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गुरुवार, 30 अप्रैल 2026

यादों के झरोखों से – मेरी पहली दक्षिण भारत यात्राएं, भाग-2

 

अन्नामलाई से पांडिचेरी, ऊटी, कोडाइकनाल एवं मैसूर

नटराज मंदिर, चिदाम्बरम

अन्नामलाई विश्वविद्यालय चिदाम्बरम रेल्वे स्टेशन से 2-3 किमी दूरी पर स्थित है और चिदाम्बर शहर के ह्दय क्षेत्र में स्थित है प्रख्यात नटराज मंदिर, जो भगवान शिव को समर्पित एक अत्यंत प्राचीन एवं पवित्र मंदिर है। यह 10वीं-11वीं शताब्दी की चोल वास्तुकला का एक प्रमुख उदाहरण है, जो अपने चार ऊंचे गोपुरमों, भरतनाट्यम नृत्य की मुद्राओं की नक्काशी और आकाश तत्व को दर्शाने के लिए प्रसिद्ध है। यहाँ भगवान शिव की ब्रह्माण्डीय नर्तक के रुप में पूजा होती है और शिव को निराकार (आकाश) रुप में पूजा जाता है, जिसे चिदंबर रहस्य कहा जाता है।

भगवान नटराज

यूनिवर्सिटी में राइस प्रोसेसिंग यूनिट में हमें यहाँ की राइस मिल्ज को देख आश्चर्य हुआ कि राइस ब्रान (चाबल भूसी) कितना बहुमूल्य होता है, जिससे तेल से लेकर साबुन, पशु खाद्य उत्पाद, सौंदर्य़ प्रसाधन जैसे कितने ही उत्पाद तैयार किए जा सकते हैं। पौष्टिकता की दृष्टि से राइस ब्रान विटामिन बी और ई सहित फाइबर एवं एंटिऑक्सिडेंट से भरपूर होता है।

यूनिवर्सिटी से ही कुछ दूरी पर समुद्री बीच था। फुर्सत के दिनों में हम यहाँ भी किराए से ली गई साईकल से टूर कर आए। बेकवाटर में मेंग्रोव के जंगल हमने पहली बार देखे। और नाव में चढ़कर इनका नज़दीक से अवलोकन किए और वहाँ चहचहाते पक्षियों के दृश्यों का आनन्द लिए। रास्ते के ग्रामीण परिवेश में नारियल के वृक्षों की भरमार के साथ चाबल की खेती अधिक दिखी। दूर-दूर तक इनका विस्तार दर्शनीय रहा।

तमिलनाडू की एक विशेषता उम्दा बस सर्विस लगी, जिसका किराया भी किफायती था। स्पीड के मामले में लगता था कि जैसे हवाई जहाज में सफर कर रहे हों। इस तरह लम्बी दूरी का सफर कुछ घंटों में पूरा हो जाता।

ट्रेनिंग के अंतिम दिनों में आसपास भ्रमण के अंतर्गत हम पांडिचेरी की योजना बनाते हैं, चिदम्बर बस स्टेशन से बस पकड़ते हैं, जो यहाँ से लगभग 70 किमी पड़ता था व लगभग डेढ़ घंटे में पहुँचते हैं। अरविंद आश्रम में समाधी दर्शन करते हैं और इसके बाद सागर तट का अवलोकन करने के वाद फिर पास के एक पार्क में बैठकर विश्राम करते हैं।

पुडुचेरी, सागर तट

सामने एक कोठी के गेट पर रंग-बिरंगी टोपी पहने सुरक्षा गार्ड हमारे लिए कौतुक का विषय थे। हम अनजाने में ही जिज्ञासावश उनकी ओऱ इशारा कर रहे थे। कुछ ही मिनट में हमारा दल पुलिस के घेरे में था। वे हम सबको पुलिस जीप में बिठाते हैं। हम सब हैरान थे कि हमारे साथ ये क्या हो रहा है। हमने तो कोई गुनाह नहीं किया है और न ही कोई कानून तोड़ा है, पार्क में बैठकर हंजी मजाक ही तो कर रहे थे।

बिनम्रतापूर्वक हम सबको स्थानीय पुलिस स्टेशन में बिठाया जाता है। पीछे फोटो लगे थे, उग्रवादियों के। लगा कि हम सबका मिलान उनके फोटो के साथ हो रहा था। हम सबकी तहकीकात हो रही थी। बाद में पता चला कि हम जिस पार्क में बैठे थे, सामने पांडिचेरी के राज्यपाल की कोठी थी, जो थे रिटार्यड लेफ्टिनेंट जनरल, जिनका स्वर्ण मंदिर अमृतसर के ब्लू स्टार ऑपरेशन में अहं भूमिका थी। इस कारण वे उग्रवादियों की हिटलिस्ट में थे। इस बात से अनजान हम सब पार्क में हंसी मजाक व इशारेबाजी कर रहे थे। फ्रेंच उपनिवेश होने के कारण अभी भी पांडिचेरी में सुरक्षा गार्ड वही पारम्परिक रंग-विरंगी टोप पाली बर्दी पहने थे।

तहकीकात में पुलिस को कुछ हाथ नहीं लगा। अंत में हमारे एक सहपाठी संस्थान के निर्देशक का मोबाइल नम्बर शेयर करते हैं, जिनसे बातचीत करने पर पुलिस दस्ते को स्पष्ट होता है कि यह ग्रुप छात्रों का एक समूह था, जो ट्रेनिंग करने आया था और वे हमे वाई-इज्जत बरी करते हैं। वहाँ से छूटते ही हम उल्टे पाँव बस में बैठकर बापिस अन्नामलाई कैंपस पहुँचते हैं और रास्ते भर आज की रोमाँचक घटना की चर्चा का आनन्द लेते हैं।

ट्रेनिंग पूरी होने पर हम दक्षिण भारत के कुछ हिल स्टेशन व मुख्य शहरों का दिग्दर्शन करते हुए लुधियाना यूनिवर्सिटी कैंपस बापिस आते हैं। इस क्रम में हमें मैसूर पलेस के म्यूजियम व महल को देखते हैं, यह वाडियार राजवंश का पूर्व निवास है, जो इंडो-सार्सेनिक शैली में बना है। इसके अंदरूनी हिस्से की नक्काशी और शाही वस्तुओं का संग्रह दर्शनीय लगा।

चामुंडेश्वरी मंदिर, चामुंडी हिल्स, मैसूर

इसके बाद पहाड़ी रास्ते में ऊपर चढ़ते हुए पहाड़ी पर चामुंडी हिल्स के नाम से प्रख्यात स्थान पर चामुंडेश्वरी मंदिर के दर्शन करते हैं, जहाँ से मैसूर शहर के विहंगम दर्शन होते हैं। इन्हें दुर्गा का अवतार माना जाता है और ये 51 शक्तिपीठों में एक माना जाता है। पौराणिक कथाओं के अनुसार इसी पहाड़ी पर देवी ने महिषासुर का वध किया था। पास में ही पहाड़ी पर एक ही चट्टान से तराशी गई नंदी महाराज की वृहद प्रतिमा ध्यान आकर्षित करती है, जहाँ सामूहिक फोटोग्राफी होती है।  

इसके बाद हम ऊटी हिल स्टेशन पहुंचते हैं। मैदानी क्षेत्र से धीरे-धीरे पहाड़ों का आरोहण करती बस यात्रा हमें बखुबी याद है। यहां ऊटी झील में बोटिंग का आनन्द लेते हैं। बॉटेनिकल गार्डन के दर्शन करते हैं, जहाँ दुर्लभ प्रजाति के पेड़-पौधे हैं। 1848 में स्थापित यह गार्डन 55 एकड़ में फैला हुआ है।

डोड्डाबेटा पीक से ऊटी का विहंगम दृश्य

फिर ऊटी स्टेशन से सर्पिली सड़कों से होते हुए पहाड़ की चोटी तक पहुँचे थे, जहाँ हल्की बारिश हो रही थी, ठंडक भी काफी थी। यह नीलगिरि की सबसे ऊँची चोटी डोड्डाबेटा पीक थी, जहाँ वर्नाकुलर से नीचे मैदानी घाटियों के दर्शन करते हैं। बिना दूरवीन के भी यहाँ से घाटी के मनोरम दृश्य दिखते हैं, हालाँकि बादल के कारण दृश्य बाधित थे।

इसके बाद हम लोग दूसरे हिल स्टेशन कोडाइकनाल पहुंचते हैं, जहाँ का प्राकृतिक सौंदर्य़ ऊटी की तुलना में अधिक संरक्षित व नैसर्गिक लगा। आश्चर्य नहीं कि इसे दक्षिण भारत का स्विटजरलैंड कहा जाता है। यह अपनी झीलों, जंगलों व ठंडी जलवायु के लिए जाना जाता है। यहाँ झील में कुछ बोटिंग करते हैं और यहाँ से साइकिल किराए पर लेकर साइक्लिंग करते हुए हिल स्टेशन का अवलोकन करते हैं। यहाँ के पहाडी मार्ग पर चढते हैं और फिर घूमकर बापिस आते हैं।

कोडाइकनाल का विहंगम दृश्य

इस तरह ईश्वर की कृपा से हमारी दक्षिण भारत की पहली यात्रा से कई सुखद स्मृतियाँ जुड़ीं, जो याद करने पर फिर ताजा हो उठती हैं। इन तीन-चार दशकों में तो वहाँ बहुत कुछ बदल चुका होगा। आज भी इन स्थलों से जुड़ी कोई सूचना अखबार या इंटरनेट पर देखते-पढ़ते हैं, तो महज़ ही इनसे जुड़ी पुरानी यादें झंकृत हो उठती हैं।

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