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शनिवार, 31 जनवरी 2026

मेरा गाँव मेरा देश: प्राकृतिक फ्लोरा-फोना संग यादें बचपन की

                                                   गाँव का फ्लोरा-फोना और जैव-विविधता

यहाँ चर्चा हो रही है गाँव के फ्लोरा-फोना की, अर्थात् वनस्पति, जीव-जंतु आदि की, जो बचपन में हमारे जीवन का अभिन्न हिस्सा रहे। जिनसे बचपन की कई यादें जुड़ी हुई हैं और बदलते समय के साथ इनके भौतिक स्वरुप व अस्तित्व में आए परिवर्तन के साथ इन भावों का झंकृत होना स्वाभाविक है। प्रस्तुत है इसी का लेखा-जोखा, जिससे उस दौर से गुजरे लोग भली-भाँति स्वयं को जोड़ सकते हैं और हिमालय की जैव-विवधता रुचि रखने वाले सुधी पाठक भी इस परिवर्तन में निहित शाश्वत तत्व को ह्दयंगम कर अपना ज्ञानबर्धन कर सकते हैं।

गाँव व इलाके के प्राकृतिक फल व सब्जियाँ - बचपन के दौर में घर-गाँव में सबकुछ प्राकृतिक रुप में उपलब्ध होता था, अपने खेत व क्यारियों में आवश्यकता की सब्जी-भाजी व तरकारियाँ उग आती थीं। भिंडी, टमाटर, खीरा, कद्दु, लौकी, घिया, करेला, वैंगन आदि सब घर की ही क्यारियों, आंगन व छत पर उगते थे। मौसमी सरसों का साज सीजन में सहज ही खेतों में उपलब्ध रहता। ये सब अपने साथ दूसरों के भी काम आते थे। जरुरत से अधिक हुए तो पड़ोसी, रिश्तेदारों के साथ इनका आदान-प्रदान चलता था। बाज़ार से इनको खरीदने का तब कोई चलन नहीं था।

कभी घर के बड़े-बुजुर्ग बाज़ार गए तो कुछ विशेष सब्जियाँ व फल ही वहाँ से खरीदते, जो घरों में नहीं उगते थे। जैसे आलू, प्याज आदि से लेकर केला, आम, पपीता जैसे फल।

जंगल व वनक्षेत्र भी कुछ विशिष्ट सब्जियों व वनस्पतियों के उर्बर स्रोत रहते। लिंगड़ी इसमें प्रचलित थी, जो आज भी जंगल में नमी व छायादार स्थानों पर बहुतायत में मिल जाती है। 


इससे सब्जी से लेकर आचार बनता। खेत के मेढ़ों में देसी आढू व विदाना के पेड़ों से तोड़े फलों से आढ़ू-विदाना का आचार बनता, जिसका कोई सानी नहीं रहता। इनके साथ बिच्छू बूटी की मुलायम पत्तियों की सब्जी व चटनी भी नाश्ते का हिस्सा बनती। 
 

यहाँ गुच्छी का नाम लिए बिना चर्चा अधूरी रहेगी। फरवरी-मार्च माह में खेतों के किसी कौने में या जंगल में गुच्छी के झुंड मिलते। इसे विश्व की सबसे पौष्टिक और मंहगी सब्जी माना जाता है। यह कैसे व कब जंगल में उगती है, यह लम्बे समय तक एक पहेली रही है, हालाँकि अब कुछ वैज्ञानिक इसे प्रयोगशाला में तैयार करने की बात करने लगे हैं। 


सुबह-सुबह पुराने सेब-जापानी के पेड़ के नीचे ओंस भरी घास से झांकते गुच्छी के दर्शन रोमाँचित करते। फिर थोड़ा बड़ा होने पर ही इनको तोड़ते।

खेतों में ही मेढ़ों पर उगे शहतूत, अंजीर जैसे फलदार पेड़ बच्चों के लिए मौसम का फल सावित होते। इसके साथ काली और लाल रंग की आंछा (झाडियों में उगने वाली जंगली बैरी), शांभल (किल्मोड़ा) के खट्टे-मीठे बेंगनी दानेदार फल व जंगली दाडू (अनार) भी दोपहर को भूख लगने पर नाश्ता बनते, जब गाय व भेड़ों के साथ हम ग्वाल धर्म निभाते जंगल जाते। शेगल के पके काले फल भी चीकू से कम स्वादिष्ट नहीं रहते थे। जंगल में ये बंदर, लंगूर व भालू का प्रिय आहार रहते। 

घर में जैविक रुप से परम्परागत गैंहू, धान, मक्का, जौ आदि अन्न उगाए जाते। गाय का गौबर उर्बरक के रुप में काम आता। हालांकि धीरे-धीरे रसायन खाद का चलन भी हमने बढ़ते देखा। दाल में अपने ही खेत में माष, राजमाष, सोयावीन, चना, मूँग, मसूर, रोंगी जैसी फसलें घर की आवश्यकता को पूरा करती।

तिल की फसल भी बचपन में होती, जिसका तेल तैयार होता। खिचडी के साथ इसका बहुत जायकेदार कम्बिनेशन रहता। तिल की चटनी का उपयोग भटूरे व सिड्डू में होता। इसके सूखे लट्ठों को जलाकर दिवाली की सर्द रातों में जलाते, जिसका आनन्द दीपपर्व के उत्सव में एक नया ही रंग घोलता था। सरसों की खेती के संग पीले रंग से अटे खेत एक अलग ही नज़ारा पेश करते। बागवानी के बढ़ते चलन के कारण अब ऐसे दृश्य कम ही रह गए हैं।   

मोटे अनाज में कोदरा, चीणी, काउणी, टाक, सरयारा (रामदाणा) की फसलें हमने घर में ही उगती देखी। सरयारा से तैयार होने वाली धाणा व फैंबड़ा (नकमीन खीर) का स्वाद नहीं भूल सकते। पूर्वजों द्वारा उगाए जाने वाले ये मोटे अनाज धीरे-धीरे लुप्त होते गए। जैसे-जैसे बागवानी का चलन बढता गया, सब्जियों में केश क्रॉप का चलन शुरु हुआ, किसानों का ध्यान अर्थ उपार्जन में अधिक हो चला व पारंपारिक विरासत का संरक्षण-संवर्धन कहीं पीछे छूटता गया।

इसी क्रम में ब्रौकली, सेलरी, पक्चोई, जुग्नी, स्कवैश जैसी एग्जोटिक सब्जियों का चलन बढ़ता चला। 


इसी के साथ टमाटर, फूलगोभी, बंद गोभी आदि का उत्पादन अपनी आवश्यकता तक सीमित न होकर, नकदी फसल (केश क्रोप) के रुप में होने लगा। यह किसानों के आर्थिक स्वावलम्बन की दृष्टि से आवश्यक भी था, लेकिन इनके साथ सब्जियों से जुड़ा प्राकृतिक एवं जैविक स्वाद पीछे छूटता गया। रसायन से लेकर कीटनाशकों को बहुतायत में छिड़काव होने लगा।

आज बचपन की यादों का वह प्राकृतिक जीवन स्मृतियों की गोद में दबा पड़ा है और थोड़ा कुरेदने पर भावुक एवं रोमांचित करता है और दुबारा उसे जीने का भाव जगाता है। हालाँकि किचन गार्डनिंग के रुप में उस चलन को दुवारा शुरु किया जा सकता है। लेकिन समय का प्रभाव तो घटनाओं व परिस्थितियों पर स्पष्ट है। 

गाँव व इलाके के जीव-जंतु - गाँव व इलाके के जीव-जंतुओं की चर्चा किए बिना बात अधूरी रह जाएगी। घर में पाले गए कुत्ते, बिल्ली, भेड-बकरियाँ व गाय-बैल तो परिवार का अनिवार्य हिस्सा रहते। कुछ समय मुर्गियों के पालन को भी देखा। धीरे-धीरे भेड़-बकरियों का चलन कम होता गया। फिर टिल्लर मशीन आने से बैल भी दुर्लभ होते हुए। अब गाय पालन शेष बचा है। उससे भी कई लोग अब गुरेज करने लगे हैं व दूध खरीद कर आवश्यकता पूरा कर रहे हैं।

घर-आंगन में सबसे रोचक पक्षियों में गौरेया व मैना रहते। 


गौरेया झुंडों में फुदकते व चहचहाते हुए वातावरण में एक रौनक लाए रहती। खास कर धान के टूहके के पास ये झुंडों में दाना चुगती और हम इनको पकड़ने का असफल प्रय़ास करते। आज गौरेया के दर्शन दुर्लभ हो चले हैं ऊँचाई वाले गाँवों में ही इनके दर्शन किए जा सकते हैं, वहीं मैना आज भी बैसे ही घर की शोभा बढ़ा रही हैं।

कौआ तो सदावहार पक्षी रहा है। सर पर कल्गी धारी पिक्लटूरु भी अपना दर्शन देते थे। उपउपड़े अपनी मधुर हुपहुप ध्वनि के कारण एक नई मिठास घोलते, जिनके दर्शन अब दुर्लभ हो चले हैं। इसी तरह वसंत में पहाड़ी कोयल कुप्पू चिडिया अपनी मीठी व सुरीली आवाज से एक मंगलमयी रस बिखेरती। जो आज भी जारी है। घूघती का अपना ही जल्बा रहता, जो बिजली की तार पर जोड़ें में शोभायमान रहती। फलों के सीजन में तोतों की मौज रहती, जो झुंडों में एक बगीचे से दूसरे बगीचे में उड़ान भरते रहते। उल्टा कौआ (चमगादड़) भी बाल मन के लिए एक कौतुक का विषय रहते, क्योंकि दिन में इनके दर्शन नहीं होते थे और रात को खाली हवा में उड़ते दिखते और बगीचों में फलों का भक्षण करते। 

खेत के कौनों में तीतर की तिरक-तिरक-तितरी आवाज भी सभी का ध्यान आकर्षित करती। कड़ेशे (जंगली मुर्गे) जंगल व खेतों में जहाँ-तहाँ मिलते, जो आज भी बहुतायत में पाए जाते हैं। जंगल की शान मोनाल पक्षी के बारे में सुनते थे, लेकिन उसकी सुंदर एवं सतरंगी कलगी के लिए शिकार के चलते आज उसका अस्तित्व संकट में है तथा उसके दर्शन दुर्लभ हो गए हैं। ऐसे ही चकोर पक्षी भी शिकार के कारण दुर्लभ हो गए हैं। सफाई करने वाले गडिल्ण (गिद्ध) पक्षी भी आज दुर्लभ श्रेणी में आ गए हैं। 

जंगलों में गीदड़, तेंदुआ, बाघ, भालू आदि की चर्चा बचपन में होती, जिनके प्रत्यक्ष दर्शन दुर्लभ थे। रात को गीदड़ों के चिल्लाने की आवाजें गाँव के कुत्तों को चौकन्ना कर देती। तेंदुए व बाघ के दर्शन तो दुर्लभ ही रहे। हाँ भालूओं से जुड़ी घटनाओं को किवदंतियों के रुप में अपने बुजुर्गों से सुनते। जंगल में जाने पर भालुओं द्वारा खोदी जमीं के दर्शन प्रायः होते रहे। बर्फ में उनके पंजों के निशान भी दिखते रहे। लेकिन पिछले कुछ वर्षों से हर वर्ष इंसान पर हमले की घटनाएं बढ़ रही हैं, जो चिंता का विषय है। हालाँकि जंगली जानवरों के संदर्भ में प्रचलित है कि वे बिना कारण हमला नहीं करते। जब अचानक किसी से सामना होता है, तो वे आत्मरक्षा में हमला करते हैं। जब मादा भालू अपने शाबकों के साथ होती है, तो वह आक्रमक होती है।

पिछले कुछ वर्षों से वन्य विभाग द्वारा जंगलों में तेंदुए छोड़े जाने से इनकी संख्या में वृदिध हो रही है, दूसरा जंगलों के घटते दायरे से उनके भोजन का अभाव हो चला है, जिससे ये इंसानी वस्तियों की ओर आने के लिए मजबूर हो रहे हैं। अतः आए दिन पालतू कुत्तों व मवेशियों पर इनके हमले बढ़ रहे हैं।

जंगलों में बंदर, लंगूर आदि के दर्शन होते है तथा उंचाई के गाँव में फसलों व फलों को ये नुकसान पहुँचाते है। नीचे हमारे घर के आसपास इनके दर्शन दुर्लभ ही रहे। जंगल में तो गडीहण (उड़न गिलहरी) के दर्शन भी होते रहते।

इसके साथ मधुमक्खियों का पालन भी पुश्तों से बुजुर्गों का एक शग्ल रहता। हर घर में इनके छत्ते (मडाम) मिलते। आज इनकी संख्या कम हो चुकी है। हालाँकि कुछ शौकिया तौर पर, तो कुछ बागवानी के चलते फ्रेम जड़े बक्सों में मधुमक्खियों का पालन करन लगे हैं।

गांव व इलाके के वृक्ष-वनस्पति – में भेखल, शांभल, टिम्बर आदि लोकप्रिय़ थे, जिनसे कई तरह की यादें जुड़ी हुई हैं। भेखल की खाली पाइप को हम बंदूक की तरह इस्तेमाल करते। शांभल के छोटे-छोटे खट्टे-मीठे जांमुनी फल खाते और बाद में पता चला कि दारु हल्दी के रुप में इससे कैंसर की दबा बनती है। टिम्बर (तिरमिरा) का उपयोग हम माउथ फ्रेशनर के रुप में करते।

कोउश (अतीश) के पेड़ गाँव के नाले व ब्यास नदी के किनारे कतार में दर्शन देते तथा शीतलता व छाया देते। शेगल व बाँज के सदावहार पेड़ चारे के रुप में काम आते। इसके जंगल गाँव वासियों के लिए सर्दी में चारा का एक मह्त्वपूर्ण विकल्प रहते। मोहरु का इकलौता हराभरा पेड़ खेत के कौने में शौभा देता। ऊँचाइयों में काईल, रई, तोश, देवदार के गगनचूंबी पेड़ों की तो बात ही कुछ ओर रहती। जिनके दर्शन हमें एक दूसरी ही दुनियाँ में विचरण की अनुभूति देते। 

इस तरह अपने गाँव व क्षेत्र में जीव-जंतुओं एवं वृक्ष-वनस्पतियों का यह पिछले साढ़े पाँच दशक का मुआइना स्पष्ट करता है कि चीजें काफी बदल गई हैं। कुछ ग्लौबल वार्मिंग के चलते जलवायु परिवर्तन, तो कुछ जीवन में मशीनों के हस्तक्षेप व अधिक धन कमाने की दौड़ तथा प्रकृति के साथ इंसान का बढ़ता हस्तक्षेप, सब मिलाकर हिमालय के इस सुंदर क्षेत्र की जैव-विविधता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा रहा है। जिसका संरक्षण हर स्तर पर किए जाने की आवश्यकता है। पहाड़ी क्षेत्रों का प्राकृतिक सौंदर्य, स्वास्थ्यबर्धक आवोहवा व सुख-शांतिपूर्ण जीवन बहुत कुछ इससे जुड़ा हुआ है। 

गुरुवार, 30 दिसंबर 2021

मेरा गाँव मेरा देश - मधुमक्खी पालन

 हिमालय की वादियों में मधुमक्खी पालन

बर्फ में हिमालयन बी फार्म मोहिला का विहंगम नजारा

शहद के साथ बचपन की कितनी सारी यादें जुड़ी हुई हैं। घर की छत्त पर प्राय़ः दक्षिण या उत्तर दिशा में मधुमक्खी के दीवाल के साथ जड़े छत्त लगे होते थे, जिन्हें क्षेत्रीय भाषा में म़ड्ड़ाम कह कर पुकारते हैं। साल भर में एक बार हमारे बड़े-बुजुर्ग इनसे शहद निकालते। धुँआँ देकर मधुमक्खियों को कुछ देर के लिए बाहर निकाला जाता और इनके छत्तों के बीच शुद्ध शहद से जड़े छत्ते को काटकर अलग किया जाता।

इसको ऐसे ही टुकड़े में खाने का लुत्फ लेते और शेष का कपड़छान कर अलग कर लेते। कभी कभार खाने के लिए इस शहद का उपयोग होता, अधिकाँशतः औषधी के लिए इसको सुरक्षित रखते। या फिर शास्त्र के रुप में इसे पूजा कार्यों के लिए संरक्षित रखा जाता। ऐसे नानीजी के खजाने में कईयों साल पुराने शहद से भरे वर्तन सुरक्षित मिलते। मालूम हो कि शहद एक ऐसा विरल उत्पाद है, जो कभी खराब नहीं होता।

हिमालयन बी फार्म में उपलब्ध शुद्ध देशी शहद
 

अब हालाँकि पारम्परिक रुप में शहद के ये तौर-तरीके पीछे छुटते जा रहे हैं। एक तो फल व सब्जियों में बहुतायत में उपयोग किए जाने वाले रसायन व कीटनाशकों के कारण मधुमक्खियाँ खुलकर परागण नहीं कर पाती, अधिकाँश तो विलुप्त हो चली हैं। इस कारण हिमालयन मधुमक्खियों का शहद अब पहाड़ों में तराई के इलाकों की वजाए अधिक ऊँचाईयों तक सीमित हो चला है, जहाँ अभी भी जंगली फूल व बनौषधियाँ प्रचूर मात्रा में उपलब्ध रहती हैं, जो खिलने पर मधुमक्खियों के लिए परागण का आहार उपलब्ध कराते हैं।

मधुमक्खी पालन का नया चलन – हालाँकि अब बक्सों में शहद की मधुमक्खियों के पालन का चलन चल पड़ा है, जो पारम्परिक तरीके से एक प्रकार से थोड़ा अधिक वैज्ञानिक और व्यवहारिक लगता है, जिसमें मधुमक्खियों के छत्तों को कम से कम छेड़खान के साथ इससे अधिक शहद प्राप्त किया जा सकता है।

फ्रेमयुक्त बक्से में मधुमक्खी का आवास

वर्ष 2021 का नवम्बर माह और आज हमारी यात्रा का संयोग बन रहा था, ऐसे ही एक हनी कीपर, श्री लाल सिंह ठाकुर के हिमालयन बी फार्म में, जहाँ वे सेब के बगान के बीच पिछले 15-16 बर्षों से मधुमक्खी पालने के अपने शौक को अंजाम दे रहे हैं। इनके बगीचे में फैले 150 के करीब बक्सों में ये हर सीजन का शहद तैयार करते हैं। ये इनके मधुमक्खी पालन के शौक के साथ इनके लिए रोजगार का भी एक सशक्त साधन बन चुके हैं और ये इच्छुक किसानों को इसका प्रशिक्षण भी देते हैं और अपने यू-ट्यूब चैनल हिमालयन बीज (Himalayan Bees) के माध्यम से अपना अनुभव साझा करते रहते हैं, जिससे जुड़कर आप मधुमक्खी पालने की बारीकियाँ सीख सकते हैं। 

नवम्बर माह में Himalayan Bees फार्म, Mohila

नग्गर से होकर यहाँ जाने के लिए पहले पतलीकुहल पहुँचना पड़ता है, जो कुल्लू-मानाली राइट-बैंक का मध्य बिंदु है। यहाँ तक का दूसरा रास्ता कुल्लू की ओर से कटराईं होकर पतलीकुल पहुँचता है। मानाली से भी सीधे पतलीकुहल पहुँचा जा सकता है।

पतलीकुहल से आगे बड़ाग्राँ-पनगाँ लिंक रोड़ के साथ यहाँ तक पहुँचा जा सकता है।

नग्गर से पतलीकुहल की ओर, ब्यास नदी को पार करते हुए

बड़ाग्राँ इस रुट का पहला बड़ा गाँव पड़ता है, इसके आगे आता है पनगाँ गोम्पा। यहां सड़क के नीचे रंग-बिरंगे कपड़ों की झालरें इसका परिचय देती हैं।  इसके आगे सड़क पर बढ़ते हुए समानान्तर उस पार लेफ्ट बैंक में अप्पर बैली का विहंगम दृश्य दर्शनीय रहता है। यहीं से सामने नगर के पीछे चंद्रखणीं पास की बर्फ से ढ़की चौटियों के दर्शन किए जा सकते हैं। और पास में सडक के साथ पहाड़ों पर पहाड़ी घर व गाँव के नजारें बहुत सुन्दर लगते हैं।

उस पार लेफ्ट बैंक नग्गर साईड, चंद्रखणी पास में बर्फ ढके पहाड़
थोड़ी आगे एक डायवर्जन आता है, जहाँ वायीं ओर से सड़क आगे शेगली की ओर जाती है, जो स्वयं में एक लोकप्रिय टूरिस्ट डेस्टिनेशन है, जबकि सीधे आगे सड़क पनगां की ओर जाती है। सड़क के दोनों ओर सेब के बाग स्वागत करते हैं, हालाँकि नवम्बर में इनमें फलों का तुड़ान हो चुका था।

पहाड़ी झरने रास्ते में अपने गर्जन-तर्जन भरे कलकल निनाद के साथ एक बहुत सुखद अहसास दिलाते हैं। साथ ही इस ऊँचाई पर वहने पाली ठण्डी आवोहवा आपको हिमालय की वादियों में विचरण की सघन अनुभूति देती है। थोड़ी ही देर में पनगाँ गाँव आता है, इसको पार करते ही हम अपने गन्तव्य मोहिला गाँव पहुँच चुके थे, जहाँ सेब के बागान में मधुमक्खी के बक्से सजे थे, जहाँ श्री लाल सिंह ठाकुर मधुपालन के अपने शौक को सेब की बगीचे में अंजाम दे रहे हैं।

हिमालयन बीज फार्म, मोहिला

मधुमक्खियाँ इनमें छेद से होकर अंदर-बाहर निकल रहीं थी। कुछ इसके चारों ओर मंडरा रहीं थी। इनकी चाल, इनके बोल व इनकी कार्यशैली तो येही जाने, हम तो बस इनकी मधुर गुंजार को सुन रहे थे, इनकी मस्त चाल को देख रहे थे, जो सब मिलकर इनकी अनवरत सक्रियता व अथक श्रम की बानगी पेश कर रही थी, जिसका मधुर फल शहद के रुप में बक्सों के अंदर छत्तों में तैयार हो रहा था।एक बक्से में औसतन सात फ्रेम जड़े थे, जिनमें मधुमक्खियाँ छत्ता बनाकर शहब इकट्ठा कर रही थीं। जिस फ्रेम में शहद पूरी तरह से भर जाता है, उस को अलग कर एख सेंट्रिफ्यूगल मशीन में फिट कर फिर शहद निकाला जाता है और शहद निकालने के बाद फ्रेम को पुनः बक्से में फिट किया जाता है, जहाँ फिर मधुमक्खियाँ अपना काम शुरु करती हैं।

लकड़ी के घर के बाहर सक्रिय हिमालयन मधुमक्खियाँ

मालूम हो कि एक छत्ते में एक रानी मक्खी होती है। रानी मक्खी का कार्य छत्तों में अण्डे देना होता है। इसके सहयोग के लिए कुछ नर होते हैं, जिन्हें निखट्टू कहा जाता है, क्योंकि प्रजनन के अतिरिक्त इनका कोई कार्य नहीं होता और इसके तुरन्त बाद इनका जीवन समाप्त हो जाता है। इनके साथ मुख्य कार्य श्रमिक मधुमक्खियों का होता है, जो फूलों से परागण लाकर छत्तों में एकत्रित करती हैं व शहद तैयार करती हैं। ये मादा मधुमक्खियाँ होती हैं, जिनमें डंक मारने की क्षमता होती है, लेकिन दुःखद बात यह है कि डंक मारने के बाद इनके प्राण पखेरु उड़ जाते हैं।

हिमालय बी फार्म से सामने लेफ्ट बैंक का खूबसूरत नजारा

कुल्लू-मानाली घाटी के बीच राइट बैंक में मोहिला स्थित इस बी-फार्म में एक प्रगतिशील किसान श्री लाल सिंह ठाकुर के इन प्रयोग को देखकर बहुत कुछ जानने सीखने को मिला। पारम्परिक तरीके से, छत्त पर मड्डाम लगाकर मधुमक्खी पालन या जंगल से इनको छत्तों को निचोड़कर शहद निकालने के तौर-तरीकों से यहाँ चल रहा प्रयोग हमे अधिक व्यवहारिक व मानवीय लगा। साथ ही ग्रामीण परिवेश में स्वाबलम्बन का एक पुख्ता आधार दिखा।

यह सही है कि मधुमक्खी पालन में हम उनके मेहनत का मीठा फल शहद इस मेहनतकश नन्हें जीव से लेते हैं, लेकिन इनको रहने के लिए आवास की भी व्यवस्था करते हैं, सर्दियों में इनके लिए भोजन से लेकर आश्रय की व्यवस्था करते हैं। 

बर्फ की मौसम में बी फार्म

इस तरह मिलजुल कर एक दूसरे के पूरक बनकर काम करते हैं। पूरी संजीदगी व संवदेनशीलता के साथ मधुपालन के पेशे को अपनाया जाए, तो यह सभी के लिए हर दृष्टि से एक उपयोगी कार्य रहता है। यहाँ हमें कुछ ऐसा ही प्रयोग देखने के मिला।

इस सबके साथ यहाँ से सामने चारों ओर घाटी का नजारा लाजबाब लगा। सामने लेफ्ट बैंक के गाँव, खेतों की सेरियाँ, इसके महत्वपूर्ण गाँव-कस्वों तथा पहाड़ों के दर्शन मोहित करने वाले हैं। यहाँ से ऊपर जगतसुख से लेकर नीचे नगर साईड और सामने हरिपुर व सोयल गाँव का नजारा प्रत्यक्ष दिखा। इनके पीछे देवदार से ढके पर्वत व इनके भी पीछे बर्फ से ढके पहाड़ यहाँ की भव्यता को चार चाँद लगाते हैं। नीचे ब्यास नदी के भी हल्के से दर्शन यहाँ से होते हैं। इस सबके साथ सेब के बगीचे में बी-फार्म की लोकेशन व आसपास का व्यू स्वयं में बहुत ही मनोरम व बैजोड़ अनुभव रहा। आप चाहें तो इस सबकी एक झलक नीचे दिए वीडियो में भी पा सकते हैं। 

बर्फ में बी फार्म का नजारा दिलकश रहता है। हालाँकि ठण्ड में मधुमक्खियों की गतिविधियाँ सीमित हो जाती हैं, क्योंकि इस समय फूलों के रुप में आवश्यक आहार इन्हें उपलब्ध नहीं होता। इसके लिए इनके लिए अतिरिक्त आहार की व्यवस्था की जाती है, हालाँकि इनके छत्त में पहले से ही संचित मधु इस समय काम आता है।

धूप के बीच पिघलती बर्फ के बीच हिमालयन बीज फार्म का नजारा


शुक्रवार, 18 जून 2021

मेरा गाँव मेरा देश – मौसम गर्मी का

गर्मी के साथ पहाड़ों में बदलता जीवन का मिजाज

मैदानों में जहाँ मार्च-अप्रैल में बसन्त के बाद गर्मी के मौसम की शुरुआत हो जाती है। वहीं पहाड़ों की हिमालयन ऊँचाई में, जंगलों में बुराँश के फूल झरने लगते हैं, पहाड़ों में जमीं बर्फ पिघलने लगती है, बगीचों में सेब-प्लम-नाशपाती व अन्य फलों की सेटिंग शुरु हो जाती है और इनके पेड़ों व टहनियों में हरी कौंपलें विकसित होकर एक ताजगी भरा हरियाली का आच्छादन शुरु करती हैं। मैदानों में इसी समय आम की बौर से फल लगना शुरु हो जाते हैं। मैदानों में कोयल की कूकू, तो पहाड़ों में कुप्पु चिड़िया के मधुर बोल वसन्त के समाप्न तथा गर्मी के मौसम के आगमन की सूचना देने लगते हैं।

मई माह में शुरु यह दौर जून-जुलाई तक चलता है, जिसके चरम पर मौनसून की फुआर के साथ कुछ राहत अवश्य मिलती है, हालाँकि इसके बाद सीलन भरी गर्मी का एक नया दौर चलता है। ये माह पहाड़ों में अपनी ही रंगत, विशेषता व चुनौती लिए होते हैं। अपने विगत पाँच दशकों के अनुभवों के प्रकाश में इनका लेखा जोखा यहाँ कर रहा हूँ, कि किस तरह से पहाड़ों में गर्मी का मिजाज बदला है और किस तरह के परिवर्तनों के साथ पहाड़ों का विकास गति पकड़ रहा है।

हमें याद है वर्ष 2010 से 2013 के बीच मई माह में शिमला में बिताए एक-एक माह के दो स्पैल (दौर), जब हम जैकेट पहने एडवांस स्टडीज के परिसर में विचरण करते रहे। पहाड़ी की चोटी पर भोजनालय में दोपहर के भोजन के बाद जब 1 बजे के लगभग मैस से बाहर निकलते तो दोपहरी की कुनकुनी धूप बहुत सुहानी लगती। सभी एशोसिऐट्स बाहर मैदान में खुली धूप का आनन्द लेते। अर्थात यहाँ मई माह में भरी दोपहरी में भी ठण्डक का अहसास रहता।

इससे पहले हमें याद हैं वर्ष 1991 में मानाली में मई-जून माह में बिताए वो यादगार पल, जब पर्वतारोहण करते हुए, कुछ ऐसे ही अहसास हुए थे। यहाँ इस मौसम में भी ठीक-ठाक ठण्ड का अहसास हुआ था और गुलाबा फोरेस्ट में तो पीछे ढलान पर बर्फ की मोटी चादर मिली थी, जिसपर हमलोग स्कीईंग का अभ्यास किए थे।

हमारे गाँव में भी मई माह में गर्मी नाममात्र की रहती है, बल्कि यह सबसे हरा-भरा माह रहता है। इसी तरह की हरियाली वरसात के बाद सितम्बर माह में रहती है। इस तरह घर में मई माह अमूनन खुशनुमा ही रहा। गर्मी की शुरुआत जून माह में होती रही, जो मोनसून की बरसात के साथ सिमट जाती। इस तरह मुश्किल से 3 से 4 सप्ताह ही गर्मी रहती। इस गर्मी में तापमान 38 डिग्री से नीचे ही रहता। इसके चरम को लोकपरम्परा में मीर्गसाड़ी कहा जाता है, जो 16 दिनों का कालखण्ड रहता है, जिसमें 8 दिन ज्येष्ठ माह के तो शेष 8 दिन आषाढ़ माह के रहते। इस वर्ष 2021 में 6 जून से 22 जून तक यह दौर चल रहा है। इस दौर के बारे में बुजुर्गों की लोकमान्यता रहती कि जो इन दिनों खुमानी की गिरि की चटनी (चौपा) के साथ माश के बड़े का सेवन करेगा, उसमें साँड को तक हराने की ताक्कत आ जाएगी। हालाँकि यह प्रयोग हम कभी पूरी तरह नहीं कर पाए। कोई प्रयोगधर्मी चाहे तो इसको आजमा सकता है।

इस गर्मी के दौर के बाद जून अंत तक मौनसून का आगमन हो जाता और इसके साथ जुलाई में तपती धरती का संताप बहुत कुछ शाँत होता, लेकिन बीच बीच में बारिश के बाद तेज धूप में नमी युक्त गर्मी के बीच दोपहरी का समय पर्याप्त तपस्या कराता, विशेषकर यदि इस समय खेत या बगीचे में श्रम करना हो या चढाई में पैदल चलना हो।

अधिक ऊँचाई और स्नो लाईन की नजदीकी के कारण मानाली साईड तो यह समय भी ठण्ड का ही रहता है। यहाँ पूरी गर्मी ठण्ड में ही बीत जाती है। पहाड़ों की ऊँचाईयों में तो यहाँ तक कि स्नोफाल के नजारे भी पेश होते रहते। हमें याद है मई-जून माह में ट्रेकिंग का दौर, जिसमें नग्गर के पीछे पहाड़ों की चोटी पर चंद्रखणी पास में ट्रैकरों ने बर्फवारी का आनन्द लिया था और बर्फ के गलेशियर को पार करते हुए अपनी मंजिल तक पहुँचे थे।

जून में गर्मी के दिनों में भी यदि एक-दो दिन लगातार बारिश होती तो फिर ठण्ड पड़ जाती, क्योंकि नजदीक की पीर-पंजाल व शिवालिक पर्वत श्रृंखलाओं में बर्फवारी हो जाती। इस तरह गर्मी का मौसम कुछ सप्ताह तक सिमट जाता। हालाँकि बारिश न होने के कारण और लगातार सूखे के कारण हमनें बचपन में दो माह तक गर्मियों के दौर को भी देखा है, जब मक्की की छोटी पौध दिन में मुरझा जाती।

यदि फसलों (क्रॉपिंग पैटर्न) की बात करें, तो हमें याद है कि पहले गर्मी में जौ व गैंहूं की फसल तैयार होती। फलों में चैरी, खुमानी, पलम, नाशपती, आढ़ू सेब आदि फल एक-एक कर तैयार होते। जापानी व अखरोट का नम्बर इनके बाद आता। सब्जियों में पहले मटर, टमाटर, मूली, शल्जम आदि उगाए जाते। फिर बंद गोभी, फूल गोभी, शिमला मिर्च आदि का चलन शुरु हुआ और आज आईसवर्ग, ब्रौक्ली, स्पाईनेच, लिफी(लैट्यूस) जैसी इग्जोटिक सब्जियों को उगाया जा रहा है। इनको नकदी फसल के रुप में तैयार किए जाने का चलन बढ़ा है।

ये मौसमी सब्जियाँ यहाँ से पंजाब, राजस्थान जैसे मैदानी राज्यों में निर्यात होती हैं, जहाँ गर्मी के कारण इनका उत्पादन कठिन होता है और वहां से अन्न का आयात हमारे इलाके में होता है। क्योंकि हमारे इलाकों में अन्न उत्पादन का रिवाज समाप्त प्रायः हो चला है, क्योंकि अन्न से अधिक यहाँ फल व सब्जी की पैदावार होती है व किसानों को इसका उचित आर्थिक लाभ मिलता है। इस क्षेत्र में जितनी आमदनी पारम्परिक अन्न व दाल आदि से होती है, उससे चार गुणा दाम पारम्परिक सब्जियों से होता है और इग्जोटिक सब्जियाँ इससे भी अधिक लाभ देती हैं। वहीं फलों का उत्पादन सब्जियों से भी अधिक लाभदायक रहता है, हालाँकि इनके पेड़ को पूरी फसल देने में कुछ वर्ष लग जाते हैं। कोई आश्चर्य नहीं कि अब किसानों ने अन्न उगाना बंद प्रायः कर दिया है तथा यहाँ बागवानी का चलन पिछले दो-तीन दशकों में तेजी से बढ़ा है और यह गर्मी में ही शुरु हो जाता है। सेब प्लम आदि की अर्ली वैरायटी जून में तैयार हो जाती हैं, हालाँकि इसकी पूरी फसल जुलाई-अगस्त में तैयार होती है।

जून माह में ही जुलाई की बरसात से पहले धान की बुआई, जिसे हम रुहणी कहते – एक अहम खेती का सीजन रहता, जिसका हम बचपन में बड़ी बेसब्री से इंतजार करते। हमारे लिए इसमें भाग लेना किसी उत्सव से कम नहीं होता था। काईस नाला से पानी के झल्कों (फल्ड इरिगेशन का किसानों की पारी के हिसाब से नियंत्रित प्रवाह) के साथ काईस सेरी में धान के खेतों की सिंचाई होती। घर के बड़े बुजुर्ग पुरुष जहाँ बैलों की जोडियों के साथ रोपे को जोतते, मिट्टी को समतल व मुलायम करते, हम लोग धान की पनीरी को बंड़ल में बाँधकर दूर से फैंकते और महिलाएं गीत गाते हुए पूरे आनन्द के साथ धान की पौध की रुपाई करती। खेत की मेड़ पर माष जैसी दालों के बीज बोए जाते, जो बाद में पकने पर दाल की उम्दा फसल देते।

गाँव भर की महिलाएं धान की रुपाई (रुहणी) में सहयोग करती। सहकारिता के आधार पर हर घर के खेतों में धान की रुपाई होती। दोपहर को बीच में थकने पर पतोहरी (दोपहर का भोजन) होती, जिसे घरों से किल्टों (जंगली वाँस की लम्बी पिट्ठू टोकरी) में नाना-प्रकार के बर्तनों में पैक कर ले जाया जाता। इसकी सुखद यादें जेहन में एक दर्दभरा रोमाँच पैदा करती हैं। आज इन रुहणियों के नायक कई बढ़े-बुजुर्ग पात्र घर में नहीं हैं, इस संसार से विदाई ले चुके हैं, लेकिन उनके साथ विताए रुहणी के पल चिर स्मृतियों में गहरे अंकित हैं। समय के फेर में हालाँकि रुहणी का चलन आज बिलुप्ति की कगार पर है, मात्र 5 से 10 प्रतिशत खेतों में ऐसा कुछ चलन शेष बचा है, लेकिन गर्मी का मौसम इसकी यादों को ताजा तो कर ही देता है।

गाँव-घर में गर्मियाँ की छुट्टियाँ भी 10 जुन से पड़ती, जो लगभग डेढ़-दो माह की रहती। ये अगस्त तक चलती। हालाँकि अब इन छुट्टियों के घटाकर क्रमशः कम कर दिया गया है, जो अभी महज 3 सप्ताह की रहती हैं। शेष छुट्टियों के सर्दी में देने का चलन शुरु हुआ है। इस दौरान जंगल में गाय व भेड़-बकरियों को चराने की ड्यूटी रहती। साथ में एक बैग में स्कूल का होम वर्क भी साथ रहता। मई, जून में ही गैर दूधारु पशुओं को जंगल में छोड़ने का चलन रहता, जिनकी फिर अक्टूबर में बापिसी होती। इनको छोड़ते समय एक-आध रात जंगल में बिताने का संयोग बनता, जिसकी यादें आज भी भय मिश्रित रोमाँच का भाव जगाती हैं।

हालाँकि गर्मी का मौसम घर में बिताए लम्बा अर्सा हो चुका है, लेकिन स्मरण मात्र करने से ये पल अंतःकरण को गुदगुदाते हुए भावुक सा बनाते हैं और दर्दभरी सुखद स्मृतियों को जगाते हैं। शायद जन्मभूमि से दूर रह रहे हर इंसान के मन में कुछ ऐसे ही भावों को समंदर उमड़ता होगा, खासकर तब, जब लोकडॉउन के बीच लम्बे अन्तराल से वहाँ जाने का संयोग न बन पा रहा हो।

बुधवार, 20 मई 2020

मेरा गाँव मेरा देश - बचपन का पर्वत प्रेम और ट्रैकिंग एडवेंचर, भाग-2


पहाड़ों के बीहड़ बन की गहराईयों से पहला गाढ़ा परिचय
प्रातः चाय-नाश्ता कर हम बीहड़ वन की गहराईयों को एक्सप्लोअर करने के लिए आगे बढ़ते हैं। गेस्ट हाउस से पीछे शाड़ी नामक ढलानदार थोड़े खुले क्षेत्र से होकर गुजरते हैं, जहाँ जंगली पालक बहुतायत में लगी थी। जरुरत पड़ने पर इसका चाबल या रोटी के साथ भोजन में बेहतरीय प्रयोग किया जा सकता था। अब देवदार का जंगल घना होता जा रहा था। थोड़ी देर में एक पहाड़ी नाला आता है, इसको पार कर हम दूसरी ओर एक ढलानदार मैदान की ओर चढ़ाई करते हैं। यहाँ भांड पात्थर नामक स्थान पर एक बड़ी सी समतल चट्टान पर चढ़कर यहाँ का सुंदर नजारा लेते हैं। यहाँ देवदार से घिरे बुग्याल में चम्बा के खजियार और काश्मीर की घाटियों की झलक आ रही थी। यह बुग्याल भेड़-बकरियों के चरने के लिए एक आदर्श स्थल था।
यहीं पर सत्तु-गुड़ का हल्का नाश्ता लेते हैं। यहाँ ठण्ड इतनी थी कि हाथ की ऊँगलियाँ जैसे जम रही थी। नाश्ते के बाद हम वुग्याल के पार दाएं ऊपर की ओर जंगल में प्रवेश करते हैं। यह थोड़ा चट्टानी क्षेत्र था, जहाँ आगे देवदार के पेड़ के दो-तिहाई ऊँचाई को छूते दो समानान्तर चट्टानों को लेकर एक चूल्हानुमा आकृति हमें रोमांचित करती है, जो पाँडू चूल्हा नाम से जाना जाता है। मान्यता है कि पाण्डव अज्ञातवास के दौरान यहाँ से गुजरे थे और यह उनका बनाया हुआ चूल्हा है, जिसको पीछे से जाकर चढ़कर इसकी समतल चट्टानों पर बैठकर इसका अनुभव लेते हैं। अनुमान लगाते रहे कि पाण्डव कितने ताकतवर रहे होंगे, साथ ही कितना ऊँचे भी। 
फिर हम नीचे उतरे और भांड़ पात्थर पहुँचे। यहाँ से तिरछी ऊँचाई पर ऊपर देऊधाणा स्थल पड़ता है, जो भेड-बकरियों के विश्राम के लिए अनुकूल स्थान माना जाता है, जहाँ फुआल (गड़रिए) अपने झुंडों के साथ रहते हैं। आज समय अभाव के कारण वहाँ पहुँचना संभव नहीं था। भाण्ड पात्थर से दक्षिण की ओर सीधा रास्ता माऊट नाग नामक बीहड़ एकाँत में स्थित तीर्थ स्थल एवं वन्य संरक्षित इलाके से होकर
आगे मुख्य मार्ग से मिलता है और सीधे घाटी के छोर पर पहाड़ की चोटी पर स्थित प्रख्यात बिजली महादेव मंदिर तक जाता है। हम इसके ठीक बिपरीत उत्तर दिशा की ओर सीधी पगडंडी के सहारे आगे बढ़ रहे थे। रास्ते में यहाँ भालूओं के जमीन को खोदने के निशान दिखे। हालाँकि ये ताजा नहीं थे। मालूम हो कि भालू जड़ी बूटियों का भी शौकीन होता है और इनकी जड़ों को खोदकर खाता है। शहद उसका पसंदीदा भोजन माना जाता है। जंगल में उगने वाले कैंट, एक तरह के जंगली बागूकोशा के पक्के मीठे फलों को भालू पड़े चाव से खाता है। खैर हम बीहड़ बन में आगे बढ़ रहे थे, पूरी साबधानी के साथ, कुछ हल्ला व शौर करते हुए, जिससे कि यदि कोई भालू कहीं हो तो दूर भाग जाए।
रास्ते में उबल्दा स्थान आता है, जहाँ जमीं से फूटता पानी का चश्मा किसी चमत्कार से कम नहीं लग रहा था।
यह शीतल एवं निर्मल जल उबाल के साथ बाहर निकल रहा था, जिस कारण इसका नाम ऐसा (उबल्दा) पड़ा। भादों की बीस (प्रायः सितम्बर माह का पहला सप्ताह, जब ये वुग्याल जंगली फूलों के सजे होते हैं) को लोग विशेषरुप में यहाँ पुण्य स्नान के लिए आते हैं। इसके जल को औषधीय गुणों से भरपूर माना जाता है और दिव्य भी। यहाँ पर हल्का नाश्ता कर हम आगे बढ़ते हैं। ऐसे पहाड़ों में ट्रेकिंग करने वालों का यह आम अनुभव रहता है कि यहाँ का जल इतना सुपाच्य एवं औषधीय होता है कि भूख बहुत जल्द लगती है, जठाग्नि जैसे अपने चरम पर प्रदीप्त होती है और कुछ भी खाओ जैसे तुरन्त पच जाता हो।
आगे रास्ते में दूंअधड़ा थाच पड़ा, जहाँ लकड़ी व घास की झौंपड़ी में ग्वाले अपने मवेशियों के साथ रह रहे थे। थोड़ा नीचे आगे तंदला सोर (सरोवर या ताल) पड़ता है, जिसके बारे में मान्यता है कि इसके तल पर कोई पत्ता तक नहीं गिरता। चिडिया गिरते पत्तों के तुरंत उठा लेती है। हम समय अभाव के कारण इसके भी दर्शन नहीं कर पाए।
हम सीधा आगे बढ़ रहे थे। आगे पटोऊल स्थान हमारा आज का गन्तव्य स्थल था, जहाँ नीचे फूटा सोर (सरोवर) पडता है।
मान्यता है कि भगवती दशमी वारदा (इलाके में मान्य दुर्गा माता का कन्या रुप) ने अपनी कनिष्ठिका उँगली से इसको फेर कर कभी भयंकर सूखे का निवारण किया था और यहाँ पर अधिकार जमाए असुर का बध किया था। यहाँ आज भी दलदली सरोवर बीच में टापू का आकार लिए हए है। यहाँ से हम पीछे पहाड़ के सबसे ऊचे बिंदु पर चढ़ जाते हैं, जहाँ से पीछे की मणिकर्ण घाटी के दर्शन प्रत्यक्ष थे। नीचे पार्वती नदी बह रही थी, और ऊपर घाटी में क्षाधा-बराधा और दूसरे गाँव उस पार दिख रहे थे। यह हमारे लिए एक अदभुत नजारा था, क्योंकि पहाड़ के शीर्ष से क्या दिखता होगा, यह आज समझ आ रहा था। आसमान तक जाने का तो कोई रास्ता संभव नहीं दिखा, लेकिन पीछे दूसरी अनेकों घाटियों के दर्शन और सुदूर हिमाच्छादित विराट पर्वतश्रृंखलाओं के मनोरम नजारे हमें रोमाँचित कर रहे थे।
यही हमारा आज का गन्तव्य स्थल था और आज तक बचपन की वाल जिज्ञासाओं का समाधान भी। इसके आगे रास्ता रूमसू टॉप से होकर चंद्रखणी पास पहुँचता है और आगे मलाना गाँव (विश्व का सबसे प्राचीन लोकतंत्र) पड़ता है। अब तक दोपहर हो चुकी थी। हम यहीं से बापिस हो जाते हैं, उबल्दा पहुँचते हैं और शॉर्ट कट से नीचे मुख्य मार्ग में पहुँचते हैं और कच्चे मोटर रुट के साथ नग्गर-बिजली महादेव कीसड़क पर आगे बढ़ते हैं। 
 रास्ते में रेउँश गेस्ट हाउस मिलता है, जहाँ हम रात को रुके थे तथा सुबह बीहड़ वन को एक्सप्लोअर करने का अभियान शुरु किए थे।
    इसके आगे रास्ते में चट्टानी पहाड़ को काटकर बनाए रास्ते को देखते हैं, जहाँ गुफानुमा स्थलों में नाईट हाल्ट की कामचलाऊ व्यवस्था दिखी। इस राह की खासियत देवदार के साथ रई-तोष के घने जंगल लगे एवं साथ में जल की प्रचुरता, जो सीधे नीचे सेऊबाग नाले को समृद्ध करते हैं, जिसका जिक्र हम पिछले कई ब्लॉग्ज में विस्तार से कर चुके हैं।
हाइणी थाच स्थान से हम मुख्य मार्ग से हटकर पगडंडी के सहारे नीचे की और बापसी के रास्ते चल देते हैं। सूर्य भगवान लगभग अस्त हो रहे थे। यहाँ हम सीधी धार (रिज) की उतराई भरी कच्ची पगडंडियों पर तेज कदमों के साथ नीचे उतर रहे थे। लक्ष्य अब एक ही था, अँधेरा होने से पहले घर पहुँचना। रास्ते में काली जोनी व मेंह स्थलों को पार करते हुए दाड़ू री धारा स्थान पर पहुँचते हैं। अभी भी यहाँ से नीचे गाँव-घर के दर्शन नदारद थे। यहाँ से हाका देने री धारा स्थल को पार कर नीचे छाऊँदर नाला के टॉप पर पहुँचते हैं, जहाँ से अब नीचे गाँव-घर के दर्शन हो रहे थे।
लग रहा था कि अब हम लोग घर पहुँच ही गए। कुछ मिनटों में सेऊबाग नाला के समानान्तर चट्टानी उतराई के साथ केक्टस के जंगल को पार करते हुए हनुमान मंदिर पहुँचते हैं। फिर सीधे रास्ते अपने-अपने घर की ओर कूच करते हैं। 
सफर हालाँकि थका देने वाला था, लेकिन आज जितने सवालों के जबाब मिल रहे थे, वे महत्वपूर्ण थे। मन की कई जिज्ञासाएं शांत हो गईं थीं। पहाड़ों के प्रति रूमानी भाव के साथ एक नयी समझ, एक व्यवहारिक अंतर्दृष्टि विकसित हो चुकी थी। 
    ऐसा ही बाद का एक ट्रैकिंग एडवेंचर अपने भाईयों व मित्रों के साथ हमें याद है, अप्रैल या मई माह के दिन थे, जब ऊँचाईयों में हल्की बर्फ जमीं थी। इस टूर में पांडू चूली के पास बर्फ में भालू के ताजा निशां दिखे थे। इस बार हमारा शेरु कुत्ता भी साथ में था। भालूओं के सामना होने पर इनसे भिड़ने की तैयारी हमारी अधूरी थी, अतः हम सब लोग दबे पाँव बापिस हट गए थे, जो हमारा समझदारी भरा कदम था।
आगे दूंअधड़ा के पास बर्फ इतना अधिक थी कि हम आगे बढ़ने की स्थिति में नहीं थे, बार-बार ढलान में फिसलने का खतरा बढ़ रहा था और इसके साथ यहाँ भी भालूओं के पंजों के ताजा निशां मिल चुके थे और हम बापिस आ गए। लेकिन इस बार हम उबल्दा से मुख्य मार्ग में न उतर कर सीधा भाण्ड पात्थर से होकर माऊट नाग पहुंचते हैं,
इसके संरक्षित क्षेत्र में फूलों से सजे बुग्याल को पार करते हुए नग्गर-बिजली महादेव सड़क पर उतरने के बाद बिजली महादेव तक गए थे। बापसी में हाइणी थाच से होते हुए इस बार अपने पैतृक गाँव गाहर से होकर नीचे उतरे थे। यहाँ से गाँव के दर्शन तो नदारद थे, लेकिन कुल्लू-ढालपुर मैदान के विहंगम दर्शन हो रहे थे और पीछे लग वैली और मंडी साईड की पर्वतश्रृंखाएं दिख रही थीं। गाहर गाँव से हम फिर सेऊवाग गाँव तक पैदल आधा-पौन घंटे में पहुँचे थे। (आज पक्की सड़क बन चुकी है, जिसमें मात्र 10-15 मिनट में सेऊबाग से गाहर गाँव का रास्ता तय हो जाता है)
हर यात्रा हमें पहाड़ों के प्रति और गहराई में उतार रही थी। घरवालों, पड़ोसियों एवं गांव वालों के सवाल के चिरपुरातन प्रश्न का जबाब अब भी हमारे पास नहीं था कि इन पहाड़ों में ऐसा रखा क्या है, जो छुट्टियों में सीधे यहाँ घूमने चल देते हो। लेकिन नियति हमें किसी निर्धारित गन्तव्य की ओर ले जा रही थी। काल के गर्भ में पकती इस खिचड़ी का स्वरुप कुछ वर्षों बाद स्पष्ट होता है, जब अपनी बीटेक की पढ़ाई पूरा करने के बाद हमें मानाली स्थित पर्वतारोहण संस्थान में प्रवेश मिलता है और यहाँ से अनुभवी प्रशिक्षकों के कुशल मार्गदर्शन में एडवेंचर और बेसिक कोर्स करने का सुअवसर मिलता है, जिसकी रोचक, रोमाँचक एवं कहीं-कहीं रोंग्टे खड़े करने वाली दास्ताँ हिमवीरु के अगली पोस्टों में शेयर होती रहेगी, जिसका पहला भाग आप नीचे की पोस्ट में पढ़ सकते हैं।
 
 
वर्तमान ब्लॉग पोस्ट का पहला भाग आप नीचे पढ़ सकते हैं -
 

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