फोरेस्ट मैन पदमश्री जादव मोलाई पायेंग
पर्यावरण की समस्या, कटते जंगल, वेघर होते वन्य जीव और मानवीय
अस्तित्व का संकट आज के ज्वलंत मुद्दे हैं। लोगों को शिकायत रहती है कि सरकार इसके
लिए कुछ विशेष प्रयास नहीं कर रही और लोग साथ नहीं दे रहे। फिर घटते वनों के
आच्छादन की चिंता भी सभी करते हैं, लेकिन क्या करें, इस पर कोई व्यवहारिक समाधान
नहीं खोज पाते। प्रस्तुत है इस परिस्थिति में समाधान का आलोक विखेरती भारत के
फोरेस्ट मैन पदमश्री जादव मोलाई पायेंग की अविश्वसनीय कर्म गाथा, जो पाठकों
को झकझोरते हुए इन तमाम प्रश्नों के उत्तर देती है।
इस गाथा के नायक की वाल्यवस्था गुजरती है आसाम में ब्रह्मपुत्र नदी में बने विश्व के सबसे बड़े टापू में, जो बनकटाव एवं बाढ़ के कारण रेगिस्तान व बंजर जमीन के टुकड़े के रुप में रुपाँतरित हो चुका था। इसके एक टीले पर बालक पायेंग की कुटिया थी, जो परिवार सहित गाय व भैंस का दूध बेचकर जीवनयापन कर रहे थे। बाढ़ के कारण सर्पों का एक झुण्ड टापू में इकट्ठा हो जाता है और कुछ दिन बाद तपती रेत में इनकी जीवन लीला समाप्त हो जाती है। घटना वर्ष 1979 की है, जब 16 वर्षीय किशोर जादव पायेंग एक दिन धूप भरी दोपहरी में रेतीली जमीं पर कई मरे हुए सर्पों को देखता है। उचित छाँव, नमीं व जल के कारण वे अकाल मृत्यु को प्राप्त हो गए थे।
यह दृश्य पायेंग के किशोर मन को झकझोर देता है और अंतर्मन में विचार कौंधता है कि यदि यहाँ
पेड़ होते, जंगल का आच्छादन होता तो इनकी ऐसी अकाल मृत्यु नहीं होती। बड़ों से
मार्गदर्शन मिला कि बाँस के जंगल उगाकर जीवों की रक्षा की जा सकती है। किशोक पायेंग
के जेहन में घर कर गया कि टापू वृक्षों से हीन है और यदि यहाँ के जीव-जंतुओं व
जीवन को बचाना है तो पेड़ लगाने होंगे, जंगल खड़ा करना होगा।
किशोर पायेंग नित्य बाँस का एक पेड़ लगाना प्रारम्भ करते हैं। और फिर दिन में तीन-चार घण्टे में सैंकड़ों पौध लगाते हैं। स्वयं ही पेड़ लाते हैं, स्वयं ही गड्ढा खोदते हैं और पौधारोपण करते हैं। और यह जादव पायेंग की नियमित दिनचर्या बन जाती है। सरकारी योजना भी इस दौरान यहाँ आजमायी जा चुकी थी, लेकिन तीन वर्ष में ही उचित सहयोग व प्रेरणा के अभाव में यह दम तोड़ती है। लेकिन किशोर पायेंग का वृक्षारोपण का एकला अभियान अनवरत रुप से ज़ारी रहा। अंतःकरण को झकझोरता प्रेरणा प्रवाह किशोर की प्रेरक शक्ति के रुप में कार्य कर रहा था।
इस तरह कुछ ही वर्षों में पेड़ बड़े होने के साथ टापू पर एक जंगल
रुपाकार ले रहा था। शुरुआत की कठिनाई सरल हो रही थी, अब वृक्ष के बीज गिरकर
स्वयं की पौध तैयार कर रहे थे। और धीरे-धीरे पशु-पक्षियों की भी यहाँ वसावट
प्रारम्भ हो जाती है। ऐसे में वृक्षों के फलों को खाने पर पक्षी व जीव-जंतुओं द्वारा
वन का विस्तार प्राकृतिक रुप से हो रहा था। और इनका एकला वृक्षारोपण अभियान भी
जारी था।
इस अभियान में पायेंग किशोरावस्था से युवावस्था की दहलीज को पार कर जाते हैं, लेकिन उनका यह अभियान अखण्ड रुप से गतिशील था। लगभग 30 वर्ष पश्चात सन 2008 में स्थानीय वाइल्ड लाइफ फोटो पत्रकार जीतू कलिटा की नज़र पायेंग के इस अद्भुत प्रयोग पर पड़ती है और वे इसका समाचार स्थानीय अखबार में प्रकाशित करते हैं, लोगों को विश्वास नहीं होता कि ब्रह्मपुत्र के टापू में एक व्यक्ति इतना बड़ा प्रयोग कर रहा है और किसी को इसकी कानों कान कोई खबर तक नहीं। यहीं से जादव पायेंग का गुमनाम भगीरथी प्रयास जनता जनार्दन के सामने आता है।
इस अभूतपूर्व कार्य के लिए जाटव पायेंग को देश भर
से प्रतिष्ठा मिलती है।
राष्ट्रीय समाचार पत्रों में इसकी कवरेज होती है, विश्वविद्यालयों में उनके
प्रयासों की प्रस्तुति होती है, 2010 के एक कार्यक्रम में तत्कालीन राष्ट्रपति
अब्दुल कलाम आजाद स्वयं जादव पायेंग को पुरस्कृत करते हैं। जादव पायेंग को फोरेस्ट
मैन ऑफ इंडिया की उपाधि मिलती है, जिसे पायेंग अपने जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि
मानते हैं। लेकिन उनके चेहरे पर उदासी भी छा जाती है कि लोग उस तत्परता के साथ
वृक्षारोपण के कार्य में स्वयं कोई पहल नहीं क रहे, जिससे कि उनके आसपास के बंजर
टापू, पहाडियों भी हरी-भरी हो सके।
वर्ष 2012 में जादव पायेंग के भगीरथी पुरुषार्थ पर पहली डॉक्यूमेंट्री फिल्म बनती है, जो कई पुरस्कारों से नवाज़ी जाती है। गाँव के एक सरल किंतु प्रेरक व्यक्ति को टेड़ टॉक के लिए बुलाया जाता है। देश ही नहीं विदेशों में भी उनके इस अभूतपूर्व कार्य की चर्चा होती है और वहाँ जाकर वृक्षारोपण व जलवायु संकट के समाधान पर अपने अनुभूत ज्ञान को सांझा करते हैं। वर्ष 2015 में जादव पायेंग को पदमश्री पुरस्कार से तत्कालीन राष्ट्रपति महोदय प्रणव मुखर्जी द्वारा पुरस्कृत किया जाता है।
आज पायेंग प्रौढ़ावस्था की दहलीज को पार कर चुके हैं और उसी निष्ठा के साथ वे प्रातः साढ़े चार बजे अपने वृक्षारोपण अभियान के लिए निकल पड़ते हैं। कई किमी पैदल चलकर, फिर नाव से ब्रह्मपुत्र नदी की धारा को पार करते हुए वे टापू में पहुँचते हैं और अपने वृक्षारोपण के अभियान में जुटे हुए हैं।
आज उनके जंगल में हर तरह के जीव-जंतु आश्रय पा रहे है। गैंढ़ा, हाथी, हिरन सहित बंगाल टाइगर लगभग हर प्रजाति के जीव यहाँ पनप रहे हैं। उन्हीं के नाम से इसे मौलाइ फोरेस्ट के रुप में जाना जाता है, जिसे वे जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि मानते हैं।
और देश-विदेश से लोग आकर इनका कार्य देख चकित
होते हैं, प्रेरणा लेते हैं और अपने-अपने क्षेत्रों में धरती पर हरियाली का
आच्छादन लगाने के संकल्प के साथ लौटते हैं।
पदमश्री पायेंग की जीवन गाथा सीख देती है कि विपरीत परिस्थितियों के बीच एक व्यक्ति अकेले दम पर पूरा जंगल खड़ा कर सकता है, वह भी उन विषम परिस्थितियों में जब कुछ साथ नहीं था। था तो बस एक संकल्प, एक दृढ़ भाव कि इस टापू को हरा-भरा करना है, इसे मनुष्य सहित जीव-जंतुओं के लिए रहने योग्य बनाना है। यदि देश का हर संवेदनशील नागरिक वृक्षारोपण को लेकर छोटा सा भी संकल्प लेता है तो पूरा देश हरियाली की चादर औढ़कर वर्तमान पर्यावरण संकट की विकराल होती समस्या के समाधान की दिशा में अपना महत्वपूर्ण योगदान दे सकता है।






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