
लुधियाना से उड़ीसा, तमिलमाड़ू

कॉलेज में बिताए स्वर्णिम दिनों में दक्षिण भारत की पहली यात्राएं
उल्लेखनीय हैं। पहली उड़ीसा के कटक शहर की और दूसरी अन्नामलाई यूनिवर्सिटी की। कटक
यात्रा में पहली बार महानदी और पुरी में सागर के दर्शन हुए थे। और अन्नामलाई की
यात्रा में दक्षिण भारत के हिल स्टेशन ऊटी व कोडेक्नाल के साथ मैसूर, बैंगलोर व
पाँडिचेरी की एक झलक पायी थी।
उड़ीसा की पहली यात्रा संभवतः वर्ष 1988 के दौरान सम्पन्न हुई थी, जब
हम पंजाब कृषि विश्वविद्यालय में अपनी बीटेक की पढ़ाई कर रहे थे। यूनिवर्सिटी की
वेटलिफ्टिंग टीम के सदस्य के रुप में हम इंटर-यूनिवर्सिटी प्रतियोगिता हेतु
कटक विश्वविद्यालय गए थे। लगभग एक दर्जन युवा खिलाड़ियों की टीम कोच के साथ थी।
इंजीनियरिंग कॉलेज से हम अकेले थे, कुछ वेटनरी कॉलेज से तथा अधिकाँश एग्रीक्लचर-हॉर्टिक्लचर
कॉलेज से थे। सफर की यादें काफी धुंधली हो चुकी हैं, लेकिन जेहन में अंकित स्मृतियों
को कुरेदते हुए यहाँ कुछ रोचक एवं यादगार घटनाओं का वर्णन कर रहा हूँ।
हमारे साथ वेटलिफ्टिंग टीम में प्लस 110 किलो के सुपर हेवीवट केटेगरी में भाई दलजीत सिंह टीम में आकर्षण का विशेष केंद्र थे, जिन्हें हम प्यार से पहलवानजी कहते थे। दूर से ही उनका ढील-ढोल और चाल-ढाल देखकर पता चलता था कि पहलवानजी आ रहे हैं। उनकी डाइट भी उनके बजन के हिसाब से कुछ स्पेशियल थी। तीन दर्जन रोटियाँ, दर्जनों अण्डे व लीटरों के हिसाब से दूध उनकी खुराक रहती थी। उसी हिसाब से उनकी वेटलिफ्टिंग का अभ्यास रहता था।

याद है ट्रेन में केले बेचने वाला जब फल से भरी टोकरी लेकर आता है, तो
रेट पूछने पर वह दर्जन के हिसाब से केले के दाम बताता है। लेकिन पहलवानजी अपने
नाश्ते के हिसाब से पूरी टोकरी का रेट पूछ रहे थे। फेरी बाले ने जीवन में शायद पहली
वार पूरी टोकरी को एक साथ बिकते देखा होगा। केले का साइज सामान्य से छोटा था, लेकिन
विशेष स्वाद लिए थे। पहलवानजी एक बार में एक केला छील कर उदरस्थ करते और
देखते-देखते पूरी टोकरी खाली कर गए। हमारे लिए यह सामान्य घटना थी, लेकिन फेरी
वाले व ट्रेन में बैठे लोगों के लिए यह कौतुहल का विषय था।
कटक पहुँचने पर महानदी के पुल के किनारे गुरुद्वारे में रुकने की
व्यवस्था थी। यहाँ से महानदी का विस्तार देखने योग्य था, जिसके ऊपर कई किमी लम्बा
पुल बना था। यहाँ से स्टेडियम थोड़ी दूरी पर था। आसपास हर घर के साथ पानी का तलाब
और साथ में नारियल के झुरमुट हमें बहुत दर्शनीय लगे। इनके साथ एक नए प्रारुप में
ग्रामीण जीवन के दर्शन हमें रोमाँचित कर रहे थे। हालाँकि किसी के घर जाकर नजदीक से
देखने का समय नहीं था, लेकिन इस नए प्रदेश के नए परिवेश व संस्कृति को देखकर कई
प्रश्न उठ रहे थे कि क्या इन तालावों में मछलियाँ भी होती हैं। इनके जल का स्रोत
क्या रहता है। इसकी शुद्धता कैसी रहती होगी व इसका उपयोग किन-किन रुपों में होता
होगा। यह प्रश्न हमारे लिए अभी भी पूरी तरह उत्तरित नहीं हैं। समय मिलेगा तो एक
बार इनको नजदीक से देखकर अवश्य जानना व समझना चाहूँगा।
वेटलिफ्टिंग प्रतियोगिता में प्रतिभाग लेने के बाद हम सभी पुरी
साइड के सी बीच (सागर तट) में भी भ्रमण किए, इसकी भी यादें धुधली सी हैं, जहाँ
पर कुछ यादगार सामूहिक फोटोग्राफी होती है (इससे जुड़ी फोटो आज खो चुकी हैं,
इन्हें इकट्ठा करने का प्रयास जारी है।) इस समय हमारा शारीरिक सौष्ठव अपने चरम पर
था, क्योंकि इसी दौर में हम विश्वविद्यालय स्तर पर बॉडी बिल्डिंग प्रतियोगिता में
मिस्टर यूनिवर्सिटी बने थे।
उस दौर में शारीरिक फिटनेस के प्रति अपनी दिवानगी का जिक्र अवश्य करना चाहूँगा। खेल के प्रति हमारी निष्ठा अप्रतिम रही। कबड्डी से लेकर शॉट पुट, डिस्कस, जेवलिन थ्रो जैसे पॉवर गेम्ज़ में हम प्रतिभाग करते रहे, लेकिन मुख्य खेल बॉडी बिल्डिंग ही चयनित था, साथ ही कोच के प्रोत्साहन में वेटलिफ्टिंग से भी जुड़ गया था। किशोरावस्था में स्वामी विवेकानन्द के युवाओं को संदेश में मुखरित मस्ल्ज़ ऑफ आयरन के आग्नेय वचन हमारे प्रेरक मंत्र बन चुके थे, जिसके अनुरुप पंजाब कृषि विश्वविद्यालय में एनएसओ (NSO-नेशनल स्पोर्टस ऑर्गेनाइजेशन) के अंतर्गत हमें अपने पैशन को पूरा करने का यहाँ स्वर्णिम अवसर मिला था।

खेल का मैदान व जिम हमारे लिए किसी मंदिर व तपःस्थली से कम नहीं था।
क्या आँधी, क्या तुफान, क्या परीक्षा, क्या बारिश, हम शाम को ठीक साढ़े चार बजे
ग्राउंड में पहुंच जाते थे। पहले बीस मिनट एथलेटिक ट्रेक पर राउंड के साथ वार्मअप
करते और फिर जिम में प्रवेश करते। लगभग दो-अढ़ाई घंटे कोच के मार्गदर्शन में जिम
में पसीना बहाते। इसके बाद योगासन के कुछ स्ट्रेचिंग
आसन व शवासन आदि के साथ कूलडाउन करते। अंत में पसीने से तर-बतर वनियान को निचोड़ते,
तो पसीने की धार झरने लगती।
इसके बाद यूनिवर्सिटी गेट के बाहर जेंटलमेन दी हट्टी में दूध
का गिलास व गर्मागर्म जलेबी का सेवन होता। इसके साथ शारीरिक श्रम के साथ खर्च हुई
ऊर्जा की कुछ भरपाई हो जाती। फिर हॉस्टल पहुँच कर स्नान-ध्यान के साथ अपनी
सांयकालीन दिनचर्या आगे बढ़ती।
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पढ़ाई के अंतिम वर्ष संभवतः सन 1989-90 के दौरान हमें फील्ड प्रोजेक्ट के तहत अन्नामलाई विश्वविद्यालय, तमिलनाड़ु भेजा गया, साथ में थे एग्रीक्लचरल इंजीनियरिंग कॉलेज से बीटेक अंतिम वर्ष के लगभग एक दर्जन सहपाठी छात्र। हमें याद है कि लुधियाना से हम ट्रेन में चढते हैं और तमिलनाड़ू के चिदम्बरम स्टेशन पर उतरते हैं, जहाँ अन्नामलाइ विश्वविद्यालय सामने ही पड़ता है।

यहीं एक होस्टल में हम लोगों के रुकने की व्यवस्था थी। यहाँ कर्मचारी
हिंदी या पंजाबी नहीं समझते थे, अंग्रेजी भी कम ही समझ पाते थे। वे तमिल में ही
बोलते थे। इसलिए अधिकांश संवाद इशारे में ही होते व किसी तरह काम चलाते। धीरे-धीरे
हम पानी पीने से लेकर अभिवादन में उपयोग होने वाले दैनिक व्यवहार के कुछ शब्दों को
सीख गए थे, जैसे वनक्कम, तन्नी कुडुङ्गा आदि।
यूनिवर्सिटी के प्रोफेसरों से तो अंग्रेजी में संवाद हो जाता था, हॉस्टल में थोड़ा
कठिन रहता था।
बाहर दुकानदारों के साथ भी इशारों में अधिक बात होती थी। हमारे साथ
पंजाब से आए सहपाठी अधिकाँशतः पंजाब से थे, जहाँ रोटी खाने का चलन अधिक है। वे
चावल को अधिक पसन्द नहीं करते। लेकिन यहाँ तो इडली से लेकर डोसा, हर डिश में चाबल
ही रहता। बड़ी मुश्किल से हमें रोटी वाला ढाबा बाहर शहर में मिलता है और किसी तरह
से हमारे साथियों का काम चलता है। (...शेष अगली पोस्ट में)