बारिश तो है महाप्रकृति का कृपा-प्रसाद
बारिश का आनन्द तो वह चातक जाने,
जो पूरी गर्मी रहा एक बूंद के लिए तरसता,
सहन करता रहा प्यासा गर्मी की तपन ।1।
बारिश का आनन्द तो वह कोयल जाने,
जो गर्मी भर तपती रही वृक्ष की ओट में,
गीत मलहार गाते हुए पूरे ग्रीष्म समर ।2।
बारिश का आनन्द तो वो वाशिंदे जानें,
जो फील लायक 42-45 डिग्री में तपते रहे,
बारिश का इंतजार करते रहे पंखा मात्र 3 नम्बर ।3।
बारिश का परमानन्द तो वो लोग जानें,
जो रहे
भवन की सबसे ऊंची तपती छत के नीचे,
रात को भी जिनका बिस्तर रहा पसीने से तर ।4।
बारिश का आनन्द तो वह पशु-पक्षी जाने,
जो जून की दोपहरी में पेड़ों में पड़े,
सहते रहे गर्मी का विकराल आतप ।5।
बारिश का आनन्द तो जाने वो फसल, पेड़-पौधे,
जो खुले आसमान के नीचे तपते रहे धूप की गर्मी में,
तरसते रहे पानी की एक बूंद के लिए गर्मी भर ।6।
बारिश का आनन्द तो वह वह धरती जाने,
जो बिना छत के तपती रही अंगार बरसाते सूर्य को,
जब 40, 50 डिग्री क्या, इससे भी उपर रहा गर्मी का
आतंक ।7।
बारिश का आनन्द वो लोग क्या जानें,
जो ऐसी कमरे में रहे पूरी गर्मी की दोपहरी में,
चौबीसों घंटे ऐसी भवन, कार, कमरों में बंद ।8।
फिर बारिश तो है महाप्रकृति का कृपा-प्रसाद, जो
बरसता है सबके ऊपर,
मानो इसे परमतपस्वी करुणासागर महादेव (परमेश्वर)
का भी दिव्य प्रसाद,
तप के शिखर पर ऐसे में हो रहा जैसे शिष्य-भक्त का अपने ईष्ट-अऱाध्य से मिलन-संवाद ।9।



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