नहीं धीरज जब, न
ही विश्वास
अपने मद की आँधी
पर हो सवार,
कोई दिक्कत नहीं
इसमें भी,
लेकिन, क्या इसकी
कीमत चुकाने को हो तैयार ।1
स्वाभिमान और
अहंकार में है अन्तर न्यून,
जब रज के उवाल
में चित्त मार रहा हो हुंकार,
अपनी गलती न सूझे
तनिक भी, प्रतिपक्ष ही गलती में शुमार ।2
स्वाभिमान के
पीछे छिपे होते हैं सत्य, संवेदना, औचित्य,
अहंकार के पीछे
भावशून्य हठधर्मिता, अहं का दर्प दंभ हुंकार,
सत्य से दृष्टि औझल, अपने दुराग्रह को मनवाने की टंकार ।3
औचित्य में होती
है, लचक, संभावना सृजन की,
सत्य को
स्वीकारने की, अपनी गलती को सुधारने की,
दृष्टि सुधार की,
नहीं दंडित करने का भाव प्रधान ।4
जब सामने वाला हो
अपनी गलती मानने को तैयार,
सुधार की संभावना
जहाँ दिख रही हो कुछ साकार,
क्यों न दें मौका
सुधरने-संवरने का, जब हर कोई यहाँ गलती का शिकार ।5
राह यह अनन्त
धैर्य की, नहीं यहाँ हो तत्काल कुछ चमत्कार,
उदारता-सहिष्णुता
के चरम पर मिले फल मीठे,
वहे अन्त में फिर
परिवर्तन की व्यार ।6
यही युगऋषि के
सतयुग की बापसी का आधार,
भावसंवेदना की
गंगोत्री से ही बहेगी समाधान की शीतल रसधार,
जहाँ तप और योग
के शिखर पर होंगे सतयुगी स्वप्न साकार ।7
त्याग, बलिदान से भरी यह राह प्रकाश पथ की
शूरवीरों को देनी
पड़ी हैं, अग्नि परीक्षाएं अनगिन वार,
नहीं यह राह
फूलों की, होंगे असुरता के पग-पग पर प्रहार ।8
तमस से ज्योति
का, असत्य से सत्य का,
मृत्यु से अमरता
की यह राह विरल,
पंगडंडियों में
नहीं, राजमार्ग से होगा, यहाँ मंजिल का संधान ।9
झूठ, असत्य,
अधर्म कितना भी हो प्रबल, मायावी,
सत्य, धर्म, इंसानियत की तय अंतिम विजय महान्,
धर्म की आभासित हार के पीछे महाकाल की चेतना विकराल ।10
सब कुछ वर्दाश्त
कर सकती है यह पराचेतना,
नहीं इसे अपने
भक्तों से अन्याय, अत्याचार, ज्यादती स्वीकार,
होते हैं
हर युग में इसीलिए महाशक्ति संग परमपुरख के अवतार ।11
अतः बनें विनीत,
सरल, धर्मनिष्ठ, तज क्षुद्र स्वार्थ-अहंकार,
बनें युगसाधक सृजन पथ के, युगऋषि की दर्शायी
राह से हो प्यार,
रहे सत्य, धर्म, औचित्य, आत्म-सुधार, परिमार्जन के लिए सदा तैयार ।12




कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें