
देखता रहूँ अब खेल मालिक का बन मौन दर्शक
कड़ुआ सच्च कहूँ, तो वो बुरा मान जाएं,
किसी का दिल दुखाना भी तो ठीक नहीं,
इससे तो मौन बेहतर ।1।
खरी खोटी सुनाऊँ तो हो जाए इज्जत तार-तार उनकी,
किसी की इज्जत से खिलवाड़ भी तो ठीक नहीं,
इससे तो मौन बेहतर ।2।
सच्च कहूँ, तो उनकी मूर्खता हो जाए उज़ागर,
उनके अज्ञान से पर्दा हटाने की घृष्टता भी ठीक
नहीं,
फिर, इससे तो मौन ही बेहतर ।3।

धूर्त की शातिरता को करुँ ऊजागर, तो उनकी शांति
हो जाए भंग,
किसी की अशांति, बेचैनी का कारण बेमतलब क्यों
बनूं,
इससे तो मौन ही बेहतर ।4।
उनके हठ पर उठाऊँ उंगली, तो हो जाए उनका मान हनन,
किसी के हठयोग में क्यों बनूं बाधक,
इससे तो मौन ही बेहतर ।5।
ज़बरपेली पर उठाऊँ उंगली, तो हो जाए उनका लोकहित
बाधित,
उनके तथाकथ विजयी अभियान में क्यों बनूँ बाधक,
इससे तो मौन बेहतर ।6।
कागजी अभियान पर उनके उठाऊँ सवाल, तो उन्हें लगे
न अच्छा,
उनके मायावी खेल का मजा क्यों करुँ किरकिरा,
इससे तो मौन बेहतर ।7।
दूसरों के कंधे पर रख बंदूक, उनकी मनमानी पर
उठाऊं सवाल,
तो उनके सृजन अभियान का बन जाऊं रोढ़ा,
इससे तो मौन रहना ही बेहतर ।8।
जब औकात से बाहर हो परिस्थितियाँ, इंसान मात्र
कठपुतली,
तो न्याय का ठेका ले, क्यों दैवीय विधान में बनूं
बाधक,
इससे तो मौन रहना ही बेहतर ।9।

समय से पहले जब नहीं कोई सुनने समझने सुधरने के
लिए तैयार,
तो क्यों करुँ छेड़खान किसी की नियति, भाग्य,
भवितव्यता से,
ऐसे में फिर मौन रहना ही बेहतर ।10।
जब काल के भी काल महाकाल के हाथों कमान युग परिवर्तन
की,
तो फिर क्यों न दूँ उस महानायक को काम करने अपना,
अकिंचन सा सेवक बन देखता रहूँ खेल मालिक का बन
मौन दर्शक ।11।
ईमानदारी संग निभाता रहूँ जिम्मेदारी अपनी, रह
अपने स्वधर्म में अढिग,
अपना सुधार जब सेवा संसार की सबसे बड़ी,
तो क्यों न करता रहूँ सत्यं-शिवं-सुंदरं की
अराधना सतत मौन रहकर ।12।
