नियति की चुनौती स्वीकार करें
सदा दिन ही बना रहे, रात कभी आये ही नहीं, भला यह कैसे हो सकता है? जन्मोत्सव ही मनाए जाते रहें, मरण का रुदन सुनने को न मिले, यह कैसे संभव है। सुख की घड़ियाँ ही सामने रहें, दुख के दिन कभी न आयें - यह मानकर चलना यथार्थता की ओर से आँखें मूंद लेने के समान है। बुद्धिमान वे हैं जो सुखद परिस्थितियों का समुचित लाभ उठाते हैं और दुख की घड़ी आने पर उसका सामना करने के लिए आवश्यक शौर्य और साधन इकट्ठा करते रहते हैं।
परिस्थितियों की अनुकूलता और प्रतिकूलताओं से इन्कार नहीं किया जा सकता। शारीरिक संकट उठ खड़ा हो, कोई अप्रत्याशित रोग घेर ले यह असंभव नहीं। परिवार के सरल क्रम में से कोई साथी बिछुड़ जाय और शोक-संताप के आँखू बहाने पड़ें, यह भी कोई अनहोनी बात नहीं है। ऐसे दुर्दिन हर परिवार में आते हैं और हर व्यक्ति को कभी न कभी सहन करने पड़ते हैं। मनचाही सफलताएँ किसे मिली हैं। मनोकामनाओं को सदा पूरी करते रहने वाला कल्पवृक्ष किसके आँगन में उगा है? ऐसे तूफान आते ही रहते हैं जो सँजोई हुई साध के घोंसले उड़ाकर कहीं से कहीं फेंक दें और एक-एक तिनका बीनकर बनाए गए उस घरोंदे का अस्तित्व ही आकाश में छितरा दें, ऐसे अवसर पर दुर्बल मनःस्थिति के लोग टूट जाते हैं ।
नियति क्रम से हर वस्तु का, हर व्यक्ति का अवसान होता है। मनोरथ और प्रयास भी सर्वदा सफल कहाँ होते हैं। यह सब अपने ढंग से चलता रहे, पर मनुष्य भीतर से टूटने न पाए इसी में उसका गौरव है। समुद्र तट पर जमी हुई चट्टानें चिर अतीत से अपने स्थान पर जमी-अड़ी बैठी हैं। हिलोरों ने अपना टकराना बंद नहीं किया सो ठीक है, पर यह भी कहाँ गलत है कि चट्टान ने हार नहीं मानी।
न हमें टूटना चाहिए और न हार माननी चाहिए। नियति की चुनौती स्वीकार करना और उससे दो-दो हाथ करना ही मानवी गौरव को स्थिर रख सकने वाला आचरण है।
- युगऋषि वेदमूर्ति तपोनिष्ठ पं.श्रीराम शर्मा आचार्य
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सद्विचारों का कारवाँ तथा जीवन्त विश्वास के जल की व्यवस्था
ध्यान की घड़ियों में आत्मा ने स्वयं से कहा-मौन में ही शांति का निवास है। और शांति पाने के लिए तुम्हें बलवान होना आवश्यक है। त्याग की शक्तिशाली निस्तब्धता में जब इन्द्रियों का विक्षोभ डूब जाता ,है तब मौन आता है। इस संसार-मरुभूमि में तुम पथिक हो। यहाँ न रुकना जिससे कि तुम रास्ते में ही नष्ट न हो जाओ। अपने लिए सद्विचारों का कारवाँ बना लो तथा जीवन्त विश्वास के जल की व्यवस्था कर लो। सभी मृगतृष्णाओं से सावधान रहो। लक्ष्य वहाँ नहीं है। बाह्य आकर्षणों से भ्रमित न होओ। सभी त्याग कर उन पथों से जाओ जो तुम्हें स्वयं तुम्हारी अन्तर्दृष्टि के एकांत में ले जायेंगे। अनेकत्व के जाल में फँस कर उसका अनुसरण न करो। एकत्व के जिस लक्ष्य की ओर संतगण सबसे अलग और अकेले जाते हैं, उसी पथ में तुम भी जाओ। वीर होने का साहस करो। प्रारंभिक प्रयत्नों में ही असत्य को जीतो। विचलित न होओ। पवित्रता में डूब जाओ। एक उन्मत्त छलांग में स्वयं को ईश्वरीय समुद्र में डूबो दो। दिव्यत्व ही लक्ष्य है। ओ महान् ज्योतिर्मय की किरण! प्रकृति में तुम्हारे लिए और कोई वस्तु नहीं हो सकती। शीघ्रता करो जिससे कि तुम्हें पश्चाताप न करना पड़े। धार्मिक आंतरिकता और दृढ़ विश्वास के घोड़ों को पकड़ो। यदि आवश्यक हो तो स्वयं को कुचल डालो। किसी भी वस्तु को तुम्हारे रास्ते में बाधक न होने दो। तुम्हारा भाग्य संयोग पर निर्भर नहीं है। निश्चय और आत्मशक्ति के साथ आगे बढ़ो क्योंकि तुम्हारा लक्ष्य सत्य है। वस्तुतः तुम स्वयं ही सत्य हो। मुक्त हो जाओ। मुक्त हो जाओ। आत्मानुभूति की भाषा में बल के समान और कोई महत्त्वपूर्ण शब्द नहीं है। प्रारंभ में, अंत में, सदैव तुम बलवान बनो। स्वर्ग, नरक, देवता, राक्षस किसी से भी न डरते हुए आगे बढ़ो। तुम्हें कोई नहीं जीत सकेगा। ईश्वर स्वयं तुम्हारी सेवा करने को बाध्य है, क्योंकि वह स्वयं तुम्हारे भीतर विराजमान है, जिसके प्रति कि वह आकर्षित है। अतः एकत्व ही अति उदार अन्तर्दृष्टि का सार है, क्योंकि जो तुम्हारे भीतर है, जो तुम हो, वह ईश्वर है। वास्तव में तुम स्वयं ही दिव्य हो। – एफ जे अलक्जेन्डर, स्वामी विवेकानन्द के अमेरिकी शिष्य
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साधक सावधान
शक्ति को व्यर्थ न जाने दो। आत्मशक्ति का अविराम संचय और उसकी सुरक्षा करते
रहो। व्यर्थ विवाद, उत्तेजना,
आलस्य, त्वरा, जड़ता, उहापोह के द्वारा नष्ट होने वाली शक्ति
को बचाना होगा साधक।
वास्तविक विनम्रता का मतलब है, एक च्युतिरहित और निर्भूल भावात्मकता और क्रियात्मकता। अतः आत्म-महत्त्व, आत्म-प्रदर्शन, आत्मपोषण, आत्म-कारुण्य, आत्म-कथन से बचो। सही विनम्रता शक्ति-संरक्षक है। प्रतिक्षण अपनी भौतिक, मानसिक, प्राणिक सभी सीमाओं का अतिक्रमण करते रहो। "नहीं सकता हूँ", से "सकता हूँ" की ओर चलना ही साधना-संतुलन का मूल है।
हम स्वयं ही हमारी सीमा हैं। एक आत्म ज्ञान, एक आत्म शक्ति, एक संचेतना-बीज हमारे भीतर बंद है। उसे लगातार ढूंढते रहो, खोजते रहो । उसका उद्घाटन कर पाना ही जीवन की एक मात्र सफलता है।
अपनी आध्यात्मिक सफलता सिद्धि के सबसे बड़े शत्रु हम स्वयं ही हैं। हमारा ही एक भाग एक भयानक व मरणान्तक विष-क्रीड़ा में लगा रहता है, जो हमारे प्रत्येक ज्ञान-प्रयास के विरुद्ध बक-बक करता रहता है। हमें उठने से रोकता रहता है। हम नहीं सुनते तो अवसाद व विषाद की काली मोटी चादर से हमें सब ओर से लपेट कर हमारी सारी गतियाँ व शक्तियाँ कुंद कर देता है। अतः स्वयं का स्वयं से उद्धार कर साधक। तुझे यह करना ही होगा।
हमारे भीतर की अंध-शक्तियाँ हमारे मन के द्वारा हमसे ही चालाकी व धूर्त्तता करती रहती हैं, कि हम अपनी ज्योतिर्यात्रा को छोड़ दें। इससे बचने का एकमात्र उपाय है हर प्रकार की बाधा और निराशा व असफलता के बावजूद लगे रहना, डटे रहना, बढ़ते रहना।
मनुष्य में यह सामर्थ्य होनी ही चाहिए कि जब चाहे मन के संकल्प-विकल्प व स्व-वार्तालाप को बंद कर सके। प्रकाश की ओर दृष्टि जमाने में यह स्व-वार्तालाप बहुत बड़ी बाधा है। एक साधक को सर्वदा योद्धाभाव में स्थित होना चाहिए। सदा चुस्त, चौकन्ना व सावधान। कहीं से भी, कभी भी, कोई भी प्रहार किया जा सकता है। प्रमाद व गफलत साधक के सबसे महान शत्रु हैं।
साधक को सदा शांत, समाहित व संगठित चित्त रहना चाहिए व अपनी पकड़-साधना विषय से कभी भी हटने देना नहीं चाहिए। - श्री माँ





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