बुधवार, 31 दिसंबर 2025

गंगा पार टापू में प्रवास के यादगार पल

गंगाजी में डुबकी के संग जंगल में मंगल

हर वर्ष सर्दी का मौसम आते ही गंगाजी के टापू जैसे नेह भरा आमन्त्रण देते हैं पधारने के लिए अपने आंचल में। न जाने कितने सामूहिक भ्रमण की यादें गंगाजी के टापूओं की गोद में छात्र-छात्राओं, शिक्षकों व कार्यकर्ता भाई-बहनों के साथ जुड़ी हुई हैं, जो क्रमिक रुप से एकांतिक प्रवास की ओर सिमटती जा रही हैं।

तीन दशक पूर्व का ब्रह्मवर्चस शोध संस्थान में प्रवास का दौर, जब समूह के साथ गंगा पार, नदी को पार करते हुए जाते थे, जहाँ टापूओं में बेल फल से लेकर जंगली बेर का आनन्द लेते। पार करते हुए गंगाजी में डूबने व फिर सामान को बटोरते हुए पार करने की यादें ताजा हैं। हरिद्वार महाकुंभ के दौरान इन्हीं टापुओं में बाबाओं के तम्बू गढ़े रहते। पार जाने के लिए अस्थायी पुल की व्यवस्था रहती और सारे टापू साधु-संतो की छावनियों में रुपाँतरित हो जाते।

फिर ब्रह्मवर्चस के निदेशक एवं विवि के कुलाधिपति महोदय के साथ गंगा भ्रमण की भी कई यादें सहज ही चिदाकाश में तैर जाती हैं। हरिपुर गाँव के आगे गंगा के किनारे टॉवर के पास, फिर आगे अनुसूइया आश्रम के प्रांगण में और गंगाजी के उस पर चीला डैम के साथ कई यादें जुड़ी हुई हैं, हालाँकि काल के प्रवाह में अब ये मात्र चित्त को कुरेदती हुई स्मृतियों तक सिमटी हुई हैं।

फिर देवसंस्कृति विश्वविद्यालय में पत्रकारिता विभाग के छात्र-छात्राओं एवं शिक्षकों के संग टापूओं के कई सामूहिक भ्रमण याद हैं, जिनको किश्तों में विजुअल स्टोरीज के रुप में प्रकाशित किया जा सकता है। हालाँकि गंगाजी के तट पर कई दुर्घटनाओं के चलते ऐसे भ्रमण अब बीते दिनों की बातों तक सामित हो गए हैं। फिर यदा-कदा पासआउट विद्यार्थियों के साथ गंगाजी के टापुओं पर भ्रमण की यादें भी जुड़ी हुई हैं, जो समय के साथ अब सिमट रही हैं।

अभी शेष बची हैं इन टापुओं की सहज-स्फुर्त यात्राएं, जो कभी कभार उपलब्ध शिक्षकों व मित्रों के साथ संभव हो पाती हैं। पिछले ही वर्षों ऐसी यात्रा का आगाज़ हुआ था, जिसको आप संपादित वीडियो के रुप में देख व अनुभव कर सकते हैं।


लगता है कि ये यात्राएं मात्र इंसानी इच्छा से निर्धारित नहीं होतीं। कहीं गहरे अंतरात्मा की समवेत पुकार और गंगाजी की कृपा स्वरुप ऐसे संयोग घटित होते हैं और कुछ यादगार पल स्मृतिकोश से जुड़ते हैं और कुछ कर्मों का प्रवाह लेन-देन के क्रम में अपने नियत निष्कर्ष की ओर आगे बढ़ता है।

इसी वर्ष 2025 प्रयागराज महाकुंभ के दौरान जब वहाँ जाने का संयोग नहीं बन पाया तो मकर संक्राँति के दिन इन्हीं टापुओं पर गंगाजी का जैसे बुलावा आता है और यहीं सप्तसरोवर क्षेत्र में महाकुंभ के भावभरे सुमरण के साथ गंगाजी में डुबकी के संग कुंभ स्नान का सुयोग घटित हो जाता है।

इस वर्ष 2025 के दिसम्बर माह में ऐसे ही एक सहज स्फुर्त टापू भ्रमण का संयोग बनता है। शोध छात्र की भारतीय देशज संचार परम्परा पर सप्तवर्षीय शोध-साधना की पूर्णाहुति के रुप में भी इसका संयोग बन रहा था।

गंगा कुटीर घाट नम्बर 18 से प्रवेश होता है, जहाँ इस वर्ष गंगाजी की निर्मल धार पर्याप्त गर्जन-तर्जन के साथ प्रवाहित हो रही है, मानो पहाड़ से उतर कर मैदान की ओर बढ़ने का उत्साह संभाल नहीं पा रही हो।


हरिद्वार में गंगाजी को इसके निर्मलतम स्वरुप में देखने व अनुभव करने के लिए यह घाट सर्वोत्तम है। यहीं पर हरिद्वार क्षेत्र में गंगाजी के पहले दिग्दर्शन होते हैं।

यहाँ से उत्तर की ओर बिरला घाट को पार करते हुए, आगे व्यास मंदिर घाट के समीप से गंगा की पहली धार को पार करते हैं। आगे रेत के मैदान को पार कर पत्थरीले मैदान से होकर दूसरी धार को पार करते हैं। गंगाजी के किनारे कुछ श्रद्धालु, परिवारजन तो कुछ बाबाजी विश्राम कर रहे थे, कुछ स्नान कर रहे थे, तो कुछ ध्यान में मग्न थे। एक विश्राँति, शांति का अनुभव यहाँ सहज रुप में हो रहा था। जीवन के सकल द्वन्द-विक्षोभ और तनाव-अवसाद जैसे गंगाजी के कलकल निनाद में विलीन हो रहे हों।

इसी तरह जल की दो-तीन और धाराएं पार करते हुए हम अंततः जंगल में प्रवेश करते हैं, जहाँ जंगली बेर फल की झाड़ियाँ पके फलों से लदी थीं। आज तक हमने इतने बैर फल पहले कभी नहीं देखे थे। स्वाद में खट्टे-मीठे बैर फल।

थोड़ी आगे पेड़ों के नीचे चिर-परिचित रेतीले टीले पर हम आसन जमाते हैं, जहाँ से गंगाजी के दर्शन सुलभ थे और दूर-दूर के दृश्य का अवलोकन कर सकते थे। यहाँ चूल्हा पहले से ही बना रखा था। यहाँ आसन बिछाते हैं, लकड़ी बटोरते हैं और धूप जलाकर जलपान व स्नान ध्यान का कार्यक्रम शुरु करते हैं।

पास में चरती गाय स्थान की जंगली जानवरों से रहित होने की सूचना दे रहीं थी। दो लड़के जंगल से आते दिखे, शायद इनके चरवाहे रहे हों या हमारी ही तरह घूमने आए हों।

चाय की चुस्की के साथ चर्चा करते हुए आज की पिकनिक का उद्घाटन होता है और फिर गंगाजी के किनारे स्नान के लिए जाते हैं। गंगाजी के बर्फीले स्पर्श वाले निर्मल जल में जैसे तन-मन के सकल विकार धुल रहे थे। आत्म-चैतन्यता जाग्रत हो रही थी और सारी थकान जैसे छूमंतर हो जाती है।

फिर आकर चाय-नाश्ते का क्रम चलता है। चाय पर आपसी संवाद के अतिरिक्त विभाग एवं विश्वविद्यालय के विकास सम्बन्धी भावी संभावनाओं पर चर्चा होती है। साथ ही धुनी, मचान और गुफा आदि पर भी विचार-विमर्श होता है, जो यहाँ पर साधु-संतों की तप साधना के प्रचलित प्रारुप हैं और किसी भी साधक को प्रयोग के लिए लुभा सकते हैं।

अपना आज का संक्षिप्त प्रवास पूरा कर, सामान समेटते हुए पूरा दल गंगाजी की धाराओं को पार करते हुए घाट नम्बर 18 पहुँचता है। और अपने पात्रों में गंगाजाल को भरकर, गंगाजी को प्रणाम करते हुए आज के सफल प्रवास के लिए धन्यवाद ज्ञापित करता है और विवि परिसर की ओर बढ़ता है।

सारतः यदि कोई हरिद्वार पधारता है, तो सहज ही इन टापुओं में गंगाजी के तट पर स्नान-ध्यान व आत्मचिंतन के साथ भीड़ से दूर कुछ शांति-सुकून भरे एकांतिक यादगार पल बिता सकता है और एक नई ऊर्जा के साथ अपने कार्यक्षेत्र के लिए तैयार हो सकता है।

जीवन गीत - अंधेरी सुरंग के पार एक रोशनी का टिमटिमाना

 

2025 बीत चला, 2026 में मंजिल का नया सोपान मिलेगा

 


अंधेरी सुरंग के पार एक रोशनी का टिमटिमाना,

सोए बुझे अरमानों में जैसे नए पंख का लग जाना,

घनघोर रात के बाद जैसे भौर का उजाला छा जाना,

रेगिस्तान में भटक रहे प्यासे को जल का स्रोत मिल जाना।

 

लेकिन अभी तो क्षितिज के पार बहुत दूर है मंजिल,

अग्नि परीक्षा के कई दौर हैं अभी बाकि,

बाहरी छल-छद्म के खेलों का भी होगा राह में सामना,

थक जाओगे राह में पथिक, लेकिन तुम्हें है बस चलते जाना।

 


सबसे बड़ी चुनौती हो स्वयं, चित्त् शुद्धि का विकट कार्य,

बिगड़ैल मन की कुचालों को भी है पग-पग पर साधना,

बार-बार गिरोगे, फिसलोगे, लेकिन लक्ष्य सिद्धि तक

अनन्त काल तक बिना हारे तुम्हें है बस चलते जाना।

 

जहाँ अपनी शक्ति चूक जाए, हाथ खड़े हो जाएं,

वहाँ दैवीय शक्ति, गुरु अवलम्बन में क्या उदासीनता,

दो कदम बढ़ो उस ओर, वह दस कदम पास मिलेगा,

2025 बीत चला, 2026 में मंजिल का नया सोपान मिलेगा।

रविवार, 21 दिसंबर 2025

मरणोतर जीवन रहस्य, भाग-2

 

पितर हमारे अदृश्य सहायक-2


सतत अनुग्रह बरसाने वाले सदाशय पितर –

मरण और पुनर्जन्म के बीच के समय में जो समय रहता है, उसमें जीवात्मा क्या करता है, कहाँ रहता है, आदि प्रश्नों के सम्बन्ध में भी विभिन्न प्रकार के उत्तर हैं, पर उनमें भी एक बात सही प्रतीत होती है कि उस अवधि में उसे अशरीरी, किंतु अपना मानवी अस्तित्व बनाए हुए रहना पड़ता है।

जीवन मुक्त आत्माओँ की बात दूसरी है। वे नाटक की तरह जीवन का खेल खेलती हैं और अभीष्ट उद्देश्य पूरा करने के उपरान्त पुनः अपने लोक को लौट जाती हैं। इन्हें वस्तुओं, स्मृतियों, घटनाओं एवं व्यक्तियों का न तो मोह होता है और न उनकी कोई छाप इन पर रहती है। किंतु सामान्य आत्माओं के बारे में यह बात सही नहीं है।

वे अपनी अतृप्त कामनाओं, विछोह, संवेदनाओं, राग, द्वेष की प्रतिक्रियाओं से उद्गिन रहती हैं। फलतः मरने से पूर्व वाले जन्मकाल की स्मृति उन पर छाई रहती है और अपनी अतृप्त अभिलाषाओं को पूर्ण करने के लिए ताना-बाना बुनती रहती हैं। पूर्ण शरीर न होने से वे कुछ अधिक तो नहीं कर सकती, पर सूक्ष्म शरीर से भी वे जिस-तिस को अपना परिचय देती हैं। उस स्तर की आत्माएं भूत कहलाती हैं।

वे दूसरों को डराती या दबाव देकर अपनी अतृप्त अभिलाषाएं पूरी करने में सहायता करने के लिए बाधित करती हैं। भूतों के अनुभव प्रायः डरावने और हानिकारक ही होते हैं। पर जो आत्माएं भिन्न प्रकृति की होती हैं, वे डराने, उपद्रव करने से विरत ही रहती हैं। अमेरिका के राष्ट्रपति भवन में समय-समय पर जिन पितरों के अस्तित्व अनुभव में आते रहते हैं, उनके आधार पर यह मान्यता बन गई है कि वहाँ पिछले कई राष्ट्रपतियों की प्रेतात्माएं डेरा डाले पडी हैं। इनमें अधिक बार अपने अस्तित्व का परिचय देने वाली आत्मा अब्राह्म लिंकन की है। ये आत्माएं वहाँ रहने वालों को कभी कष्ट नहीं पहुँचाती। वस्तुतः उपद्रवी आत्माएं तो दुष्टों की ही होती हैं।

मरण के समय में विक्षुब्ध मनःस्थिति लेकर मरने वाले अक्सर भूत-प्रेत की योनि भुगतते हैं, पर कई बार सद्भाव सम्पन्न आत्माएं भी शांति और सुरक्षा के उद्देश्य लेकर अपने जीवन भर सम्बन्धित व्यक्तियों को सहायता देती-परिस्थितियों को सम्भालती तथा प्रिय वस्तुओं की सुरक्षा के लिए अपने अस्तित्व का परिचय देती रहती हैं। पितृवत् स्नेह, दुलार और सहयोग देना भर उनका कार्य होता है।

पितर ऐसी उच्च आत्माएं होती हैं जो मरण और जन्म के बीच की अवधि को प्रेत बनकर गुजारती हैं और अपने उच्च स्वभाव संस्कार के कारण दूसरों को यथासम्भव सहायता करती रहती हैं। इनमें मनुष्यों की अपेक्षा शक्ति अधिक होती हैं। सूक्ष्म जगत से सम्बन्ध होने के कारण उनकी जानकारियाँ भी अधिक होती है। उनका जिनसे सम्बन्ध हो जाता है, उन्हें कई प्रकार की सहायताएं पहुँचाती हैं। भविष्य ज्ञान होने से वे सम्बद्ध लोगों को सतर्क भी करती हैं तथा कई प्रकार की कठिनाईयों को दूर करने एवं सफलताओं के लिए सहायता करने का भी प्रयत्न करती हैं।

ऐसी दिव्य आत्माएं, अर्थात पितर सदाशयी, सद्भाव-सम्पन्न और सहानुभूतिपूर्ण होती हैं। वे कुमार्गगामिता से असन्तुष्ट होतीं तथा सन्मार्ग पर चलने वालों पर प्रसन्न रहती हैं।

पितर वस्तुतः देवताओं से भिन्न किंतु सामान्य मनुष्य से उच्च श्रेणी की श्रेष्ठ आत्माएं हैं। वे अशरीरी हैं, देहधारी से सम्पर्क करने की उनकी अपनी सीमाएं होती हैं। हर किसी से वे सम्पर्क नहीं कर सकतीं। कोमलता और निर्भीकता, श्रद्धा और विवेक दोनों का जहाँ उचित संतुलन सामंजस्य हो, ऐसी अनुकूल भाव-भूमि ही पितरों के सम्पर्क के अनुकूल होती है। सर्व साधारण उनकी छाया से डर सकते हैं, जबकि डराना उनका उद्देश्य नहीं होता। इसलिए वे सर्व साधारण को अपनी उपस्थिति का आभास नहीं देतीं। वे उपयुक्त मनोभूमि एवं व्यक्तित्व देखकर ही अपनी उपस्थिति प्रकट करती और सत्परामर्श, सहयोग-सहायता तथा सन्मार्ग-दर्शन कराती हैं।

अवांछनीयता के निवारण, अनीति के निकारण की सत्प्रेरणा पैदा करने तथा उस दिशा में आगे बढ़ने वालों की मदद करने का काम भी ये उच्चाशयी पितर आत्माएँ करती हैं। अतः भूत-प्रेतों से विरक्त रहने, उनकी उपेक्षा करने औऱ उनके अवांछित-अनुचित प्रभाव को दूर करने की जहाँ आवश्यकता है, वहीं पितरों के प्रति श्रद्धा-भाव दृढ़ रखने, उन्हें सद्भावना भरी श्रद्धांजलि देने तथा उनके प्रति अनुकूल भाव रखकर उनकी सहायता से लाभान्वित होने में पीछे नहीं रहना चाहिए। (जारी, शेष अगले ब्लॉग में...)


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