मंगलवार, 31 मार्च 2026

मेरा गाँव और मेरा देश - मार्च में बारिश और बर्फ का आगाज़ (2026)


धरती के लिए किसी वरदान से कम नहीं

जन्म स्थल पर यह वर्ष 2026 का पहला प्रवास था। सेमेस्टर ब्रेक दिसम्बर 2025 में जाने की योजना थी, जो कार्य की अति व्यस्तता के चलते टलते-टलते मार्च में ही संभव हो पायी। इसके पीछे भी कोई दैवीय विधान था, यह अंत में स्पष्ट होता है। पिछले तीन माह से बारिश नहीं हो रही थी, गर्मी का मौसम जैसे शुरु हो चुका था। फोन से पता चला कि घरों में तंदूर जलने बंद हो चुके थे, इसलिए ह्ल्की-फुल्की तैयारी के साथ घर जाता हूँ। मुख्य उद्देश्य अपने बुजुर्ग माता-पिता के दर्शन थे और साथ ही पारिवारिक मिलन भी।

हरिद्वार से हिमाचल पथ परिवहन निगम की अंतिम बस हरिद्वार बस स्टैंड से रात्रि आठ बजकर दस मिनट पर जाती है, इसी में चढ़ता हूँ। यह वाया देहरादून जाती है, जो आगे पौंटा साहिब, नाहन, काला अम्ब होती हुई पंचकुला, चण्डीगढ़ पहुँचती है। सफर सदैव की तरह खशनुमा रहा। बस में अधिक भीड़ नहीं थी। देहरादून में चाय आदि के लिए आधा घंटा रुकती है। फिर काला अम्ब में रात को पौने एक रात्रि भोजन के लिए बस रुकती है।

रात को तीन बजे चण्डीगढ़ बस पहुँचती है, सबारियों को बिठाते हुए फिर आगे पंजाब के मोहाली, रोपड़, कीरतपुर साहिब जैसे शहरों को पार करती है और हिमाचल में प्रवेश करती है। टनल से नया रुट बना होने के कारण स्वारघाट का पुराना व लम्बा रूट नहीं आता। सुरंग के पार बिलासपुर जिला आता है, इसमें सतलुज नदी को पार करते हुए सुबह छः बजे सुंदरनगर बस रुकती है, फिर नैरचौक से होते हुए सात बजे मंडी पहुँचती है।

यहाँ से आगे पंडोह डैम के आगे कई सुरंगों को पार करते हुए हम आउट पहुँचते हैं, फिर कुल्लू घाटी में प्रवेश होता है। पनारसा, बजौरा, भूंतर, शमसी, ढालपुर होते हुए सुबह नौ दस तक सरवरी कुल्लू बस अड्डा पहुँचता हूँ।


यहीं से लेफ्ट बैंक की बस पकड़कर दस बजे तक अपने गाँव-घर पहूंचता हूँ। इस तरह रात को सात बजे देसंविवि, हरिद्वार से शुरु हुआ सफर सुबह दस बजे पूरा होता है। कुल पंद्रह घंटे में घर पहुँचता हूँ।

हालाँकि मौसम विभाग ने अगले सप्ताह बारिश की चेतावनी दे रखी थी, इसी के अनुरुप अभिसिंचन के साथ हमारा गाँव में प्रवेश होता है। यहाँ की शीतल शुद्ध आवोहवा, खुशनुमा माहौल, चिरपरिचित खेत-खलिहान, बगीचे, आसमान छूते पहाड़, फिर घर, गांववासी और परिवारजन, सब बचपन की यादों को ताजा कर रहे थे।  

आज ही गांव के मेले स्यो जाच का अंतिम दिन भी था। बारिश के कारण यहाँ दिन के खेल व रात के सांस्कृतिक कार्यक्रम बाधित ही रहे, लेकिन देवकार्य यथासमय संपन्न होते रहे। मेले में पधारी भगवती दशमी वारदा एवं जुआणी महादेव के दुर्लभ दर्शन करते हुए उनके आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। दिन भर और रात को बारिश होती रही। ऊंचे पहाड़ों पर बर्फवारी का क्रम चल रहा था। रात्रि तापमान शून्य से नीचे था।

ऐसे लग रहा था कि हमारी सर्दी में यहाँ के मौसम को फील करने की दबी इच्छा जैसे प्रकृति माँ पूरा कर रही थी। घर में बंद पड़े तंदूर एक्टिवेट हो चुके थे, जिसके किनारे बैठने का अलग ही आनन्द रहता है। वास्तव में वहाँ बैठते ही बचपन से अब तक की अनगिन यादें झंकृत हो उठती हैं, जिसमें नानाजी, नानीजी, मामाजी सहित दादीजी, ताउजी एवं अनगिन परिवारजनों से हुए मिलन, संवाद आदि सहज ही चिकादाश में उमड़ पड़ते हैं।

फिर इस बार भतीजे सोहम की अपेंडिक्स सर्जरी के चलते गाँव भर से लोग मिलने के लिए आ रहे थे, सो कई परिचित लोगों से मिलन व नए चेहरों से परिचय का क्रम चलता रहा। क्षेत्रीय लोकजीवन, यहाँ के चल रहे घटनाक्रम, गाँव-घाटी के ज्वलंत मुददे, देव-संस्कृति से जुड़ी बातें सब चर्चा के विषय थे।

अगले पाँच दिनों लगातार बारिश होती रही, ऊँचे पर्वतों में तो बर्फवारी शुरु हो गई थी, चारों ओर पर्वत घाटी ने जैसे सफेद बर्फ का श्रृंगार कर लिया था।


लगा जैसे प्रकृति माँ की विशिष्ट उपहार अपनी आकुल संतानों के लिए दिल खोल कर लूटा रही हों। एक दिन तो घर-गाँव में भी बर्फ का आगाज होता है, लेकिन मात्रा कम होने के चलते यह टिक नहीं पाती। चारों ओर हिमशिखरों में बर्फ जमने के कारण घाटी में रात का तापमान माइनस में जाता रहा। दिन का तापमान 3-5 डिग्री सेल्सियस तक रहा। सो घर में एक्टिव तंदूर के चलते तंदूर से गर्म कमरे में पारिवारिक मिलन व संवाद का क्रम चलता रहा।

मालूम हो कि तंदूर कक्ष हिमालच के पहाड़ी इलाकों में सर्दी का एक बहुत बड़ा आश्रय-स्थल रहता है, जहाँ का गर्माहट भरा कोजी वातावरण एक अलग ही भावलोक में विचरण की अनुभूति देता है। सर्दी में ठिठुरते जीवन को एक अलग ही सुख व आनन्दमयी संसार में विचरण का आलौकिक अहसास दिलाता है।

इसी बीच बारिश कम होने के कारण एक दिन जिला पुस्तकालय, कुल्लू भी चले गए, जहाँ पर क्षेत्रीय जीवन एवं साहित्य पर लिखी पुस्तकों का अवलोक किया। हमारी खोज कुल्लूत देश की कहानी थी, जिसकी एक ही प्रति संदर्भ कक्ष में थी और आज छुट्टी होने के नाते हमें यह उपलब्ध न हो सकी। इसी के साथ हमने देव भारथा और कुल्लू के शान लालचंद्र प्रार्थीजी पर एक (मात्र) पुस्तक इश्यू की। पुस्तकालय में पाठकों का तांता लगा था, अधिकाँश लगा प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए विशेष कक्ष में अध्ययनरत थे। कुछ समाचार कक्ष में अखबार एवं पत्रिकाओं को बाँच रहे थे। कुछ बाहर कैफिटेरिया में यार-दोस्तों के साथ रिलेक्स हो रहे थे।

पुस्तकालय में विषय की तमाम पूस्तकें उपलब्ध हैं, हमारी खोज क्षेत्र के सांस्कृतिक एवं ऐतिहासिक अतीत की थी, जिस पर अधिक शोधपरक सामग्री नहीं मिली। इस विषय पर लालचंद प्रार्थीजी के ऐतिहासिक कार्य़ (कुल्लूत देश की कहानी) की तक एक प्रति काफी आग्रह के बाद संदर्भ कक्ष में उपलब्ध हो पायी है। ऐसे में युवा पीढ़ी अपने इतिहास व संस्कृति से कैसे परिचित होंगे, सोचने का विषय है। हमारा अपनी रुचि के अनुरुप इस विषय पर अपने ढंग से शोध-अनुसंधान जारी है।

इसी तरह हमारे पूर्वजों के इतिहास के संदर्भ में हम अधिक दूर नहीं जा पाते, अपने घरों में ही पारिवारिक इतिहास पर चर्चा करें, तो चार-पाँच पीढी से पीछे नाम नहीं बता सकते। उनका विस्तार तो और भी नहीं। इस संदर्भ में इस बार हम अपनी वंदनीया माताजी का सहज-स्फुर्त प्रयास देखकर चकित हो गए। वे परिवार की सात पीढियों का पूरा हिसाब-किताब कागज पर लिख कर बैठी हैं। इसी क्रम में घाटी में सेब व फलों के प्रवेश की गाथा पिताजी से चर्चा करने पर स्पष्ट हुई, जिसको अगले किसी ब्लॉग में प्रस्तुत करुँगा।

दो घंटे में पुस्तकालय से बाहर निकलने पर देखा ह्ल्की-हल्की बारिश हो रही है, जो हमें देव अभिसिंचन जैसे फील दे रहा था। ढालपुर मैदान को बैसे भी ठारा करड़ू की सोह कहा जाता है। लगा जैसे हमारे नेक इरादों को देव आशीष मिल रहा है।


पूरी घाटी ईधऱ-ऊधर उड़ते अवारा बादलों के फाहों से साथ ढकी हुई थी, दायीं ओर सूदूर बिजली महादेव तो मानाली की ओर सेऊबाग-गाहर साइड के पहाड़ और सामने खराहल घाटी सभी बादलों के सघन आच्छादन से ढके हए बहुत ही सुंदर दृश्य प्रस्तुत कर रहे थे। आज दोपहर तक बारिश से कुछ राहत रही थी, लेकिन शाम से फिर इसका अनवरत क्रम प्रारम्भ होता है।

इस बार की चार-पाँच दिनों की बारिश-बर्फवारी फसल व फलों के हिसाब से किसी वरदान से कम नहीं थी। ऊँचे पहाड़ों में बर्फ की मोटी परत जमने से घाटी के नाले दनदनाते हुए व्यास नदी की जलराशि को समृद्ध कर रहे थे। निसंदेह रुप में गर्मी के आने वाले मौसम में घाटी के घर-गाँव में इससे जल की उचित व्यवस्था हो सकेगी, जो हर गर्मी में एक विकट समस्या रहती है।

19 मार्च के दिन नव संवत्सर का पर्व था। इसमें कुल पुरोहित घर-घऱ जाकर नए वर्ष की पत्री वाँचते हैं, इसी क्रम में युवा पंडित जोगिंद्रजी से मुलाकात हुई। पता चला कि नए संवत का नाम रौद्र है, इसके राजा गुरु, मंत्री मंगल हैं आदि। विभिन्न राशियों का लेना-देना व धर्म-अधर्म की स्थिति तथा विभिन्न घटनाओं के प्रतिशत आदि से परिचित हुए। साथ ही घाटी की देवपरम्परा पर कुछ सार्थक चर्चा भी हुई।

इस तरह मार्च 2026 में एक सप्ताह का संक्षिप्त प्रवास कई सुखद स्मृतियों को बटोरने का संयोग रहा। दीर्घकालीन संयम व प्रतिक्षा का मीठा फल जैसे इन सुखद अनुभूतियों के रुप में मिल रहा था। बारिश, बर्फवारी के बीच ठंड व तंदूर के आसपास लोकजीवन की बचपन की यादें सब जीवंत हो रहीं थीं व गहन-गंभीर मंथन के साथ इस शेष बचे नश्वर जीवन के सार्थक नियोजन की रुपरेखा ओर स्पष्ट हो रही थी। 

इसी प्रवास के दौरान सम्पन्न कुल्लू-मानाली घाटी के यात्रा वृतांत को पढ़ सकते हैं आगे दिए लिंक पर। (मानाली से कुल्लू वाया लेफ्ट बैंक)

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