तम्बू से बाहर निकलकर एक वार पूरा नज़ारा निहारने का मन हुआ। डॉ.
सौरभजी जुत्ता पहनने के लिए कह रहे थे, लेकिन हम ट्रेकिंग शूज पहनने की जटिलता से बचने के लिए
राँसी से खरीदी नई चप्पल को आधा पैर में फंसाकर बाहर निकल पड़ते हैं। हमारा तम्बू
खेत के कौने में था और वाकि तम्बू कतार में सजे थे। पीछे दायीं ओर बाबा का मंदिर और
चारों ओऱ का विहंगम दृश्य देखकर आल्हादित था। रात भर सांय-सांय करती
नदीं प्रवाहित होने की ध्वनि आ रही थी, वो मधुगंगा थी।
एक हाथ में डंडा व एक हाथ में मोबाइल लिए हम कुछ ही दूर आगे बढ़े थे,
कि सामने वाले तम्बू के पीछे जल निकास के लिए बनी छोटी सी नाली की चिकनी मिट्टी
में हम अचानक फिसल गए। मोबाइल व डंडा हाथ से छूट चुका था और पीठ में बिजली कौंधने
के साथ एक चट्टाका सा हुआ। और गिरने के बाद उठने में बहुत दर्द हो रहा था। हमारे
दोनों साथी और नीचे आ रहे एक दूसरे तम्बू के सज्जन मिलकर हमें उठाते हैं और तम्बू
के अंदर लिटाते हैं। हम पीठ के बल लेट कर विश्राम करते हैं। लगा कि हम तम्बू में
विश्राम करें तो वेहतर रहेगा, दो किमी ऊपर बुढ़ा केदार जाना हमारे लिए ऐसे में ठीक
नहीं होगा। बाकि विश्राम के बाद ठीक होने पर मंदिर दर्शन कर लेंगे।
हमारे साथी लोग मंदिर दर्शन कर ऊपर बुढ़ा केदार के लिए निकल पड़ते हैं।
हम तम्बू में लेटे विश्राम करते हैं। हम पीठ के बल लेट पा रहे थे, जबकि थोड़ी
मेहनत के साथ दायीं ओर वांए भी करवट ले पा रहे थे, लेकिन उठ नहीं पा रहे थे, जिससे
कि पालथी मार कर बैठ सकें। हमें लग रहा था कि लोअर बैक में चोट आयी है। ऐसे में लग
रहा था कि चलना तो दूर, खच्चर की पीठ पर भी चढ़ नहीं पाएंगे, क्योंकि उसमें कदम पर
सीधे झटके लगते हैं। कई बार कोशिश कर पाने के वावजूद उठ न पाने के कारण व हो रहे
दर्द के चलते हम हेल्थ एंग्जाइटी के दौरे में उलझ चुके थे व एक ही विकल्प सूझ रहा
था कि किसी तरह एयर लिफ्ट किया जाए। लेकिन इस दूर दराज इलाकें में यह कैसे संभव
होगा। लगा कि उत्तराखण्ड तो हेली सेवा की बहुत चर्चित है, इसकी व्यवस्था कर लेंगे।
इस दृष्टि से अपने पॉकेट डायरी में मुख्य नाम व फोन लिख देते हैं,
ताकि आपात सेवा में जरुरत पड़ने पर काम आ सके। इन दो-तीन घंटों में जीवन की पूरी
पिक्चर रील की तरह आँखों के सामने तैर जाती है। लगा कि महादेव द्वारा हमारे
प्रारब्ध कर्मों की गहन चिकित्सा हो रही है। उनके धाम में, उनके द्वार पर, उनके
चरणों में आकर ऐसी घटना बिना कारण तो हो नहीं सकती। कोई बड़ी घटना छोटे में टल रही
है। इसका आध्यात्मिक पक्ष समझते हुए मन को समझा रहे थे, लेकिन यक्ष प्रश्न एक ही
था कि हम बापिस 16 किमी ट्रेक कर वाहन तक कैसे पहुँचेंगे।
तम्बू बंद था, धीरे-धीरे धूप निकल रही थी, तम्बू गर्म हो रहा था। और बड़े-बड़े मच्छर तम्बू में विचरण कर रहे थे, लेकिन वो काट नहीं रहे थे। किसी तरह पैर से जुराब उतारकर अंगूठे से तंबू के अंदर के फाटक की जंजीर खेंचते हैं। तम्बू में रोशनी के साथ हवा का शीतल झौंका आता है, कुछ राहत मिलती है। लाठी के सहारे उठने की तमाम कोशिश की, लेकिन नहीं उठ पा रहा था। ऐसे थक-हार कर आंखें बंद कर भोले बाबा व गुरुसत्ता को याद करता हूँ व अपने अस्तित्व का पूरा मंथन चलता है।
हमारे साथियों को भी जब वे गए थे तो इसका अनुमान नहीं था। वो सोचे थे
कि कुछ चोट आई है, विश्राम करेंगे तो बापिस जाने के लायक हो जाएंगे। जब वे दो-तीन
घंटे बाद आते हैं तो उनसे अपनी स्थिति को स्पष्ट करता हूँ और एयर लिफ्ट का विचार
सामने रखता हूँ। बिना किसी हेलीपेड के यह कैसे संभव है, यह बात सामने आई। फिर इस
विकल्प के हटते ही दूसरा विकल्प आया कि स्ट्रेचर के सहारे बापिस जा सकता हूँ।
लेकिन यहाँ इसकी आपात व्यवस्था है भी कि नहीं, यह प्रश्न उठा।
हमारी स्थिति का आंकलन करते हुए दोनों साथी हमको दोनों हाथ व कंधों से पकड़कर खड़ा करते हैं, जिसमें हमें कोई विशेष दिक्कत नहीं आई। मैं दो डण्डों के सहार खड़ा हो पा रहा हूँ, देखकर मैं अचंभित था। दोनों लाठी के साथ हमें चलने में कोई विशेष परेशानी नहीं हो रही थी, हाँ सीढ़ी व खाई में काफी संभलकर चलना पड़ रहा था। लेकिन गिरने व चोटिल होने का एक मनोवैज्ञानिक प्रभाव अवश्य साथ में था। ईश्वरीय कृपा से व साथियों के सहयोग से हम धीरे-धीरे एक-एक साइकोलॉजिक्ल बैरियर टूट रहे थे।
कल रात को दिल्ली से आई ट्रैकर, जिसको हम लोग अंधेरे में सहायता किए थे, वह भी रास्ते में मिली, सही सलामत बापिस जा रही थी। रात के सहयोग का आभार व्यक्त करती हुई वह हमें एक स्प्रे गिफ्ट करती हैं, जो मस्ल पैन से राहत देने के लिए थी। लगा कि कुछ भी संयोग से घटित नहीं होता और अच्छे कर्म का परिणाम अच्छा ही रहता है। इस तरह बाबा को दूर से ही प्रणाम कर हम लोग बापिस रांसी की ओर चल पड़ते हैं।
शुरु के सीधे रास्ते चलने में कोई दिक्कत नहीं हो रही थी। फिर जहाँ
सीढ़ी आती, वहाँ लाठी के सहारे इसको भी संभलकर पार करते गए। हम चल पा रहे हैं,
हमें विश्वास नहीं हो रहा था। हम अपनी स्थिति देखकर प्रमुदित थे, कहाँ एयर लिफ्ट
और स्ट्रेचर से चलने की बात और कहाँ हम दो लाठियों के सहारे चल रहे थे। लगा जैसे
बाबा व गुरुसत्ता की कृपादृष्टि प्रत्यक्ष हमें चला रही है और इस तरह अढाई किमी
नीचे कूनचट्टी तक पहुँच चुके थे।
कून चट्टी के नीचे बारिश शुरु हो गई थी। सो रेन कोट को ओढ़कर चलते हैं। कुछ लोग खड़ी चढ़ाई में शॉर्टकट मार रहे थे, वह भी पीठ मे समान लादे, जो हमें बहुत खतरनाक प्रयोग लग रहा था। क्योंकि बैग के साथ एक कदम भी पैर फिसलने के परिणाम बहुत घातक हो सकते थे। उन्हें इसके बार में सचेत भी करते हैं। स्थानीय लोग इन शॉर्ट कट में चलने के आदी होते हैं, उनकी नकल नहीं की जा सकती। बीच में बारिश थमती है, तो आगे नीचे घाटी का रास्ता स्पष्ट दिख रहा था।
जहाँ विश्राम करते, वहाँ से नीचे का दृश्य कैप्चर करना नहीं भूलते। क्योंकि थकने पर कुछ पल का विश्राम और प्रकृति के इन खूबसूरत नजारों के देखकर नई ऊर्जा पाते। दूसरा चढ़ाई में नीचे के दृश्यों पर उतना ध्यान नहीं था, क्योंकि दृष्टि सीधा आगे व ऊपर मंजिल की ओर थी। लेकिन उतराई में नीचे घाटी और दूर पर्वत श्रृंखलाओं के नजारे बहुत स्पष्ट रुप में दिख रहे थे। सो यथासंभव इनको कैप्चर करते रहे।
इस तरह हम नानू चट्टी के पहले की दुकान तक पहुँचते हैं, जहाँ चढ़ते समय मैगी खाई थी। आज यहाँ पराँठा आर्डर करते हैं। लेकिन परांठा खाने का मन नहीं कर रहा था। किसी तरह एक तिहाई खाते हैं। हमारी भूख ही मर गई थी। इसी बीच पाँच युवा आते हैं और सीधे दस पराँठा आर्डर देते हैं। हम सोचते ही रह गए की ये कौन हैं, जो इतना पराँठा खाने का कांफिडेंस लिए हैं।
बात करने पर पता चला कि ये
छत्तीसगढ़, राजनंदगाँव से आए हैं। फिर तो उनसे चर्चा होती है तथा परिचय ओर सघन
होता है। ये सुपर फिट युवा थे अपने बीस-पच्चीस की वय में। ये सुबह राँसी से चले
थे, और आज ही बुढ़ा केदार से होकर नीचे बापिस हो रहे थे। यह अपवाद श्रेणी के वो ट्रेकर
थे, जो लम्बे ट्रेक के अभ्यस्थ रहते हैं तथा इनकी संख्या पाँच-सात
प्रतिशत रहती होगी।
यहाँ से नीचे उतरते हैं, तो बारिश और तेज हो जाती है। अब बारिश थमने का नाम नहीं ले रही थी।
लग रहा था कि चढ़ाई में तो बाबा ने हमको वख्श दिया था, लेकिन उतराई में हमारे सारे प्रारब्ध कर्मों को धोने जा रहे थे। इसी बारिश में हम लोग खट्टरा पहुँचते हैं, यहीं रास्ते में चंडीगढ़ से आए सज्जन मिले, जो अपने बुजुर्ग माता-पिता को श्रवण की भाँति तीर्थाटन के लिए लाए थे। माताजी का जीवट अभी उताराई में भी बैसे ही बर्करार था।
खट्टरा तक अंधेरा हो चुका था, हम अपने मोबाइल टॉर्च के सहारे नीचे उतर
रहे थे। घुटने की नीचे की पिंडलियाँ जोर पकड़ रहीं थी और पैर शरीर का भार उठाने
में असक्षमता जाहिर कर रहे थे। इसी तरह हम कल सुबह के टीन शैड़ वाले उस बिंदु को
पार करते हैं। रात को यह बंद हो चुका था। सौरभजी हमें सहारा देकर नीचे उतरने में
मदद कर रहे थे। रजतजी रोशनी के साथ रास्ता स्पष्ट कर हमारा सफर सरल बना रहे थे।
इस तरह तेज बारिश के बीच हम कल के रिंगाल जंगल व बुराँश पेड़ इलाके को
भी पार करते हैं। इसके बाद अंतिम दो जिगजैग ट्रेक रात के इतना लम्बे लग रहे थे कि
खत्म होने का ही नाम नहीं ले रहे थे। अंत में कौने पर पहुँचने पर बनलौती के भवनों की रोशनी टिमटिमाती दिखती है, तो कुछ
राहत मिलती है। लेकिन गांव में प्रवेश तक के कुछ सौ मीटर भी कई किमी जैसे लग रहे
थे। पैर जैसे जबाब दे चुके थे।
इस रुट पर बिना तैयारी, हमारी तरह चल चुके यात्री इस स्थिति को भलीभाँति समझ रहे होंगे। लो वह ठिकाना आ गया, जहाँ हम कल सुबह नाश्ता किए थे, यहाँ लोगों की चहल-पहल थी, भोजन पानी चल रहा था, पता चला कि यहाँ रुकने की भी व्यवस्था है। यहाँ अंदर सीढ़ियाँ उतरते-चढ़ते हुए कमरे तक पहुँचते हैं। और गर्म पानी में हाथ पैर धोकर, सरसों के तेल की मालिश कर सोते हैं। चाबल रोटी, आलू-सोया बडी, दाल का बेहतरीन एवं पसंदीदा भोजन आता है, लेकिन हमारी भूख मर चुकी थी। भोलेनाथ की कृपा का आभार व्यक्त करते हुए बिस्तर मे जाते हैं कि आज की 10 किमी की यात्रा इस अवस्था में पूरी हो गयी थी। (जारी, शेष अगले भाग-7 बनतौली से रांसी वाया गौंदार और घर बापिसी)






