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शनिवार, 31 जनवरी 2026

मेरा गाँव मेरा देश: फ्लोरा-फोना से जुड़ी यादें बचपन की

                                                   गाँव का फ्लोरा-फोना और जैव-विविधता

यहाँ चर्चा हो रही है गाँव के फ्लोरा-फोना की, अर्थात् वनस्पति, जीव-जंतु आदि की, जो बचपन में हमारे जीवन का अभिन्न हिस्सा रहे। जिनसे बचपन की कई यादें जुड़ी हुई हैं और बदलते समय के साथ इनके भौतिक स्वरुप व अस्तित्व में आए परिवर्तन के साथ इन भावों का झंकृत होना स्वाभाविक है। प्रस्तुत है इसी का लेखा-जोखा, जिससे उस दौर से गुजरे लोग भली-भाँति स्वयं को जोड़ सकते हैं और हिमालय की जैव-विवधता रुचि रखने वाले सुधी पाठक भी इस परिवर्तन में निहित शाश्वत तत्व को ह्दयंगम कर अपना ज्ञानबर्धन कर सकते हैं।

गाँव व इलाके के प्राकृतिक फल व सब्जियाँ - बचपन के दौर में घर-गाँव में सबकुछ प्राकृतिक रुप में उपलब्ध होता था, अपने खेत व क्यारियों में आवश्यकता की सब्जी-भाजी व तरकारियाँ उग आती थीं। भिंडी, टमाटर, खीरा, कद्दु, लौकी, घिया, करेला, वैंगन आदि सब घर की ही क्यारियों, आंगन व छत पर उगते थे। मौसमी सरसों का साज सीजन में सहज ही खेतों में उपलब्ध रहता। ये सब अपने साथ दूसरों के भी काम आते थे। जरुरत से अधिक हुए तो पड़ोसी, रिश्तेदारों के साथ इनका आदान-प्रदान चलता था। बाज़ार से इनको खरीदने का तब कोई चलन नहीं था।

कभी घर के बड़े-बुजुर्ग बाज़ार गए तो कुछ विशेष सब्जियाँ व फल ही वहाँ से खरीदते, जो घरों में नहीं उगते थे। जैसे आलू, प्याज आदि से लेकर केला, आम, पपीता जैसे फल।

जंगल व वनक्षेत्र भी कुछ विशिष्ट सब्जियों व वनस्पतियों के उर्बर स्रोत रहते। लिंगड़ी इसमें प्रचलित थी, जो आज भी जंगल में नमी व छायादार स्थानों पर बहुतायत में मिल जाती है। 


इससे सब्जी से लेकर आचार बनता। खेत के मेढ़ों में देसी आढू व विदाना के पेड़ों से तोड़े फलों से आढ़ू-विदाना का आचार बनता, जिसका कोई सानी नहीं रहता। इनके साथ बिच्छू बूटी के की मुलायम पत्तियों की सब्जी व चटनी भी नाश्ते का हिस्सा बनती। 
 

यहाँ गुच्छी का नाम लिए बिना चर्चा अधूरी रहेगी। फरवरी-मार्च माह में खेतों के किसी कौने में या जंगल में गुच्छी के झुंड मिलते। इसे विश्व की सबसे पौष्टिक और मंहगी सब्जी माना जाता है। यह कैसे व कब जंगल में उगती है, यह लम्बे समय तक एक पहेली रही है, हालाँकि अब कुछ वैज्ञानिक इसे प्रयोगशाला में तैयार करने की बात करने लगे हैं। 


सुबह-सुबह पुराने सेब-जापानी के पेड़ के नीचे ओंस भरी घास से झांकते गुच्छी के दर्शन रोमाँचित करते। फिर थोड़ा बड़ा होने पर ही इनको तोड़ते।

खेतों में ही मेढ़ों पर उगे शहतूत, अंजीर जैसे फलदार पेड़ बच्चों के लिए मौसम का फल सावित होते। इसके साथ काली और लाल रंग की आंछा (झाडियों में उगने वाली जंगली बैरी), शांभल (किल्मोड़ा) के खट्टे-मीठे बेंगनी दानेदार फल व जंगली दाडू (अनार) भी दोपहर को भूख लगने पर नाश्ता बनते, जब गाय व भेड़ों के साथ हम ग्वाल धर्म निभाते जंगल जाते। शेगल के पके काले फल भी चीकू से कम स्वादिष्ट नहीं रहते थे। जंगल में ये बंदर, लंगूर व भालू का प्रिय आहार रहते। 

घर में जैविक रुप से परम्परागत गैंहू, धान, मक्का, जौ आदि अन्न उगाए जाते। गाय का गौबर उर्बरक के रुप में काम आता। हालांकि धीरे-धीरे रसायन खाद का चलन भी हमने बढ़ते देखा। दाल में अपने ही खेत में माष, राजमाष, सोयावीन, चना, मूँग, मसूर, रोंगी जैसी फसलें घर की आवश्यकता को पूरा करती।

तिल की फसल भी बचपन में होती, जिसका तेल तैयार होता। खिचडी के साथ इसका बहुत जायकेदार कम्बिनेशन रहता। तिल की चटनी का उपयोग भटूरे व सिड्डू में होता। इसके सूखे लट्ठों को जलाकर दिवाली की सर्द रातों में जलाते, जिसका आनन्द दीपपर्व के उत्सव में एक नया ही रंग घोलता था। सरसों की खेती के संग पीले रंग से अटे खेत एक अलग ही नज़ारा पेश करते। बागवानी के बढ़ते चलन के कारण अब ऐसे दृश्य कम ही रह गए हैं।  

मोटे अनाज में कोदरा, चीणी, काउणी, टाक, सरयारा (रामदाणा) की फसलें हमने घर में ही उगती देखी। सरयारा से तैयार होने वाली धाणा व फैंबड़ा (नकमीन खीर) का स्वाद नहीं भूल सकते। पूर्वजों द्वारा उगाए जाने वाले ये मोटे अनाज धीरे-धीरे लुप्त होते गए। जैसे-जैसे बागवानी का चलन बढता गया, सब्जियों में केश क्रॉप का चलन शुरु हुआ, किसानों का ध्यान अर्थ उपार्जन में अधिक हो चला व पारंपारिक विरासत का संरक्षण-संवर्धन कहीं पीछे छूटता गया।

इसी क्रम में ब्रौकली, सेलरी, पक्चोई, जुग्नी, स्कवैश जैसी एग्जोटिक सब्जियों का चलन बढ़ता चला। 


इसी के साथ टमाटर, फूलगोभी, बंद गोभी आदि का उत्पादन अपनी आवश्यकता तक सीमित न होकर, नकदी फसल (केश क्रोप) के रुप में होने लगा। यह किसानों के आर्थिक स्वावलम्बन की दृष्टि से आवश्यक भी था, लेकिन इनके साथ सब्जियों से जुड़ा प्राकृतिक एवं जैविक स्वाद पीछे छूटता गया। रसायन से लेकर कीटनाशकों को बहुतायत में छिड़काव होने लगा।

आज बचपन की यादों का वह प्राकृतिक जीवन स्मृतियों की गोद में दबा पड़ा है और थोड़ा कुरेदने पर भावुक एवं रोमांचित करता है और दुबारा उसे जीने का भाव जगाता है। हालाँकि किचन गार्डनिंग के रुप में उस चलन को दुवारा शुरु किया जा सकता है। लेकिन समय का प्रभाव तो घटनाओं व परिस्थितियों पर स्पष्ट है। 

गाँव व इलाके के जीव-जंतु - गाँव व इलाके के जीव-जंतुओं की चर्चा किए बिना बात अधूरी रह जाएगी। घर में पाले गए कुत्ते, बिल्ली, भेड-बकरियाँ व गाय-बैल तो परिवार का अनिवार्य हिस्सा रहते। कुछ समय मुर्गियों के पालन को भी देखा। धीरे-धीरे भेड़-बकरियों का चलन कम होता गया। फिर टिल्लर मशीन आने से बैल भी दुर्लभ होते हुए। अब गाय पालन शेष बचा है। उससे भी कई लोग अब गुरेज करने लगे हैं व दूध खरीद कर आवश्यकता पूरा कर रहे हैं।

घर-आंगन में सबसे रोचक पक्षियों में गौरेया व मैना रहते। 


गौरेया झुंडों में फुदकते व चहचहाते हुए वातावरण में एक रौनक लाए रहती। खास कर धान के टूहके के पास ये झुंडों में दाना चुगती और हम इनको पकड़ने का असफल प्रय़ास करते। आज गौरेया के दर्शन दुर्लभ हो चले हैं ऊँचाई वाले गाँवों में ही इनके दर्शन किए जा सकते हैं, वहीं मैना आज भी बैसे ही घर की शोभा बढ़ा रही हैं।

कौआ तो सदावहार पक्षी रहा है। सर पर कल्गी धारी पिक्लटूरु भी अपना दर्शन देते थे। उपउपड़े अपनी मधुर हुपहुप ध्वनि के कारण एक नई मिठास घोलते, जिनके दर्शन अब दुर्लभ हो चले हैं। इसी तरह वसंत में पहाड़ी कोयल कुप्पू चिडिया अपनी मीठी व सुरीली आवाज से एक मंगलमयी रस बिखेरती। जो आज भी जारी है। घूघती का अपना ही जल्बा रहता, जो बिजली की तार पर जोड़ें में शोभायमान रहती। फलों के सीजन में तोतों की मौज रहती, जो झुंडों में एक बगीचे से दूसरे बगीचे में उड़ान भरते रहते। उल्टा कौआ (चमगादड़) भी बाल मन के लिए एक कौतुक का विषय रहते, क्योंकि दिन में इनके दर्शन नहीं होते थे और रात को खाली हवा में उड़ते दिखते और बगीचों में फलों का भक्षण करते। 

खेत के कौनों में तीतर की तिरक-तिरक-तितरी आवाज भी सभी का ध्यान आकर्षित करती। कड़ेशे (जंगली मुर्गे) जंगल व खेतों में जहाँ-तहाँ मिलते, जो आज भी बहुतायत में पाए जाते हैं। जंगल की शान मोनाल पक्षी के बारे में सुनते थे, लेकिन उसकी सुंदर एवं सतरंगी कलगी के लिए शिकार के चलते आज उसका अस्तित्व संकट में है तथा उसके दर्शन दुर्लभ हो गए हैं। ऐसे ही चकोर पक्षी भी शिकार के कारण दुर्लभ हो गए हैं। सफाई करने वाले गडिल्ण (गिद्ध) पक्षी भी आज दुर्लभ श्रेणी में आ गए हैं। 

जंगलों में गीदड़, तेंदुआ, बाघ, भालू आदि की चर्चा बचपन में होती, जिनके प्रत्यक्ष दर्शन दुर्लभ थे। रात को गीदड़ों के चिल्लाने की आवाजें गाँव के कुत्तों को चौकन्ना कर देती। तेंदुए व बाघ के दर्शन तो दुर्लभ ही रहे। हाँ भालूओं से जुड़ी घटनाओं को किवदंतियों के रुप में अपने बुजुर्गों से सुनते। जंगल में जाने पर भालुओं द्वारा खोदी जमीं के दर्शन प्रायः होते रहे। बर्फ में उनके पंजों के निशान भी दिखते रहे। लेकिन पिछले कुछ वर्षों से हर वर्ष इंसान पर हमले की घटनाएं बढ़ रही हैं, जो चिंता का विषय है। हालाँकि जंगली जानवरों के संदर्भ में प्रचलित है कि वे बिना कारण हमला नहीं करते। जब अचानक किसी से सामना होता है, तो वे आत्मरक्षा में हमला करते हैं। जब मादा भालू अपने शाबकों के साथ होती है, तो वह आक्रमक होती है।

पिछले कुछ वर्षों से वन्य विभाग द्वारा जंगलों में तेंदुए छोड़े जाने से इनकी संख्या में वृदिध हो रही है, दूसरा जंगलों के घटते दायरे से उनके भोजन का अभाव हो चला है, जिससे ये इंसानी वस्तियों की ओर आने के लिए मजबूर हो रहे हैं। अतः आए दिन पालतू कुत्तों व मवेशियों पर इनके हमले बढ़ रहे हैं।

जंगलों में बंदर, लंगूर आदि के दर्शन होते है तथा उंचाई के गाँव में फसलों व फलों को ये नुकसान पहुँचाते है। नीचे हमारे घर के आसपास इनके दर्शन दुर्लभ ही रहे। जंगल में तो गडीहण (उड़न गिलहरी) के दर्शन भी होते रहते।

इसके साथ मधुमक्खियों का पालन भी पुश्तों से बुजुर्गों का एक शग्ल रहता। हर घर में इनके छत्ते (मडाम) मिलते। आज इनकी संख्या कम हो चुकी है। हालाँकि कुछ शौकिया तौर पर, तो कुछ बागवानी के चलते फ्रेम जड़े बक्सों में मधुमक्खियों का पालन करन लगे हैं।

गांव व इलाके के वृक्ष-वनस्पति – में भेखल, शांभल, टिम्बर आदि लोकप्रिय़ थे, जिनसे कई तरह की यादें जुड़ी हुई हैं। भेखल की खाली पाइप को हम बंदूक की तरह इस्तेमाल करते। शांभल के छोटे-छोटे खट्टे-मीठे जांमुनी फल खाते और बाद में पता चला कि दारु हल्दी के रुप में इससे कैंसर की दबा बनती है। टिम्बर (तिरमिरा) का उपयोग हम माउथ फ्रेशनर के रुप में करते।

कोउश (अतीश) के पेड़ गाँव के नाले व ब्यास नदी के किनारे कतार में दर्शन देते तथा शीतलता व छाया देते। शेगल व बाँज के सदावहार पेड़ चारे के रुप में काम आते। इसके जंगल गाँव वासियों के लिए सर्दी में चारा का एक मह्त्वपूर्ण विकल्प रहते। मोहरु का इकलौता हराभरा पेड़ खेत के कौने में शौभा देता। ऊँचाइयों में काईल, रई, तोश, देवदार के गगनचूंबी पेड़ों की तो बात ही कुछ ओर रहती। जिनके दर्शन हमें एक दूसरी ही दुनियाँ में विचरण की अनुभूति देते। 

इस तरह अपने गाँव व क्षेत्र में जीव-जंतुओं एवं वृक्ष-वनस्पतियों का यह पिछले साढ़े पाँच दशक का मुआइना स्पष्ट करता है कि चीजें काफी बदल गई हैं। कुछ ग्लौबल वार्मिंग के चलते जलवायु परिवर्तन, तो कुछ जीवन में मशीनों के हस्तक्षेप व अधिक धन कमाने की दौड़ तथा प्रकृति के साथ इंसान का बढ़ता हस्तक्षेप, सब मिलाकर हिमालय के इस सुंदर क्षेत्र की जैव-विविधता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा रहा है। जिसका संरक्षण हर स्तर पर किए जाने की आवश्यकता है। पहाड़ी क्षेत्रों का प्राकृतिक सौंदर्य, स्वास्थ्यबर्धक आवोहवा व सुख-शांतिपूर्ण जीवन बहुत कुछ इससे जुड़ा हुआ है। 

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