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शुक्रवार, 29 मई 2026

जीवनबोध

बिना मूल्य चुकाए, कुछ बड़ा हासिल न कर पाने की हताशा

जीवन में नीचे गिरना सहज-स्वाभाविक है, इसके लिए कोई प्रयास नहीं करना पड़ता। चारों ओर का प्रवाह भी इसमें सहायक है, लेकिन ऊपर उठना कठिन है, समय साध्य, कष्ट साध्य है। इसलिए आश्चर्य़ नहीं कि कम ही लोग ऊपर उठ पाते हैं, श्रेय पथ पर चल पाते हैं। अधिकांश लोग पगडंडियों का सहारा लेते हैं, शॉर्टकट से बिना अधिक श्रम किए, बिना मूल्य चुकाए सस्ते में, हो सके तो मुफ्त में ही कुछ बड़ा हासिल करना चाहते हैं, जो अन्त में एक भूल निकलती है और हाथ में हताशा-निराशा के अलावा कुछ लगता नहीं।

माना कि ऊपर उठना सहज नहीं, यह अनुशासन की माँग करता है, तप की तपन से गुजरना माँगता है, श्रम एवं पुरुषार्थ के श्वेत बिंदुंओं का श्रृंगार करना पड़ता है। लेकिन यही यही जीवन निर्माण का राजमार्ग है, चरित्र गठन की प्रक्रिया है, यही मनुष्य जीवन को सार्थक बनाने वाला शाश्वत मार्ग है और यही पूर्णता की ओर ले जाता मुक्ति पथ भी। इसलिए समझदार लोग इसका सहर्ष वरण करते हैं और इसके लिए आवश्यक मूल्य चुकाने के लिए सदा तैयार रहते हैं।

नैतिकता का वरण क्यों करें

अच्छे क्यों बनें, नैतिक क्यों बनें, प्रश्न सहज ही मन में उठ सकता है, जीवन के पड़ाव पर कई बार कौंधता है। इसके कई उत्तर हो सकते हैं। लेकिन इसका सीधा सपाट उत्तर तो एक ही है कि जीवन की जो संभावनाएं बीज रुप में जीवात्मा में विद्यमान हैं, जो परामात्मा का अंश होने के नाते ईश्वरतुल्य हैं, नैतिकता इनके साकार होने का प्रवेश बिंदु है।

नैतिकता का वरण करते हुए मनुष्य नर पिशाच की असुरता से नर पशु की ओर ऊपर उठता है। फिर मानवीय संवेदना को धारण करता हुआ नर मानव की गरिमा को प्राप्त होता है। और फिर अपनी मानवीय दुर्बलताओं पर विजय प्राप्त करते हुए महामानव की श्रेणी में खड़ा होता है और फिर अपनी क्षुद्रताओं का तिरोधान करते हुए, अंतर्निहित देवत्व के जागरण के साथ देवमानव बनता है। इस तरह नर से नारायण, जीव से शिव बनने की प्रक्रिया नैतिकता, चरित्र निर्माण के आधार पर घटित होती है और जीवन की चरम संभावनाओं का द्वार खुलता है।

बिना नैतिकता के इंसान को पशु बनते देर नहीं लगती, इससे भी नीचे गिरते हुए आसुरी एवं पैशाचिक कृत्यों के साथ उच्चतर संभावनाओं के सत्यनाश की आत्मघाती दुर्घटना के साथ घटित हो सकती है। इस तरह नैतिकता को अपनाना किसी दूसरे पर उपकार या कोई अहसान नहीं, बल्कि यह स्वयं के प्रति ही उपकार है, स्वयं के जीवन की सुख, शांति और सद्गति का आधार है।

भाग्य एवं पुण्य का खेल

पुरुषार्थ अपनी जगह, लेकिन भाग्य एवं पुण्य की भूमिका को नकार नहीं सकते। यदि कोई गलत व्यक्ति फल-फूल रहा है, तो समझो कि यह उसके वर्तमान कर्मों का फल नहीं है, वह अपने पूर्व के संचित शुभ कर्मों या पुण्यों का फल है अर्थात वह अपने भाग्य का फल भोग रहा है। अतः जब तक यह पुण्य प्रबल रहता है, तब तक नाम यश, धन, सुख, लोक सम्मान, मानवीय प्यार आदि सर्वसुलभ एवं सहज प्रतीत होते हैं। लगता है कि ये तो जैसे अपने जन्मसिद्ध अधिकार हैं और व्यक्ति तप एव पुण्य के प्रति उदासीन हो जाता है।

ऐसे में आश्चर्य नही कि व्यक्ति भोगों की आँधी और अहं की मदहोशी में भूल-चूकों के साथ पाप वृत्तियों में मश्गूल हो जाता है। क्रमशः पुण्य क्षीण होने लगते हैं और इसी के साथ अर्जित नाम, यश, स्वास्थ्य, सुख, ऐश्वर्य भी सब क्षीण पड़ने लगते हैं और इसके साथ तथाकथ सब अपने भी छिटकने लगते हैं। जैसे कंगाल व्यक्ति फिर बाजार से कुछ खरीद नहीं सकता, यही स्थिति पुण्यहीन व्यक्ति की होती है। संसार में फिर कुछ हाथ नहीं लगता, सब बेगाना सा हो जाता है। जो पहले दुआ-सलाम करते थे, आगे पीछे घूमते थे, वे अब पूछते तक नहीं, राह में मिलते हैं, तो मुंह फेर लेते हैं।

यदि व्यक्ति समझदार है, तो जगत के ऐसे तत्वबोध के साथ आत्म-बोध के पथ पर अग्रसर हो जाता है और अध्यात्म मार्ग का पथिक बन जाता है। जीवन के प्रति सजग हो जाता है और ईश्वर का अवलम्बन लेकर निर्बल के बल प्रभुश्रीराम (समर्थ ईष्ट-आदर्श) की शरण में जाता है और जीवन के नवनिर्माण की नूतन पटकथा लिखता है।

जीवन में दुःख-कष्ट-पीड़ा का औचित्य

जीवन में दुःख, कष्ट, पीड़ा क्यों मिलते हैं, ईश्वर की बनाई इस सृष्टि में बुरे, धूर्त एवं दुष्ट लोग क्यों हैं। ये प्रश्न यदा-कदा कौंध सकते हैं, जब इनके अवांछनीय प्रवाह के बीच अनावश्यक पीड़ा, कष्ट एवं दुःख से गुजरना पड़ता है।

मानकर चलें कि ईश्वर की कर्मप्रधान सृष्टि में यह अनायास नहीं होता। यदि कोई इन परिस्थितियों से गुजरने के लिए विवश-बाध्य अनुभव कर रहा है तो शांत मनःस्थिति में स्पष्ट होगा कि ये सब प्रकृति माँ कहो या परमपिता परमेश्वर के उपहार हैं। हालाँकि तत्काल इनके औचित्य पर प्रश्न उठना स्वाभाविक है, इनके लाभ एवं निहितार्थ को जानना-पहचानना कठिन होता है, लेकिन दीर्घकाल में स्पष्ट होता है कि जीवन यदि इन अग्नि परीक्षाओं से न गुजरा होता तो, वह तप कर कुंदन नहीं बनता।

और यह भी स्पष्ट होता है कि स्वर्ग का रास्ता नरक से होकर गुजरता है, शांति का मार्ग अशाँति के विप्लवी दौर से होकर ही पूर्णता को पाता है। असत से सत, अंधकार से प्रकाश, मृत्यु से अमृत अर्थात शाश्वत जीवन की यात्रा इसी आधार पर घटित होती है। अनन्त धैर्य, अपार श्रद्धा और अनवरत प्रयास ही इस मार्ग के पाथेय हैं। न ही यहाँ कोई शॉर्ट कट हैं और न ही किसी दूसरे के कंधे पर सवार होकर इसे पार किया जा सकता है।

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