रावण के दस मुख और जीवन सवक
रावण एक प्रकाण्ड पंडित, उद्भट विद्वान, चारों वेदों और षडदर्शन के
ज्ञाता, भगवान शिव के परमभक्त, शिव-ताण्डव स्रोत के रचियेता थे और साथ ही ज्योतिष
और आयुर्वेद के महापंडित, कुशल वीणा वादक जैसी विशेषताओं से सम्पन्न थे। लेकिन कुछ
विकृतियाँ उनके विनाश का कारण बनीं, जिसके कारण दस सिर वाला रावण का पुतला उनके
भाई कुंभकरण और वेटे मेघनाथ के साथ दशहरे के दिन जलाया जाता है, जिसे बुराई पर
अच्छाई की तथा अधर्म पर धर्म की जीत के रुप में देखा जाता है।
रावण त्रेता युग में सीता माता के हरण के कारण अधर्म, अन्याय और
अहंकार-दंभ के प्रतीक एक व्यक्ति के रुप में असुरता के प्रतिनिधि माने जाते हैं,
लेकिन आज रावण से जुड़ी ये बुराईयों मनुष्य के स्वभाव में इस कदर घुलमिल चुकी हैं
कि जैसे रावण से जुड़े दुर्गुण यथा - क्रोध, दर्प दंभ, अहंकार, हठधर्मिता, वासना
आदि विकार जैसे इंसान के जीवन में स्थान पा चुके हैं।
इस रुप में दशहरे के दिन रावण का दहन, तात्विक रुप में हमारे अंदर की
अशुभता, असुरता, पशुता एवं अवांछनीय विकृतियों के दहन का भी आध्यात्मिक संदेश देता
है, जो कि हमें एक मनुष्य जीवन की गरिमा के अनुरुप जीने से वंचित रखता है और
परिवार से लेकर समाज में एक सतयुगी समाज की रचना में बाधक बनता है। इस तरह दशहरा
आत्मावलोकन का पावन पर्व भी है, कि हम अपना ईमानदार मूल्याँकन करें, कि कौन सी
बुराई का हमें अपने चिंतन, चरित्र एवं व्यवहार में दहन करना है व इनके स्थान पर
किस सद्गुण को धारण करना है।
वासना विकार, विकार, जो व्यक्ति को कामान्ध बनाकर उसके विवेक
का हरण करता है, उसको असंयमित भोग के पाश में जकड़कर उसकी जीवनी शक्ति को निचोड़
देता है, उसे दुर्बल-रुगण बनाता है। जिसके चलते व्यक्ति गृहस्थ धर्म का सही ढंग से
पालन नहीं कर पाता, संतानों को श्रेष्ठ संस्कार नहीं दे पाता। आजकल तलाक से लेकर
घरेलु हिंसा के बढ़े-चढे मामले इसी से जुड़े हुए हैं, तो भयावह घटनाओं को जन्म दे
रहे हैं। इंद्रिय असंयम के चलते व्यक्ति का चरित्र भी सामाजिक रुप से संदिग्ध बना
रहता है और ऐसे में जीवन की संभावनाएं पूर्ण रुप से नहीं खिल पाती।
क्रोध, का विनाशकारी आवेश दूसरा दुर्गुण है, जो विवेक को
कुंद कर देता है, इसके आगोश में व्यक्ति कुछ ऐसा कह व कर बैठता है, जिससे फिर बाद
में पश्चाताप ही हाथ लगता है। कई बार क्रोध के आवेश में भयंकर दुर्घटनाएं हो जाती
हैं, जिनकी फिर भरपाई नहीं की जा सकती। आपसी सम्बन्धों को क्रोध हर हमेशा के लिए
बिगाड़ देता है और व्यक्ति स्वयं भी इसकी आग में अंदर ही अंदर सुलगता रहता है। एक
गुस्सैल व्यक्ति कभी भी पारिवारिक एवं सामाजिक जीवन में शांति-समाधान का हिस्सा
नहीं बन पाता।
लोभ-मोह, आवश्यकता के अधिक चीजों को संग्रहित करने की
वृत्ति, एक ऐसा अवगुण है जिसका कोई अन्त नहीं। इसके चलते एक सामान्य व्यक्ति लखपति
बनना चाहता है, एक लखपति करोड़पति बनने का सपना देखता है और इससे आगे फिर एक
अरबपति। और आवश्यकता से अधिक संग्रह अन्ततः अशांति, क्लह एवं विग्रह का ही कारण
बनता है तथा जीवन का सदुपयोग नहीं हो पाता। इसके साथ मोह विकार व्यक्ति
या वस्तु के प्रति अनावश्यक आसक्ति को जन्म देता है, जिनका वियोग फिर असह्य दुःख
पीड़ा एवं संताप का कारण बनता है। आशा-अपेक्षाओं से भरे ह्दय से फिर कर्तव्य कर्म
भी अनासक्त भाव से नहीं हो पाते।
अहंकार, अपने वास्तविक स्वरुप के बोध का अभाव, स्वयं को
सर्वशक्तिमान मान बैठने के दंभ को जन्म देता है। अपनी शक्ति, सत्ता, धन, वैभव,
ज्ञान व गुणों का दंभ, देर-सवेर व्यक्ति के पतन का कारण बनता है। इस अहंकार-दंभ के
चलते व्यक्ति को अपने हित की बातें समझ नहीं आती और ऐसे में वह अपने शुभचिंतकों को
अपना शत्रु मान बैठता है, जबकि चापलुसी करने वाले जालसाजों को अपना परमहितेषी,
जिनकी झूठी प्रशंसा के चलते अहंकारी अपना वास्तविक हित नहीं समझ पाता, न ही जीवन
के उद्देश्य को साध पाता। अपनी सत्ता, धन, वैभव, बल के नष्ट होते ही उसे अपनी
वास्तविकता का कटु बोध होता है, तब तक प्रायः देर हो चुकी होती है।
संकीर्ण स्वार्थपरता, अपने ही हित की सोच, दूसरों से कोई मतलब नहीं। व्यापक
जनहित या मानवता के हित के विपरीत सिर्फ अपने तक सीमित संकीर्ण सोच। संकीर्ण
स्वार्थपरता जीवन की असीम संभावनाओं को समेट कर इनको व्यापक बनने से रोकती है।
मनुष्य जन्म का उद्देश्य नरपशु से नरमानव, महामानव, देवमानव की श्रेणियों को पार
करते हुए अपने प्रसुप्त देवत्व एवं असीम संभावनाओं को साकार करना है, जबकी संकीर्ण
स्वार्थपरता के कारण वह नरपशु की श्रेणी में ही अटका रहता है और इसमें क्षुद्र
अहंकार और वासना के घुलने से तो इससे भी नीचे गिरकर नर-पिशाच, असुरता की श्रेणी
में जा गिरता है।
छल-कपट व अन्याय, छल-कपट में अनाधिकार चेष्टा के तहत दूसरे की
सम्पदा का हरण, प्रकृति की लूट-खसोट शामिल है। ऐसे में दूसरों के प्रति अन्याय के
चलते, औचित्य, न्याय और नैतिकता का पक्ष तार-तार हो जाता है। तत्काल कुछ लाभ एवं
उपलब्धि का भ्रम हो सकता है, लेकिन जब ये कर्म लौटकर बापिस आते हैं, तो अपनी भयंकर
भूल का अहसास होता है। समाज में ऐसे लोगों का भयवश सम्मान हो सकता है, लेकिन दिल
से कोई इनका सम्मान नहीं करता। इन पर व्यापक स्तर पर तिरस्कार ही बरसता है।
अनादर, दूसरों का उपहास एवं अपमान करना। इससे दूसरे के
ह्दय में विद्रोह का भाव घर कर जाता है, शत्रुता का भाव पैदा होता है, जो देर-सबेर
विध्वंस के रुप में प्रकट होता है। इसके स्थान पर दूसरों के प्रति सम्मान का भाव,
आत्मीय सम्बन्धों को पुष्ट करता है, परिवार और समाज में एक शांति-सौहार्द्रयपूर्ण
बेहतरीन वातावरण तैयार करता है, जिससे स्वयं को भी शांति एवं सुकून का अनुभव मिलता
है।
भय, एक ऐसा अवगुण है, जो हमारी क्षमताओं को कुंद कर देता है। खतरों का
सामना होने पर भयभीत होना स्वाभाविक है, लेकिन बिना वास्तविक भय के कारण के मात्र
कल्पना के आधार पर भयभीत होना, जीवन की सभावनाओं को प्रकट होने से रोकता है। यदि
हम सत्य, न्याय और प्रेम के पथ पर चलेंगे, तो भय कम हो जाता है। गलत आचरण, भ्रष्ट
व्यवहार के चलते हम कभी भी निर्भय होकर नहीं जी सकते। अतः सरलता, सत्यता, ईमानदारी
के साथ जीवन यापन ही निर्भय जीवन को सुनिश्चित करता है। गलत आचऱण करने वाला कितना
भी निर्भय दिखे, लेकिन भीतर ही भीतर वह बहुत भयभीत रहता है।
ईर्ष्या-द्वेष, दूसरे की खुशियों या उपलब्धियों के प्रति असंतोष
एवं जलन का भाव हमारे व्यक्तित्व को संकुचित बनाता है, बौनेपन का अहसास देता है।
और ऐसे में व्यक्ति अंदर से जलता रहता है, जो भीतर ही भीतर उसको खोखला करती रहती
है। इसके साथ ईर्ष्या-द्वेष वश यदि कोई दूसरे को नीचे दिखाने की दुर्भिसंधि रचता
है, तो इसका परिणाम अशांति, असंतोष एवं तनाव के रुप में प्रकट होता है। इसके
विपरीत उदारता-सहिष्णुता भरा जीवन शांति, संतोष एवं प्रसन्नता का जनक सावित होता
है।
क्रूरता-अमानवता, दया, करुणा, संवेदना का अभाव है, जो अपने कर्म को बिगाड़ने वाला अवगुण है, जो पुण्य का तीव्रता से क्षय करता है और अन्ततः व्यक्ति के समूल विनाश का कारण बनता है। ऐसे कर्म बहुत भयंकर रुप में व्यैक्तिक एवं सामूहिक स्तर पर बापिस आते हैं। आजकल स्वाद के लिए निरीह पशुओं-जीवों की हत्या, धर्मांधता के नाम पर पशु बलि इसी क्रूरता, अमानवता के कुत्सित प्रचलन हैं, जिन्हें त्यागकर ही हम सच्चे अर्थों में इंसान होने का परिचय दे सकते हैं।
दशहरा अपने अंतःकरण में स्थान बनाए इन दुर्गुणों को चिन्हिंत करने का विशेष
दिन है और इन्हें जानने के साथ इन्हें जीतने के लिए संकल्पित होने का पावन दिन है,
जिससे कि हम आंतरिक शांति के साथ जीवन की बाहरी सिद्धी एवं सफलता को प्राप्त कर
सकें तथा हमारा मनुष्य जीवन अपनी संपूर्ण संभावनाओं के साथ धरती पर जन्म लेने के महान
उद्देश्य को पूर्ण कर सके।
इस लिंक पर पढ़ सकते हैं, दशहरा कुल्लू का


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