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गुरुवार, 23 जुलाई 2026

हमारी अविस्मरणीय मदमहेश्वर यात्रा, भाग-5

 


नानू से मदमहेश्वर

अब बारिश थम चुकी थी। नानू चट्टी से हम धीरे-धीरे आगे बढ़ते हैं। थोड़ा आगे बढ़ने के बाद अब ऊपर का जिगजैग मार्ग दूर तक दिख रहा था, जिसमें यात्रियों का आवागमन चल रहा था। ऊपर से बापिस आ रहे यात्रियों में कुछ ही चुस्त-दुरुस्त अंदाज में नीचे उतर रहे थे। अधिकाँश की चाल में थकान व ठहराव दिख रहा था। कुछ तो नंगे पैर ही धीरे-धीरे नीचे उतर रहे थे, स्पष्टया पैर में छाले पड़ने के कारण उनको चलने में दिक्कत हो रही थी। कुछ किसी तरह स्वयं को नीचे घसीट रहे थे।

स्पष्ट है कि यह ट्रैक यात्रियों से पूरी तैयारी की माँग करता है। उत्साह में उठकर किसी के कहने पर चल देने वालों के लिए यह ट्रेक नहीं है। जो पहले से ही लम्बी यात्रा के अभ्यस्त हों या इसके लिए पर्य़ाप्त तैयारी करके आए हों, उनके यह ट्रेक पूरे एडवेचर एवं आनन्द से भरा हुआ है। क्योंकि इसकी खूबी इसकी प्राकृतिक समृद्धता है, जो अभी अपने नैसर्गिक रुप में बर्करार है। लेकिन ट्रैक की चढ़ाई अपनी जगह चुनौतियों के पहाड़ की तरह यात्रियों की कदम-कदम पर परीक्षा लेने के लिए तैयार दिखती है। ऐसे ट्रेक में सही जुत्तों का भी अपना महत्व रहता है। यदि जुत्ते सही न हों तो येही रास्ते का एक बड़ा व्यवधान बन जाते हैं, जो इस रुट पर दिखा रहा था। कुछ लोग जुत्ता उतारकर नंगे पैर ही नीचे उतर रहे थे।

हर-हर महादेव की गुंजार आते-जाते यात्रियों के उत्साह में बर्धन कर रहा था। थोड़ी ही देर में हम एक ऐसी जगह पहुंचते हैं, जहाँ सड़क के ऊपर नीचे दो-चार दुकानें सजीं थी। यहाँ रिफ्रेशमेंट के लिए यात्रियों की भीड़ लगी थी। हम नीचे वाले ढावे में प्रवेश करते हैं। यहाँ मैगी और चाय का आनन्द लेते हैं। हालाँकि स्वाद में राँसी वाला स्वाद नहीं था, लेकिन इस ऊंचाई व विरान इलाके में पेट भरने की यह कामचलाऊ व्यवस्था भी कम नहीं थी। यहाँ भी पूरा परिवार इस कार्य में लगा दिखा।

यहाँ से आगे का जिगजैग रास्ता काफी दूर तक स्पष्ट दिख रहा था। और बीच में काफी सीधा भी। रास्ते में खड़ी चट्टानें व गहरी खाइयाँ स्वागत कर रही थीं, जो कई हजार फीट नीचे सीधे नीचे मधुगंगा की ओर ईशारा कर रही थीं। लेकिन रास्ते का प्राकृतिक सौंदर्य़ इन खतरों पर भारी था, अतः ध्यान अपने रास्ते पर रहता है, जहाँ थोड़ा दम भरते, वहाँ से सामने व चारों ओर के नजारों पर भी एख नज़र डालते, जो काफी सुकूनदायी व ऊर्जा भरने वाला रहता।

बता दें कि इस रुट में खड़ी चढ़ाई के बाद, जहाँ भी थोडा सा सीधा रास्ता मिलता, वहीं कुछ राहत का भाव जागता, क्योंकि सीधी खड़ी चढ़ाई में सांस फूल रही थी। ऊंचाई 9000 फीट से अधिक बढ़ने के साथ ऑक्सीजन का स्तर कम होता जा रहा था, फैफड़े को अतिरिक्त ऑक्सीजन की जरुरत महसूस हो रही थी, जिस कारण दिल की धड़कनें बढ़ जाती और इस पर दबाव स्पष्ट अनुभव हो रहा था। और कुछ पल विश्राम करने पर वह सामान्य हो जाता है। और शरीर उस ऊँचाई के प्रति अभ्यस्त (acclimatize) हो जाता और फिर हम आगे बढ़ चलते। सीधे रास्ते में यह चुनौती हट रही थी। अतः सीधा मार्ग हर चढ़ाई के बाद राहत का सबब बनकर यात्रा को कुछ सरल बना रहा था।

रास्ते में अब जिगजैग मार्ग लगभग समाप्त हो रहे थे, व आगे मोड़ से वाएं मुड़ते हुए हम नए परिवेश में प्रवेश करने वाले थे। अहसास जग रहा था कि हम महमहेश्वर के समीप पहुँच रहे हैं। हालांकि वहां के दर्शन अभी नदारद थे। यहां मैखम्ब नाम की एक छोटी सी चट्टी नजर आई, जहाँ सड़क से थोड़ा हटकर एक लम्बे से भवन में दुकानें दिखीं और सड़क के किनारे पानी की टंकी व नल थे। यहाँ से पानी पीकर व बोटल में भरकर आगे ब़ढ़ते हैं।

रास्ते में साठ से ऊपर के एक बुजुर्ग दम्पति के दर्शन हुए, जो महमहेश्वर जा रहे थे। इनमें माताजी का जीवट देखते ही बन रहा था। वे इस ऊँचाई में भी सधे कदमों के साथ एकचित्त होकर आगे बढ़ रही थी।


रास्ते में इनके सुपुत्र से मुलाकात होने पर पता चला कि माताजी तन से दुबली पतली दिखने पर भी मन की बहुत मज़बूत हैं। बाबा के प्रति प्रगाढ़ आस्था के चलते ये आत्मबल की धनी हैं। निसंदेह रुप में इस रुट पर आस्था का महत्व अपनी जगह भूमिका निभाता है।

पास में ऊपर दाईँ ओऱ के वन्यक्षेत्र में पेड-पौधों का रंग व स्वरुप बदल रहा था। पास के स्थानीय लडके से पूछा कि ये किसके जंगल हैं, उत्तर संतोषजनक नहीं मिला। जबकि हमारा अनुभव कह रहा था कि ये भूरे वृक्षों के जंगल कुछ न कुछ विशेष व वेशकीमती वनसंपदा हैं, क्योंकि इस ऊंचाई पर उगने वाले सभी पेड़-पौधे व झाड़ियाँ विशिष्ट गुण लिए होते हैं। हम अपनी अज्ञानतावश इनके गुण व महत्व को न समझ पाए, वह बात दूसरी है।

आगे से हम इस राह के अंतिम जिगजैग मोड़ से मुड़ चुके थे। और कून चट्टी के समीप पहुँचने वाले थे। यहीं हमें एक गाइड मिलते हैं, जो उम्रदराज व अनुभवी प्रतीत हो रहे थे। पता चला कि वो यहीं के स्थानीय वासी हैं, पिछले कई वर्षों से गाइड का काम कर रहे हैं और आज भी एक ग्रुप के साथ गाइड की भूमिका में थे। उनसे पूछने पर पता चला की ये खोरसू के जंगल हैं, जो हिमालयन इकॉलोजी का एक महत्वपूर्ण स्तम्भ माने जाते हैं।


इन्हें बाँज की ही ऊंचाइयों में उगने वाली एक प्रजाति माना जाता है, जिनके (बाँज) दर्शन हमे बनतौली के ऊपर से होना प्रारम्भ हुए थे व नानू चट्टी के ऊपर तक होते रहे।

रास्ते में इनके जंगलों के बीच यात्रा आगे बढ़ती रही। एक बिंदु पर विश्राम के दौरान नीचे घाटी से बादलों का सैलाव ऊपर उठता दिखा, जो कुछ ही पल में पूरी घाटी को ढक लता है, हम लोगों को छूता हुआ यह ऊपर बढ़ता है। निश्चित रुप से इस ट्रेक का यह एक यादगार अनुभव था, लगा जैसे बादल भी हमारा स्वागत कर रहे हों।

इस तरह हम कून चट्टी पहुँचते हैं, जो अब मदमहेश्वर से पहले इस मार्ग की अंतिम मानवीय बस्ती है। इसके प्रवेश द्वार पर ही एक बड़ी सी चट्टान के नीचे रुकने के लिए दो-तीन तम्बुओ की व्यवस्था दिखी, चाय नाश्ते का भी अस्थ्यी इंतजाम वग्ल में दिखा। हमारे पीछे आ रही दो युवतियां तो यहीं रुक गई थीं। थोड़ी आगे एक मोड़ पार कर ऊपर कून चट्टी का भवन व स्टाल मिला, शाम होने के कारण हलचल नहीं थी, अभी यहाँ का शटर बंद था, वग्ल में बस एक चूल्हा जला था। बस यात्री बेंच पर विश्राम के लिए रुके थे। यहाँ नीचे खाली स्थान में तम्बू लगे थे। यहाँ भी रुकने की व्यवस्था थी। पौने सात बज चुके थे, शाम का धुंधलका छा रहा था, हम तो अपनी गिरी हालत के चलते यहाँ भी रुकने की सोच रहे थे, लेकिन साथियों का भाव था कि दो-तीन किमी ही तो शेष बचे हैं, वहीं पहुँचकर विश्राम करते हैं। यहाँ पर स्पष्ट चेतावनी थी कि आगे के 2 किमी तक जल का कोई स्रोत नहीं है। अतः यहाँ के नल से बोटल में जल भरते हैं, और यहाँ के सुन्दर दृश्य को कैप्चर करते हुए आगे बढ़ चलते हैं।

आगे रास्ते में फिर उम्रदराज गाइड से मुलाकात होती है, जो हमें आगे मदमहेश्वर के रास्ते की स्टीक जानकारी भी मिली कि थोड़ा आगे तक तो दो तीन मोड तक कुछ चढ़ाई है, फिर अंत में सीधा रास्ता मदमहेश्वर तक जाता है। इनकी बातों को सुनकर बहुत राहत मिली। वाकि अब तक रास्ते भर बापिस लौट रहे अधिकाँश यात्रियों के निराशाजनक व हतोत्साहित करने वाले ही उत्तर मिलते रहे। खट्टरा व नानू के बीच में एक व्यक्ति ने तो यहाँ तक कह दिया कि अब तक तो वार्म अप ट्रेक था, असली चढ़ाई तो अब आने होने वाली है।

किसी तरह से अपने पूरे जीवट और साहस को वटोर कर सफर कर रहे थके पथिकों के लिए यह परामर्श उसके विश्वास की ढोर को तोड़ने वाला सिद्ध हो रहा था। कूनचटी से ऊपर एक व्यक्ति ने तो ओर भी खतरनाक परामर्श दे डाला था कि मदमहेश्वर से पहले दो-तीन सौ मीटर पानी से भरी फिसलन भरी चढ़ाई है, वहाँ संभल कर चलाना। अंधेरे में सफर कर रहे पथिकों के लिए यह एक खतरनाक चुनौती प्रतीत हो रही थी, पता नहीं अंधेरे में इसे कैसे पार करेंगे, यही पेच मन में पड़ चुका था। जबकि वहाँ से गुजरते हुए ऐसा कुछ भी नहीं निकला। रास्ते में नाले का कुछ पानी सड़क पर फैला हुआ था, जिसकी इतनी खतरनाक व्याख्या की जा रही थी।

अतः हमारा तो सुझाव है कि अपरिवक्व व नौसिखिया यात्रियों से आगे के रास्ते का परामर्श न लेंकोई अनुभवी, परिपक्व या स्थानीय व्यक्ति से ही रास्ते का हिसाब किताब पूछें, जो सही सटीक व आशावादी परामर्श के साथ आपके कदमों का सहारा बनें। वाकि अपनी अंतःप्रेरणा के हिसाब से, अपने होमवर्क के आधार पर अनुमान के सहारे चलते रहने में भी कौन सी बुराई है। रास्ता तो इन्हीं कदमों के सहारे पुरा होना है, सो धीमे-धीमे आगे बढ़ाते रहें।

कून चट्टी से बढ़ते हुए रास्ते में अंधेरा छा रहा था। आगे का रास्ता कहीं चढ़ाई भरा मिला, फिर सीधे रास्ते की राहत और फिर चढ़ाई। अंधेरा बढ़ने के कारण मोबाइल टॉर्च जलाते हैं। रास्ते में दिल्ली की दो ट्रेक्कर आगे बढ़ने के लिए संघर्ष करती दिखीं। इनमें से बजनदार ट्रेकर को चढ़ने में दिक्कत हो रही थी। साथी ट्रेक्कर हौंसला बधाई कर चलने का दबाब बना रही थी।

मैं भी इसी कैटेगरी में आगे बढ़ रहा था और बच्ची की तकलीफ को अनुभव कर पा रहा था। यहाँ मात्र हौंसला फजाई या दबाव से काम चलने वाला नहीं था। यात्री की वास्तविक स्थिति को समझने की आवश्यकता थी। थोड़ा दूर चलने, जहाँ धड़कन अधिक बढ़ने लगे, वहाँ थोड़ा रुकने, श्वांस को सामान्य करने व फिर चलने का रुटीन ऐसे में काम आ रहा था, वही उसको बताया। इस तरह धीरे-धीरे अंधेरे को चीरते हुए हम लोग मोबाइल टॉर्च के सहारे आगे बढ़ रहे थे।

अंधेरे में चढ़ाई वाला रास्ता समाप्त ही नहीं हो रहा था, लग रहा था कि इस अंतहीन यात्रा की अंतिम मंजिल के दर्शन कब होंगे। अंधेरे में हमारा दल इन बच्ची के सहचर सहयोगी की भूमिका में इसको आगे बढ़ाता रहा। अब मदमहेश्वर मुश्किल से एक-डेढ़ किमी रहा होगा। इनके ग्रुप का गाइड टोर्च लाइट के साथ इनको खोजते हुए आ चुका था व धीरे-धीरे हम अंतिम चढ़ाई पार करते हैं और फिर समतल रास्ता और सामने मंदिर की टिमटिमाती रोशनी मंजिल तक पहुँचने का आश्वासन दे रही थी और कुछ ही देर में हम लोग मंदिर परिसर में प्रवेश करते हैं। रात के साढ़े दस बज चुके थे। शुरु में तम्बुओं की कतार स्वागत करती नज़र आ रही थी, जिसमें यात्री रुके थे, कुछ सोने की तैयारी कर रहे थे।

जल्दी महदमहेश्वर पहुँचकर कमरा बुक करने के चक्कर में हमारे एक साथी कुछ घंटे पहले की यहाँ पहुँच चुके थे, लेकिन नेटवर्क बाधित होने के कारण हम लोगों का संपर्क कट चुका था। यहाँ भी मुख्य मंदिर ऑफिस से पता करने व तम्बुओं के पास आवाज देने पर भी कोई सुराग नहीं मिल पाया। लगा कि देर रात तक इंतजार करते-करते थककर सो न गया हो।

अतः एक भवन के सामने लगी कुर्सी मेज पर समान रखकर, हमारे साथी रुकने की व्यवस्था खोजते हैं। बाहर खुले में ठंड इस कदर थी, कि हवा के झौंकों के साथ वह वदन के आर-पार हो रही थी। लेकिन यहाँ इसको झेलने व इंतजार के अतिरिक्त कोई चारा नहीं था। रुकने की वातचीत होने पर हमारे साथी आते हैं और ऊपर मुख्य ऑफिस के बाहर लगे कुर्सी-मेज पर रात का दाल-चाबल खाते हैं। अंदर चूल्हा जल रहा था, लेकिन जुत्ता पहने अंदर प्रवेश संभव नहीं था। बाहर से ही बीरबल की आग की तरह दूरदर्शन से ही इसका ताप लेते रहे। भोजन के उपरान्त यहाँ से उपलब्ध गाइड के साथ समान लेकर नीचे एक खेत में लगे तम्बूओं की कतार की ओर बढ़ते हैं। जंगली घास और ढलानदार खेत के बीच होते हुए नीचे उतरते हैं।

इसी क्रम में हमारा एक साथी ढलान की गिली मिट्टी पर फिसल जाता है, लगा कहीं चोट ज्यादा तो नहीं आ गई। पता चला कि कंधे पर हल्की चोट आई है, बाकि सब ठीक है। फिर हम सब संभल कर आगे बढ़ते हैं और कौने पर एक खाली तम्बू में प्रवेश करते हैं। जूत्ते तम्बू के बाहर गैलरी में रखकर, अपना समान तम्बू के कौने में समेट कर मैट पर बिछे गद्दे पर लेटते हैं, मोटे-मोटे दो कम्बल ओढ़कर मदमहेश्वर बाबा का धन्यवाद ज्ञापन करते हैं कि सही सलामत उनके प्राँगण में पहुँच गए और बाबा को याद करते हुए सो जाते हैं। (जारी, शेष अगले ब्लॉग के भाग-6 में)

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