
रुट के मुख्य पडावों का विहंगावलोन करता सफर

इस वार मार्च 2026 के दूसरे-तीसरे सप्ताह के मध्य एक सप्ताह का
संक्षिप्त प्रवास का संयोग बना। पाँच दिन तो बारिश-बर्फवारी के बीच बीते। अंत में
एक दिन साफ मौसम देखते हुए घाटी का एक फील लेने के उद्देश्य से मानाली के लिए निकल
पड़ता हूँ। सरवरी कुल्लू बस स्टैंड से राइट बैंक की कुल्लू-मानाली बस को पकड़ता हूँ।
बस अखाड़ा बाज़ार होते हुए रामशिला से आगे बैष्णों माता, पुलिस स्टेशन, बाशिंग जैसे पड़ावों को पार करती हुई सेऊवाग, बवेली, बंदरोल, रायसन जैसे स्टेशनों को कवर होती हुई कटराइं पहुँचती है। मकसद इस सुंदर घाटी के अवलोकन के साथ पिछली बरसात के बाद हुए नुकसान का मुआइना करना था व साथ ही रूट की वीडियो रिकॉर्डिंग भी चलती रही, लेकिन ठीक कटराईं पहुँचते ही मोबाइल का स्टोरेज फुल हो जाता है। इसे दैवीय संदेश मानते हुए वीडियोग्राफी बंद कर देता हूँ। और आगे मात्र आवश्यक फोटो से काम चलाते हुए क्लाथ होते हुए मानाली पहुँचता हूँ।

रास्ते में बरसात में हुई तबाही का मंजर साफ था, रायसन के आगे और फिर
पतलीकुहल के आगे स्पेन रिजॉर्ट तथा आगे क्लाथ व मानाली के आसपास प्राकृतिक प्रकोप
के जख्म साफ दिख रहे थे। लगा काफी कुछ हीलिंग हो चुकी है, लेकिन पूरी तरह से
रिक्वरी अभी वाकि है। लेफ्ट बैंक में छरुहड़ू के पास तो स्थिति और भी विकट बनी हुई
थी। हालाँकि निर्माण कार्य तेजी से चल रहा था, लेकिन कूपित प्रकृति की मार का दंश
अभी भी स्पष्ट दिख रहा था।
राइट बैंक के ऊपर बताए पड़ावों को पार करते हुए एक समानान्तर दृष्टि उस पार लेफ्ट बैंक की घाटी पर भी टिकी हुई रही। घाटी की दो से चार किमी चौड़ी बसावट, हल्की ढलान पर बसे सेब व अन्य फलों के वागान, गाँव-कस्वों के पीछे के देवदार जंगल और उनके पीछे बर्फ से ढके पर्वत शिखर, सब मिलाकर घाटी के मनोरम दृश्य हमारे चित्त को आल्हादित कर रहे थे।
मानाली शहर की शीतल आवोहवा, पर्य़टकों का जमावड़ा, स्थानीय लोगों की अपने उत्पादों के साथ व्यापारिक चहल-पहल और ट्रैफिक की व्यस्तता, सब मिलाकर एक जीवंत हिल स्टेशन के दिग्दर्शन करवा रहे थे।
मानाली के कुछ यादगार पलों को समेटते हुए व आवश्यक खरीददारी के बाद मानाली से लेफ्ट बैंक की बस में बैठता हूँ। इस पड़ाव के मुख्य पड़ावों का वर्णन यहाँ कर रहा हूँ, शायद इस रूट में रूचि रखने वाले नये पाठकों का कुछ ज्ञानबर्धन हो सके व कभी यहाँ से गुजरे, तो एक नए नज़रिए से वे इस घाटी का आवलोकन कर सकें।

मानाली, बस स्टैंड से ठीक चार बजे बस चल पड़ती है। ब्यास
नदी पर पुल पार करते हुए लेफ्ट बैंक में दायीं ओर मुड़ती है। वायीं ओर की सड़क आगे
वाहंग, पलचान, सोलांग घाटी व अटल टनल की ओर जाती है। पलचान से दायां रूट कोठी,
गुलावा, मढ़ी होते हुए रोहतांग दर्रे की ओर जाता है।
हम इस रूट के विपरीत कुल्लू की ओर बढ़ रहे थे। पहला पड़ाव अलेऊ आता है, जो पर्वतारोहण संस्थान के लिए जाना जाता है, यह मुख्य मार्ग से दायीं ओर आधा किमी नीचे देवदार के घने जंगलों के बीच ब्यास नदी के किनारे स्थित है। ट्रेकिंग, पर्वतारोहण एवं रोमाँचप्रेमियों के लिए यह संस्थान किसी तीर्थ से कम नहीं। हमें स्वयं 1991 में यहाँ से एडवेंचर और बेसिक कोर्स करने का सौभाग्य मिल चुका है। यहाँ से जुड़े यादगार अनुभवों को आप दिए लिंक में पढ़ सकते हैं। (पर्वतारोहण का विधिवत प्रशिक्षण, भाग-1)

अलेऊ के साथ ही प्रीणी आता है, जहाँ अटल विहारी वाजपेयीजी का सीजनल निवास माना जाता है। आगे शुरु में शवरी माता का सिद्ध पीठ है, जिसका सम्बन्ध महाभारत काल के अर्जुन-किरात युद्ध से जुड़ा हुआ माना जाता है। जगतसुख भी एक पुरातन गाँव है, जो कभी कुल्लू की राजधानी भी रहा और यह अपने पौराणिक एवं दुर्लभ गायत्री मंदिर के लिए जाना जाता है। इसके बाद गोजरा में निर्मल जल के झरने (पाणी रा मोगरा) के दर्शन किए जा सकते हैं तथा खखनाल गाँव कार्तिकेय स्वामी के मंदिर के लिए प्रख्यात है।

सजला में भगवान विष्णु का पौराणिक मंदिर है और इसके आगे देवदार के घने जंगल को पार करते हुए धोमसू गाँव आता है, जिसके बाद करजाँ के रुप में एक बड़ा गाँव आता है। इसके नीचे गजां दोचो-मोचो के मंदिर के लिए जाना जाता है। इसके आगे मनसारी और ऊपर सोयल जैसे प्राकृतिक पर्यटन गांव आते हैं। इन्हीं के साथ हरिपुर डिग्री कॉलेज के लिए जाना जाता है। इसके आगे सरसेई और नीचे बटाहर गाँव आते हैं, आगे छाकी गाँव पड़ता है। यहाँ से नीचे सीढीदार खेतों की सेरी का दृश्य देखने लायक रहता है, कभी धान की खेती के लिए प्रख्यात यह पूरी घाटी अब सेब के बगानों से पटी दिखती है।

इसके आगे आता है कुल्लू-मानाली मार्ग का मध्य पड़ाव नगर जो कुल्लू के अधिकाँश राजाओं की राजधानी रहा। यहीँ पर कुल्लू की शान लालचंद प्रार्थीजी का निवास स्थान है और थोड़ा ऊपर रशियन संत कलाकार निकोलाई रोरिक का समाधी स्थल और आर्ट गैलरी। यहीं से बिजली महादेव के लिए लिंक रोड़ भी जाता है, जिसके मार्ग में नशाला घाटी, नथान सेरी, नथान गाँव, जाणा, बनोट जैसे गाँव आते हैं और आगे कायस वन विहार। इस रुट की जानकारी दिए गए लिंक में पड़ सकते हैं। (बिजली महादेव जीप सफारी वाया नग्गर,जाणा-भाग1)
नगर के ही ऊपर चचोगी व रूमसू जैसे गाँव पड़ते हैं, जो चंद्रखणी पास के लिए ट्रेकिंग रुट का हिस्सा हैं जो आगे मलाना के प्रख्यात गाँव तक जाता है। नगर के आगे भगवान गणेशजी के मंदिर के लिए प्रख्यात घोरदौड़ गांव आता है, जहाँ सुधांशुजी महाराजजी का भव्य आश्रम सडक के साथ सटा है, जो अब संभवतः एक भव्य होटल में रुपाँतरित है। आगे लरांकेलो स्टेशन आता है, जहाँ थोड़ा नीचे देवदार के गगनचुम्बी वृक्षों के बीच लराई महादेव स्थित हैं। आगे हिरनी गाँव आता है, जिसके पीछे छेती, पारशा, शोर्न जैसे गाँव आते हैं। आगे अरछंडी पड़ाव आता है, जहाँ सड़क के साथ काली माता का सिद्ध मंदिर स्थित है।

इसके आगे राउगी नाला आता है, जहाँ माना जाता है कि जाणा फाल
का पानी बहता है, इसके किनारे पिकनिक स्पॉट में जलक्रीड़ा का आनन्द लिया जा
सकता है। इसके आगे बलोगी, कराड़सू जैसे गाँव आते हैं व आगे कुकड़ी
सेरी जो बौद्ध गोंपा के माना जाता है। इसके ठीक उस पार है बंदरोल गाँव, जो हिमाचल
में सबसे पहले कैप्टन ली द्वारा स्थापित सेब बगान के लिए माना जाता है।
इसके बाद काईस गाँव आता है, जो भगवती दशमी वारदा का सिद्ध स्थान है और आगे उनके बाहन बरिंडी देवता का स्थान। जिसके बाद मलाहर गाँव आता है, जहाँ जिला का एकमात्र पॉलिटेक्निक कॉलेज स्थित है। जो पहले भेड़ू फार्म व वेटेनरी अस्पताल के लिए जाना जाता था।

इसके आगे आता है सेऊबाग गाँव, जहाँ कुल्लू में
अंग्रेजों द्वारा सेब के बगान लगाने के बाद स्थानीय प्रगतिशील बागवानों द्वारा सेब
के खनोर (चेस्टनट) के ऐतिहासिक प्रयोगों के लिए जाना जाता है, जिस कारण गाँव का
नाम सेऊबाग पड़ा। मानाली से चार बजे चली हमारी बस ठीक छः बजे सेऊबाग पहुँचती है, जिसमें
कुछ लेट-लतीफी सरसेई में मेले के कारण हुए जाम के कारण रही।
इसके आगे छरूहड़ू नाला आता है, जो हर वर्ष भूस्खलन के कारण लेफ्ट बैंक के लिए समस्या का सबब बना रहता है, जहाँ वर्ष 2025 में आई भयंकर बाढ़ के दंश आज भी स्पष्ट दिख रहे थे।
हालाँकि निर्माण कार्य तेजी से चल रहा था, लेकिन सड़क अनवरत भूस्खलन के कारण क्षतिग्रस्त दिखी। इसके आगे लुगड़ी भट्टी आती है, जहाँ ऊपर प्रेमनगर चदौहल में रिसर्च सेंटर के रुप में बागवानी फार्म स्थित है, जिसके ऊपर गाहर, छाड़गड़ी, सूईरोपा, पारली बेड जैसे गाँव आते हैं।
इसके आगे जुआंणी रोपा आता है, जहाँ पीछे थरमाहण, नेउली गाँव, बराधा, सराहन जैसे गाँव आते हैं, यहाँ जुआणी महादेव क्षेत्र के जाने-माने देवता हैं। यहीं पर गैमन पुल लेफ्ट और राइट बैंक को जोड़ने वाली एक महत्वपूर्ण संरचना है। यहीं से बिजली महादेव के लिए खराहल घाटी के आर-पार जाने वाला लिंक रोड़ शुरु होता है। इस रुट से बिजली महादेव का यात्रा वृतांत आगे दिए लिंक में पढ़ सकते हैं। (बिजली महादेव का यादगार रोमाँचक सफर)

इसके ठीक बाद आता है रामशीला जहाँ उस पार हनुमानजी का प्रसिद्ध मंदिर मौजूद है। माना जाता है कि बरसात की प्रलयंकारी बाढ़ में यही शिला अखाड़ा बाजार की रक्षा करती है। इसके नीचे आता है टापू जो लेफ्ट बैंक का पुराना बस स्टैंड था, जिससे हमारे बचपन व स्कूल-कालेज के दिनों की अनगिन यादें जुड़ी हुई हैं। अभी यहां से लिंक रोड़ उस पार दाईँ ओर ऊपर मुड़ने पर पुराने बस स्टैंड की ओर जाता है, जहाँ अखाड़ा बाजार कुल्लू की मुख्य मार्केट मौजूद है। नीचे आगे बढ़ने पर ढुग्गी लग घाटी से आने वाली सरवरी नदी के किनारे बना सरबरी बस स्टैंड आता है, जो कुल्लू का नया बस स्टैंड है, यहाँ से हिमाचल के विभिन्न जिलों के साथ अंतर्राजीय बसों की बुकिंग की जा सकती है।

सरवरी नदी को पार करते हुए ऊपर आता है ढालपुर मैदान, जिसे ठारा करड़ू की सोह भी कहा जाता है। अर्थात घाटी के मुख्य देवताओं की क्रीडा स्थली। आश्चर्य़ नहीं वर्ष में एक बाद यहीं पर कुल्लू का विश्व प्रख्यात दशहरा मनाया जाता है। इसी मैदान के ऊत्तरी छोर पर ही सीनियर सैकेंडरी स्कूल और दक्षिणी छोर पर ही डिग्री कॉलेज कुल्लू, जहाँ हमें अपने जीवन के कुछ महत्वपूर्ण बिताने का संयोग-सौभाग्य मिला। यहीं नीचे लालचंदी प्रार्थी कलाकेंद्र है, जहाँ दशहरे में रात को सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित होते हैं और इसी के बग्ल में है जिला पुस्तकालय, जिसको कवर करता ब्लॉग दिए लिंक में पढ़ सकते हैं। (मार्च में बारिश और बर्फ का आगाज़ (2026))



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