पितर हमारे अदृश्य सहायक-3
अविज्ञात की अनुकम्पा भी अदृश्य सत्ता का ही अनुदान
उपनिषद् के ऋषि का अनुभव है कि आत्मा जिसे वरण
करता है उसके सामने अपने रहस्यों को खोलकर रख देता है। इस उक्ति का निष्कर्ष यह है
कि रहस्यों का उद्घाटन चेतना की गहराइयों से होता है। मानवी संसार की सामयिक
आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए वह अनुदान इस धरती पर उतारता रहता है। यह अवतरण जिनके
माध्यम से होता है, वे सहज ही श्रेयाधिकारी बन जाते हैं।
वैज्ञानिक आविष्कारों का श्रेय यों उन्हें
मिलता है जिनके द्वारा वे प्रकाश में आने योग्य बन सकें। किन्तु यहाँ यह विचारणीय
है कि क्या उसी एक व्यक्ति ने उस प्रक्रिया को सम्पन्न कर लिया? आविष्कर्ता जिस रूप में अपने प्रयोगों
को प्रस्तुत कर सके हैं, उसे प्रारम्भिक ही कहा जा सकता है।
सर्वप्रथम प्रदर्शन के लिए जो आविष्कार प्रस्तुत किये गये वे कौतुहलवर्धक तो अवश्य
थे, आशा और उत्साह उत्पन्न करने वाले भी पर
ऐसे नहीं थे, जो लोकप्रिय हो सकें और सरलतापूर्वक
सर्वसाधारण की आवश्यकता पूरी कर सकें। रेल, मोटर, टेलीफोन हवाई जहाज आदि के जो नमूने
पंजीकृत कराये गये थे, उनकी स्थिति ऐसी नहीं थी कि उन्हें
सार्वजनिक प्रयोग के लिए प्रस्तुत किया जा सके यह स्थिति तो धीरे-धीरे बनी है और
उस विकास में न्यूनाधिक उतना ही मनोयोग और श्रम पीछे वालों को भी लगाना पड़ा है
जितना कि आविष्कर्ताओं को लगाना पड़ा था।
संसार के महान् आन्दोलन आरम्भिक रूप में बहुत
छोटे थे। उनके आरम्भिक स्वरूप को देखते हुए कोई यह अनुमान नहीं लगा सकता था कि कभी
इतने सुविस्तृत बनेंगे और संसार की इतनी सेवा कर सकेंगे। किन्तु अविज्ञात ने जहाँ
उन आन्दोलनों को जन्म देने वाली प्रेरणा की निर्झरणी का उद्गम उभारा, किसी परिष्कृत व्यक्ति के माध्यम से
उसे विकसित किया, साथ ही इतनी व्यवस्था और भी बनाई कि उस
उत्पादन को अग्रगामी बनाने के लिए सहयोगियों की श्रृंखला बनती बढ़ती चली जाय। ईसा, बुद्ध, गाँधी आदि के महान आन्दोलनों का आरम्भ और अन्त-बीजारोपण और विस्तार
देखते हुए लगता है यह श्रेय-साधन किसी अविज्ञात शक्तियों में पितर-सत्ताओं का भी
समावेश है।
जिन आविष्कर्ताओं को श्रेय मिला, उन्हें सौभाग्यशाली कहा जा सकता हैं।
गहरे मनोयोग के सत्परिणाम क्या हो सकते हैं ? इसका
उदाहरण देने के लिए भी उनके नामों का उत्साहवर्धक ढंग से उल्लेख किया जा सकता है।
गहराई में उतरने की प्रेरणा भी उस चर्चा से कितनों को ही मिलती है। पर यह भुला न
दिया जाना चाहिए कि उन आविष्कारों के आरम्भ के रहस्य प्रकृति ही अपना अन्तराल
खोलकर प्रकट करती है। हाँ इतना अवश्य है कि इस प्रकार के रहस्योद्घाटन हर किसी के
सामने नहीं होते। प्रकृति को भी पात्रता परखनी पड़ती है। अनुदान और अनुग्रह भी
मुफ्त में नहीं लूटे जाते,
उन्हें पाने के लिए भी उपयुक्त मनोभूमि
तो उस श्रेयाधिकारी को ही विर्निमित करनी पड़ती है।
आविष्कार की चर्चा इतिहास पुस्तकों में जिस
प्रकार होती है, वह बहुत पीछे की स्थिति है। आरम्भ कहाँ से होता है यह देखना हो तो
पता चलेगा कि उन्हें आवश्यक प्रकाश और संकेत अनायास ही मिला था। इनमें उनकी पूर्व
तैयारी नहीं के बराबर थी। दूसरे शब्दों में कहा जाय तो यह भी कह सकते हैं कि उन पर
इलहम जैसा उतरा और कुछ बड़ा कर गुजरने के लिए आवश्यक मार्ग दर्शन देकर चला गया।
संकेतों को समझने और निर्दिष्ट पथ पर मनोयोगपूर्वक चल पड़ने के लिए तो उन
आविष्कर्ताओं की प्रत्तिभा को सराहना ही पड़ेगा।
बात लगभग दो हजार वर्ष पुरानी है। एशिया माइनर
के कुछ गड़रिये पहाड़ी पर भेड़े चरा रहे थे। उनकी लाठियों के पेंदे में लोहे की
कीलें जड़ी थीं। उधर से गुजरने पर गड़रियों ने देखा कि लाठी पत्थरों से चिपकती है
और जोर लगाने पर ही छूटती। पहले तो इसे भूत-प्रेत समझा गया फिर पीछे खोजबीन करने
से चुम्बक का विज्ञान यहीं से आरम्भ हुआ। आज तो चुम्बक एक बहुत बड़ी शक्ति की
भूमिका निभा रहा है।
यह गड़रिये चुम्बक का आविष्कार करने का उद्देश्य
लेकर नहीं निकले थे। और न उनमें इस प्रकार के तथ्यों को ढूँढ निकालने और
विश्वव्यापी उपयोग के लायक किसी महत्त्वपूर्ण शक्ति को प्रस्तुत कर सकने की क्षमता
थी।
न्यूटन ने ने देखा कि पेड़ से टूटकर सेव का फल
जमीन पर गिरा। यह दृश्य देखते सभी रहते हैं, पर
न्यूटन ने उस क्रिया पर विशेष ध्ययान दिया और माथापच्ची की कि फल नीचे ही क्यों
गिरा, ऊपर क्यों नहीं गया? सोचते-सोचते उसने पृथ्वी की आकर्षण
शक्ति का पता लगाया और पीछे सिद्ध किया कि ग्रह-नक्षत्रों को यह गुरुत्वाकर्षण ही
परस्पर बाँधे हुए है। इस सिद्धान्त के उपलब्ध होने पर ग्रह विज्ञान की अनेकों
प्रक्रियाएँ समझ सकना सरल हो गया।
पेड से फल न्यूटन से पहले किसी के सामने न गिरा
हो ऐसी बात नहीं है। असंख्यों ने यह क्रम इन्हीं आँखों से देखा होगा पर किसी
अविज्ञात ने अकारण ही उसके कान में गुरुत्त्वाकर्षण की सम्भावना कह दी और उसने संकेत
की पूँछ मजबूती से पकड़ कर श्रेय प्राप्त करने वाली नदी पार कर ली।
अब से ३०० वर्ष पुरानी बात है। हालैंड का चश्मा
बेचने वाला ऐसे ही दो लैंसों को एक के ऊपर एक उलट पुलट कर कौतुक कर रहा था, दोनों शीशों को संयुक्त करके आँख के
आगे रखा तो विचित्र बात सी दिखाई पड़ी। उसको गिरजा बहुत निकट लगा और उस पर की गई नक्कासी
बिल्कुल स्पष्ट दीखने लगी। दूरबीन का सिद्धांत इसी घटना से हाथ लगा और अब अनेक
प्रकार के छोटे-बड़े दूरबीन विज्ञान की शोधों में महत्त्वपूर्ण योगदान दे रहे हैं।
एक्सरे
के आविष्कार का श्रेय जिस व्यक्ति को मिला, उसने
जान बूझ कर नहीं बनाया था। उस संयोग के पीछे कोई अविज्ञात ही काम कर रहा होगा।
अन्यथा ऐसे-ऐसे संयोग आये दिन न जाने कितने सर्वसाधारण के सामने आते रहते हैं।
उसकी ओर ध्यान जाने का कोई कारण भी नहीं होता।
बात आविष्कारों की हो या आन्दोलनों की, श्रेय साधनों का शुभारम्भ 'अविज्ञात' की प्रेरणा से होता है। इस अविज्ञात को
ब्रह्म कंहा जाय या प्रकृति, इस
पर बहस करने की आवश्यकता नहीं। श्रेय लक्ष्य है। प्रगति अभीष्ट है। वह आत्मा के, परमात्मा
के उद्गम से आविर्भूत होता है। एक सहयोगी श्रृंखला का परिपोषण पाकर विकसित होता
है। एक सहयोगी पितरों, स्वर्गीय श्रेष्ठ आत्माओं द्वारा भी प्राप्त होता है।
देवसत्ताओं द्वारा भी तथा सर्वोच्च सत्ता की अव्यक्त प्रेरणा द्वारा भी।
गड़रियों ने जब अग्नि का आविष्कार किया, उस समय पहले तो आग की चिन्गारियों को
उन्होंने भूतों का ही उपद्रव समझा, पीछे
पितरों की कृपा मान कर उत्सव मनाया, आनन्दित
हुए और पितरों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त की।
श्रद्धा-भाव रखने तथा श्रेष्ठ जीवन क्रम अपनाए
रहने पर उच्च स्तरीय पितर-सत्ताएँ सचमुच ऐसे ही महत्त्वपूर्ण सहयोग अनुदान
प्रकाश-प्रेरणाएं प्रदान करती हैं, जो
व्यक्ति एवं समाज के जीवन को सुख-सुविधाओं से भर देती है। उन पितरों की अपेक्षा
यही रहती है कि इन उदार अनुदानों का दुरुपयोग न हो। परमेश्वर की भी तो मनुष्यों से
यही अपेक्षा रहती है। पर कृतघ्न मनुष्य इतनी-सी अपेक्षा भी पूरी नहीं कर पाता। (जारी...)


कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें