करती रहती हैं। इनमें मनुष्यों की अपेक्षा शक्ति अधिक होती हैं। सूक्ष्म जगत से सम्बन्ध होने के कारण उनकी जानकारियाँ भी अधिक होती है। उनका जिनसे सम्बन्ध हो जाता है, उन्हें कई प्रकार की सहायताएं पहुँचाती हैं। भविष्य ज्ञान होने से वे सम्बद्ध लोगों को सतर्क भी करती हैं तथा कई प्रकार की कठिनाईयों को दूर करने एवं सफलताओं के लिए सहायता करने का भी प्रयत्न करती हैं।

ऐसी दिव्य आत्माएं, अर्थात पितर सदाशयी, सद्भाव-सम्पन्न और सहानुभूतिपूर्ण होती हैं। वे कुमार्गगामिता से असन्तुष्ट होतीं तथा सन्मार्ग पर चलने वालों पर प्रसन्न रहती हैं।

पितर वस्तुतः देवताओं से भिन्न किंतु सामान्य मनुष्य से उच्च श्रेणी की श्रेष्ठ आत्माएं हैं। वे अशरीरी हैं, देहधारी से सम्पर्क करने की उनकी अपनी सीमाएं होती हैं। हर किसी से वे सम्पर्क नहीं कर सकतीं। कोमलता और निर्भीकता, श्रद्धा और विवेक दोनों का जहाँ उचित संतुलन सामंजस्य हो, ऐसी अनुकूल भाव-भूमि ही पितरों के सम्पर्क के अनुकूल होती है। सर्व साधारण उनकी छाया से डर सकते हैं, जबकि डराना उनका उद्देश्य नहीं होता। इसलिए वे सर्व साधारण को अपनी उपस्थिति का आभास नहीं देतीं। वे उपयुक्त मनोभूमि एवं व्यक्तित्व देखकर ही अपनी उपस्थिति प्रकट करती और सत्परामर्श, सहयोग-सहायता तथा सन्मार्ग-दर्शन कराती हैं।

अवांछनीयता के निवारण, अनीति के निकारण की सत्प्रेरणा पैदा करने तथा उस दिशा में आगे बढ़ने वालों की मदद करने का काम भी ये उच्चाशयी पितर आत्माएँ करती हैं। अतः भूत-प्रेतों से विरक्त रहने, उनकी उपेक्षा करने औऱ उनके अवांछित-अनुचित प्रभाव को दूर करने की जहाँ आवश्यकता है, वहीं पितरों के प्रति श्रद्धा-भाव दृढ़ रखने, उन्हें सद्भावना भरी श्रद्धांजलि देने तथा उनके प्रति अनुकूल भाव रखकर उनकी सहायता से लाभान्वित होने में पीछे नहीं रहना चाहिए। (जारी, शेष अगले ब्लॉग में...)


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