कृपा उसकी परम मंगलमयी, रखना बस उस पर अटल विश्वास
अल्पज्ञ मनुष्य नासमझ
मूढ़, सर्वज्ञ होने का भ्रम पाल बैठा,
लेकिन प्रकृति की विराटता विकरालता के समक्ष बौना
हो बैठा।
माना ईश्वर का अंश, ईशतुल्य, जीव अविनाशी,
लेकिन अपनी मानवीय सीमाओं का भी तो बोध होना
चाहिए।
मदहोशी में, अपने सम्यक बोध के अभाव में हो जाती
हैं गलतियाँ,
कोई बड़ी बात नहीं, समझ आने पर भूल सुधारने में
क्या देरी।
वह सर्वज्ञ सर्वसमर्थ, तुम्हारा सब जाने, अतीत
वर्त और भविष्य,
उसकी कालजयी योजना का तुम क्या पार पाओगे।
उसकी दुर्भेद्य प्रकृति का एक झटका लगे कठिन
परीक्षा,
जन्मों के संचित कर्म, प्रारब्ध चटकेंगे पल भर
में कुछ ऐसे।
तत्काल प्रकृति का क्रूर विधान, अत्याचार, अन्याय लगेगा,
समय के साथ इसके पीछे का करुणा विधान समझ आएगा।
जो नहीं कर पा रहे जन्मों से, वह इसी जन्म में हो
जाएगा,
चटांक बुद्धि से न लगाओ तड़का परिस्थितियों के
चक्रव्यूह पर।
वह है सत्य शिव सुन्दर, सौम्य अणु विभू, अखण्ड
प्रचण्ड विकराल,
उसकी कृपा है परममंगलमयी, रखना बस उस पर अटल विश्वास।


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