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शनिवार, 20 जून 2026

जीवन बोध

समझें इस सुरदुर्लभ मानव जीवन का महत्व

मनुष्य जीवन कितना बेशकीमती है, इसका सामान्यतया अहसास नहीं हो पाता, क्योंकि यदि अहसास होता तो यह वहुमूल्य उपहार यूँ ही व्यर्थ नष्ट नहीं होता। दुर्व्यसन से लेकर नशा एवं आत्मघाती कृत्यों के साथ जीवन लीला को अपने हाथों से नष्ट करते समाचार नित्य समाचारों की सुर्खी बनते हैं। इसके साथ भ्रष्टाचार से लेकर आतंक एवं अपराधिक गतिविधियों के समाचारों के साथ देवत्व एवं ईश्वरत्व की संभावनाओं से युक्त मनुष्य जीवन को पतन-पराभव के गर्त में गिरते देखा जा सकता है। बिना सार्थकता की अनूभूति के जीवन की ऐसी दुर्गति को एक त्रास्द दुर्भाग्य ही माना जाएगा।

जबकि मनुष्य जीवन में सुख-शांति व सृजन के अभूतपूर्व रोमाँच की अनन्त संभावनाएं हैं। हर इंसान इनकी कल्पना भी करता है, नाना रुपों में पाने की चेष्टा करता है, लेकिन जीवन की सही समझ के अभाव में वह दिशा भटक जाता है और ये संभावनाएं अधूरी ही रह जाती हैं। जिस संतुष्टि, स्वतंत्रता व आनन्द की कल्पना मनुष्य बाहरी सम्पदा, मोह ममता और सत्ता सुख में करता है, वे भी अंततः मृग मारिचिका बनकर पहुँच से दूर हो जाती हैं और जीवन के अंतिम पलों में हाथ कुछ लगता नहीं। बिना किसी सार्थक निष्कर्ष के मानव जीवन के इस अवसान को एक दुर्घटना ही कहा जाएगा।

भारतीय परम्परा में मनुष्य जीवन को सृष्टि का सर्वश्रेष्ठ उपहार गया है और इसे सुलदुर्लभ कहा गया है। देवता भी मनुष्य शरीर को प्राप्त करने के लिए तरसते हैं, क्योंकि इसी में वे संभावनाएं मौजूद हैं, जो आत्मतत्व को जाग्रत करते हुए सकल मानवीय सीमाओं एवं दुःख को तिरोहत कर सके और जीव से शिव, नर से नारायण की यात्रा सम्पन्न करते हुए अंततः परमात्मा के प्रतिरुप आत्म-स्वरुप को प्राप्त कर सके।

भारतीय परम्परा में जीवन का मूल्य बाहरी उपलब्धियों, धन-दौलत व पद प्रतिष्ठा आदि में कभी नहीं रहा है, ये सेवा के लिए जीवन के सहज अवलम्बन हो सकते हैं, जीवन उद्देश्य नहीं। क्योंकि यदि इनके रहते भी व्यक्ति अशांत, असंतुष्ट, हैरान-परेशान और जीवन के आनन्द से वंचित है, तो यह घाटे का सौदा माना जाएगा। आश्चर्य नहीं कि बुद्ध भगवान से लेकर महावीर, नानक, कवीर एवं महर्षि रमण जैसे ऋषितुल्य शिखर पुरुष शांति, आनन्द व धन्यता की खोज में  किसी बाहरी सुख, सुविधा व सत्ता आदि के मोहताज नहीं रहे, बल्कि इन सबका त्याग करते हुए जीवन के परमलाभ को प्राप्त हुए और आज भी प्रेरणा के प्रकाशपुंज बनकर जीवन जीने का कालजयी संदेश दे रहे हैं।

इन सबका एक ही संदेश रहा कि जीवन की असली सम्पदा इंसान के अंदर कस्तुरी मृग की भाँति छिपी पड़ी है। भ्रम की मारीचिका के कारण वह इसे बाहर ढूंढता फिर रहा है। वासना, त्रिष्णा और अहंता के नागपाश में बंधकर वह जीवन की सुख-संतुष्टि की तलाश बाहर खोजने के लिए प्रेरित हो रहा है, लेकिन उसका हर प्रय़ास चूक जाता है और अंततः जब समय आता है तो काफी देर हो चुकी होती है। समय रहते इसकी समझ व अंतर्दृष्टि विकसित की होती, तो हाथ में कुछ सार्थक लगता, जिसकी वह चिरकाल से प्रतीक्षा कर रहा था।

लकड़हारे की कहानी प्रख्यात है कि उसे राजा द्वारा उसके उपकार के लिए उपहार के रुप में एक चंदन का जंगल भेंट में मिलता है। राजा को आशा थी कि अब उसकी गरीबी दूर हो जाएगी और वह एक खुशहाल जीवन जीएगा। लकड़हारा इस वन से पेड़ काटकर, इसका कोयला बनाता और पास के शहर में जाकर बेच आता। यह सिलसिला कई माह वर्ष तक चलता रहा। और वह अपनी झोंपड़ी में इससे मिलने बाली धनराशि से गुजर बसर करता रहा।

जब एक दिन राजा जंगल में शिकार करते हुए वहाँ से गुजरता है तो आश्चर्यचकित होता है कि लकड़हारा उसी झोंपड़ी में रह रहा है, जबकि उसे उम्मीद थी कि वह अब तक सम्पन्न हो गया होगा। अब वहाँ कुछ पेड़ बचे थे। राजा ने पूरा हाल-चाल पूछा तो माथा थोककर रह गया। और लकड़हारे को समझाया कि यह चंदन का पेड़ है, जिसका एक पेड़ भी इसकी दरिद्रता को दूर करने के लिए पर्याप्त था। लकड़हारा अपनी मूर्खता पर पछताता है और बचे वृक्षों का सदुपयोग करते हुए शेष जीवन को सम्पन्नता एवं धन्यता के साथ गुजारता है।

यही कहानी हर इंसान की है, जिसे ईश्वर ने वे सारी क्षमताएं, विभूतियाँ बीज रुप में प्रदान की हैं - एक स्वस्थ-सबल काया, कम्प्यूटर से भी तेज चलने बाला मस्तिष्क, वायु से भी तीव्र मन, किसी भी समस्या को भेदने में सक्षम बुद्धि, प्रेरणा की अजस्र स्रोत भावनाएं, अस्तित्व के हर रहस्य को भेदने में सक्षम अंतर्प्रज्ञा, किसी भी कल्पना को मूर्त करने में सक्षम इच्छा शक्ति। औऱ साथ में समय के रुप में सबको चौबीस घंटे, जिनका सदुपयोग करते हुए वह अपनी मनचाही सृष्टि का सृजन कर सकता है। और अपने देवत्व, ईश्वरत्व को चैतन्य करते हुए इस जीवन को धन्य एवं सफल सार्थक कर सकता है।

देर इनके प्रति जागने भर की है, नित्य अपने अंतर मन में झांकने की है, आत्मनिरीक्षण करते हुए इसमें बाधक आंतरिक एवं बाह्य तत्वों को पहचान कर दूर करने भर की है। नित्य स्वाध्याय सतसंग एवं आत्मचिंतन-मनन के प्रकाश में प्राप्त अंतर्दृष्टि के आधार पर वह इसे सहजता से कर सकता है और जीवन शैली में आवश्यक परिवर्तन करते हुए, व्यक्तित्व में अभीष्ट पात्रता विकास के साथ जीवन को नए सिरे से परिभाषित कर सकता है और इस सुरदुर्लभ मानव जीवन को सफल सार्थक बना सकता है।

 

शुक्रवार, 29 मई 2026

जीवनबोध

बिना मूल्य चुकाए, कुछ बड़ा हासिल न कर पाने की हताशा

जीवन में नीचे गिरना सहज-स्वाभाविक है, इसके लिए कोई प्रयास नहीं करना पड़ता। चारों ओर का प्रवाह भी इसमें सहायक है, लेकिन ऊपर उठना कठिन है, समय साध्य, कष्ट साध्य है। इसलिए आश्चर्य़ नहीं कि कम ही लोग ऊपर उठ पाते हैं, श्रेय पथ पर चल पाते हैं। अधिकांश लोग पगडंडियों का सहारा लेते हैं, शॉर्टकट से बिना अधिक श्रम किए, बिना मूल्य चुकाए सस्ते में, हो सके तो मुफ्त में ही कुछ बड़ा हासिल करना चाहते हैं, जो अन्त में एक भूल निकलती है और हाथ में हताशा-निराशा के अलावा कुछ लगता नहीं।

माना कि ऊपर उठना सहज नहीं, यह अनुशासन की माँग करता है, तप की तपन से गुजरना माँगता है, श्रम एवं पुरुषार्थ के श्वेत बिंदुंओं का श्रृंगार करना पड़ता है। लेकिन यही यही जीवन निर्माण का राजमार्ग है, चरित्र गठन की प्रक्रिया है, यही मनुष्य जीवन को सार्थक बनाने वाला शाश्वत मार्ग है और यही पूर्णता की ओर ले जाता मुक्ति पथ भी। इसलिए समझदार लोग इसका सहर्ष वरण करते हैं और इसके लिए आवश्यक मूल्य चुकाने के लिए सदा तैयार रहते हैं।

नैतिकता का वरण क्यों करें

अच्छे क्यों बनें, नैतिक क्यों बनें, प्रश्न सहज ही मन में उठ सकता है, जीवन के पड़ाव पर कई बार कौंधता है। इसके कई उत्तर हो सकते हैं। लेकिन इसका सीधा सपाट उत्तर तो एक ही है कि जीवन की जो संभावनाएं बीज रुप में जीवात्मा में विद्यमान हैं, जो परामात्मा का अंश होने के नाते ईश्वरतुल्य हैं, नैतिकता इनके साकार होने का प्रवेश बिंदु है।

नैतिकता का वरण करते हुए मनुष्य नर पिशाच की असुरता से नर पशु की ओर ऊपर उठता है। फिर मानवीय संवेदना को धारण करता हुआ नर मानव की गरिमा को प्राप्त होता है। और फिर अपनी मानवीय दुर्बलताओं पर विजय प्राप्त करते हुए महामानव की श्रेणी में खड़ा होता है और फिर अपनी क्षुद्रताओं का तिरोधान करते हुए, अंतर्निहित देवत्व के जागरण के साथ देवमानव बनता है। इस तरह नर से नारायण, जीव से शिव बनने की प्रक्रिया नैतिकता, चरित्र निर्माण के आधार पर घटित होती है और जीवन की चरम संभावनाओं का द्वार खुलता है।

बिना नैतिकता के इंसान को पशु बनते देर नहीं लगती, इससे भी नीचे गिरते हुए आसुरी एवं पैशाचिक कृत्यों के साथ उच्चतर संभावनाओं के सत्यनाश की आत्मघाती दुर्घटना के साथ घटित हो सकती है। इस तरह नैतिकता को अपनाना किसी दूसरे पर उपकार या कोई अहसान नहीं, बल्कि यह स्वयं के प्रति ही उपकार है, स्वयं के जीवन की सुख, शांति और सद्गति का आधार है।

भाग्य एवं पुण्य का खेल

पुरुषार्थ अपनी जगह, लेकिन भाग्य एवं पुण्य की भूमिका को नकार नहीं सकते। यदि कोई गलत व्यक्ति फल-फूल रहा है, तो समझो कि यह उसके वर्तमान कर्मों का फल नहीं है, वह अपने पूर्व के संचित शुभ कर्मों या पुण्यों का फल है अर्थात वह अपने भाग्य का फल भोग रहा है। अतः जब तक यह पुण्य प्रबल रहता है, तब तक नाम यश, धन, सुख, लोक सम्मान, मानवीय प्यार आदि सर्वसुलभ एवं सहज प्रतीत होते हैं। लगता है कि ये तो जैसे अपने जन्मसिद्ध अधिकार हैं और व्यक्ति तप एव पुण्य के प्रति उदासीन हो जाता है।

ऐसे में आश्चर्य नही कि व्यक्ति भोगों की आँधी और अहं की मदहोशी में भूल-चूकों के साथ पाप वृत्तियों में मश्गूल हो जाता है। क्रमशः पुण्य क्षीण होने लगते हैं और इसी के साथ अर्जित नाम, यश, स्वास्थ्य, सुख, ऐश्वर्य भी सब क्षीण पड़ने लगते हैं और इसके साथ तथाकथ सब अपने भी छिटकने लगते हैं। जैसे कंगाल व्यक्ति फिर बाजार से कुछ खरीद नहीं सकता, यही स्थिति पुण्यहीन व्यक्ति की होती है। संसार में फिर कुछ हाथ नहीं लगता, सब बेगाना सा हो जाता है। जो पहले दुआ-सलाम करते थे, आगे पीछे घूमते थे, वे अब पूछते तक नहीं, राह में मिलते हैं, तो मुंह फेर लेते हैं।

यदि व्यक्ति समझदार है, तो जगत के ऐसे तत्वबोध के साथ आत्म-बोध के पथ पर अग्रसर हो जाता है और अध्यात्म मार्ग का पथिक बन जाता है। जीवन के प्रति सजग हो जाता है और ईश्वर का अवलम्बन लेकर निर्बल के बल प्रभुश्रीराम (समर्थ ईष्ट-आदर्श) की शरण में जाता है और जीवन के नवनिर्माण की नूतन पटकथा लिखता है।

जीवन में दुःख-कष्ट-पीड़ा का औचित्य

जीवन में दुःख, कष्ट, पीड़ा क्यों मिलते हैं, ईश्वर की बनाई इस सृष्टि में बुरे, धूर्त एवं दुष्ट लोग क्यों हैं। ये प्रश्न यदा-कदा कौंध सकते हैं, जब इनके अवांछनीय प्रवाह के बीच अनावश्यक पीड़ा, कष्ट एवं दुःख से गुजरना पड़ता है।

मानकर चलें कि ईश्वर की कर्मप्रधान सृष्टि में यह अनायास नहीं होता। यदि कोई इन परिस्थितियों से गुजरने के लिए विवश-बाध्य अनुभव कर रहा है तो शांत मनःस्थिति में स्पष्ट होगा कि ये सब प्रकृति माँ कहो या परमपिता परमेश्वर के उपहार हैं। हालाँकि तत्काल इनके औचित्य पर प्रश्न उठना स्वाभाविक है, इनके लाभ एवं निहितार्थ को जानना-पहचानना कठिन होता है, लेकिन दीर्घकाल में स्पष्ट होता है कि जीवन यदि इन अग्नि परीक्षाओं से न गुजरा होता तो, वह तप कर कुंदन नहीं बनता।

और यह भी स्पष्ट होता है कि स्वर्ग का रास्ता नरक से होकर गुजरता है, शांति का मार्ग अशाँति के विप्लवी दौर से होकर ही पूर्णता को पाता है। असत से सत, अंधकार से प्रकाश, मृत्यु से अमृत अर्थात शाश्वत जीवन की यात्रा इसी आधार पर घटित होती है। अनन्त धैर्य, अपार श्रद्धा और अनवरत प्रयास ही इस मार्ग के पाथेय हैं। न ही यहाँ कोई शॉर्ट कट हैं और न ही किसी दूसरे के कंधे पर सवार होकर इसे पार किया जा सकता है।

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