शुक्रवार, 29 मई 2026

जीवनबोध

बिना मूल्य चुकाए, कुछ बड़ा हासिल न कर पाने की हताशा

जीवन में नीचे गिरना सहज-स्वाभाविक है, इसके लिए कोई प्रयास नहीं करना पड़ता। चारों ओर का प्रवाह भी इसमें सहायक है, लेकिन ऊपर उठना कठिन है, समय साध्य, कष्ट साध्य है। इसलिए आश्चर्य़ नहीं कि कम ही लोग ऊपर उठ पाते हैं, श्रेय पथ पर चल पाते हैं। अधिकांश लोग पगडंडियों का सहारा लेते हैं, शॉर्टकट से बिना अधिक श्रम किए, बिना मूल्य चुकाए सस्ते में, हो सके तो मुफ्त में ही कुछ बड़ा हासिल करना चाहते हैं, जो अन्त में एक भूल निकलती है और हाथ में हताशा-निराशा के अलावा कुछ लगता नहीं।

माना कि ऊपर उठना सहज नहीं, यह अनुशासन की माँग करता है, तप की तपन से गुजरना माँगता है, श्रम एवं पुरुषार्थ के श्वेत बिंदुंओं का श्रृंगार करना पड़ता है। लेकिन यही यही जीवन निर्माण का राजमार्ग है, चरित्र गठन की प्रक्रिया है, यही मनुष्य जीवन को सार्थक बनाने वाला शाश्वत मार्ग है और यही पूर्णता की ओर ले जाता मुक्ति पथ भी। इसलिए समझदार लोग इसका सहर्ष वरण करते हैं और इसके लिए आवश्यक मूल्य चुकाने के लिए सदा तैयार रहते हैं।

नैतिकता का वरण क्यों करें

अच्छे क्यों बनें, नैतिक क्यों बनें, प्रश्न सहज ही मन में उठ सकता है, जीवन के पड़ाव पर कई बार कौंधता है। इसके कई उत्तर हो सकते हैं। लेकिन इसका सीधा सपाट उत्तर तो एक ही है कि जीवन की जो संभावनाएं बीज रुप में जीवात्मा में विद्यमान हैं, जो परामात्मा का अंश होने के नाते ईश्वरतुल्य हैं, नैतिकता इनके साकार होने का प्रवेश बिंदु है।

नैतिकता का वरण करते हुए मनुष्य नर पिशाच की असुरता से नर पशु की ओर ऊपर उठता है। फिर मानवीय संवेदना को धारण करता हुआ नर मानव की गरिमा को प्राप्त होता है। और फिर अपनी मानवीय दुर्बलताओं पर विजय प्राप्त करते हुए महामानव की श्रेणी में खड़ा होता है और फिर अपनी क्षुद्रताओं का तिरोधान करते हुए, अंतर्निहित देवत्व के जागरण के साथ देवमानव बनता है। इस तरह नर से नारायण, जीव से शिव बनने की प्रक्रिया नैतिकता, चरित्र निर्माण के आधार पर घटित होती है और जीवन की चरम संभावनाओं का द्वार खुलता है।

बिना नैतिकता के इंसान को पशु बनते देर नहीं लगती, इससे भी नीचे गिरते हुए आसुरी एवं पैशाचिक कृत्यों के साथ उच्चतर संभावनाओं के सत्यनाश की आत्मघाती दुर्घटना के साथ घटित हो सकती है। इस तरह नैतिकता को अपनाना किसी दूसरे पर उपकार या कोई अहसान नहीं, बल्कि यह स्वयं के प्रति ही उपकार है, स्वयं के जीवन की सुख, शांति और सद्गति का आधार है।

भाग्य एवं पुण्य का खेल

पुरुषार्थ अपनी जगह, लेकिन भाग्य एवं पुण्य की भूमिका को नकार नहीं सकते। यदि कोई गलत व्यक्ति फल-फूल रहा है, तो समझो कि यह उसके वर्तमान कर्मों का फल नहीं है, वह अपने पूर्व के संचित शुभ कर्मों या पुण्यों का फल है अर्थात वह अपने भाग्य का फल भोग रहा है। अतः जब तक यह पुण्य प्रबल रहता है, तब तक नाम यश, धन, सुख, लोक सम्मान, मानवीय प्यार आदि सर्वसुलभ एवं सहज प्रतीत होते हैं। लगता है कि ये तो जैसे अपने जन्मसिद्ध अधिकार हैं और व्यक्ति तप एव पुण्य के प्रति उदासीन हो जाता है।

ऐसे में आश्चर्य नही कि व्यक्ति भोगों की आँधी और अहं की मदहोशी में भूल-चूकों के साथ पाप वृत्तियों में मश्गूल हो जाता है। क्रमशः पुण्य क्षीण होने लगते हैं और इसी के साथ अर्जित नाम, यश, स्वास्थ्य, सुख, ऐश्वर्य भी सब क्षीण पड़ने लगते हैं और इसके साथ तथाकथ सब अपने भी छिटकने लगते हैं। जैसे कंगाल व्यक्ति फिर बाजार से कुछ खरीद नहीं सकता, यही स्थिति पुण्यहीन व्यक्ति की होती है। संसार में फिर कुछ हाथ नहीं लगता, सब बेगाना सा हो जाता है। जो पहले दुआ-सलाम करते थे, आगे पीछे घूमते थे, वे अब पूछते तक नहीं, राह में मिलते हैं, तो मुंह फेर लेते हैं।

यदि व्यक्ति समझदार है, तो जगत के ऐसे तत्वबोध के साथ आत्म-बोध के पथ पर अग्रसर हो जाता है और अध्यात्म मार्ग का पथिक बन जाता है। जीवन के प्रति सजग हो जाता है और ईश्वर का अवलम्बन लेकर निर्बल के बल प्रभुश्रीराम (समर्थ ईष्ट-आदर्श) की शरण में जाता है और जीवन के नवनिर्माण की नूतन पटकथा लिखता है।

जीवन में दुःख-कष्ट-पीड़ा का औचित्य

जीवन में दुःख, कष्ट, पीड़ा क्यों मिलते हैं, ईश्वर की बनाई इस सृष्टि में बुरे, धूर्त एवं दुष्ट लोग क्यों हैं। ये प्रश्न यदा-कदा कौंध सकते हैं, जब इनके अवांछनीय प्रवाह के बीच अनावश्यक पीड़ा, कष्ट एवं दुःख से गुजरना पड़ता है।

मानकर चलें कि ईश्वर की कर्मप्रधान सृष्टि में यह अनायास नहीं होता। यदि कोई इन परिस्थितियों से गुजरने के लिए विवश-बाध्य अनुभव कर रहा है तो शांत मनःस्थिति में स्पष्ट होगा कि ये सब प्रकृति माँ कहो या परमपिता परमेश्वर के उपहार हैं। हालाँकि तत्काल इनके औचित्य पर प्रश्न उठना स्वाभाविक है, इनके लाभ एवं निहितार्थ को जानना-पहचानना कठिन होता है, लेकिन दीर्घकाल में स्पष्ट होता है कि जीवन यदि इन अग्नि परीक्षाओं से न गुजरा होता तो, वह तप कर कुंदन नहीं बनता।

और यह भी स्पष्ट होता है कि स्वर्ग का रास्ता नरक से होकर गुजरता है, शांति का मार्ग अशाँति के विप्लवी दौर से होकर ही पूर्णता को पाता है। असत से सत, अंधकार से प्रकाश, मृत्यु से अमृत अर्थात शाश्वत जीवन की यात्रा इसी आधार पर घटित होती है। अनन्त धैर्य, अपार श्रद्धा और अनवरत प्रयास ही इस मार्ग के पाथेय हैं। न ही यहाँ कोई शॉर्ट कट हैं और न ही किसी दूसरे के कंधे पर सवार होकर इसे पार किया जा सकता है।

सोमवार, 18 मई 2026

मेरा गाँव मेरा देश – भेड़-बकरी पालन और फुआल नानाजी के रोमाँचक किस्से, भाग-2

 

वीहड़ वन में फुआल बन घूमने की अधूरी तम्न्ना

इस यात्रा में आते-जाते लाहौल-स्पीति के ठंडे रेगिस्तान के दर्शन हुए, बीच-बीच में घास के टापुओं और घाटी-मैदानों को भी देखे। लगा हमारे पूर्वज फुआल, यहीं कहीं भेड़ों को लेकर आते रहे होंगे। यहाँ के विकट जीवन को देखकर ताज्जुक किए कि कैसे वे अपने साथ महीनों का राश्न लेकर यहाँ पहुँचते रहे होंगे, जहाँ रुकने के लिए सही ढंग का ठिकाना भी नहीं है।

नानाजी कहा करते थे कि वहाँ पत्थरों को एक के ऊपर एक सटाकर दिवार व छत्त बनाकर रहने लायक गुफानुमा बसेरे तैयार होते, जिससे बारिश में उनकी कुछ रक्षा हो पाती। लेकिन भेड़-बकरियों के लिए ऐसी सुरक्षा व छत्त अधिकाँशतः उपलब्ध नहीं रह पाती और वे खुले आसमान के नीचे ही रात बिताने के लिए विवश रहती। कल्पना करना कठिन है कि बारिश व ठंड में वे किस तरह यहाँ दिन व रात गुजारती रही होंगी। हालाँकि ईश्वर ने उन्हें गर्म ऊन का एक मोटा सा जैकेट अवश्य दिया है, जो इन विकट परिस्थितियों में ठंड से उनकी रक्षा करता है। यह ऊन फुआलों के लिए भी वरदान से कम नहीं  होती। वर्ष में अमूनन दो बार वे इसको काटकर इसको बेचते हैं और कुछ ऊन से अपने व परिवारजनों के लिए कोट से लेकर कम्बल तैयार करते हैं।

मालूम हो कि फुआल परम्परा से भेड़ की ऊन से मोटे कम्बल (दोहड़ू) तैयार करते रहे हैं, जो बारिश के बीच जंगलों में उनके क्वच का काम करते और बकरी के रेशेदार ऊन से बने ऑवरकोट (कुंठ) वाटरप्रूफ जैकेट का काम करते। साथ ही जंगल में इनसे मजबूत बिछावन (सेला) की व्यवस्था हो जाती। आज तो टैंट से लेकर आधुनिक सुविधाओं की व्यवस्था है, लेकिन हमारे पूर्वज फुआल इन सुविधाओं से वंचित थे। यहाँ भी कल्पना करना कठिन है कि किस तरह वे बिना तरपाल या तंबू के पेड़ के नीचे प्रकृति के विषम प्रहारों को झेलते रहे होंगे। आश्चर्य नहीं कि फुआलों को एक काठी जात (रफ-टफ) माना जाता है, जो फौलादी तन-मन व जीवनट के साथ हर तरह की परिस्थितियों में सरवाइव करना जानते हैं। उनके साथ होता है परम्परा एवं नैसर्ग से मिला आंतरिक जीवट और स्वतःस्फुर्त आत्म-विश्वास तथा साथ में प्रकृति की अधिष्ठात्री महाशक्ति और पशुपतिनाथ भोलेनाथ का भरोसा। जिसके चलते इनका चूल्हा भी धुनि का रुप लिए होता है।

लाहौल में तो नानाजी कहा करते थे कि खाना बनाने के लिए चूल्हे की लकड़ियाँ भी मिलना कठिन हो जाती थी। इस ठंडे रेगिस्तान में कुछ इलाकों में बैठर (सुगंधित देवदार की छोटी प्रजाति, जिसकी सूखी पत्तियों को देवकार्यों में धूप-अग्रवती के रुप में उपयुक्त किया जाता है) की सूखी झाड़ियों से काम चलाते या भेड़ों की मिंगणियों को सुखाकर इनका इंधन के रुप में उपयोग करते। यदि कहीं दूरस्थ गाँव वासियों के मवेशी यहाँ चरते तो उनके गौवर के उपले ईंधन में काम आते।

वीहड़ वनों में आग सुलगाने की पारम्परिक व्यवस्था भी विशिष्ट रहती। हम स्वयं नानाजी को मुलायम बाचा घास से आग जलाते देखे हैं। जिसमें वे चकमक सफेद पत्थर के ऊपर लौहे की साज (छोटी हथोड़ी) का त्वरित प्रहार करते, जिसके घर्षण के साथ चिंगारियाँ निकलती और बाचा घास आग पकड़ लेती। इससे वे अपनी चिल्म जलाते थे और चूल्हे की आग भी प्रज्जवलित होती।

देवदार के जंगलों में तो आग जलाने के लिए शोली (विरोजायुक्त देवदार की लकड़ी, जो माचिस से तुरन्त आग पकड़ लेती है) भी रहती। आज तो लाइटर से लेकर तमाम विकल्प उपलब्ध हैं। कह सकते हैं कि आधुनिक टेक्नोलॉजी के साथ फुआल लोगों के जीवन को थोड़ा राहत आवश्य मिली है। मोवाइल फोन आने से वे अपने घर-परिवार से संपर्क में भी रहते हैं, हालाँकि नेटवर्क हर जगह उपलब्ध नहीं रहता। कुछ विशेष ऊँचे स्थानों पर आकर ही वे संपर्क साध सकते हैं। जबकि पहले महीनों घर की कोई खबर नहीं रहती। जंगल में तो किसी तरह की डाक सुविधा भी नहीं थी। घर-परिवार के सुख-दुःख में भाग लेने के लिए उन्हें दिनों-सप्ताह लग जाते। कल्पना कर सकते हैं कि फुआल जीवन तब कितना त्याग, तप और कठिनाई भरा रहा होगा।

प्रायः डेरा जलस्रोत के पास ही रहता, सो यहाँ का जड़ी-बूटियों से युक्त (चार्ज्ड) प्राकृतिक जल किसी वरदान से कम नहीं होता। जो एक ओर जहाँ पाचन को दुरुस्त रखता, वहीं छोटे-मोटे रोगों की भी दवा का काम करता। हालाँकि ऊँचाइयों में तो ग्लेशियर से आता जल ही नसीव होता। इस जमाने वाले ठंडे जल में नित्य स्नान संभव नहीं था, सो इसका भी मुहुर्त निकलता। 

गर्मी व बारिश में नानाजी लोग लाहौल जाते, तो सर्दी में नीचे मंडी-सलापड़ की ओर कूच करते। बचपन में जब हम पुश्तैनी मकान की खिड़की के पास बैठते तो वहाँ से मंडी साइड के पहाड़ दिखाई देते। इसके साथ नानाजी के रोमाँचक किस्सों के संग हम कल्पना की उड़ान भर कर वहाँ की भाव यात्रा करते। मंडी साइड से ही वे तेजपत्र के जंगल की बात करते और घर में उनके लाए सूखे तेजपत्र मसाले के रुप में पर्व-त्यौहारों के व्यंजनों में उपयुक्त होते।

यहाँ पर यह भी स्पष्ट कर दूँ कि हमारे जंगलों में, राह में कुछ ऐसे विशेष स्थान भी हैं, जिन्हें रुआड़ (चट्टान से बनी प्राकृतिक गुफाएं) कहते हैं, जिनकी आड़ में भेड़-बकरियाँ बारिश व बर्फवारी में सुरक्षित-संरक्षित रहती हैं। फिर देवदार से लेकर रई-तौस व जंगली खनोर (चेस्टनट) के गगनचुम्बी वृक्षों के नीचे भी उनके लिए सिर छुपाने की जगह मिल जाती।

फिर जंगल में भालू से लेकर गुलदार एवं शंकू जैसे खुंखार जानवरों का भी खत्तरा रहता, जो रात को आकर कभी भी झुंड़ पर हमला कर नुकसान पहुँचा सकते हैं। ऐसे में हालाँकि रात को पहाड़ी कुत्ते सजग एवं नैष्ठिक पहरेदार की भाँति पहरा देते और स्वयं फुआल भी विशेष परिस्थितियों में रात भर नींद के बीच भी जागते हुए रखवाली करते। नानाजी ऐसी भिड़ंत के लोमहर्षक किस्से सुनाते, कैसे वे भालू आने पर पेड़ पर चढ़ गए थे, और भालू पीछा कर रहा था तो ऊपर से उसकी नाक पर लात मारकर और पेड़ को हिलाकर उसे भगा दिए थे।

यहाँ यह भी बता दें कि नानाजी बहुत ही निडर और दिलेर किस्म के व्यक्ति थे। उन्हें कई मन्त्र सिद्ध थे और उन्होंने शमशान में साधना कर ये मंत्र सिद्ध किए थे। साँपों को चुटकी में वश करना उन्हें आता था और वे उसे पकड़ कर दूर निर्जन स्थान पर छोड़ देते। मंत्र सिद्धि की शर्त थी कि साँप को किसी तरह का कोई नुकसान नहीं पहुंचना चाहिए।

जंगली पक्षियों से लेकर जीवों के शिकार के किस्से भी भी वे बड़े उत्साह और संजीदगी से सुनाते। हालाँकि आज हम इस तरह की हिंसक गतिविधियों के समर्थक नहीं है, लेकिन लोकजीवन में परम्परागत चलन अपनी जगह हैं, जो इतिहास का हिस्सा बने हुए हैं। आज भी घाटी के प्राचीन मंदिरों में ऐसे दुर्लभ जीव-जंतुओं के सींग और अवशेष टंगे मिलेंगे, जो कभी जंगलों में विचरण करते रहे होंगे और आज विलुप्त हैं।

किन परिस्थितियों में यह सब हुआ शोध का विषय है, लेकिन नानाजी के फुआल जीवन के संग हम उस समुदाय के जीवन के संघर्ष, रोमांच व कठोर यथार्थ को कुछ-कुछ समझते रहे। चम्बा साइड में यही समुदाय गद्दी के रुप में विशिष्ट पहचान रखता है, जिसकी अपनी संस्कृति है, परम्परा है और जो अमूनन फुआलों के उपरोक्त वताए किस्सों से मिलती-जुलती है। वे भी चम्बा से दुर्गम कुगती पास या काली छो दर्रे को पार कर लाहौल घाटी पहुँचते हैं और तप-त्याग एवं कठोर श्रम भरे भेड़ पालन के पेशे को निभाते हैं।

फुआलों के ऊपर बताए गए कठोर जीवन के साथ उनके प्रकृति की गोद में अलमस्त व एकांत शांत जीवन की कल्पना भी हमें रोमाँचित करती, कि काश एक वार हम भी कुछ दिन, सप्ताह या माह उनके साथ रहकर इसको अनुभव करें। आज भी यह अरमान बाकि हैं। देखते हैं किस तरह प्रकृति-परमेश्वर, आदिशक्ति-भोले बाबा इसकी व्यवस्था करते हैं और हम फुआल जीवन के फर्स्ट हैंड अनुभव को जी पाते हैं और बीहड़ वन के रफ-टफ एवं रोमाँचक जीवन को सुधी पाठकों तक पहुँचा पाते हैं।

शनिवार, 16 मई 2026

मेरा गाँव मेरा देश – भेड़-बकरी पालन और फुआल नानाजी के रोमाँचक किस्से, भाग-1

 

वीहड़ वन में फुआल बन घूमने की अधूरी तम्न्ना

गाय-बैल के साथ भेड़-बकरियों का पालन पूरे गाँव का पुश्तैनी पेशा रहा। प्रारम्भ से पहाड़ों में अन्न, दाल व सब्जियों के सीमित विकल्प होने के कारण भेड़-बकरियों का पालन बुजुर्गों का मुख्य व्यवसाय रहा। सर्दियों में अधिक बर्फ के चलते अन्न व फल शाक के साधन सीमित रहते, सो पशु धन लोगों की मुख्य आवश्यकताओं की पूर्ति करते। सर्द मौसम में ठंड से बचाव के लिए भेड़-बकरियों से ऊन मिल जाती और आपातकाल में इनसे दूध से लेकर माँस आदि की आवश्यकता पूर्ति हो जाती।

घर में एक व्यक्ति की ड्यूटी इनको चराने की रहती। सुबह आठ-नौ बजे क्लार (ब्रँच) के बाद घर का एक सदस्य इनके काफिले को लेकर जंगल में जाता। भेड़ के छोटे मेमणों व बकरियों के छोटे बच्चों (छेलूओं) को घर में ही एक विशिष्ट स्थान पर रखा जाता। सर्दियों में चूल्हे व तंदूर बाले कमरे में एक बाढ़ा लगाकर एक कौने में इनको रखा जाता, जिसमें फर्श पर नरम घास-पत्तियां बिछी रहती। बचपन इनके बाढ़े में घुसकर उनके साथ लाड़-प्यार करते, खेलते कैसे बीता, पता ही नहीं चला। अभी भी इनके साथ बिताए विशिष्ट पल याद करने पर गुदगुदाते हैं, एक सुखद सिहरन पैदा करते हैं। खुला छोड़ने पर इन नन्हें फरिश्तों की ऊछल-कूद देखने लायक रहती।

शाम को भेड़-बकरियाँ जंगल से घर आते ही अपने मेमनों व छेलुओं को याद करतीं। इनकी विशेष आबाजें सुनकर मेमने व छेलू भी मिलने के लिए जैसे मचल जाते और सीधा उनके पास पहुँचकर स्तनपान करते। जीव-जंतुओं के इस ममत्व भाव को देखकर ईश्वर की कलाकारिता पर विचार होता कि उसने अपनी सृष्टि को चलाने के लिए कैसे जीव-जंतुओं से लेकर इंसान को तक ममत्व एवं वात्सल्य की डोर में बाँध रखा है, जिसके चलते उसकी सृष्टि का पालन-पौषण एवं विस्तार सहज रुप से होता रहता है।

बचपन ननिहाल में बीता, सो हमारे मामू साहब भेड़ों-बकरियों को लेकर जंगल में जाते। हमारे बुजुर्ग नानाजी भी भेड़-बकरियों का पालन कर चुके थे, व कई बार इनके झुंडों के साथ फुआल की भूमिका में लाहौल-स्पिति जा व रह चुके थे। वे बड़ी रूचि के साथ वहाँ बिताए रोमाँचक पलों को याद करते और कथा-कहानियों व किवदंतियों के रुप में हम बच्चों को बड़े शौक और गर्व के साथ सुनाते। जो निश्चित रुप से हमारे बाल मन को रोमाँचित करती, कहीं गहरे छू जाती। और हमारा संकल्प बलवती होता कि एक बार हम भी इस यात्रा का हिस्सा अवश्य बनेंगे और कुछ दिन-सप्ताह या माह वहाँ रहकर जीवन की बीहड़ सच्चाई को नज़दीक से देखेंगे।

बारिश में लाहौल-स्पिति जाने से पहले भेड़-बकरियों का काफिला गाँव के ऊँचाई वाले जंगल में ही रहता, यहाँ रुकने के लिए रुआड़ थे व साथ ही देवदार से लेकर रई-तोश के आसमान छूते सदावहार हरे-भरे वृक्ष। जंगली खनोर (चेस्टनट) के पेड़ों से गिरने के सीजन में तो भेड़-बकरियों की डाइट प्लानिंग होती। एक दिन पनाणी शिला में खनोर के जंगलों में चरती और दो दिन ऊपर ठेली (जंगली घास के ढलानदार मैदान, बुग्याल) में। जंगली खनोर के गिरे काले रंग के गिरिदार बीजों को भेड़-बकरियाँ फोड़कर खातीं, जिनको बहुत पौष्टिक माना जाता है। अधिक खाने पर पेट फूलने का डर रहता, सो बाकि के दो दिन इनसे दूर रखा जाता।

जुलाई माह में हमारे इलाके में मौनसून की बारिश होती, सो फुआल मई-जून में लाहौल-स्पीति की ओर कूच करते। मालूम हो कि लाहौल-स्पिति घाटी में मौनसून की बारिश नहीं होती। कुल्लू-मानाली के आगे पीर-पंजाल पर्वत श्रृंखला मौनसून के नम बादलों को आगे बढ़ने से रोकती है। इस तरह लाहौल-स्पिति घाटी भेड़ पालकों के लिए इस सीजन में आदर्श रहती।

सड़कें तो बाद में बनीं, हमारे पुरखों के समय तो आवागमन का मार्ग पहाड़ों की ऊँचाईयों में धार (रिज़) से ही रहता। काइस धार से आगे पटोउल, फुटा सोर, दोहरा नाला और फिर रूमसू टॉप से होकर चंद्रखणी पास और फिर आगे कई पर्वत शिखरों को पार करते हुए हामटा पास पहुँचते, वहाँ से आगे रोहतांग दर्रा पार करते हुए लाहौल-स्पीति घाटी में प्रवेश होते और वहाँ से चंद्रताल से लेकर बारालाचा, सूरजताल के बीच भेड़-बकरियों के काफिले को चराते हुए कुछ माह वहाँ रहते।

सड़क मार्ग बनने से फिर फुआलों की भेड़ें सीधे सड़कों से होते हुए आगे बढती हैं, हालाँकि ट्रैफिक के चलते काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है, आवादी के बीच बढ़ते हुए भेड़ चौरों का भी भय रहता है। इसलिए मध्यम मार्ग अपनाते हुए कहीं जंगल से होते हुए भेड़ों को चरवाते हुए आगे बढ़ते हैं और कहीं सीधे सड़क मार्ग से लाहौल स्पीति की ओर कूच करते हैं। मालूम हो कि कुल्लू व लाहौल घाटी को जोड़ने वाली अटल टनल में भेड़-बकरियों के लिए वैकल्पिक मार्ग मुख्य मार्ग के नीचे बनाया गया है, यह कितना उपयोग में है, इसको तो सुधी लोग ही बता सकते हैं।

नानाजी लाहौल घाटी के नीरु घास का जिक्र खूब करते, जो अपने पौष्टिक गुणों के लिए जाना जाता है। इसको खाने से भेड-बकरियों में चर्बी बढ़ती है और इसका अत्यधिक सेवन नुकसानदायक भी माना जाता है। यहाँ तक कि इसके अत्यधिक सेवन से भेड़-बकरियों की मौत भी हो सकती है। अतः इसका यथोचित ही सेवन हो, ये फुआल ध्यान रखते। इसके अतिरिक्त कोड़ु, पत्तीस व अन्य जड़ी-बूटी नुमा घास भी इस घाटी के उच्चर क्षेत्रों में होती, जिसके सेवन से भेड़-बकरियाँ विशेष पौषण पाती और इनके दूध में भी इसके स्वाद व पौष्टकता का समावेश होता। इस तरह फुआलों से लेकर कुत्तों को तक इनका दूध आवश्यक पौषण का काम देता।

नानाजी से भेड़ चरवाने के रोमाँचक किस्सों को सुनते-सुनते यह भाव बलवती होता गया कि गाँव के जंगल से लाहौल-स्पीति तक यात्रा एवं वहाँ पर रुकने के अनुभव का डॉक्यूमेंटेशन करेंगे, इसकी कथा-गाथा व रोमाँच को लिपिवद्ध करेंगे। हमारे बचपन का यह सपना, सपना ही रहा, लेकिन 22-23 वर्ष की आयु में हमें पर्वतारोहण करते हुए लाहौल-स्पिति घाटी में जाने का अवसर अवश्य मिला। हालाँकि तह तक नानाजी गुज़र चुके थे।  

मानाली में पर्वतारोहण संस्थान से बेसिक प्रशिक्षण के दौरान हम पूरी टीम के साथ मानाली से अपने प्रशिक्षकों के मार्गदर्शन में रोहताँग दर्रा पार करते हुए, खोखसर पहुँचे, फिर सिसू से होते हुए तांदी पुल पार करते हुए कैलाँग पहुंचे और फिर जिस्पा में पर्वतारोहण संस्थान के क्षेत्रीय केंद्र में रुके और आगे दारचा पार करते हुए, पटसेऊ और फिर जिंगजिंगवार में अपना बेसकैंप लगाए। (इस यात्रा का रोमाँच आप नीचे दिए लिंक में पढ़ सकते हैं।)

बेसिक कोर्स का रोमाँच, भाग-2, मानाली से जिंगजिंगवार घाटी का रोमाँचक सफर

यहाँ की आइस फील्ड़ और बर्फ की ढलानों पर आठ-दस दिन का अभ्यास करते हुए फिर सूरजताल झील, बारालाचा दर्रा पहुँचे और वहाँ से लगभग 18,000 फीट ऊंची चोटी का आरोहण किए। (इस यात्रा का रोमाँच आप नीचे दिए लिंक में पढ़ सकते हैं।)

बेसिक कोर्स का रोमाँच, भाग-3, लाहौल घाटी में पर्वतारोहण और शिखर का आरोहण

गुरुवार, 30 अप्रैल 2026

जीवन गीत - इससे तो मौन बेहतर...


देखता रहूँ अब खेल मालिक का बन मौन दर्शक

 

कड़ुआ सच्च कहूँ, तो वो बुरा मान जाएं,

किसी का दिल दुखाना भी तो ठीक नहीं,

इससे तो मौन बेहतर ।1।

 

खरी खोटी सुनाऊँ तो हो जाए इज्जत तार-तार उनकी,

किसी की इज्जत से खिलवाड़ भी तो ठीक नहीं,

इससे तो मौन बेहतर ।2।

 

सच्च कहूँ, तो उनकी मूढता हो जाए उज़ागर,

उनके अज्ञान से पर्दा हटाने की घृष्टता भी ठीक नहीं,

फिर, इससे तो मौन ही बेहतर ।3।

 

धूर्त की शातिरता करुँ ऊजागर, तो उनकी शांति हो जाए भंग,

किसी की अशांति, बेचैनी का कारण बेमतलब क्यों बनूं,

इससे तो मौन ही बेहतर ।4।

 

उनके हठ पर उठाऊँ उंगली, तो हो जाए उनका मान हनन,

किसी के हठयोग में क्यों बनूं बाधक,

इससे तो मौन ही बेहतर ।5।

 

ज़बरपेली पर उठाऊँ उंगली, तो हो जाए उनका लोकहित बाधित,

उनके तथाकथ विजयी अभियान में क्यों बनूँ बाधक,

इससे तो मौन बेहतर ।6।

 

कागजी अभियान पर उनके उठाऊँ सवाल, तो उन्हें लगे न अच्छा,

उनके मायावी खेल का मजा क्यों करुँ किरकिरा,

इससे तो मौन बेहतर ।7।

 

दूसरों के कंधे पर रख बंदूक, उनकी मनमानी पर उठाऊं सवाल,

तो उनके सृजन अभियान का बन जाऊं रोढ़ा,

इससे तो मौन रहना ही बेहतर ।8।

जब औकात से बाहर हो परिस्थितियाँ, इंसान मात्र कठपुतली,

तो न्याय का ठेका ले, क्यों दैवीय विधान में बनूं बाधक,

इससे तो मौन रहना ही बेहतर ।9।

 

समय से पहले नहीं जब कोई सुनने समझने सुधरने के लिए तैयार,

तो क्यों करुँ छेड़खान किसी की नियति, भाग्य, भवितव्यता से,

ऐसे में तो फिर मौन रहना ही बेहतर ।10।

 


जब काल के भी काल महाकाल के हाथों कमान युग परिवर्तन की,

तो फिर क्यों न दूँ उस महानायक को काम करने अपना,

अकिंचन सा सेवक बन देखता रहूँ खेल मालिक का बन मौन दर्शक ।11।

 

ईमानदारी संग निभाता रहूँ जिम्मेदारी अपनी, रह अपने स्वधर्म में अढिग,

अपना सुधार ही जब सेवा संसार की सबसे बड़ी,

तो क्यों न करता रहूँ सत्यं-शिवं-सुंदरं की अराधना, सतत मौन रहकर।12।

यादों के झरोखों से – मेरी पहली दक्षिण भारत यात्राएं, भाग-2

 

अन्नामलाई से पांडिचेरी, ऊटी, कोडाइकनाल एवं मैसूर

नटराज मंदिर, चिदाम्बरम

मालूम हो कि अन्नामलाई यूनिवर्सिटी तमिलनाड़ु के चिदंबरम में स्थित एक प्रमुख, सरकारी आवासीय विश्वविद्यालय है, जिसकी स्थापना सन 1929 में हुई थी। 1000 एकड़ में फैला इसका परिसर कृषि, इंजीनियरिंग, चिकित्सा व कला सहित विभिन्न विषयों में शिक्षा प्रदान करता है। यह दक्षिण एशिया के सबसे बड़े आवासीय विश्वविद्यालयों में से एक है। 

अन्नामलाई विश्वविद्यालय चिदाम्बरम रेल्वे स्टेशन से 2-3 किमी दूरी पर स्थित है और चिदाम्बर शहर के ह्दय क्षेत्र में स्थित है प्रख्यात नटराज मंदिर, जो भगवान शिव को समर्पित एक अत्यंत प्राचीन एवं पवित्र मंदिर है। यह 10वीं-11वीं शताब्दी की चोल वास्तुकला का एक प्रमुख उदाहरण है, जो अपने चार ऊंचे गोपुरमों, भरतनाट्यम नृत्य की मुद्राओं की नक्काशी और आकाश तत्व को दर्शाने के लिए प्रसिद्ध है। यहाँ भगवान शिव की ब्रह्माण्डीय नर्तक के रुप में पूजा होती है और शिव को निराकार (आकाश) रुप में पूजा जाता है, जिसे चिदंबर रहस्य कहा जाता है।

भगवान नटराज

यूनिवर्सिटी में राइस प्रोसेसिंग यूनिट में हमें यहाँ की राइस मिल्ज को देख आश्चर्य हुआ कि राइस ब्रान (चाबल भूसी) कितना बहुमूल्य होता है, जिससे तेल से लेकर साबुन, पशु खाद्य उत्पाद, सौंदर्य़ प्रसाधन जैसे कितने ही उत्पाद तैयार किए जा सकते हैं। पौष्टिकता की दृष्टि से राइस ब्रान विटामिन बी और ई सहित फाइबर एवं एंटिऑक्सिडेंट से भरपूर होता है।

सुबह-शाम परिसर में भ्रमण के तहत हम लोग हॉस्टल से लेकर विश्वविद्यालय के प्राकतिक एवं सुरम्य कैंपस में टहलते। रास्ते में एक तालाब पड़ता, आगे खेल के मैदान और बैडमिंटन कोर्ट आदि। एक दिन यूनिवर्सिटी के किसी बड़े अधिकारी की बेटी की शादी में उनके घर जाने का निमंत्रण मिलता है। यहाँ के लोगो का अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ा होना व उनकी सादगी हम सबको गहरे प्रभावित करती है। शादी में पधारे विश्वविद्यालय के कुलपति एवं बड़े अधिकारी तक धोती-कुर्ता में केले के पत्ते में भोजन करते दिखे।

यूनिवर्सिटी से ही कुछ दूरी पर समुद्री बीच था। फुर्सत के दिनों में हम यहाँ भी किराए से ली गई साईकल से टूर कर आए। बेैकवाटर में मेंग्रोव के जंगल हमने पहली बार देखे। और नाव में चढ़कर इनका नज़दीक से अवलोकन किए और वहाँ चहचहाते पक्षियों के दृश्यों का आनन्द लिए। रास्ते के ग्रामीण परिवेश में नारियल के वृक्षों की भरमार के साथ चाबल की खेती अधिक दिखी। दूर-दूर तक इनका विस्तार दर्शनीय रहा।

तमिलनाडू की एक विशेषता उम्दा बस सर्विस लगी, जिसका किराया भी किफायती था। स्पीड के मामले में लगता था कि जैसे हवाई जहाज में सफर कर रहे हों। इस तरह लम्बी दूरी का सफर कुछ घंटों में पूरा हो जाता।

ट्रेनिंग के अंतिम दिनों में आसपास भ्रमण के अंतर्गत हम पांडिचेरी की योजना बनाते हैं, चिदम्बर बस स्टेशन से बस पकड़ते हैं, जो यहाँ से लगभग 70 किमी पड़ता था व लगभग डेढ़ घंटे में पहुँचते हैं। अरविंद आश्रम में समाधी दर्शन करते हैं और इसके बाद सागर तट का अवलोकन करने के वाद फिर पास के एक पार्क में बैठकर विश्राम करते हैं।

पुडुचेरी, सागर तट

सामने एक कोठी के गेट पर रंग-बिरंगी टोपी पहने सुरक्षा गार्ड हमारे लिए कौतुक का विषय थे। हम अनजाने में ही जिज्ञासावश उनकी ओऱ इशारा कर रहे थे। कुछ ही मिनट में हमारा दल पुलिस के घेरे में था। वे हम सबको पुलिस जीप में बिठाते हैं। हम सब हैरान थे कि हमारे साथ ये क्या हो रहा है। हमने तो कोई गुनाह नहीं किया है और न ही कोई कानून तोड़ा है, पार्क में बैठकर हंजी मजाक ही तो कर रहे थे।

बिनम्रतापूर्वक हम सबको स्थानीय पुलिस स्टेशन में बिठाया जाता है। पीछे फोटो लगे थे, उग्रवादियों के। लगा कि हम सबका मिलान उनके फोटो के साथ हो रहा था। हम सबकी तहकीकात हो रही थी। बाद में पता चला कि हम जिस पार्क में बैठे थे, सामने पांडिचेरी के राज्यपाल की कोठी थी, जो थे रिटार्यड लेफ्टिनेंट जनरल, जिनका स्वर्ण मंदिर अमृतसर के ब्लू स्टार ऑपरेशन में अहं भूमिका थी। इस कारण वे उग्रवादियों की हिटलिस्ट में थे। इस बात से अनजान हम सब पार्क में हंसी मजाक व इशारेबाजी कर रहे थे। फ्रेंच उपनिवेश होने के कारण अभी भी पांडिचेरी में सुरक्षा गार्ड वही पारम्परिक रंग-विरंगी टोप पाली बर्दी पहने थे।

तहकीकात में पुलिस को कुछ हाथ नहीं लगा। अंत में हमारे एक सहपाठी संस्थान के निर्देशक का मोबाइल नम्बर शेयर करते हैं, जिनसे बातचीत करने पर पुलिस दस्ते को स्पष्ट होता है कि यह ग्रुप ट्रेनिंग करने आया छात्रों का एक समूह था और वे हमे वाई-इज्जत बरी करते हैं। वहाँ से छूटते ही हम उल्टे पाँव बस में बैठकर बापिस अन्नामलाई कैंपस पहुँचते हैं और रास्ते भर आज की रोमाँचक घटना की चर्चा का आनन्द लेते हैं।

ट्रेनिंग पूरी होने पर हम दक्षिण भारत के कुछ हिल स्टेशन व मुख्य शहरों का दिग्दर्शन करते हुए लुधियाना यूनिवर्सिटी कैंपस बापिस आते हैं। इस क्रम में हमें मैसूर पलेस के म्यूजियम व महल को देखते हैं, यह वाडियार राजवंश का पूर्व निवास है, जो इंडो-सार्सेनिक शैली में बना है। इसके अंदरूनी हिस्से की नक्काशी और शाही वस्तुओं का संग्रह दर्शनीय लगा।

चामुंडेश्वरी मंदिर, चामुंडी हिल्स, मैसूर

इसके बाद पहाड़ी रास्ते में ऊपर चढ़ते हुए पहाड़ी पर चामुंडी हिल्स के नाम से प्रख्यात स्थान पर चामुंडेश्वरी मंदिर के दर्शन करते हैं, जहाँ से मैसूर शहर के विहंगम दर्शन होते हैं। इन्हें दुर्गा का अवतार माना जाता है और ये 51 शक्तिपीठों में एक माना जाता है। पौराणिक कथाओं के अनुसार इसी पहाड़ी पर देवी ने महिषासुर का वध किया था। पास में ही पहाड़ी पर एक ही चट्टान से तराशी गई नंदी महाराज की वृहद प्रतिमा ध्यान आकर्षित करती है, जहाँ सामूहिक फोटोग्राफी होती है।  

इसी क्रम में हम ऊटी हिल स्टेशन पहुंचते हैं। मैदानी क्षेत्र से धीरे-धीरे पहाड़ों का आरोहण करती बस यात्रा हमें बखुबी याद है। यहां ऊटी झील में बोटिंग का आनन्द लेते हैं। बॉटेनिकल गार्डन के दर्शन करते हैं, जहाँ दुर्लभ प्रजाति के पेड़-पौधे हैं। 1848 में स्थापित यह गार्डन 55 एकड़ में फैला हुआ है।

डोड्डाबेटा पीक से ऊटी का विहंगम दृश्य

फिर ऊटी स्टेशन से सर्पिली सड़कों से होते हुए पहाड़ की चोटी तक पहुँचे थे, जहाँ हल्की बारिश हो रही थी, ठंडक भी काफी थी। यह नीलगिरि की सबसे ऊँची चोटी डोड्डाबेटा पीक थी, जहाँ वर्नाकुलर से नीचे मैदानी घाटियों के दर्शन करते हैं। बिना दूरवीन के भी यहाँ से घाटी के मनोरम दृश्य दिखते हैं, हालाँकि बादल के कारण दृश्य बाधित थे। तात्कालिक फोटो के अभाव में प्रस्तुत प्रतीकात्मक फोटो से इसका अवलोकन किया जा सकता है।

इसके बाद हम लोग दूसरे हिल स्टेशन कोडाइकनाल पहुंचते हैं, जहाँ का प्राकृतिक सौंदर्य़ ऊटी की तुलना में अधिक संरक्षित व नैसर्गिक लगा। आश्चर्य नहीं कि इसे दक्षिण भारत का स्विटजरलैंड कहा जाता है। यह अपनी झीलों, जंगलों व ठंडी जलवायु के लिए जाना जाता है। यहाँ झील में कुछ बोटिंग करते हैं और यहाँ से साइकिल किराए पर लेकर साइक्लिंग करते हुए हिल स्टेशन का अवलोकन करते हैं। यहाँ के पहाडी मार्ग पर चढते हैं और फिर घूमकर बापिस आते हैं।

कोडाइकनाल का विहंगम दृश्य

इस तरह ईश्वर की कृपा से हमारी दक्षिण भारत की पहली यात्रा से कई सुखद स्मृतियाँ जुड़ीं, जो याद करने पर फिर ताजा हो उठती हैं। लगभग तीन-चार दशकों बाद अपनी धुंधली पड़ी स्मृती को केरेदते हुए कुछ यादगार स्थल एवं पल यहाँ प्रस्तुत करने का प्रयास किया है। इस दौर में तो अब वहाँ बहुत कुछ बदल चुका होगा। आज भी इन स्थलों से जुड़ी कोई सूचना अखबार या इंटरनेट पर देखते-पढ़ते हैं, तो महज़ ही इनसे जुड़ी पुरानी यादें झंकृत हो उठती हैं।

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