गुरुवार, 30 अप्रैल 2026

यादों के झरोखों से – मेरी पहली दक्षिण भारत यात्राएं, भाग-2

 

अन्नामलाई से पांडिचेरी, ऊटी, कोडाइकनाल एवं मैसूर

नटराज मंदिर, चिदाम्बरम

अन्नामलाई विश्वविद्यालय चिदाम्बरम रेल्वे स्टेशन से 2-3 किमी दूरी पर स्थित है और चिदाम्बर शहर के ह्दय क्षेत्र में स्थित है प्रख्यात नटराज मंदिर, जो भगवान शिव को समर्पित एक अत्यंत प्राचीन एवं पवित्र मंदिर है। यह 10वीं-11वीं शताब्दी की चोल वास्तुकला का एक प्रमुख उदाहरण है, जो अपने चार ऊंचे गोपुरमों, भरतनाट्यम नृत्य की मुद्राओं की नक्काशी और आकाश तत्व को दर्शाने के लिए प्रसिद्ध है। यहाँ भगवान शिव की ब्रह्माण्डीय नर्तक के रुप में पूजा होती है और शिव को निराकार (आकाश) रुप में पूजा जाता है, जिसे चिदंबर रहस्य कहा जाता है।

भगवान नटराज

यूनिवर्सिटी में राइस प्रोसेसिंग यूनिट में हमें यहाँ की राइस मिल्ज को देख आश्चर्य हुआ कि राइस ब्रान (चाबल भूसी) कितना बहुमूल्य होता है, जिससे तेल से लेकर साबुन, पशु खाद्य उत्पाद, सौंदर्य़ प्रसाधन जैसे कितने ही उत्पाद तैयार किए जा सकते हैं। पौष्टिकता की दृष्टि से राइस ब्रान विटामिन बी और ई सहित फाइबर एवं एंटिऑक्सिडेंट से भरपूर होता है।

यूनिवर्सिटी से ही कुछ दूरी पर समुद्री बीच था। फुर्सत के दिनों में हम यहाँ भी किराए से ली गई साईकल से टूर कर आए। बेकवाटर में मेंग्रोव के जंगल हमने पहली बार देखे। और नाव में चढ़कर इनका नज़दीक से अवलोकन किए और वहाँ चहचहाते पक्षियों के दृश्यों का आनन्द लिए। रास्ते के ग्रामीण परिवेश में नारियल के वृक्षों की भरमार के साथ चाबल की खेती अधिक दिखी। दूर-दूर तक इनका विस्तार दर्शनीय रहा।

तमिलनाडू की एक विशेषता उम्दा बस सर्विस लगी, जिसका किराया भी किफायती था। स्पीड के मामले में लगता था कि जैसे हवाई जहाज में सफर कर रहे हों। इस तरह लम्बी दूरी का सफर कुछ घंटों में पूरा हो जाता।

ट्रेनिंग के अंतिम दिनों में आसपास भ्रमण के अंतर्गत हम पांडिचेरी की योजना बनाते हैं, चिदम्बर बस स्टेशन से बस पकड़ते हैं, जो यहाँ से लगभग 70 किमी पड़ता था व लगभग डेढ़ घंटे में पहुँचते हैं। अरविंद आश्रम में समाधी दर्शन करते हैं और इसके बाद सागर तट का अवलोकन करने के वाद फिर पास के एक पार्क में बैठकर विश्राम करते हैं।

पुडुचेरी, सागर तट

सामने एक कोठी के गेट पर रंग-बिरंगी टोपी पहने सुरक्षा गार्ड हमारे लिए कौतुक का विषय थे। हम अनजाने में ही जिज्ञासावश उनकी ओऱ इशारा कर रहे थे। कुछ ही मिनट में हमारा दल पुलिस के घेरे में था। वे हम सबको पुलिस जीप में बिठाते हैं। हम सब हैरान थे कि हमारे साथ ये क्या हो रहा है। हमने तो कोई गुनाह नहीं किया है और न ही कोई कानून तोड़ा है, पार्क में बैठकर हंजी मजाक ही तो कर रहे थे।

बिनम्रतापूर्वक हम सबको स्थानीय पुलिस स्टेशन में बिठाया जाता है। पीछे फोटो लगे थे, उग्रवादियों के। लगा कि हम सबका मिलान उनके फोटो के साथ हो रहा था। हम सबकी तहकीकात हो रही थी। बाद में पता चला कि हम जिस पार्क में बैठे थे, सामने पांडिचेरी के राज्यपाल की कोठी थी, जो थे रिटार्यड लेफ्टिनेंट जनरल, जिनका स्वर्ण मंदिर अमृतसर के ब्लू स्टार ऑपरेशन में अहं भूमिका थी। इस कारण वे उग्रवादियों की हिटलिस्ट में थे। इस बात से अनजान हम सब पार्क में हंसी मजाक व इशारेबाजी कर रहे थे। फ्रेंच उपनिवेश होने के कारण अभी भी पांडिचेरी में सुरक्षा गार्ड वही पारम्परिक रंग-विरंगी टोप पाली बर्दी पहने थे।

तहकीकात में पुलिस को कुछ हाथ नहीं लगा। अंत में हमारे एक सहपाठी संस्थान के निर्देशक का मोबाइल नम्बर शेयर करते हैं, जिनसे बातचीत करने पर पुलिस दस्ते को स्पष्ट होता है कि यह ग्रुप छात्रों का एक समूह था, जो ट्रेनिंग करने आया था और वे हमे वाई-इज्जत बरी करते हैं। वहाँ से छूटते ही हम उल्टे पाँव बस में बैठकर बापिस अन्नामलाई कैंपस पहुँचते हैं और रास्ते भर आज की रोमाँचक घटना की चर्चा का आनन्द लेते हैं।

ट्रेनिंग पूरी होने पर हम दक्षिण भारत के कुछ हिल स्टेशन व मुख्य शहरों का दिग्दर्शन करते हुए लुधियाना यूनिवर्सिटी कैंपस बापिस आते हैं। इस क्रम में हमें मैसूर पलेस के म्यूजियम व महल को देखते हैं, यह वाडियार राजवंश का पूर्व निवास है, जो इंडो-सार्सेनिक शैली में बना है। इसके अंदरूनी हिस्से की नक्काशी और शाही वस्तुओं का संग्रह दर्शनीय लगा।

चामुंडेश्वरी मंदिर, चामुंडी हिल्स, मैसूर

इसके बाद पहाड़ी रास्ते में ऊपर चढ़ते हुए पहाड़ी पर चामुंडी हिल्स के नाम से प्रख्यात स्थान पर चामुंडेश्वरी मंदिर के दर्शन करते हैं, जहाँ से मैसूर शहर के विहंगम दर्शन होते हैं। इन्हें दुर्गा का अवतार माना जाता है और ये 51 शक्तिपीठों में एक माना जाता है। पौराणिक कथाओं के अनुसार इसी पहाड़ी पर देवी ने महिषासुर का वध किया था। पास में ही पहाड़ी पर एक ही चट्टान से तराशी गई नंदी महाराज की वृहद प्रतिमा ध्यान आकर्षित करती है, जहाँ सामूहिक फोटोग्राफी होती है।  

इसके बाद हम ऊटी हिल स्टेशन पहुंचते हैं। मैदानी क्षेत्र से धीरे-धीरे पहाड़ों का आरोहण करती बस यात्रा हमें बखुबी याद है। यहां ऊटी झील में बोटिंग का आनन्द लेते हैं। बॉटेनिकल गार्डन के दर्शन करते हैं, जहाँ दुर्लभ प्रजाति के पेड़-पौधे हैं। 1848 में स्थापित यह गार्डन 55 एकड़ में फैला हुआ है।

डोड्डाबेटा पीक से ऊटी का विहंगम दृश्य

फिर ऊटी स्टेशन से सर्पिली सड़कों से होते हुए पहाड़ की चोटी तक पहुँचे थे, जहाँ हल्की बारिश हो रही थी, ठंडक भी काफी थी। यह नीलगिरि की सबसे ऊँची चोटी डोड्डाबेटा पीक थी, जहाँ वर्नाकुलर से नीचे मैदानी घाटियों के दर्शन करते हैं। बिना दूरवीन के भी यहाँ से घाटी के मनोरम दृश्य दिखते हैं, हालाँकि बादल के कारण दृश्य बाधित थे।

इसके बाद हम लोग दूसरे हिल स्टेशन कोडाइकनाल पहुंचते हैं, जहाँ का प्राकृतिक सौंदर्य़ ऊटी की तुलना में अधिक संरक्षित व नैसर्गिक लगा। आश्चर्य नहीं कि इसे दक्षिण भारत का स्विटजरलैंड कहा जाता है। यह अपनी झीलों, जंगलों व ठंडी जलवायु के लिए जाना जाता है। यहाँ झील में कुछ बोटिंग करते हैं और यहाँ से साइकिल किराए पर लेकर साइक्लिंग करते हुए हिल स्टेशन का अवलोकन करते हैं। यहाँ के पहाडी मार्ग पर चढते हैं और फिर घूमकर बापिस आते हैं।

कोडाइकनाल का विहंगम दृश्य

इस तरह ईश्वर की कृपा से हमारी दक्षिण भारत की पहली यात्रा से कई सुखद स्मृतियाँ जुड़ीं, जो याद करने पर फिर ताजा हो उठती हैं। इन तीन-चार दशकों में तो वहाँ बहुत कुछ बदल चुका होगा। आज भी इन स्थलों से जुड़ी कोई सूचना अखबार या इंटरनेट पर देखते-पढ़ते हैं, तो महज़ ही इनसे जुड़ी पुरानी यादें झंकृत हो उठती हैं।

जीवन गीत - इससे तो मौन बेहतर...

 


देखता रहूँ अब खेल मालिक का बन मौन दर्शक

 

कड़ुआ सच्च कहूँ, तो वो बुरा मान जाएं,

किसी का दिल दुखाना भी तो ठीक नहीं,

इससे तो मौन बेहतर ।1।

 

खरी खोटी सुनाऊँ तो हो जाए इज्जत तार-तार उनकी,

किसी की इज्जत से खिलवाड़ भी तो ठीक नहीं,

इससे तो मौन बेहतर ।2।

 

सच्च कहूँ, तो उनकी मूढता हो जाए उज़ागर,

उनके अज्ञान से पर्दा हटाने की घृष्टता भी ठीक नहीं,

फिर, इससे तो मौन ही बेहतर ।3।

 

धूर्त की शातिरता को करुँ ऊजागर, तो उनकी शांति हो जाए भंग,

किसी की अशांति, बेचैनी का कारण बेमतलब क्यों बनूं,

इससे तो मौन ही बेहतर ।4।

 

उनके हठ पर उठाऊँ उंगली, तो हो जाए उनका मान हनन,

किसी के हठयोग में क्यों बनूं बाधक,

इससे तो मौन ही बेहतर ।5।

 

ज़बरपेली पर उठाऊँ उंगली, तो हो जाए उनका लोकहित बाधित,

उनके तथाकथ विजयी अभियान में क्यों बनूँ बाधक,

इससे तो मौन बेहतर ।6।

 

कागजी अभियान पर उनके उठाऊँ सवाल, तो उन्हें लगे न अच्छा,

उनके मायावी खेल का मजा क्यों करुँ किरकिरा,

इससे तो मौन बेहतर ।7।

 

दूसरों के कंधे पर रख बंदूक, उनकी मनमानी पर उठाऊं सवाल,

तो उनके सृजन अभियान का बन जाऊं रोढ़ा,

इससे तो मौन रहना ही बेहतर ।8।

 

जब औकात से बाहर हो परिस्थितियाँ, इंसान मात्र कठपुतली,

तो न्याय का ठेका ले, क्यों दैवीय विधान में बनूं बाधक,

इससे तो मौन रहना ही बेहतर ।9।

 


समय से पहले जब नहीं कोई सुनने समझने सुधरने के लिए तैयार,

तो क्यों करुँ छेड़खान किसी की नियति, भाग्य, भवितव्यता से,

ऐसे में फिर मौन रहना ही बेहतर ।10।

 

जब काल के भी काल महाकाल के हाथों कमान युग परिवर्तन की,

तो फिर क्यों न दूँ उस महानायक को काम करने अपना,

अकिंचन सा सेवक बन देखता रहूँ खेल मालिक का बन मौन दर्शक ।11।

 

ईमानदारी संग निभाता रहूँ जिम्मेदारी अपनी, रह अपने स्वधर्म में अढिग,

अपना सुधार जब सेवा संसार की सबसे बड़ी,

तो क्यों न करता रहूँ सत्यं-शिवं-सुंदरं की अराधना सतत मौन रहकर ।12।

यादों के झरोखों से – मेरी पहली दक्षिण भारत यात्राएं, भाग-1


लुधियाना से उड़ीसा, तमिलमाड़ू


कॉलेज में बिताए स्वर्णिम दिनों में दक्षिण भारत की पहली यात्राएं उल्लेखनीय हैं। पहली उड़ीसा के कटक शहर की और दूसरी अन्नामलाई यूनिवर्सिटी की। कटक यात्रा में पहली बार महानदी और पुरी में सागर के दर्शन हुए थे। और अन्नामलाई की यात्रा में दक्षिण भारत के हिल स्टेशन ऊटी व कोडेक्नाल के साथ मैसूर, बैंगलोर व पाँडिचेरी की एक झलक पायी थी।

उड़ीसा की पहली यात्रा संभवतः वर्ष 1988 के दौरान सम्पन्न हुई थी, जब हम पंजाब कृषि विश्वविद्यालय में अपनी बीटेक की पढ़ाई कर रहे थे। यूनिवर्सिटी की वेटलिफ्टिंग टीम के सदस्य के रुप में हम इंटर-यूनिवर्सिटी प्रतियोगिता हेतु कटक विश्वविद्यालय गए थे। लगभग एक दर्जन युवा खिलाड़ियों की टीम कोच के साथ थी। इंजीनियरिंग कॉलेज से हम अकेले थे, कुछ वेटनरी कॉलेज से तथा अधिकाँश एग्रीक्लचर-हॉर्टिक्लचर कॉलेज से थे। सफर की यादें काफी धुंधली हो चुकी हैं, लेकिन जेहन में अंकित स्मृतियों को कुरेदते हुए यहाँ कुछ रोचक एवं यादगार घटनाओं का वर्णन कर रहा हूँ।

हमारे साथ वेटलिफ्टिंग टीम में प्लस 110 किलो के सुपर हेवीवट केटेगरी में भाई दलजीत सिंह टीम में आकर्षण का विशेष केंद्र थे, जिन्हें हम प्यार से पहलवानजी कहते थे। दूर से ही उनका ढील-ढोल और चाल-ढाल देखकर पता चलता था कि पहलवानजी आ रहे हैं। उनकी डाइट भी उनके बजन के हिसाब से कुछ स्पेशियल थी। तीन दर्जन रोटियाँ, दर्जनों अण्डे व लीटरों के हिसाब से दूध उनकी खुराक रहती थी। उसी हिसाब से उनकी वेटलिफ्टिंग का अभ्यास रहता था।

याद है ट्रेन में केले बेचने वाला जब फल से भरी टोकरी लेकर आता है, तो रेट पूछने पर वह दर्जन के हिसाब से केले के दाम बताता है। लेकिन पहलवानजी अपने नाश्ते के हिसाब से पूरी टोकरी का रेट पूछ रहे थे। फेरी बाले ने जीवन में शायद पहली वार पूरी टोकरी को एक साथ बिकते देखा होगा। केले का साइज सामान्य से छोटा था, लेकिन विशेष स्वाद लिए थे। पहलवानजी एक बार में एक केला छील कर उदरस्थ करते और देखते-देखते पूरी टोकरी खाली कर गए। हमारे लिए यह सामान्य घटना थी, लेकिन फेरी वाले व ट्रेन में बैठे लोगों के लिए यह कौतुहल का विषय था।

कटक पहुँचने पर महानदी के पुल के किनारे गुरुद्वारे में रुकने की व्यवस्था थी। यहाँ से महानदी का विस्तार देखने योग्य था, जिसके ऊपर कई किमी लम्बा पुल बना था। यहाँ से स्टेडियम थोड़ी दूरी पर था। आसपास हर घर के साथ पानी का तलाब और साथ में नारियल के झुरमुट हमें बहुत दर्शनीय लगे। इनके साथ एक नए प्रारुप में ग्रामीण जीवन के दर्शन हमें रोमाँचित कर रहे थे। हालाँकि किसी के घर जाकर नजदीक से देखने का समय नहीं था, लेकिन इस नए प्रदेश के नए परिवेश व संस्कृति को देखकर कई प्रश्न उठ रहे थे कि क्या इन तालावों में मछलियाँ भी होती हैं। इनके जल का स्रोत क्या रहता है। इसकी शुद्धता कैसी रहती होगी व इसका उपयोग किन-किन रुपों में होता होगा। यह प्रश्न हमारे लिए अभी भी पूरी तरह उत्तरित नहीं हैं। समय मिलेगा तो एक बार इनको नजदीक से देखकर अवश्य जानना व समझना चाहूँगा।

वेटलिफ्टिंग प्रतियोगिता में प्रतिभाग लेने के बाद हम सभी पुरी साइड के सी बीच (सागर तट) में भी भ्रमण किए, इसकी भी यादें धुधली सी हैं, जहाँ पर कुछ यादगार सामूहिक फोटोग्राफी होती है (इससे जुड़ी फोटो आज खो चुकी हैं, इन्हें इकट्ठा करने का प्रयास जारी है।) इस समय हमारा शारीरिक सौष्ठव अपने चरम पर था, क्योंकि इसी दौर में हम विश्वविद्यालय स्तर पर बॉडी बिल्डिंग प्रतियोगिता में मिस्टर यूनिवर्सिटी बने थे।

उस दौर में शारीरिक फिटनेस के प्रति अपनी दिवानगी का जिक्र अवश्य करना चाहूँगा। खेल के प्रति हमारी निष्ठा अप्रतिम रही। कबड्डी से लेकर शॉट पुट, डिस्कस, जेवलिन थ्रो जैसे पॉवर गेम्ज़ में हम प्रतिभाग करते रहे, लेकिन मुख्य खेल बॉडी बिल्डिंग ही चयनित था, साथ ही कोच के प्रोत्साहन में वेटलिफ्टिंग से भी जुड़ गया था। किशोरावस्था में स्वामी विवेकानन्द के युवाओं को संदेश में मुखरित मस्ल्ज़ ऑफ आयरन के आग्नेय वचन हमारे प्रेरक मंत्र बन चुके थे, जिसके अनुरुप पंजाब कृषि विश्वविद्यालय में एनएसओ (NSO-नेशनल स्पोर्टस ऑर्गेनाइजेशन) के अंतर्गत हमें अपने पैशन को पूरा करने का यहाँ स्वर्णिम अवसर मिला था।

खेल का मैदान व जिम हमारे लिए किसी मंदिर व तपःस्थली से कम नहीं था। क्या आँधी, क्या तुफान, क्या परीक्षा, क्या बारिश, हम शाम को ठीक साढ़े चार बजे ग्राउंड में पहुंच जाते थे। पहले बीस मिनट एथलेटिक ट्रेक पर राउंड के साथ वार्मअप करते और फिर जिम में प्रवेश करते। लगभग दो-अढ़ाई घंटे कोच के मार्गदर्शन में जिम में पसीना बहाते। इसके बाद योगासन के कुछ स्ट्रेचिंग आसन व शवासन आदि के साथ कूलडाउन करते। अंत में पसीने से तर-बतर वनियान को निचोड़ते, तो पसीने की धार झरने लगती।

इसके बाद यूनिवर्सिटी गेट के बाहर जेंटलमेन दी हट्टी में दूध का गिलास व गर्मागर्म जलेबी का सेवन होता। इसके साथ शारीरिक श्रम के साथ खर्च हुई ऊर्जा की कुछ भरपाई हो जाती। फिर हॉस्टल पहुँच कर स्नान-ध्यान के साथ अपनी सांयकालीन दिनचर्या आगे बढ़ती।

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पढ़ाई के अंतिम वर्ष संभवतः सन 1989-90 के दौरान हमें फील्ड प्रोजेक्ट के तहत अन्नामलाई विश्वविद्यालय, तमिलनाड़ु भेजा गया, साथ में थे एग्रीक्लचरल इंजीनियरिंग कॉलेज से बीटेक अंतिम वर्ष के लगभग एक दर्जन सहपाठी छात्र। हमें याद है कि लुधियाना से हम ट्रेन में चढते हैं और तमिलनाड़ू के चिदम्बरम स्टेशन पर उतरते हैं, जहाँ अन्नामलाइ विश्वविद्यालय सामने ही पड़ता है।

यहीं एक होस्टल में हम लोगों के रुकने की व्यवस्था थी। यहाँ कर्मचारी हिंदी या पंजाबी नहीं समझते थे, अंग्रेजी भी कम ही समझ पाते थे। वे तमिल में ही बोलते थे। इसलिए अधिकांश संवाद इशारे में ही होते व किसी तरह काम चलाते। धीरे-धीरे हम पानी पीने से लेकर अभिवादन में उपयोग होने वाले दैनिक व्यवहार के कुछ शब्दों को सीख गए थे, जैसे वनक्कम, तन्नी कुडुङ्गा आदि। यूनिवर्सिटी के प्रोफेसरों से तो अंग्रेजी में संवाद हो जाता था, हॉस्टल में थोड़ा कठिन रहता था।

बाहर दुकानदारों के साथ भी इशारों में अधिक बात होती थी। हमारे साथ पंजाब से आए सहपाठी अधिकाँशतः पंजाब से थे, जहाँ रोटी खाने का चलन अधिक है। वे चावल को अधिक पसन्द नहीं करते। लेकिन यहाँ तो इडली से लेकर डोसा, हर डिश में चाबल ही रहता। बड़ी मुश्किल से हमें रोटी वाला ढाबा बाहर शहर में मिलता है और किसी तरह से हमारे साथियों का काम चलता है। (...शेष अगली पोस्ट में)


मंगलवार, 31 मार्च 2026

चरित्र निर्माण की प्रक्रिया

चरित्र निर्माण के प्रति सजग रहने की आवश्यकता


चरित्र निर्माण के बिना हम अपने पुरुषार्थ, भाग्य या किसी समर्थ की कृपा-आशीर्वाद के फलस्वरुप तथाकथ सफलता या बुलन्दी के शिखर पर तो पहुँच सकते हैं, लेकिन वहां टिके रहें, यह सिर्फ और सिर्फ चरित्र बल के आधार पर ही संभव होता है। अतः जीवन में टिकाऊ सफलता के साथ शांति एवं सद्गति के इच्छुक प्रत्येक व्यक्ति के लिए आवश्यक हो जाता है कि वह चरित्र निर्माण की प्रक्रिया के प्रति सजग एवं गंभीर हो जाए, ताकि वह शिखर से रसातल की ओर लुढ़कने की त्रास्द बिडम्बना से बच सके।

इसके लिए चरित्र निर्माण की प्रक्रिया के चरणों की तात्विक समझ आवश्यक है। महापुरुषों के सत्संग से प्राप्त अन्तर्दृष्टि के आधार पर इसके आधारभूत तत्वों पर प्रकाश डाला जा रहा है।

चिंतन, चरित्र एवं व्यवहार - जैसा हम सोचते हैं, बैसा ही हमारा संकल्प बनता है, क्रियाएं सम्पन्न होती हैं, क्रमशः आदतें बनती हैं और संस्कार पुष्ट होते हैं तथा चरित्र का निर्माण होता है, जो हमारे आचरण-व्यवहार को प्रभावित करता है। युगऋषि पं.श्री रामशर्मा आचार्यजी के शब्दों में जैसा हम सोचते व करते हैं, बैसे ही बनते जाते हैं। और इस तरह चरित्र ही हमारी नियति एवं भविष्य को तय करता है।

इस प्रक्रिया को समझते हुए चरित्र निर्माण के संदर्भ में निम्न चरणों को अपनाया जा सकता है –

स्वाध्याय-सत्संग – महापुरुषों का स्वाध्याय एवं सत्संग सबसे महत्वपूर्ण है, जिसके प्रकाश में चिंतन-मनन करते हुए आत्म-चिंतन संभव हो पाता है। आत्म-विश्लेषण की प्रक्रिया गति पकड़ती है, आत्म-सुधार के साथ आत्म-निर्माण एवं आत्म-विकास के चरण आगे बढ़ते हैं और व्यक्तित्व विकास के साथ चरित्र गठन की महान प्रक्रिया सम्पन्न होती है।

आध्यात्मिक आदर्श का वरण – जीवन में कैरियर एवं पेशेवर लक्ष्यों के अनुरुप अपने क्षेत्र से सम्बन्धित महानतम एवं श्रेष्ठतम आदर्शों का चयन किया जा सकता है, लेकिन चरित्र निर्माण के संदर्भ में आध्यात्मिक आदर्शों का वरण आवश्यक है। लौकिक आदर्श सामाजिक सफलता के प्रेरक हो सकते हैं, लेकिन व्यक्तित्व के गहनतम स्तर से रुपाँतरण एवं चरित्र गठन की प्रेरणा, त्वरा एवं प्रकाश तो आध्यात्मिक आदर्श से ही प्राप्त हो पाते हैं। अतः आध्यात्मिक आदर्श का वरण पहला चरण है।

श्रेष्ठ संग-साथ एवं वातावरण – दिन भर हम किन व्यक्तियों, विचारों व संग-साथ के साथ विचरण कर रहे हैं, किस वातावरण में रह रहे हैं, यह चरित्र निर्माण के संदर्भ में महत्वपूर्ण हो जाता है। कुसंग और दूषित वातावरण में हम किन्हीं श्रेष्ठ विचारणा एवं प्रेरणा की आशा नहीं कर सकते। ऐसे में बुरी संगत से अकेला भला की उक्ति को अपनाया जा सकता है। सोशल मीडिया के वर्तमान युग में यहाँ डिजिटल संयम के महत्व को भी समझा जा सकता है।

अनुशासित जीवनशैली – चरित्र गठन के संदर्भ में जीवनशैली का अनुशासित होना आवश्यक है। बिना खान-पान, दिनचर्या, विचार एवं व्यवहार को साधे चरित्र निर्माण की प्रक्रिया को सम्पन्न नहीं किया जा सकता। इस संदर्भ में संयमित आहार, कसी हुई दिनचर्या, सकारात्मक-श्रेष्ठ विचार एवं संतुलित-उदात वाणी-व्यवहार के माध्यम से चरित्र निर्माण की जड़ों का पोषण किया जा सकता है।


जीवन साधना – चरित्र निर्माण के लिए अन्ततः चित्त के स्तर पर उतर कर स्वयं पर कार्य करना पड़ता है। मात्र वाणी, व्यवहार एवं विचारों पर कार्य करने भर से चरित्र गठन की प्रक्रिया सम्पन्न नहीं हो पाती। दीर्घकाल से जड़जमा कर बैठी आदतों एवं हठीले कुसंस्कारों का परिष्कृत करने में समय लगता है। इसके लिए जप, ध्यान प्रार्थना से लेकर प्रायश्चित तप के आध्यात्मिक उपचारों का अवलम्बन लेना पड़ता है। समूचे जीवन को साधनामय बनाना पड़ता है।

निसंदेह रुप में चरित्र निर्माण एक जीवनपर्यन्त चलने वाली प्रक्रिया है (Character building is a lifelong process) और युगनायक स्वामी विवेकानन्द के शब्दों में हजारों ठोकरें खाने के साथ चरित्र का गठन होता है। (Character has to be established through a thousand stumbles.) इसकी दुरुहता, जटिलता, गंभीरता एवं महत्व को समझते हुए हम चरित्र निर्माण की प्रक्रिया के प्रति सजग हो जाएं, इसको जीवनचर्या का हिस्सा बनाएं, क्योंकि यही हमारे गौरव-गरिमा की रक्षक है, यही हमारे गुरुत्व की पौषक है, यही हमारे आत्मिक उत्थान की नींव है और यही हमारे जीवन की टिकाऊ सफलता, सुख-शांति, संतुष्टि एवं परिपूर्णता का आधार है।

यात्रा वृतांत - मानाली से कुल्लू वाया लेफ्ट बैंक

रुट के मुख्य पडावों का विहंगावलोन करता सफर

इस वार मार्च 2026 के दूसरे-तीसरे सप्ताह के मध्य एक सप्ताह का संक्षिप्त प्रवास का संयोग बना। पाँच दिन तो बारिश-बर्फवारी के बीच बीते। अंत में एक दिन साफ मौसम देखते हुए घाटी का एक फील लेने के उद्देश्य से मानाली के लिए निकल पड़ता हूँ। सरवरी कुल्लू बस स्टैंड से राइट बैंक की कुल्लू-मानाली बस को पकड़ता हूँ।

बस अखाड़ा बाज़ार होते हुए रामशिला से आगे बैष्णों माता, पुलिस स्टेशन, बाशिंग जैसे पड़ावों को पार करती हुई सेऊवाग, बवेली, बंदरोल, रायसन जैसे स्टेशनों को कवर होती हुई कटराइं पहुँचती है। मकसद इस सुंदर घाटी के अवलोकन के साथ पिछली बरसात के बाद हुए नुकसान का मुआइना करना था व साथ ही  रूट की वीडियो रिकॉर्डिंग भी चलती रही, लेकिन ठीक कटराईं पहुँचते ही मोबाइल का स्टोरेज फुल हो जाता है। इसे दैवीय संदेश मानते हुए वीडियोग्राफी बंद कर देता हूँ। और आगे मात्र आवश्यक फोटो से काम चलाते हुए क्लाथ होते हुए मानाली पहुँचता हूँ।

रास्ते में बरसात में हुई तबाही का मंजर साफ था, रायसन के आगे और फिर पतलीकुहल के आगे स्पेन रिजॉर्ट तथा आगे क्लाथ व मानाली के आसपास प्राकृतिक प्रकोप के जख्म साफ दिख रहे थे। लगा काफी कुछ हीलिंग हो चुकी है, लेकिन पूरी तरह से रिक्वरी अभी वाकि है। लेफ्ट बैंक में छरुहड़ू के पास तो स्थिति और भी विकट बनी हुई थी। हालाँकि निर्माण कार्य तेजी से चल रहा था, लेकिन कूपित प्रकृति की मार का दंश अभी भी स्पष्ट दिख रहा था।

राइट बैंक के ऊपर बताए पड़ावों को पार करते हुए एक समानान्तर दृष्टि उस पार लेफ्ट बैंक की घाटी पर भी टिकी हुई रही। घाटी की दो से चार किमी चौड़ी बसावट, हल्की ढलान पर बसे सेब व अन्य फलों के वागान, गाँव-कस्वों के पीछे के देवदार जंगल और उनके पीछे बर्फ से ढके पर्वत शिखर, सब मिलाकर घाटी के मनोरम दृश्य हमारे चित्त को आल्हादित कर रहे थे।


मानाली शहर की शीतल आवोहवा, पर्य़टकों का जमावड़ा, स्थानीय लोगों की अपने उत्पादों के साथ व्यापारिक चहल-पहल और ट्रैफिक की व्यस्तता, सब मिलाकर एक जीवंत हिल स्टेशन के दिग्दर्शन करवा रहे थे।

मानाली के कुछ यादगार पलों को समेटते हुए व आवश्यक खरीददारी के बाद मानाली से लेफ्ट बैंक की बस में बैठता हूँ। इस पड़ाव के मुख्य पड़ावों का वर्णन यहाँ कर रहा हूँ, शायद इस रूट में रूचि रखने वाले नये पाठकों का कुछ ज्ञानबर्धन हो सके व कभी यहाँ से गुजरे, तो एक नए नज़रिए से वे इस घाटी का आवलोकन कर सकें।

मानाली, बस स्टैंड से ठीक चार बजे बस चल पड़ती है। ब्यास नदी पर पुल पार करते हुए लेफ्ट बैंक में दायीं ओर मुड़ती है। वायीं ओर की सड़क आगे वाहंग, पलचान, सोलांग घाटी व अटल टनल की ओर जाती है। पलचान से दायां रूट कोठी, गुलावा, मढ़ी होते हुए रोहतांग दर्रे की ओर जाता है।

हम इस रूट के विपरीत कुल्लू की ओर बढ़ रहे थे। पहला पड़ाव अलेऊ आता है, जो पर्वतारोहण संस्थान के लिए जाना जाता है, यह मुख्य मार्ग से दायीं ओर आधा किमी नीचे देवदार के घने जंगलों के बीच ब्यास नदी के किनारे स्थित है। ट्रेकिंग, पर्वतारोहण एवं रोमाँचप्रेमियों के लिए यह संस्थान किसी तीर्थ से कम नहीं। हमें स्वयं 1991 में यहाँ से एडवेंचर और बेसिक कोर्स करने का सौभाग्य मिल चुका है। यहाँ से जुड़े यादगार अनुभवों को आप दिए लिंक में पढ़ सकते हैं। (पर्वतारोहण का विधिवत प्रशिक्षण, भाग-1)

अलेऊ के साथ ही प्रीणी आता है, जहाँ अटल विहारी वाजपेयीजी का सीजनल निवास माना जाता है। आगे शुरु में शवरी माता का सिद्ध पीठ है, जिसका सम्बन्ध महाभारत काल के अर्जुन-किरात युद्ध से जुड़ा हुआ माना जाता है। जगतसुख भी एक पुरातन गाँव है, जो कभी कुल्लू की राजधानी भी रहा और यह अपने पौराणिक एवं दुर्लभ गायत्री मंदिर के लिए जाना जाता है। इसके बाद गोजरा में निर्मल जल के झरने (पाणी रा मोगरा) के दर्शन किए जा सकते हैं तथा खखनाल गाँव कार्तिकेय स्वामी के मंदिर के लिए प्रख्यात है।

सजला में भगवान विष्णु का पौराणिक मंदिर है और इसके आगे देवदार के घने जंगल को पार करते हुए धोमसू गाँव आता है, जिसके बाद करजाँ के रुप में एक बड़ा गाँव आता है। इसके नीचे गजां दोचो-मोचो के मंदिर के लिए जाना जाता है। इसके आगे मनसारी और ऊपर सोयल जैसे प्राकृतिक पर्यटन गांव आते हैं। इन्हीं के साथ हरिपुर डिग्री कॉलेज के लिए जाना जाता है। इसके आगे सरसेई और नीचे बटाहर गाँव आते हैं, आगे छाकी गाँव पड़ता है। यहाँ से नीचे सीढीदार खेतों की सेरी का दृश्य देखने लायक रहता है, कभी धान की खेती के लिए प्रख्यात यह पूरी घाटी अब सेब के बगानों से पटी दिखती है।

इसके आगे आता है कुल्लू-मानाली मार्ग का मध्य पड़ाव नगर जो कुल्लू के अधिकाँश राजाओं की राजधानी रहा। यहीँ पर कुल्लू की शान लालचंद प्रार्थीजी का निवास स्थान है और थोड़ा ऊपर रशियन संत कलाकार निकोलाई रोरिक का समाधी स्थल और आर्ट गैलरी। यहीं से बिजली महादेव के लिए लिंक रोड़ भी जाता है, जिसके मार्ग में नशाला घाटी, नथान सेरी, नथान गाँव, जाणा, बनोट जैसे गाँव आते हैं और आगे कायस वन विहार। इस रुट की जानकारी दिए गए लिंक में पड़ सकते हैं। (बिजली महादेव जीप सफारी वाया नग्गर,जाणा-भाग1)

नगर के ही ऊपर चचोगी व रूमसू जैसे गाँव पड़ते हैं, जो चंद्रखणी पास के लिए ट्रेकिंग रुट का हिस्सा हैं जो आगे मलाना के प्रख्यात गाँव तक जाता है। नगर के आगे भगवान गणेशजी के मंदिर के लिए प्रख्यात घोरदौड़ गांव आता है, जहाँ सुधांशुजी महाराजजी का भव्य आश्रम सडक के साथ सटा है, जो अब संभवतः एक भव्य होटल में रुपाँतरित है। आगे लरांकेलो स्टेशन आता है, जहाँ थोड़ा नीचे देवदार के गगनचुम्बी वृक्षों के बीच लराई महादेव स्थित हैं। आगे हिरनी गाँव आता है, जिसके पीछे छेती, पारशा, शोर्न जैसे गाँव आते हैं। आगे अरछंडी पड़ाव आता है, जहाँ सड़क के साथ काली माता का सिद्ध मंदिर स्थित है।

इसके आगे राउगी नाला आता है, जहाँ माना जाता है कि जाणा फाल का पानी बहता है, इसके किनारे पिकनिक स्पॉट में जलक्रीड़ा का आनन्द लिया जा सकता है। इसके आगे बलोगी, कराड़सू जैसे गाँव आते हैं व आगे कुकड़ी सेरी जो बौद्ध गोंपा के माना जाता है। इसके ठीक उस पार है बंदरोल गाँव, जो हिमाचल में सबसे पहले कैप्टन ली द्वारा स्थापित सेब बगान के लिए माना जाता है।

इसके बाद काईस गाँव आता है, जो भगवती दशमी वारदा का सिद्ध स्थान है और आगे उनके बाहन बरिंडी देवता का स्थान। जिसके बाद मलाहर गाँव आता है, जहाँ जिला का एकमात्र पॉलिटेक्निक कॉलेज स्थित है। जो पहले भेड़ू फार्म व वेटेनरी अस्पताल के लिए जाना जाता था।

इसके आगे आता है सेऊबाग गाँव, जहाँ कुल्लू में अंग्रेजों द्वारा सेब के बगान लगाने के बाद स्थानीय प्रगतिशील बागवानों द्वारा सेब के खनोर (चेस्टनट) के ऐतिहासिक प्रयोगों के लिए जाना जाता है, जिस कारण गाँव का नाम सेऊबाग पड़ा। मानाली से चार बजे चली हमारी बस ठीक छः बजे सेऊबाग पहुँचती है, जिसमें कुछ लेट-लतीफी सरसेई में मेले के कारण हुए जाम के कारण रही।

इसके आगे छरूहड़ू नाला आता है, जो हर वर्ष भूस्खलन के कारण लेफ्ट बैंक के लिए समस्या का सबब बना रहता है, जहाँ वर्ष 2025 में आई भयंकर बाढ़ के दंश आज भी स्पष्ट दिख रहे थे।


हालाँकि निर्माण कार्य तेजी से चल रहा था, लेकिन सड़क अनवरत भूस्खलन के कारण क्षतिग्रस्त दिखी। इसके आगे लुगड़ी भट्टी आती है, जहाँ ऊपर प्रेमनगर चदौहल में रिसर्च सेंटर के रुप में बागवानी फार्म स्थित है, जिसके ऊपर गाहर, छाड़गड़ी, सूईरोपा, पारली बेड जैसे गाँव आते हैं।

इसके आगे जुआंणी रोपा आता है, जहाँ पीछे थरमाहण, नेउली गाँव, बराधा, सराहन जैसे गाँव आते हैं, यहाँ जुआणी महादेव क्षेत्र के जाने-माने देवता हैं। यहीं पर गैमन पुल लेफ्ट और राइट बैंक को जोड़ने वाली एक महत्वपूर्ण संरचना है। यहीं से बिजली महादेव के लिए खराहल घाटी के आर-पार जाने वाला लिंक रोड़ शुरु होता है। इस रुट से बिजली महादेव का यात्रा वृतांत आगे दिए लिंक में पढ़ सकते हैं। (बिजली महादेव का यादगार रोमाँचक सफर)

इसके ठीक बाद आता है रामशीला जहाँ उस पार हनुमानजी का प्रसिद्ध मंदिर मौजूद है। माना जाता है कि बरसात की प्रलयंकारी बाढ़ में यही शिला अखाड़ा बाजार की रक्षा करती है। इसके नीचे आता है टापू जो लेफ्ट बैंक का पुराना बस स्टैंड था, जिससे हमारे बचपन व स्कूल-कालेज के दिनों की अनगिन यादें जुड़ी हुई हैं। अभी यहां से लिंक रोड़ उस पार दाईँ ओर ऊपर मुड़ने पर पुराने बस स्टैंड की ओर जाता है, जहाँ अखाड़ा बाजार कुल्लू की मुख्य मार्केट मौजूद है। नीचे आगे बढ़ने पर ढुग्गी लग घाटी से आने वाली सरवरी नदी के किनारे बना सरबरी बस स्टैंड आता है, जो कुल्लू का नया बस स्टैंड है, यहाँ से हिमाचल के विभिन्न जिलों के साथ अंतर्राजीय बसों की बुकिंग की जा सकती है।

सरवरी नदी को पार करते हुए ऊपर आता है ढालपुर मैदान, जिसे ठारा करड़ू की सोह भी कहा जाता है। अर्थात घाटी के मुख्य देवताओं की क्रीडा स्थली। आश्चर्य़ नहीं वर्ष में एक बाद यहीं पर कुल्लू का विश्व प्रख्यात दशहरा मनाया जाता है। इसी मैदान के ऊत्तरी छोर पर ही सीनियर सैकेंडरी स्कूल और दक्षिणी छोर पर ही डिग्री कॉलेज कुल्लू, जहाँ हमें अपने जीवन के कुछ महत्वपूर्ण बिताने का संयोग-सौभाग्य मिला। यहीं नीचे लालचंदी प्रार्थी कलाकेंद्र है, जहाँ दशहरे में रात को सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित होते हैं और इसी के बग्ल में है जिला पुस्तकालय, जिसको कवर करता ब्लॉग दिए लिंक में पढ़ सकते हैं। (मार्च में बारिश और बर्फ का आगाज़ (2026))

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