रविवार, 8 नवंबर 2026

दीपावली का आध्यात्मिक संदेश

दीप पर्व के पावन निहितार्थ

दीपावली अपने नाम के अनुरुप दीपकों के जलाने का पर्व है। प्रचलित कथानकों के अनुसार, जब प्रभु श्रीराम सीता माता और भाई लक्ष्मण सहित बनवास पूरा कर अयोध्या बापिस लौटते हैं, तो नगरवासियों ने दीपकों को जलाकर उनका स्वागत किया था। इसी रुप में दीपावली उत्सव को रावण के पुतलों के दहन उपरान्त दशहरे के बीसवें दिन मनाया जाता है।

दीपावली मात्र बाहरी प्रकाश और उत्सव का पर्व नहीं है, बल्कि इसके आंतरिक जीवन के लिए आध्यात्मिक मायने भी हैं। इस अवसर पर आतिशवाजी से लेकर मिठाई बाँटने, झालर से घरों को सजाने व दीपकों को जलाने के साथ उत्सव का उल्लास अभिव्यक्त होता है। लेकिन जिस बेतरतीव ढंग से इस अवसर पर आतिशवाजी होती है और हर गाँव नगर और शहरों में प्रदूषण से भरा दमघोटु वातावरण तैयार होता है, उसके चलते दीपावली के पर्व के औचित्य पर प्रश्न चिंह भी उठते हैं।

प्रस्तुत है युग के कुछ आध्यात्मिक विचारकों के मत में इस उत्सव से जुड़ी दिव्य प्रेरणाओं का संकलन, जिसके आलोक में चिंतन-मनन करते हुए, हम इस पर्व के गूढ़ अर्थ को ह्दयंगम करते हुए इसका आध्यात्मिक लाभ ले सकते हैं।

स्वामी विवेकानन्द के अनुसार दीपावली का वास्तविक अर्थ केवल बाहर के दीये जलाना या तड़क-भड़क वाले रीति-रिवाजों का प्रदर्शन करना नहीं है, बल्कि अपने भीतर के प्रकाश को जगाना है। दिवाली की रात का अंधकार, अविद्या या अज्ञान का प्रतीक है, जो हमें यह सोचने के लिए वाध्य करता है कि हम केवल एक भौतिक शरीर और अहंकार तक सीमित नहीं हैं। दीवाली पर प्रज्जवलित दिये, ज्ञान के प्रतीक हैं। जो यह सोचने के लिए प्रेरित करते हैं कि हम अपने भीतर छिपी दिव्य और अनंत आत्मा को पहचानें और अज्ञान के अंधकार को मिटाने के लिए कटिबद्ध हों।

जिस तरह से हम अपने शरीर का जन्मदिन मनाते हैं, उसी प्रकार दिवाली हमारे आँतरिक प्रकाश अर्थात आत्मा की अनुभूति का उत्सव है। जब व्यक्ति को इस आंतरिक प्रकाश का बोध होता है, तो उसके भीतर सभी के प्रति प्रेम, करुणा और एकता की भावना जागृत होती है।

स्वामी विवेकानन्द के विचारों में, दीवाली पर प्रत्येक व्यक्ति को अपने भीतर मुख्य रुप से तीन दिए अवश्य जलाने चाहिए। पहला है, आत्म-विश्वास का दिया – स्वयं पर विश्वास रखना, क्योंकि आत्म-विश्वास के बिना ईश्वर पर भी विश्वास नहीं किया जा सकता। दूसरा है, ज्ञान का दीया – निरंतर सीखने की ललक और विवेक को जगाए रखना। तीसरा है, सेवा का दिया – जररुतमंदों की भलाई के लिए तत्पर रहना। इसके साथ शुद्धता व पवित्रता का चौथा दीया भी आवश्यक है, क्योंकि निर्मल विचारों और कृतज्ञ ह्दय में ही वास्तविक समृद्धि अर्थाता माता लक्ष्मी का वास होता है।

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महर्षि अरविंद के शब्दों में, दिवाली, वह दिन है जब हम दिव्य जननी का आवाह्न करते हैं और उनकी आराधना करते हैं, कोई उन्हें माँ लक्ष्मी के रुप में पूजता है, तो कोई माँ काली के रुप में। दिवाली, वह दिन  है, जब हम एक बार फिर  स्वयं को याद दिलाते हैं कि हमें प्रकाश की ओर मुडना है, अपने भीतर के अंधकार और जड़ता (तमस) को दूर करना है।

दिवाली, वह दिन है, जब हम एक बार फिर अपनी उस अंतरतम आकांक्षा को याद करते हैं और प्रज्वलित करते हैं, ताकि हम दिव्य प्रकाश के प्रति खुल सकें – सत्य का प्रकाश, न्याय का प्रकाश, अच्छाई का प्रकाश, प्रेम और सद्भाव का प्रकाश।

श्रीराम का वनवास समाप्त होना और उनका अयोध्या लौटना हमारे भीतर की उस अजेय और पवित्र अवस्था का प्रतीक है, जिसे बाहरी अंधकार या अज्ञान परास्त नहीं कर सकता। जब श्रीराम स्वर्ण-निर्मित पथ पर विचरण करते हैं, तो मनुष्य को अपने ह्दय में कृतज्ञता, प्रेम और प्रार्थना का दीपक जलाना चाहिए। यह वह पवित्र अग्नि है, जिसे युगों-युगों से महर्षियों और हमारी प्राचीन परंपरा ने जीवित रखा है।

दीपावली का वास्तविक अर्थ है, अपने भीतर की तामसिक प्रवृत्तियों और अज्ञान के अंधकार को मिटाकर ज्ञान और सत्य के प्रकाश की स्थापना करना। जब मनुष्य अपने भीतर की इस आध्यात्मिक दीवाली को मनाता है, तब उसका जीवन ही स्वयं ज्योतिर्मय और अनंत शक्तियों का स्रोत बन जाता है।

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युगऋषि पं.श्रीराम शर्मा आचार्य़ के शब्दों में, दीपावली केवल बाहरी साफ-सफाई, आतिशवाजी या दिखावटी पूजा-पाठ का पर्व नहीं है, बल्कि यह आत्म-परिमार्जन और आंतरिक चेतना जागरण का प्रतीक है। दिपावली आंतरिक प्रकाश, आत्म-सुधार और युग निर्माण का पावन संदेश देता है। बाहर दिये जलाने के साथ मन में बैठे अज्ञान, अहंकार, आलस्य, प्रमाद, बुराइयों और कुसंस्कारों के अंधकार को मिटाकर ज्ञान, सदाचार और सद्गुणों का प्रकाश फैलाना ही असली दीपावली है।

हम बदलेंगे, युग बदलेगा; हम सुधरेंगे, युग सुधरेगा, आचार्य़जी का यह मूल मंत्र दीपावली पर हमें यह संकल्प लेने की प्रेरणा देता है कि हम पहले अपने आचरण औऱ विचारों में सुधार करें। उसी के अनुरुप बाहर आवश्यक परिवर्तन परिलक्षित होगा।

दीपावली पर धन-धान्य की देवी माँ लक्ष्मी के पूजन का आध्यात्मिक अर्थ है, अपने जीवन में श्रेष्ठ संस्कारों, सद्विचारों, परिश्रम और नैतिक गुणों को धारण करना, क्योंकि जहाँ सद्गुण होते हैं, वहाँ स्थायी सुख-शांति और समृद्धि स्वतः आती है।

प्रभु श्रीराम के चौदह वर्ष के वनवास के बाद अयोध्या लौटने और दीये जलाने की परंपरा का आध्यात्मिक निहितार्थ हैं कि हमारे जीवन मे मर्यादा, कर्तव्यनिष्ठा, त्याग और पुरुषार्थ की पुनर्स्थापना होनी चाहिए।

यह पर्व बाहरी दिखावे की बजाय आत्म-शोधन और संकल्प का पावन पर्व है, अपने भीतर झांकने, पिछली कमियों को सुधारने और समाज व राष्ट्र के नवनिर्माण के लिए संकल्प लेने का अवसर है।

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