पितर हमारे अदृश्य सहायक, भाग-1
अदृश्य जगत अपने आप में एक परिपूर्ण संसार है, जहाँ सूक्ष्म जीवधारियों की एक अनोखी दुनियाँ है।...शरीर छोड़ने के उपरान्त नया जन्म मिलने की स्थिति आने तक मनुष्यों को इसी क्षेत्र में रहना पड़ता है। भूत-प्रेतों की, देवी-देवताओं की, लोक-लोकान्तरों की, स्वर्ग-नरक की चर्चा प्रायः होती ही रहती है। ऐसे प्रमाण उदाहरण आए दिन मिलते रहते हैं जिनमें दिवंगत मनुष्यों के साथ सहयोग या विग्रह करने की जानकारियाँ मिलती हैं। मनुष्यों की तरह इनकी भी एक दुनियां है। चूँकि ये सभी मनुष्य शरीर को छोड़कर ही उस क्षेत्र में पहुँचे हैं, इसलिए स्वभावतः इस संसार के साथ सम्पर्क साधने की इच्छा होती होगी। कठिनाई एक ही है कि जीवित या दिवंगत आत्माओं में से किसी को भी यह अनुभव नहीं है कि पारस्परिक सम्पर्क-साधना और आदान-प्रदान का सिलसिला चलाना किस प्रकार सम्भव हो सकता है।...आत्मिकी में वह सामर्थ्य है कि वह इन दोनों लोगों के बीच भावनात्मक एवं क्रियात्मक सहयोग का द्वार खोल सके।
प्रेत – क्रुद्ध, असन्तुष्ट, दुर्गतिग्रस्त आत्माओं को कहते हैं और पितर वे हैं, जो श्रेष्ठ समुन्नत जीवन जीते रहे हैं। वे जीवनकाल की तरह, मरणोत्तर स्थिति में पहुँचने पर भी किसी को सहायता पहुंचाने और परिस्थितियाँ अच्छी बनाने में योगदान करना चाहते हैं। ऐसी आत्माओं की सहायता से कितनों ने ही कितने ही प्रकार के महत्वपूर्ण अनुदान प्राप्त किए हैं।
शास्त्रों में विभिन्न लोकों का वर्णन मिलता है, जिनमें जीवन मुक्त आत्माएं विचरण करती हैं एवं शरीरधारी पृथ्वीवासियों की मदद हेतु सतत् तत्पर रहती हैं। इन लोकों को भौतिकी के डायमेन्शन के आधार पर नहीं समझा जा सकता, क्योंकि सूक्ष्म होने के कारण इनकी स्थिति चतुर्थ आयाम से भी परे होती है। किन्तु साधना पुरुषार्थ से अर्जित दिव्य दृष्टि सम्पन्न शरीरधारी साधक स्वयं को सूक्ष्म रुप में बदलकर अथवा स्थूल स्थिति में इन आयामों के रहस्यमय संसार का दिग्दर्शन कर सकते हैं। इस संसार में अपने कर्मों के अनुरुप सूक्ष्म आत्माएं फल पाती हैं एवं उसी आधार पर एक निश्चित अवधि तक उन्हें उसमें रहना पड़ता है। यह एक सुनिश्चित तथ्य है।
शास्त्रों के अनुसार जन्म-मरण के चक्र में घूमता हुआ जीव स्वर्ग-नरक, प्रेत-पिशाच, पितर, कृमि-कीटक, पशु एवं मनुष्य योनि प्राप्त करता है। इस दौरान उसे जो-जो गतियाँ प्राप्त होती हैं, शास्त्रों में उन्हें दो भागों में बाँटा गया है – कृष्ण या शुक्ल गति। इन्हें धूमयान तथा देवयान भी कहा गया है। छान्दोग्योपनिषद में इन गतियों और जीवात्मा की विभिन्न स्थितियों को विस्तार से वर्णन किया गया है।
अध्यात्मवेत्ताओं के अनुसार सूक्ष्म दृष्टि सम्पन्न व्यक्ति पृथ्वी पर बैठे-बैठे ही समस्त लोकों व उनमें निवास कर रही सूक्ष्म आत्माओं से सम्पर्क साधने में समर्थ होते हैं। इसके अतिरिक्त कुछ सूक्ष्म सत्ताएं अन्तरीक्षीय लोकों में ही नहीं, प्रत्युत पृथ्वी पर भी निवास करती हैं। वे अपनी ओर से शरीरधारियों से सम्पर्क स्थापित करने का पूरा प्रयास करती हैं, परन्तु सूक्ष्म जगत से अनभिज्ञ मनुष्य समुदाय के भयभीत होने से वे संकोच करती हैं, जबकि द्रष्टा साधक उनसे पूरा सहयोग लेते हुए स्वयं को नहीं, अपितु जीवधारी समुदाय को परोक्ष के वैभव से लाभान्वित कराते हैं।
इस प्रकार शास्त्र वचनों में परोक्ष जगत एवं वहाँ रहने वाली अदृश्य सूक्ष्म आत्माओं के अस्तित्व के समर्थन में तो प्रतिपादन मिलते ही हैं, पृथ्वी पर बसने वाली श्रेष्ठ आत्माओं द्वारा उनसे सम्पर्क स्थापित कर आदान-प्रदान के प्रसंग भी प्रकाश में आते हैं।
वास्तव में अदृश्य जगत अपने आप में परिपूर्ण रहस्य रोमांच से भरी एक दुनियां है। वह उतनी ही विलक्षण है, जितनी कि हमारी निहारिका, सौर मण्डल एवं ब्रह्माण्ड का यह पूरा दृश्य परिकर है।...जो दृश्यमान नहीं है, ऐसा अदृश्य लोक मरणोत्तर जीवनावधि में रह रहे जीवधारियों का भी है जिसके प्रमाण, उदाहरण आए दिन मिलते रहते हैं। पितर एवं अदृश्य सहायक यहीं रहते हुए निर्धारित समय व्यतीत करते हैं एवं समय आने पर समान गुणधर्मी आत्माओं से अपना सम्पर्क जोड़कर स्नेह-सौजन्य-सहयोग का सिलसिला चलाते हैं। पितरगण अपने जीवनकाल की ही तरह मरणोत्तर स्थिति मरणोत्तर स्थिति में भी किसी के काम आने, सहायता पहुंचाने अथवा हितकारी परिस्थितियाँ बनाने में योगदान करना चाहते हैं। आत्मिकी का यह अध्याय रहस्यपूर्ण तो है ही, अपने आप में शोध का विषय भी है। (जारी, शेष अगले अंक में...)
