यात्रा डायरी, सावन-2022, भाग-1

यात्रा डायरी, सावन-2022, भाग-1



सावन में पहाड़ों की यात्रा हमेशा ही हमारे लिए रोमाँच भरा अनुभव रहती है। हालाँकि इस मौसम में यात्रा के अपने जोखिम भी रहते हैं, भूस्खलन से लेकर बाढ़ और बादल फटने जैसी तमाम तरह की प्राकृतिक विपदाएं पहाड़ों में आए दिन घटती रहती हैं। लेकिन हम अभी तक इस संदर्भ में सौभाग्यशाली रहे हैं, प्रकृति का दैवीय संरक्षण मिलता रहा है।

19 जुलाई 2022, पारिवारिक कार्य से घर जाने का संयोग बन रहा था, सपरिवार हरिद्वार से 4 बजे की बस में बैठ जाते हैं। हिमाचल परिवहन की बसों में ऑनलाईन बुकिंग की सुबिधा के चलते सीट आसानी से अपनी पसन्द के हिसाव से मिल गई थी। पहली बार परिवहन की 2,3 ऐसी हिमधारा बस में बैठ रहे थे। एकदम नया मॉडल, सीटें भी आरामदायक। ऐसे लग रहा था जैसे हमारे लिए ईश्वर ने यात्रा की विशेष व्यवस्था कर रखी हो।

दोपहर ठीक 4,20 पर बस चल पड़ती है। देवपुरा चौक से वायं मुड़ते ही कुछ ही देर में गंगनहर पार होती है, फिर उत्तर की ओर बढ़ते हुए शंकराचार्य चौक से नीचे मुड़ती है। फ्लाईऑवर बनने से सीधे सड़क को पार करना अब कठिन हो गया है, सो यह कवायद रहती है। अब हम पुनः थोड़ी देर में फ्लाईऑवर से गुजर रहे थे। दायीं और गंगनहर साथ में थी तो बाईं और कनखल के नजारे। इसी क्रम में गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय आता है, कन्यागुरुकुल, ज्वालापुर और फिर बहादरावाद वाइपास।

इस बार सावन के मौसम की विशेषता थी, सड़क पर शिवभक्त काँवड़ियों की भरमार, पूरा मार्ग का इनकी भक्तिमयी एवं अलमस्त चहलकदमी से अटा पड़ा था। रंगविरंगी कांवड़ को कंधे पर टाँगे कांवड़िए बोल बम के नारे के साथ अपनी मंजिल की ओर बढ़ रहे थे। यह सिलसिला बिना किसी ब्रेक के रुढ़की तक देखने को मिला। अधिकाँश पैदल चल रहे थे, तो कुछ गाड़ी में तथा कुछ ट्रैक्टर व बाईक में।

रास्ते में तिरंगों की भी भरमार दिख रही थी। शिवभक्ति और देश भक्ति के जज्वे का अद्भुत दृश्य पूरे श्बाव पर दिख रहा था। इस मार्ग की यात्रा का आडियो-विजुअल दृष्टाँत नीचे दी गई विडियो क्लिप में भी देखा जा सकता है।

 

राह में मार्ग डायवर्ट होता है औऱ थोड़ा देर में बारिश शुरु हो गई थी। इसके बीच रुढ़की शहर में प्रवेश होता है। बारिश काफी तेज हो गई थी, मूसलाधार बारिश के बीच बाहर के नजारे धुंधले पड़ गए थे, काँवड़ियों के दर्शन भी अब नहीं हो रहे थे। यात्रा के पहले पड़ाव में बारिश के इस विशेष अभिसिंचन के साथ मौसम भी खुशनुमा हो गया था।

रुढ़की में गंगनहर को पार करते-करते बारिश थम गई थी, अब हमारी बस ग्रामीण परिवेश से गुजर रही थी। कांवड़ यात्रा के कारण यहाँ से हमारी अम्बाला तक की यात्रा बाई पास रुट से होती रही। मार्ग में आने वाले मुख्य शहर यथा – सहारनपुर, युमनानगर आदि के बाहर से ही बस आगे बढ रही थी।

रास्ते भर खेतों के हरे-भरे नजारें नेत्रों को शीतल एवं सुखद अहसास दिला रहे थे। कहीं खेत में अभी धान की ताजा रुपाई हुई थी, कहीं जुताई के लिए खेत तैयार थे, तो अधिकाँशतः खेतों में हरी-भरी फसल लहलहा रही थी। खेतों की मेड़ पर पोपलर व सफेदा की ईमारती लकड़ियों के वृक्ष कतार में बहुत सुन्दर लग रहे थे, कहीं-कहीं पूरे खेतों में इन्हीं की खेती भी होती दिखी। कहीं-कहीं सब्जियों को भी उगते देखा, फल के बगीचों के दर्शन कम ही हुए। शुरुआती दौर में आम के बगीचे अवश्य दिखे।

इस मार्ग पर भी कांवड यात्रा के दर्शन बीच-बीच में होते रहे। रास्ते में एक-दो स्थान पर टोल-प्लाजा व फ्लाई ऑवर को पार करते हुए खेत व गाँव के दृश्य बहुत ही मनोरम व आकर्षक लगे, जिनका अवलोकन करते हुए यात्रा का पूरा आनन्द लेते रहे। इस तरह से शाम होते-होते बस अम्बाला शहर के समीप चण्डीगढ़ ढावा पर भोजन के लिए रुकती है। घर से तैयार की गई भोजन सामग्री के साथ पेट पूजा करते हैं, अंत में ढावे की चाय के साथ पूर्णाहुति करते हुए रिफ्रेश होकर आगे की यात्रा पर बढ़ते हैं। अब तक अँधेरा हो चुका था। रुढ़की से यहाँ ढावा तक के ऑडियो-विजुअल यात्रा को नीचे दिए वीडियो में भी देख सकते हैं।

 

इसके बाद अंधेरे में अम्बाला शहर से गुजरते हैं और फिर चण्डीगढ़ वाइपास से आगे बढ़ते हुए मोहाली, खरड़ से होते हुए रुपनगर (रोपड) को पार करते हुए कीर्तपुर में बस चाय-नाश्ते के लिए रुकती है। अंधेरे में हालाँकि बाहर के दृश्य खेत खलियान आदि तो नहीं दिख रहे थे, लेकिन सड़क के दोनों और भवनों में झिलमिलाती रोशनियाँ व भव्य भवन सुंदरता में चार चांद लगा रहे थे। इस रुट पर कई बार यात्रा की होने के कारण हम बाहर की लोकेशन को समझ पा रहे थे।

कीरतपुर में फ्रेश होने के बाद बस आगे बढ़ती है, व्यास-सतलुज नहर को पार करते हुए मार्ग में किरतपुर गुरुद्वारे के दूरदर्शन होते हैं, व थोड़ी ही देर में बस मैदानी इलाके से पहाड़ पर चढ़ने लगती है, हिमाचल प्रदेश सीमा में प्रवेश का स्वागत संदेश मिलता है। अगले आधे घण्टे में पहाडी की चोटी पर स्वारघाट स्थान पर पहुंचते हैं, जहाँ से एक रास्ता नालागढ़ से होकर चण्डीगढ़ जाता है। जरुरत पड़ने पर वाहन इस रुट का भी इस्तेमाल करते हैं।

स्वारघाट की पहाड़ी को पार कर बिलासपुर के दूरदर्शन होते हैं, जो गोविंदसागर झील के किनारे बसा शहर है। भाखड़ा बाँध बनने के कारण इस पर झील में पूरा शहर जलमग्न हो गया था, इसी के किनारे नया बिलासपुर शहर बसा है। रास्ते में शिखर पर नैना देवी के मंदिर की टिमटिमाती रोशनी अपनी भव्य एवं दिव्य उपस्थिति दर्शा रहीं थी। अगले 2 घण्टे में हम विलासपुर पहुँच चुके थे। यहाँ की वर्कशॉप में गाड़ी ईँधन भरने के लिए रुकती है। सवारियाँ भी बाहर निकल कर सफर की जकड़न को दूर करती हैं।

आधी रात के अंधेरे को चीरते हुए बस आगे बढ़ रही थी। सलापड़ में बस सतलुज नदी को पार करती है (जहाँ पहाड़ों के अंदर की टनल से व्यास नदी का तल विद्युत उत्पादन करते हुए सतलुज नदी में प्रवाहित होता है), फिर कुछ मिनटों में सुन्दरनगर शहर आता है और फिर मण्डी। रास्ते में बस चाय के लिए रुकती है। दस-बारह घण्टे के सफर के बाद मंडी-पण्डोह के बीच सुबह होती है। पण्डोह डेम के किनारे यात्रा आगे बढ़ती है।

रुट काफी खतरनाकर दिखता है। पहाड़ व चट्टानों को काटकर बनायी गयी संकड़ी सड़क, नीचे गहरी खाई व तली में व्यास नदी पर बने पंडोह डेम का बैक वाटर। रास्ते में पहाड़ को खोद कर बनती सुरंगे व पुल के ऊँचे पिल्लर दिखे, जो बिलासपुर-लेह रेल्वे रुट की महत्वाकाँक्षी योजना का हिस्सा हैं।

व्यास नदी के किनारे बने हनोगी माता के मंदिर से होते हुए आउट टनल को पार कर कुल्लू घाटी में प्रवेश करते हैं। सामने व्यास नदी का तीव्र प्रवाह, पृष्ठभूमि में शिखर पर बिजली महादेव के दर्शन और सड़क के दोनों ओर गगनचूम्बी पर्वत। भून्तर हवाई अड्डे के किनारे से होते हुए ढालपुर मैदान से होकर लगभग छ बजे सरवरी नदी के किनारे स्थित कुल्लू बस स्टैंड पर पहुँचते हैं।  

नवनिर्मित बस स्टैंड अपनी भव्य उपस्थिति दर्ज करा रहा था, जो हाल ही में तैयार हुआ है। यहाँ पर अपने वाहन में घर की ओर कूच करते हैं व सकुशल घर पहुँचते हैं। धन्यवाद करते हैं प्रकृति-परमेश्वर, गुरुसत्ता व देव शक्तियों को, जिनकी कृपा से रास्ते के तमाम वरसाती जोखिमों के बीच भी यात्रा सुरक्षित व आनन्ददायक रही।

इस यात्रा से जुड़े कुछ संदर्भ लिंक्स

चण्डीगढ़ से आगे के सफर को देहरादून-चण्डीगढ़ से होकर इस रुट के पूर्व में प्रकाशित यात्रा वृतांत, हरिद्वार से कुल्लू वाया चण्डीगढ़ में विस्तार से पढ़ सकते हैं।

सावन में ही इस रुट के मनोरम अनुभव को सावन में कु्ल्लू घाटी की मनोरम छटा ब्लॉग में पढ़ सकते हैं।


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