गुरुवार, 16 जुलाई 2026

हमारी अविस्मरणीय मदमहेश्वर यात्रा, भाग-4


वनतौली से नानू चट्टी

मालूम हो कि मार्कंडगंगा बुढ़ा केदार की ओर से नीचे प्रवाहित होती हैं, जबकि मधुगंगा मदमहेश्वर की ओर से। संगम पर कुछ पल मधुगंगा और मार्कंडगंगा का आलौकिक दृश्य निहारते हुए विश्राम करते हैं। और फिर यहाँ से कुछ ही दूरी पर बसे बनतोली-1 में प्रवेश करते हैं, जहाँ सड़क के दोनों ओर घरों के साथ होमस्टे व ढावे दिखे, जो यात्रियों का स्वागत कर रहे थे।

यहाँ से एक किमी की चढ़ाई पार करते हुए हम बनतोली-2 पहुँचे। रांसी से गौंदार व संगम तक पिछले 6 किमी की उतराई के बाद अब चढ़ाई के संग यात्रा का पहला अनुभव मिल रहा था। साथ ही रास्ते से नीचे संगम व दूर गौंदार साइड के दर्शन हो रहे थे। हम नीचे लगभग 5000 फीट की ऊँचाई से चढना आरम्भ किए थे व हर दो किमी पर औसतन एक हजार फीट ऊंचाई चढ़ रहे थे। अगले 10 किमी में हम लोग लगभग 5000 फीट से अधिक ऊंचाई चढ़ने वाले थे। इसीलिए इस ट्रेक को केदारनाथ ट्रेक से अधिक टफ माना जाता है।

बनतौली-2 में भी ढावों व होमस्टे की उचित व्यवस्था दिख रही थी। यहीं के एक ढावे में हम लोग नाश्ते के लिए रुकते हैं, जहाँ परौंठा, अचार, घर की दहीं और चाय के साथ तृप्तिदायक नाश्ता करते हैं। संयोग से बापिसी में अगले दिन भी यही हमारे रात के रुकने का ठिकाना बनने वाला था। पेटभराऊ नाश्ते के बाद बनतौली से हमारा मदमहेश्वर की ओर का सफर शुरु होता है।

प्रारम्भ में ही बनतोली से दूसरी लम्बी जिगजैग सड़क के  किनारे स्थान-स्थान पर लोगों को खड़े देखा। शुरु में लोगों का यह जमाबड़ा समझ नहीं आया। लेकिन थोड़ी देर में पता चला कि यहाँ से नेटवर्क ठीक-ठाक चल रहा था। निश्चित ही सभी अपने घर-परिवार को अपनी यात्रा की कुशल-क्षेम का संदेश साझा कर रहे थे, क्योंकि आगे नेटवर्क बाधित होने वाला था। यहीं पर महमहेश्वर से आ रहे पर्यटकों से अपनी जिज्ञासाओं को शांत करने की कवायद भी शुरु हो गई थी।

इस छोर पर एक बड़ी सी चट्टान के बीच से रास्ते आगे खुलता है। इससे ठीक आगे दायीं ओर एक बालक बुराँश व कोल्ड ड्रिंक्स का ठेला लगाए था। संयोग से ठीक इसके सामने सड़क के दूसरी ओर बुराँश का एक युवा पेड़ दिखा, हालांकि अभी इसमें फूल नहीं थे। फूलों का सीजन समाप्त हो चुका था, जो अमूनन अप्रैल अंत से मई तक रहता है। बुराँश के पहले पेड़ के दर्शन के साथ मैं रोमाँचित था, क्योंकि इसके गहरे हरे लम्बे पत्तों के गुच्छ इसको विशेष बनाते हैं और इसके फूलों के साथ बचपन की गई यादें जुड़ी हुई हैं, सो इसको देखकर उन सुखद स्मृतियों का उभरना स्वाभाविक था। यह भी मालूम हो कि बुराँश बर्फिली ऊँचाईयों में ही उगता है, जिसके सुर्ख लाल रंग के फूल देखते ही बनते हैं। इनसे चटनी से लेकर जूस तैयार होते हैं, जिन्हें औषधीय गुणों से भरपूर माना जाता है।

यहाँ एक कुर्सी पर बैठकर बुराँश का एक गिलास पीते हैं, जो पूरी तरह से स्वाद में लाजबाव और तृप्तिदायक रहा। आश्चर्य़ नहीं कि रास्ते से गुजर रहे दूसरे कितने जिज्ञासु यात्रियों को भी बुरांश के लाभ व इसके पेय के लिए प्रेरित करता रहा, लगा कि बापिसी में यहाँ से बुराँश की एक बोटल खरीद लूंगा।

यहाँ से तरोताजा होकर आगे बढ़ते हैं। इसके आगे रिंगाल का जंगल शुरु होता है। सड़क के दोनों ओर इनका हराभरा जंगल व संगसाथ अगले दो जिगजैग रास्ते तक मिलता रहा। इसके वाएं छोर पर अब मार्कंड गंगा के दर्शन हो रहे थे। जो ऊंचे पहाड़ों के होकर संकरी घाटी के संग पूरी गर्जन-तर्जन करती हुई मधुगंगा से मिलने उतर रही थी। अगले दो-तीन जिगजैग रास्तों तक वाईं ओर इसके दूरदर्शन व नैसर्गिक सांय-सांय करता निनाद हमारी यात्रा का सहचर बना रहा।

अब हम एक ऐसे मोड़ पर थे, जहाँ मार्कंडगंगा के दर्शन नहीं हो रहे थे, बल्कि दायीं ओर से मधुगंगा की गर्जन-तर्जन सुनाई दे रही थी। यहाँ हम एक ऐसे बिंदु पर थे जहाँ एक साथ देवदार, बुराँश, चीड़, रिंगाल, बाँज के वृक्षों व कुछ पहाड़ी लतादार झाडियों के दर्शन हो रहे थे। पृष्ठभूमि में मार्कण्ड गंगा की ओर के बादल से ढके बर्फ से ढके पहाड़ झाँक रहे थे।

यहाँ पास के एक सरकारी टीन शेड़ में विश्राम के लिए रुकते हैं। कई यात्री यहाँ विश्राम कर रहे थे व हल्की रिफ्रेशमेंट ले रहे थे। यहाँ वाएं कौने पर बाहर एक बड़ा सा हरा-भरा छायादार पेड़ हवा में अपने बड़े व चौड़े पत्तों को फहरा रहा था, जो हमारे लिए नया था व इसका नाम पता नहीं चल पाया। रिफ्रेश होकर हमलोग यहाँ से आगे चल देते हैं।

आगे की चढ़ाई को पार करने के बाद अगला स्टेशन था खट्टरा चट्टी पहुँचते हैं, जिसे हम अनजाने में रास्ते भर खटारा बोल रहे थे। यहाँ समतल मैदान पर दो-चार भवन बने थे। हाँ रास्ते में पिछले मोड़ पर कुछ तम्बू सड़क के ऊपर-नीचे सजे थे, जो राहगीरों के विश्राम-भोजन एवं रात को रुकने की उचित व्यवस्था किए थे। खट्टरा के गेस्ट हाउस में भी रुकने की व्यवस्था दिखी। यात्रियों के लिए बाहर आंगन में तम्बु भी सजे थे।

बाहर थोड़ा आगे पानी के सिलेंडर आकार की सिमेंट टंकी दिखी, जिसमें एक लकड़ी से छेद बन्द कर रखा था और इसके खोलने पर पानी की धार बह निकलती। यहीं से अपनी प्यास बुझाकर और फिर पानी की बोतल को भर आगे बढ़ चलते हैं। यहीं छायादार पेड़ के नीचे कुछ लोग विश्राम कर रहे थे। मालूम हो कि बनतोली से लेकर महमहेश्वर तक रास्ते में कोई पानी का चश्मा नहीं मिला। ऊँचाई में किसी चश्मे के प्राकृतिक जल स्रोत से पाइप के सहारे पूरी लाइन में जल का वितरण हो रहा था, ऐसा समझ में आया।

खट्टरा से लेंडस्केप में कुछ नयापन दिखता है। एक तो भवनों के नीचे मधुगंगा की ओर ढलान पर छोटे-छोटे खेत दिखे, संभवतः यहाँ आलू व अन्य सब्जियों को उगाते होंगे। दूसरा यहाँ से थोड़ा आगे बढ़ते ही सामने मधुगंगा के प्रवाह की रेखा और पूरी घाटी के दर्शन होते हैं, जिसका नज़ारा फिर कून चट्टी से थोड़ा पहले तक अलग-अलग एंग्ल से पथिकों के मन को लुभाता रहता है।

मधुगंगा के उस पार संकरी घाटियों में नदी से बना एक बड़ा सा झरना मधुगंगा में प्रवाहित हो रहा था, जिसकी शोर करती वृहद दुधिया जलराशि के दर्शन इस पार से ही हो रहे थे। और थोड़ा आगे बढ़ने पर इनके पीछे बर्फ से ढकी चोटियों के दर्शन आल्हादित करते हैं।


महमहेश्वर की ओर के दर्शन अभी नदारद थे। अभी हम अगले स्टेशन नानू चट्टी के दर्शन के लिए वेताब थे, जो अभी दृष्टि से ओझल थी।

खट्टरा से नानू चट्टी मात्र दो किमी आगे बतायी गयी थी, लेकिन खड़ी चढ़ाई के संग चढ़ते-चढ़ते लगा कि 2 किमी खत्म ही नहीं हो रहे। रास्ते में दो-तीन चाय-नाश्ते के ठिकाने भी मिले, लेकिन नानू चट्टी दृष्टि से ओझल ही रही। नानू चट्टी कितनी दूर है, तो ऊपर से नीचे आ रहे यात्रियों का एक ही उत्तर रहता कि बस आने वाली है, थोड़ी दूर है। लेकिन नानू चट्टी के दर्शन ही नहीं हो रहे थे। थकान कुछ इस कदर हावी हो रही थी कि थोड़ी-थोड़ी दूरी पर बने विश्रामस्थलों पर बैठ जाते। चट्टानी आसन पर बैठ नीचे मधुगंगा की सांय-सांय ध्वनि व उधर से इसमें गिरते झरनों को निहारते रहते।

अगले पडाव में एक बड़े से बाँज वृक्ष के नीचे आराम करते हैं, जिसकी सघन छाया में कई लोग विश्राम कर रहे थे। नीचे तो सीधी मधुगंगा की खाई थी, लेकिन उस पार के नजारे खुबसूरत थे। अगले मोड़ पर सड़क टूट गई थी, इस पर स्थानीय मिस्त्रियों द्वारा काम चल रहा था।

इसके अगला मोड़ पार कर एक समतल स्थान पर बैठते हैं, जहाँ से नीचे पास के जंगल का नजारा दर्शनीय लग रहा था। थकान के बीच इन दृश्यों को निहारते हुए नई ऊर्जा पाते रहे और अगले पड़ाव पर देवदार का छोटा सा जंगल दिखा, जिसे देख मन प्रमुदित हुआ, क्योंकि ऐसा नजारा अभी तक नहीं दिखा था। नीचे से कुछ साहसी लोग शॉर्टकट की खड़ी चढ़ाई से भी आ रहे थे, लेकिन इनमें से कुछ लोगों की हालात देखकर लग रहा था कि एक  कदम की चूक कितनी भयंकर दुर्घटना में बदल सकती थी।

ऊप से नीचे गुजर रहे यात्रियों से आश्वासन मिला कि बस 80 मीटर आगे नानू चट्टी आने वाली है। सही कहें खट्टरा से नानू की 2 किमी की चढ़ाई में नानी याद आ रही थी। हालाँकि हमें लगा कि दूरी 2 किमी से अधिक थी। 3 किमी रही होगी। चढाई में 3 किमी पीठ में लदे बड़े बेग औऱ कंधे में टंगे दूसरे बैग के साथ हमारी उम्र के यात्री के लिए यह एक कठिन परीक्षा बन गई थी।

लगा कि इस रुट की माँग अधिक फिटनेस की माँग कर रही थी। हम अचानक बने इस प्रोग्राम में उठकर चल दिए थे, सोचा था कि अब तक का ट्रेकिंग अनुभव काम आएगा। जबकि इस रुट के लिए तीन-चार सप्ताह पहले आवश्यक फिजिक्ल फिटनेस की तैयारी की जानी थी। खैर अब आधे से अधिक रास्ता पार कर चुके थे, आगे का रास्ता भी इसी तरह पार करना था।

रास्ते में कुछ संगीत प्रेमी लोग अलग-अलग संगीत यंत्रों में भजन से लेकर मनपसंदीदा फिल्मी गीतों की धुन के साथ आगे बढ़ रहे थे। हालाँकि वन विभाग का नोटिस खट्टरा के आसपास चस्पा था कि आप वन अभियारण क्षेत्र से गुजर रहे हैं और यहाँ किसी तरह का संगीत या शोर करना मना है, पकड़े जाने पर जुर्माना भी लिखा हुआ था। क्योंकि वन्य जीवन इससे परेशान हो सकते हैं। कुछ लोगों को इसके बारे में सचेत भी किया, वे मान भी गए। लेकिन आगे लगा कि भोले के भक्तों को हम इंसान क्या व कितना समझा सकते हैं, वे स्वयं ही समझा देंगे।

एक वस्ती के दर्शन होते ही लगा कि चिरप्रतिक्षित नानू चट्टी आ गई। लेकिन अभी भी वह थोडा दूर थी। हल्की बारिश शुरु हो गई थी। रास्ता थोड़ा फिस्लनभरा हो रहा था। यहाँ जल स्रोत के पास खच्चरों का झुण्ड अपनी प्यास बुझा रहा था।


हम भी ऊपर बने छत्तदार भवन में रुकते हैं। लेकिन वहाँ की भीड़ को देखकर लगा कि यहाँ किसी तरह की रिफ्रेशमेंट लेना काफी समय ले सकता है।

हमारी टीम के युवा साथी डॉ. सौरभजी तब तक पास में खच्चर वालों से मोलभाव कर रहे थे। पता चला कि एक खच्चर की कीमत हमारे बजन के व्यक्ति के लिए 5000 रुपए रहेगी। जो हमारी यात्रा के पूरे बजट से अधिक थी। लगा इससे तो बेहतर धीरे-धीरे चलते रहेंगे। अब आगे 2-3 किमी दूर कून चट्टी है और फिर 2-3 किमी पर मदमहेश्वर। बीच में डेढ़ किमी बाद एक अन्य चट्टी आने वाली थी। बैग का सामान आपस में एडजेस्ट करते हुए हमारा पीठ का बैग थोड़ा हल्का हो गया था। और हम अगले पड़ाव की ओर बढ़ रहे थे। (जारी...शेष अगले ब्लॉग-5 में)

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