धुन में सम्यक-बोध संग बढ़ते रहना चाहिए
जहाँ खड़े हो, वहीं से आगे बढ़ते रहो,
हाँ, इसके लिए अपनी यथास्थिति का अहसास होना
चाहिए ।1
नहीं यह संभव, बिना कुछ पल स्वयं संग बिताए,
आत्म-विश्लेषण, चिंतन-मनन, जीवन मंथन करते रहना चाहिए
।2
फिर, जीवन दृष्टि, समझ की सीमा अपनी,
स्वाध्याय - साधु संग इसका दायरा बढ़ाते रहना
चाहिए ।3
इनसे मिला ज्ञान न रहे अधूरा, अपच,
इसको अमली जामा पहनाते रहना चाहिए ।4
बढ़े कदम नहीं जरुरी, छोटे कदम काफी,
गति धीमी सही, अनवरत बढ़ते रहना चाहिए ।5
राह में मिलेंगे एकतरफा सरपट दौड़ते वाहन भी
बहुत,
तुम्हें अपनी धुन में, सम्यक बोध संग बढ़ते रहना
चाहिए ।6
मंजिल का नहीं महत्व कुछ अधिक,
राह के एडवेंचर का आनन्द भरपूर लेते रहना चाहिए ।7
अपने लिए तो जी लेते हैं, मरते हैं सभी,
परहित सेवा का सुकून भी कुछ अनुभव होना चाहिए ।8
है छोटी सी यह जिंदगी, इस धरा पर नश्वर,
शाश्वत संग, जीवन के स्रोत से जुड़े रहना चाहिए ।9