रांसी से गौंदार
8जून2026, सोमवार - रांसी से 2 किमी आगे अगतोलीधार पड़ता
है, जहाँ गाड़ियों की कतारें सड़क के साथ खड़ी थीं और उसके आगे बाइक्स की कतारें
लगीं थी। सभी यात्री अपने बाहन यहीं छोड़कर मदमहेश्वर ट्रेक के लिए निकले थे।
सुरक्षा की दृष्टि से हम अपना वाहन कोमल होमस्टे के पास खड़ा कर दिए थे।
अगतोलिधार से लगभग 250 मीटर के बाद बैरिकेट लगा मिला, जहाँ से आगे किसी भी प्रकार के वाहनों का प्रवेश निषिद्ध है। वैरिकेट को पार कर हम सभी पैदल चलते हैं। यहीं से सूर्योदय का दृश्य देखकर हम थोड़ा ठिठक जाते हैं और इसको कैप्चर करने का प्रय़ास करते हैं। लेकिन यहाँ का सूर्योदय समय ले रहा था, लगा कई पहाड़ियों के पीछे से उसका उदय हो रहा है, सो हम चलते रहे।
फिर कुछ मिनट बाद रास्ते में सूर्य भगवान के दर्शन होते हैं, उनको प्रणाम कर अपना यात्रा अभियान जारी रखते हैं। बीच में दायीं ओर नीचे उतरता एक पैदल रास्ता दिखा, जो रांसी-मदमहेश्वर के पुराने रुट का एक लिंक रोड़ था।
रास्ते का प्राकृतिक परिवेश – हम हरे-भरे पहाड़ की गोद में आगे बढ़ रहे थे। कच्ची सड़क के दोनों ओर चीड़ के ऊंचे-ऊंचे वृक्षों का दीदार हो रहा था, साथ में ऊतीश, जंगली झाडियां व हरे-भरे पेड़ सफर का खुशनुमा अहसास दे रहे थें। पक्षियों की चहचाहट इस अहसास में मस्ती और शांति का एक नया रंग घोल रही थी।
रास्ते में छोटे झरने व जलस्रोत मार्ग की शोभा बढ़ा रहे थे। ट्रेकरों व तीर्थयात्रियों के समूह आगे-पीछे पूरे उत्साह के साथ आगे बढ़ रहे थे। इस रुट पर युवाओं की संख्या अधिक देखकर सुखद आश्चर्य़ हुआ कि वे अपने समय का सार्थक नियोजन कर रहे हैं, क्योंकि ऐसी यात्राएं जीवन में वो अनुदान-वरदान दे जाती हैं, जो घर बैठे संभव नहीं। घर में व्यक्ति परिवार और समाज की मोह माया में ही उलझा रहता है, जबकि इससे बाहर निकलकर प्रकृति की गोद में विताए कुछ पल जीवन में सार्थकता का गहरा बोध देने वाले सावित होते हैं।
रास्ते में नीचे मधुगंगा के दर्शन बीच-बीच में हो रहे थे और उसके पार दूसरी ओर गगनचुम्वी हरे-भरे पर्वतों के साथ संकरी घाटियों से निकलते झरने ध्यान आकर्षित कर रहे थे। लगा जून में जब इतने झरने रास्ते में दिख रहे हैं, तो जुलाई-अगस्त के मोनसून सीजन में तो यहाँ इनकी भरमार रहती होगी। और इसके साथ भूस्खलन की कल्पना का भय भी आशंकित कर रहा था।
मार्ग में एक बड़ा नाला दूर से ही अपने कल-कल निनाद के साथ रोमांचित करता है, इसी पर एक छोटी सी झील बनी थी।
आश्चर्य़ नहीं कि रास्ते के इस विशिष्ट आकर्षण के संग यात्रियों का जमाबड़ा इसके किनारे सेल्फी के साथ ग्रुप फोटो लेने में मश्गूल था। हम लोग भी इसका लोभ संवरण नहीं कर पाए और कुछ यादगार फोटो खींचते हैं। इसके साथ ही थोड़ी दूर पर चाय-नाश्ते का एक ढावा मिला, जहां कुछ यात्री विश्राम के साथ पेट-पूजा कर रहे थे।
यहाँ के हरे-भरे परिवेश के आगे का मार्ग चट्टान काट कर बना है,
रास्ते में इन चट्टानों पर पहाड़ी छिपकली के दर्शन होते हैं, जो मटमेले या घूसर रंग की होती है, हम तो इसे स्थानीय भाषा में चपाड़ कहते हैं। छिपकली से अधिक इसे गोह परिवार का छुठभई सदस्य मान सकते हैं। स्वयं में मस्त-मगन यह जीव किसी को कोई हानि नहीं पहुंचाता। यह सामान्य छिपकली की तरह घरों में नहीं पाया जाता। रास्ते भर चट्टानों पर, स्लेट वाले घर की छतों पर इसके दर्शन होते हैं। यह इन चट्टानी आवास में क्या खाता-पीता होगा, एक शोध का विषय लगा।
चट्टानी रास्ते को पार कर सामने दूर गोंडार के दर्शन शुरु हो जाते हैं, साथ ही नीचे मधुगंगा के दर्शन व सांय-सांय निनाद बीच-बीच में सुनने को मिल रहा था। और थोड़ी देर में पास ही ऊँचाई में विरान स्थल पर एक पहाड़ी गाँव दिखता है। कल्पना करता रहा कि यहाँ लोग प्रकृति की गोद में कितनी शांति-सुकून से रहते होंगे। रास्ते में सड़क के चौड़ीकरण का काम चल रहा था, कुछ सिविल इंजीनियर धागे व यंत्रों से नाप ले रहे थे।
जिगजैग सड़क के साथ हम आधे घंटे में ऐसे स्थान पर पहुँचते हैं, जहाँ रास्ता काटने वाली जेसीबी मशीन खड़ी थी। अर्थात इसके आगे अभी रास्ता कटना शेष था।
यहीं से पतली पगडंडी के सहारे नीचे उतरते हैं। बीच में 20 मीटर का खड़ी ढलान वाला छोटी सीढ़ियाँ काटकर बनाया रास्ता मार्ग की पहली चुनौती लगा। यहाँ एक कदम की लापरवाही घातक सिद्ध हो सकती थी। दिन के उजाले में ही जब यह इतना चुनौतीपूर्ण लग रहा था, तो रात को तो किसी नौसिखिए या बिना गाइड़ के यात्री को इस रास्ते पर चलने की सलाह नहीं दी जा सकती। किसी तरह हम सब व शेष यात्री सही सलामत यहाँ से नीचे उतरते हैं। नीचे कुछ दूरी पर हमारी पगडंडी पुराने समतल रास्ते से मिलती है, जहाँ से आगे का मार्ग चौड़ा व सीधा गौंडार की ओर बढ़ता है।
बीच में एक झरना व नाला पड़ता है, जिसपर लौहे का पुल बना है।
इसके दाएं किनारे पर एक ढावा कहें या चट्टी यात्रियों के चाय-नाश्ते की उचित व्यवस्था दिखी। पानी के स्रोत के पास ऊतीश के हरे चमकीले पत्तों वाले पेड़ वहुतायत में दिखे, जो इसके लिए आदर्श स्थल रहते हैं। झरने के बाद थोडी देर में एक मोड़ पर भगवती का छोटा सा मंदिर पड़ता है, जहाँ माथा नवाकर हम आगे बढ़ते हैं। यहाँ से गौंडार बिल्कुल पास ही सामने दिख रहा था। और नीचे मधुगंगा का दुधिया जल पूरी गर्जन-तर्जन के साथ आगे बढ़ रहा था।
थोड़ी देर में हम गौंडार गाँव में प्रवेश कर रहे थे। यहाँ पर्यटकों की पूरी चहल पहल थी। कुछ यहाँ से राँसी की ओर बापिस चल रहे थे और अधिकाँश महमहेश्वर की ओर, कुछ यहाँ के होम-स्टे व ढावों में नाश्ता के लिए रुके थे। हम भी यहीं सड़क के साथ लगे एक ढावे में विश्राम करते हैं, चाय-बिस्कुट की हल्की रिफ्रेशमेंट लेते हैं।
यहीं के नल से बोटल में पहाड़ी चश्में का जल भरते हैं। और यहाँ पर एक पालतु सफेद कुतिया को बिस्कुट खिलाते हैं, जो अनजान लोगों के साथ घुलमिल कर अपना काम चलाने की अभ्यस्त दिखी। यहाँ आठ बज चुके थे। अर्थात दो घंटे में हम अगतोलीधार से, व अढ़ाई घंटे में रांसी से यहाँ पहुंच चुके थे। पांच किमी हम तय कर चुके थे और एक किमी आगे संगम तक शेष था। 7000 फीट से लगभग 5000 फीट की ऊंचाई तक उतर चुके थे।
आगे का रास्ता पहले सीधा, फिर ढलानदार, फिर सीधा व अंत में झुले के पास सीधे नीचे उतरता है। पहली ढलान वाला रास्ता संकरा और लैंडस्लाइड जोन में बना है। दाईं ओर गहरी खाई सीधे मधुगंगा तक जा रही थी। मार्ग के अंत में संगम के ठीक ऊपर झूला अभी नहीं चल रहा था, जो सीधे बनतोली से जोड़ता है। पहले यहाँ पुल था, जो पिछले वर्षों बाढ़ में बह गया। इसलिए अब संगम तक नीचे उतराई वाला रास्ता तय करना पड़ा, और इसका अंतिम छोर दो समांनांतर पत्थऱ सीमेंट की मेढ़ से होकर पुरा किया।
रास्ते की दूसरी चुनौती - पहले आसान मानकर इसके बीच के मिट्टी वाले रास्ते पर
चल दिए, आगे पता चला कि ये तो खच्चरों का मार्ग है, जो उनकी लीद से भरा था। जिस पर
चलना लीद की दुर्गंध के साथ जुत्तों को पूरा कीचड़ में डुबो रहा था। किसी तरह डंडे
के सहारे सहयात्री का हाथ पकड़ ऊपर मेड़ पर चढ़ते हैं और आगे बढ़ते हैं। यहां से
निकलने के बाद फिर मिट्टी व पत्थरों में झटककर जुत्ता साफ करने की कवायद चलती रही।
यात्रियों को रात को व अंधेरे में इस रुट पर न चलने का सुझाव दिया
जाता है। एक तो इसमें पहले ढलान वाले रास्ते व फिर रिज वाले बिंदु पर अंधेरे में
फिसल कर चोटिल होने का खतरा है। इसी कारण अगले दिन मदमहेश्वर की ओर जा रहा एक दल
रात को यहीं से गौंदार बापिस हो गया था। रांसी से बनतोली तक यह दूसरा चुनौतीपूर्ण
बिंदु है, जो अंधेरे में अकेले चलने लायक नहीं है। आगे यदि यह दुरुस्त हो जाता
है, तो बात दूसरी है।
पचास मीटर उतराई के बाद हम संगम से थोड़ा ऊपर बनी लकड़ी की पुलिया के पास थे, जहाँ मदमहेश्वर के दायीं ओर से आ रही मार्कंड गंगा अपने दुधिया जल राशि को लिए पूरे वेग के साथ जैसे हर-हर महादेव का गुंजार करती हुई नीचे मधुगंगा से मिलन के लिए आगे बढ़ रही थी।
पुलिया से इसका दृश्य एक अलौकिक अनुभव दे रहा था, जो इस रूट का एक विलक्षण पल था। लगभग सभी यात्री यहाँ कुछ पल रुककर इस अद्भुत दृश्य व इसके दिव्य निनाद को आत्मसात करते हुए किसी दूसरे लोक में विचरण करते नज़र आ रहे थे। इसको पार कर कुछ साहसी लोग मधुगंगा के बर्फीले जल में डुबकी लगा रहे थे। निश्चित रुप से इसका ग्लेशियरों से निकला जल अपने हिमालयन टच के साथ उनको रिफ्रेश और रिचार्ज कर रहा था।
यहाँ से गौंड़ार पीछे दिख रहा था और आगे सामने ऊँचा पर्वत जिसकी गोद में बनतौली गाँव बसे हैं, जिनको पार करते हुए हमें मदमहेश्वर की ओर बढ़ना था। यहाँ से कुछ ही दूरी पर बनतोली-1 में प्रवेश करते हैं, जहाँ सड़क के दोनों ओर घरों के साथ होमस्टे व ढावे दिखे, जो यात्रियों का स्वागत कर रहे थे। यहाँ से एक किमी की चढ़ाई पार करते हुए हम बनतोली-2 पहुँचे, यहां भी ढावों व होमस्टे की उचित व्यवस्था दिख रही थी। यहीं के एक ढावे में हम लोग नाश्ते के लिए रुकते हैं। यहाँ परौंठा, चाय, अचार और घर की दहीं के साथ तृप्तिदायक नाश्ता करते हैं, संयोग से बापिसी में अगले दिन यहीं हमारे रात को रुकने का भी ठिकाना बनता है। (जारी, शेष अगले ब्लॉग-4 में)

















