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बुधवार, 16 सितंबर 2026

मेरा गाँव मेरा देश – देवभूमि की एक भूली बिसरी विरासत

शेर-ए-कुल्लू, लाल चंद प्रार्थी, चाँद कुल्लवी

कुल्लू-मनाली लेफ्ट बैंक सड़क के मध्य में एक मनोरम पड़ाव पड़ता है नग्गर, जो कभी कुल्लू के राजघराने का निवास स्थान रहा है और कुल्लू की राजधानी भी, जिसके अवशेष नग्गर कैसल, हेरिटेज होटेल के रुप में आज भी मौजूद हैं। हम जब भी अपनी जन्म-भूमि पधारे, तो वहाँ से महज 10 किमी की दूरी पर स्थित नग्गर जाने का मौका कई बार मिला, कभी सीधे नग्गर को एक्सप्लोअर करने के वहाने, तो कभी मानाली की ओर बढते हुए।

नग्गर बस स्टॉप से मुश्किल से 200 मीटर पहले सड़क के ऊपर दायीं ओर लालचंद प्रार्थीजी का पुश्तैनी बंगला पड़ता है। लोकजीवन में प्रार्थीजी की चर्चा बचपन में अपने बढ़े-बुजुर्गों से सुनते आए, लेकिन उनके बारे में अधिक जानने की इच्छा तब जागी, जब उनका देहावसान (1982) हो चुका था। नग्गर में रोरिक गैलेरी जाते तो उनके संदर्भ में काफी सामग्री मिलती रही, लेकिन नग्गर में प्रार्थीजी की विरासत को संजोता कोई ठिकाना नहीं दिखा, न ही उनके नाम से प्रचलित साहित्य मिला।

हमारी खोज मूलतः उनकी कालजयी रचना कुल्लूत देश की कहानी को लेकर थी, जब इसका सार संदेश कहीं पढ़ने को मिला था। इस संदर्भ में चर्चा इस लेख के अंत में मिलेगी, पहले प्रार्थीजी के जीवन के मुख्य पहलुओं से परिचय करवाती कुछ बातें शेयर करना चाहूंगा, जो हमें उपलब्ध साहित्य के अवलोकन पर मिली।

लाल चंद प्रार्थी हिमाचल प्रदेश के एक प्रमुख स्वतंत्रता सेनानी, राजनीतिज्ञ, प्रख्यात लेखक, कलाकार, कवि और संस्कृति प्रेमी थे। लाल चंद प्रार्थी को उनकी बेहतरीन काव्य और साहित्यिक रचनाओं के कारण 'चांद कुल्लवी' के नाम से भी जाना जाता था और उनकी अद्भुत शायरी के लिए उन्हें हिमाचल का 'मिर्ज़ा ग़ालिब' भी कहा जाता है। अपने संघर्षपूर्ण जीवन में उन्होंने राजनीति और संस्कृति के क्षेत्रों में महत्वपूर्ण उपलब्धियां अर्जित की।

अपनी विशेषताओं एवं योगदान के लिए उन्हें हिमाचल के लाड़ले, कुल्लवी चाँद, शान-ए-कुल्लू, शेर-ए-कुल्लू जैसे नामों से संबोधित किया गया। हिमाचल प्रदेश के यशस्वी मुख्यमंत्री वीरभद्रजी के शब्दों में, प्रार्थी जी देशभक्त, लोक संगीत प्रेमी, लेखक तथा कवि थे। उन्होंने हिमांचल के सांस्कृतिक जीवन में नयी प्रेरणा जगाई तथा पहाड़ी भाषा और साहित्य के लिए अनथक कार्य किया। वह हिमाचल मन्त्रीमण्डल के सदस्य के रूप में जितने लोकप्रिय थे, साहित्यिक क्षेत्र में उससे कम लोकप्रिय नहीं थे।

जन्म एवं शिक्षा – प्रार्थीजी का जन्म 3 अप्रैल 1916 को कुल्लू जिले के नग्गर गाँव में एक प्रतिष्ठित ब्राह्मण परिवार में हुआ था। उन्होंने आयुर्वेद में डिग्री प्राप्त की थी और स्वतंत्रता संग्राम आंदोलनों में भी सक्रिय भूमिका निभाई थी। लाल चंद प्रार्थी को हिमाचल प्रदेश में 'भाषा विभाग' और 'कला संस्कृति अकादमी' की नींव रखने का श्रेय दिया जाता है। इस कारण उन्हें हिमाचल की कला-संस्कृति का जनक भी माना जाता है।

सामाजिक राजनैतिक जीवन - प्रार्थीजी एक आयुर्वेदाचार्य थे और भारत के स्वतंत्रता संग्राम सेनानी भी। वे कुल्लू क्षेत्र से तीन बार (1952, 1962, और 1967) विधानसभा सदस्य चुने गए और राज्य सरकार में मंत्री भी रहे। इस तौर पर वे कुल्लू से हिमाचल विधान सभा में, भाषा संस्कृति एवं कला मंत्री के रुप में सुशोभित रहे। इसके साथ वे समाज सेवा में भी अग्रणी रहे।

साहित्य सृजन एवं सांस्कृतिक अवदान – प्रार्थीजी एक उम्दा साहित्यकार, उर्दू, फारसी, हिंदी, अंग्रेजी में समान अधिकार रखते थे। प्रो. नारायण चन्द पराशर के शब्दों में, श्री लाल चन्द प्रार्थी का स्मरण आते ही पहाड़ी भाषा साहित्य तथा संस्कृति के प्रति जागरूक करने तथा अपनी संस्कृति पर गर्व करने वाले प्रेरक व्यक्तित्व की तस्वीर उभर कर सामने आती है। डॉ० यशवन्त सिंह परमार के साथ मिलकर उन्होंने जिस स्वप्न को साकार करने के लिए सफल प्रयत्न किए, वह हिमाचल के लिए एक वरदान सिद्ध हुआ। न केवल पंजाब के कांगड़ा, कुल्लू, लाहुल-स्पीति तथा अन्य पहाड़ी क्षेत्र हिमाचल प्रदेश में शामिल हुए, अपितु प्रथम नवम्बर, 1966 से पहाड़ी भाषा, साहित्य तथा संस्कृति का युग भी आरम्भ हुआ।

प्रार्थीजी जीवन भर पहाड़ी भाषा-संस्कृति के विकास के लिए प्रयत्नशील रहे। आयुर्वेद की भी उन्होंने उल्लेखनीय सेवा की। प्रार्थीजी न केवल एक सफल राजनीतिज्ञ थे, अपितु लेखक, चिन्तक, कवि और आयुर्वेद विशेषज्ञ भी थे। लाल चन्द प्रार्थी 'चान्द कुल्लवी' के नाम से पहाड़ी तथा उर्दू में लिखते रहे। "हिमत केरिया अपणे देसा री किस्मत बणाणी असा" उनकी यह कविता बहुत प्रसिद्ध हुई। पत्रकारिता और सम्पादन के माध्यम से उन्होंने प्रदेश की भरपूर सेवा की। कुलूत देश की कहानी उनकी एक प्रसिद्ध कृति है, जिसमें इतिहास और संस्कृति, धर्म तथा दर्शन का तथ्यपरक वर्णन है। इस प्रकार प्रार्थीजी पहाड़ी संस्कृति के प्रबल उद्घोषक थे और वे महाराजा संसार चन्द, पहाड़ी गान्धी बाबा कांशीराम तथा डॉ. यशवन्त सिंह परमार के स्वप्नों को साकार करना चाहते थे। यही दायित्व आज हमारे ऊपर है कि हम उनके मार्गदर्शन पर चलते हुए उनके संदेश को दोहराएं –

शबे गम के अन्धेरे से न घबरा ए-मुसाफिर।

तेरे लिए बेताब है आगोश सहर का।।

(प्रो० नारायण चन्द पराशर, शिक्षा, भाषा-संस्कृति मन्त्री एवं वरिष्ठ उपाध्यक्ष, हिमाचल अकादमी, चैत्र १ शक सम्वत् १६१६)

कालजयी साहित्यिक रचना - "कुलूत देश की कहानी" लाल चंद प्रार्थी द्वारा लिखित एक ऐतिहासिक एवं कालजयी पुस्तक है। वर्ष 1971 में प्रकाशित यह कृति आज के कुल्लू (प्राचीन नाम: कुलूत) क्षेत्र के गौरवशाली इतिहास, लोक-संस्कृति, राजनीति और विरासत का एक महत्वपूर्ण दस्तावेज है।

कुलूत (कुल्लू) को भारत के प्राचीनतम गणराज्यों में से एक माना जाता है, जिसका उल्लेख ऋग्वेद, महाभारत और रामायण जैसे प्राचीन ग्रंथों में मिलता है। लेखक ने इस पुस्तक में ऋग्वेद के समय से लेकर आधुनिक युग तक के कुल्लू के इतिहास को संजोया है। पुस्तक में ऋग्वेद, महाभारत और प्राचीन पुराणों के संदर्भों के आधार पर कुलूत देश (कुल्लू) के उद्गम और इसकी कोल, दस्युराज शम्बर जैसी प्राचीन जातियों के इतिहास को रेखांकित किया गया है। साथ ही इसमें महाभारत काल, विभिन्न जातियों (कोल, किरात, नाग, खश आदि) के संघर्ष व फैलाव तथा प्राचीन राजवंशों और शासन प्रणाली पर प्रकाश डाला गया है।

पुस्तक में कुल्लू के स्थानीय राजाओं के शासन, उनकी वंशावली, क्षेत्र की भौगोलिक परिस्थितियों, पारंपरिक वेशभूषा, लोककथाओं, वहाँ के समाज और स्थानीय देवी-देवताओं की परम्परा से युक्त समृद्ध देव-संस्कृति का व्यापक और रोचक वर्णन है। यह पुस्तक सांस्कृतिक धरोहर के रुप में हिमाचल प्रदेश की लोक-संस्कृति और क्षेत्रीय पहचान को समझने के लिए एक महत्वपूर्ण स्रोत मानी जाती है।

इसके साथ वजूद-ओ-अदम उनका प्रसिद्ध उर्दू ग़ज़ल संग्रह है, जो उनकी दार्शनिक सोच और उत्कृष्ट काव्य कला को दर्शाता है।

प्रार्थीजी का अमर संदेश - इस पुस्तक का उद्देश्य आने वाली पीढ़ी को अपने गौरवशाली इतिहास से परिचित करवाना था। पुस्तक के समर्पण में प्रार्थी जी की ये प्रसिद्ध पंक्तियाँ शामिल हैं:

"निज गौरव का कुछ ज्ञान रहे।

हम भी कुछ हैं यह ध्यान रहे।

सब जाए अभी पर मान रहे।

मरणोत्तर गुंजित गान रहे॥"

प्रार्थीजी का यह सांस्कृतिक संदेश निश्चित रुप से पहाड़ी समुदाय को अपनी जड़ों से जुड़े रहने की प्रेरणा देता है।

विरासत - उनकी याद में और कुल्लू की संस्कृति को बढ़ावा देने के लिए कुल्लू में एक प्रसिद्ध ओपन-एयर थिएटर का नाम लाल चंद प्रार्थी कला केंद्र रखा गया है। यहाँ हर वर्ष प्रसिद्ध अंतरराष्ट्रीय कुल्लू दशहरा उत्सव और कई सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है। निसंदेह रुप में इस कला केन्द्र के निर्माण से संस्कृति तथा कला प्रेमियों को प्रोत्साहन मिला है।

कुल्लू के कलाकेंद्र एवं हिमाचल प्रदेश में भाषा, संस्कृति विभाग की स्थापना के अतिरिक्त कुल्लूत देश की कहानी जैसी एक शोध प्रधान कालजयी रचना उनकी एक अनुपम देन है, जिस पर कार्य अभी शेष है।

ठाकुर सत्यप्रकाशजी के शब्दों में, अपनी सशक्त लेखनी से प्रार्थीजी ने 'कुल्लूत देश की कहानी' पुस्तक रची, जिसमें यह प्रमाणित करने का प्रयत्न किया गया है कि कुल्लू से गढ़‌वाल तक के लोगों की भाषा एवं संस्कृति एक है, इसलिए यहां के लोगों का रहन-सहन, खान पान, रीति-रिवाज, लोक नृत्य, गीत की शैली एक सी है। उन्होंने पत्रकारिता के माध्यम से लोक-संस्कृति को जीवित बनाए रखने के लिए महत्वपूर्ण कार्य किया। वे स्वयं प्रसिद्ध लोकनर्तक, कलाकार, कवि, लेखक, तथा राजनीतिज्ञ थे। उनका बहुआयामी व्यक्तित्व सभी के लिए प्रेरणादायी था।

प्रार्थी जी भक्ति प्रवृत्ति के व्यक्ति थे और अपना अधिकांश समय भगवान के ध्यान में लगाते थे। देवी-देवताओं में उनकी पूर्ण आस्था थी। वह कुल्लू को अठारह करडुओं का देश कहते थे। वे हिमाचल को पहाड़ी प्रदेश के तौर पर अपनी अलग पहचान बनाए रखने के लिए भी हमेशा डॉ. यशवन्त सिंह परमार के कन्धे से कंधा मिलाकर कार्य करते रहे। (सत्य प्रकाश ठाकुर, मुख्य संसदीय सचिव, 3 अप्रैल 1994)

समाज, संस्कृति व अपनी मातृभूमि की अथक सेवा साधना करते हुए 11 दिसम्बर 1982 को प्रार्थीजी का देहावसान होता है और भावी पीढ़ी के लिए एक अनमोल साहित्यिक एवं सांस्कृतिक विरासत छोड़ जाते हैं।

हिमाचल के यशस्वी मनीषी-साहित्यकार सुदर्शन वशिष्ट के शब्दों में, साहित्यकार समाज की अमूल्य निधि हुआ करती हैं। अपनी पूरी जीवन यात्रा के अनुभव सारांश वे रचनाओं के रूप में पीछे छोड़ जाते हैं। जीवन सत्य सार के रूप में कही गई उनकी बातें हमें भटकी राह दिखाती हैं। उनकी कृतियों को हम देर तक याद करते हैं।

कई बार ऐसा भी हुआ है कि ढेरों पृष्ठ सामग्री समाज को देने पर भी हम रचनाकार के विषय में कुछ नहीं जानते। महर्षि व्यास का उदाहरण हमारे सामने है। जिस व्यास ने वेदों का विस्तार किया, महाभारत जैसा पंचम वेद रच डाला। उस श्रीकृष्ण द्वैपायन के जीवन के विषय में हम बहुत कम जानते हैं। बहुत ढूंढने पर भी उनके जीवन के क्षण अज्ञात ही रह जाते हैं। ऐसे ही महाकवि कालिदास के विषय में आज इतिहास अटकलें लगाता है। हम अपने रचनाधर्मी युग पुरुषों को नहीं जानते, यह हमारा दुर्भाग्य है।

प्रार्थी जयन्ती 3 अप्रैल, 1994 के पावन अवसर पर, सुदर्शन वशिष्ठ, सचिव, हिमाचल कला संस्कृति भाषा अकादमी के ऊपर कहे शब्द इतिहास का एक कटु सत्य है। हम स्वयं जब प्रार्थीजी की कालजयी रचना कुलूत देश की कहानी को पढ़ने के लिए प्रेरित हुए, तो हम चकित रह गए कि कुल्लू के किसी पुस्तक भंडार में यह पुस्तक उपलब्ध नहीं है। फिर हम जिला पुस्तकालय पहुँचे, इस आशा के साथ कि यहाँ तो यह अवश्य उपलब्ध मिलेगी। लेकिन वहाँ भी निराशा ही हाथ लगी। हमारे कई बार के आग्रह पर कहीं से उपलब्ध इसकी पीडीएफ के आधार पर प्रिंट प्रति तैयार हुई, जो पुस्ताकलय के संदर्भ कक्ष में आज उपलब्ध है। प्रार्थी जी की कालजयी पुस्तक की मूल प्रति का उपलब्ध न होना हमारी साहित्यिक, सांस्कृतिक एवं वैचारिक चेतना की कुंद पड़ती दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति का द्योतक है।

पुस्तक के अध्ययन उपरान्त हमें लगा कि इस पर कार्य़ शेष है। प्रार्थीजी अपने अथक प्रयास के साथ इस पुस्तक में बहुत ही अहम एवं महत्वपूर्ण सुत्र-संकेत दे गए हैं, लेकिन इन पर शोध करते हुए इनकी पुष्टि एवं इतिहास लेखन वाकि है, जिसे प्रबुद्ध एवं जागरुक भावी पीढ़ी को करना है। ईश्वर कृपा से मिली अंतःप्रेरणा के आधार पर इस संदर्भ में प्रय़ास जारी हैं, देखते हैं कि यह किस अंजाम तक पहुँचता है।

निष्कर्ष रुप में आवश्यकता प्रार्थीजी की अनमोल विरासत को संजोने व आगे बढ़ाने की है। कुलूत देश की कहानी में वर्णित देवसंस्कृति की आध्यात्मिक विरासत को जीवंत जाग्रत एवं प्रतिष्ठित करने का कार्य अभी शेष है।

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